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Tuesday, December 24, 2013

मूक भारत है बहुत लेकिन शोर है। उफ़ तुम्हारा यह गर्जन - तर्जन , छुट्टे सांड की सी द्ल्हार . लकड़ब्ग्घे की तरह मुंह खोल कर नर मांस की गंध युक्त भाप निकालना . तख्तो - ताज , राज - पाट जो चाहो ले लो , पर बंद करो काल महिष पर बैठ कर यह गर्जना . गायें दूध देना बंद कर देंगी , नदियों की गति सहम जायेगी!

मूक भारत है बहुत लेकिन शोर है।



उफ़ तुम्हारा यह गर्जन - तर्जन , छुट्टे सांड की सी द्ल्हार . लकड़ब्ग्घे की तरह मुंह खोल कर नर मांस की गंध युक्त भाप निकालना . तख्तो - ताज , राज - पाट जो चाहो ले लो , पर बंद करो काल महिष पर बैठ कर यह गर्जना . गायें दूध देना बंद कर देंगी , नदियों की गति सहम जायेगी!


पलाश विश्वास




आज का संवाद विषय साभार राजीव नयन बहुगुणा


उफ़ तुम्हारा यह गर्जन - तर्जन , छुट्टे सांड की सी द्ल्हार . लकड़ब्ग्घे की तरह मुंह खोल कर नर मांस की गंध युक्त भाप निकालना . तख्तो - ताज , राज - पाट जो चाहो ले लो , पर बंद करो काल महिष पर बैठ कर यह गर्जना . गायें दूध देना बंद कर देंगी , नदियों की गति सहम जायेगी!


Palash Biswas नयनदाज्यू आपने दहशत के माहौल को स‌ही तरीके स‌े पकड़ा है।आज के स‌ंवाद में शामिल ही नहीं बल्कि आज के स‌ंवाद का विषयभी यही स‌ाभार.इजाजत है न,नहीं पूछुंगा।आप पर इतना हक तो मेरा बनता ही है।बल्कि हमारी ओर स‌े तो फरमान यह है कि आगे विषय विस्तार भी आप ही करें।


नयनदाज्यू,आपके लिखे का अभी इंतजार है।आपने दहशतजदा समय का काफी सटीक चित्र उकेरा है। हम फेसबुक के माध्यम से संवाद का दरवाजा खोलने की शायद बेकार ही कोशिश कर रहे हैं।लाइक और शेयर के अलावा कोई गंभीर बहस की गुंजाइश यहां है नहीं।मोबाइल के जरिये फेसबुक पर जो हमारे लोग हैं,वे दरअसल हमारे लोग रह नहीं गये हैं। वे मुक्त बाजार के उपभोक्ता बन गये हैं।


बहस और अभियान लेकिन फेसबुक पर कम नहीं है। जो है वह लेकिन मुक्त बाजार का प्रबंधकीय चमत्कार है। हम लोग उनके मुद्दों पर जमकर हवा में तलवारबाजी कर रहे हैं,जबकि अपने मुद्दों को पहचानने की तमीज हमें है ही नहीं। जो लोग समर्थ हैं,वे भी मौकापरस्त इतने कि अपने स्टेटस को जोखिम में डालने को तैयार नहीं हैं।


अब हालत यह है कि धर्मनिरपेक्षता बनाम स्त्री विमर्श का गृहयुद्ध लगातार तेज होता जा रहा है। रोज नये मोर्चे खुल  रहे हैं।जमकर सभी पक्षों से गोलंदाजी हो रही है। लेकिन कारपोरेट धर्मोन्मादी सैन्य राष्ट्रवाद के मुकाबले कोई मोर्चा बन ही नहीं रहा है। हम दरअसल किसका हित साध रहे हैं,यह समझने को भी कोई तैयार नहीं है।


आपके फेसबुक मंतव्य को हमने संवाद का विषय जो चुना है,वह इसलिए कि यह भय और आतंक इस लोकतांत्रिक बंदोबस्त के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है। लोग सुनियजित तरीके से भय का वातावरण बना रहे हैं ताकि नागरिक व मानवाधिकार के खुले उल्लंधन के तहत एकतरफा कारपोरेट अभियान में कोई बाधा न पहुंचे। पिछले दिसंबर में संसदीय सत्र के दरम्यान हुए निर्भया जनांदोलन के फलस्वरुप यौन उत्पीड़न के खिलाफ कानून बना दिया गया तुरत फुरत। न यौन उत्पीड़न का सिलसिला थमा है और न थमे हैं बलात्कार।सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के तहत जो इलाके हैं,जो आदिवासी और दलित इलाके हैं,जहां सलवा जुड़ुम और रंग बिरंगा अभियान के तहत जनता के खिलाफ युद्ध जारी है,वहां पुलिस और सेना और सामतों को रक्षाकवच मिला हुआ है,वहां यौन उत्पीड़न और बलात्कार किसी कानून से थमने वाले नहीं है। लेकिन विडंबना तो यह है कि सत्ताकेंद्रों में, राजधानियों में, शहरीकरण और औद्योगीकरण के खास इलाकों में, सशक्त महिलाओं के कार्स्थलों में स्त्री पर अत्याचारों की घटनाएं बेहद बढ़ गयी हैं और उन घटनाओं को हम पितृसत्तात्मक नजरिये से देख रहे हैं। हमारी धर्मनिरपेक्षता का आंदोलन भी इस पितृसत्ता से मुक्त नहीं है। धर्मनिरपेक्षता बनाम स्त्री विमर्श का यह गृहयुद्ध देहमुक्ति विमर्श और सत्ता तंत्र में, कारपोरेट राज में अबाध पुरुष वर्चस्व के संघर्ष की अनिवार्य परिणति है।


अभी अभी जिस ईश्वर का जन्म हुआ है और हमारे वैकल्पिक मीडिया और जनांदलनों के सिपाहसालार जिनकी ताजपोशी के लिए बेसब्र हैं, वे नरेंद्र मोदी से ज्यादा खतरनाक साबित होंगे। खतरा नरेंद्र मोदी से उतना नहीं, बाजार की प्रबंधकीय दक्षता और सूचना क्रांति के महाविस्फोट से जनमे जुड़वां ईश्वरों से कहीं ज्यादा है,यह बात मैं बार बार कह रहा हूं। कालाधन की अर्थ व्यवस्था के विरुद्ध आपका कोई न्यूनतम कार्यक्रम नहीं है और न कोई मोर्चाबंदी है। आप भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं। केजरीवाल टीम के बैराग्य का तो खुलासा सरकार बनते न बनते होने लगा है। जनादेश और जनमत संग्रह की प्रणाली को हाशिये पर रखें,तो भी कांग्रेस के खिलाफ जिहाद के बाद कांग्रेस के खिलाफ सामाजिक शक्तियों की सामूहिक गोलबंदी और जनादेश क विरुद्ध जाकर नये सिरे से जनमतसंगर्ह करके कांग्रेस के सशर्त समर्थन से सबसे ज्यादा प्रतिव्यक्ति आय और सर्वाधिक कारपोरेट राज और उपभोक्ता बाजार के पोषक विशिष्ट आनलाइन समाज के  मार्फत आप देश,समाज और राष्ट्र का चरित्र बदलने चले हैं,ऐसे लोगों के भरोसे जिनकी नैतिकता सत्ता में निष्मात हो चुकी है सत्ता तक पहुंचने से पहले।


कांग्रेस,संघ परिवार,वामपंथी,बहुजनपंथी सर्वदलीय सहमति से परिवर्तन की लहर थामने के लिए मोर्चाबद्ध तरीके से लोकपाल विधेयक पारित किया गया है। जो भ्रष्टाचार को कितना खत्म करेगा, वह पहले से हासिल कागजी हक हकूक के किस्से से जाहिर न भी हुए हों तो देर सवेर उजागर हो जायेगा।


यह बात समझनी चाहिए कि अब जो राजनीतिक सत्ता केंद्रित भ्रष्टाचार है,वे कारपोरेट हितों के मुताबिक हैं। जिसमें हिस्सेदार सत्तावर्ग के सभी तबके कमोबेश हैं। कारपोरेट फंडिंग से चलने वाली राजनीति ने कारपोरेट और निजी कंपनियों को, एनजीओ को भ्रष्टाचार के दायरे से बाहर रखा है और तहकीकात के औजार वही बंद पिंजड़े में कैद रंग बिरंगे तोते हैं। हम बारबार लिख रहे हैं और आपका ध्यान खींच रहे हैं कि हम लोग जनांदोलनों से सिरे से बेदखल हो गये हैं। हम मुद्दों से बेदखल हो गये हैं।हम अपने महापुरुषों और माताओं से बेदखल हो गये हैं,हम हरतरह के विचारों से, विमर्श से और समूचे लोकतंत्र और भारत के संविधान से भी बेदखल है।जल जंगल जमीन आजीविका और नागरिकता से बेदखली से कम खतरमनाक नही है यह।किसी भी बेदखली के विरुद्ध प्रतिवाद इसी बेदखली से असंभव हो गया है।उत्पादन प्रणाली ध्वस्त है तो यह इसलिए कि भारतीय कृषि की हत्या का हम प्रतिरोध नहीं कर पाये और हमारे सारे आंदोलन अस्मिता निर्भर है जो भारतीय कृषि समाज और भूगोल और जनता के बंटवारे का मुख्य आधार है।इसे संभव बनाने में स्वंयसेवी प्रत्यक्ष विदेशी विनियोग निर्भर तमाम जनसंघटन हैं।अब समझ लीजिये कि धर्म निरपेक्षता और स्त्री अस्मिता का यह गृहयुद्ध भी कुल मिलाकर एनजीओ करिश्मा है। जहां भ्रष्ट आचरण निरंकुश है और लोकपाल से वहां कुछ भी नहीं बदलना वाला है।


मनमोहन ईश्वर के अवसान के बाद जो दो जुड़वां ईश्वरों की ताजपोशी की तैयारी है,उनके पीछे भी एनजीओ की विदेशी फंडिंग ज्यादा है,कारपोरेट इंडिया औरकारपोरेट मीडिया तो है ही।


सत्ता वर्ग को नरेंद्र मोदी से दरअसल कोई खतरा है ही नहीं। आर्थिक सुधारों के समय जनसंहार संस्कृति के मुताबिक राजकाज में कांग्रेस और संघ परिवार अकेले साझेदार नहीं हैं। वामपंथी,बहुजनवादी और रंग बिरंगी अस्मिताओं के तमाम क्षत्रप भी कारपोरेट नियंत्रण के तहत इस कारपोरेट राजकाज में समान साझेदार है।


भय और आतंक का माहौल सिर्फ नमोमय भारतके निर्माण से ही नहीं हो रहा है। स्त्री जो हर कहीं असुरक्षित हैं, हर कहीं जो नागरिक मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, पांचवीं और छठीं अनुसूचियों और संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध देश बेचो अभियान के तहत हिमालय,पूर्वोत्तर में और दंडकारण्य में जो भय और आतंक का माहौल है,जो सलवा जुड़ुम तक सीमाबद्द नहीं है,गुजरात नरसंहार और बाबरी विध्वंस का न्याय नहीं हुआ लेकिन सिख जनसंहार के युद्ध अपराधी और हिंदुत्व के पुनरुत्थान से पहले जो दंगे हुए,उन तमाम मामलों के लिए नरेंद्र मोदी जिम्मेदार नहीं है।धर्म निरपेक्षता के नाम पर हम संघ परिवार को कटघरे में खड़ा कर दें और आर्थिक नरसंहार के युद्ध अपराधी,भारत में धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की मौलिक पिताओं को बरी कर दें.यह कैसी धर्मनिरपेक्षता है,कम से कम मेरी सझ में नहीं आती।


भय और आतंक के इसी माहौल में अपने पास जो है ,उसीको बहाल रखने की फिक्र ज्यादा है लोगों को।बाजार में नंगे खड़े होने,आत्महत्या के कगार पर खड़े हो जानेके बावजूद बाबासाहेब अंबेडकर के मुताबिक बहुजन भारत आज भी मूक है।पांच करोडड क्या पचास करोड़ लोग भी आनलाइन हो जाये तो यह निःस्तब्धता टूटेगी नहीं। घनघोर असुरक्षाबोध ने हमारे इंद्रियों को बेकल बना दिया है और पूरा देश कोमा में है।प्राण का स्पंदन फेसबुक पोस्ट से वापस लाना शायद असंभव है।हम रात दिन चौबीसों घंटा सातों दिन बारह महीने कंबंधों के जुलूस  में हैं।कब्र से उठकर रोजमर्रे की जिंदगी जीने की रोबोटिक आदत है। संवेदनाएं अब रोबोट में भी है।हाल में काम के बोझ से रोबोट ने आत्महत्या भी कर ली लेकिन कारपोरेट राज में आत्मसमर्पित भारतीयों में कोईसंवेदना है ही नहीं। होती तो अपनी मां बहनों के साथ बलात्कार करने,उनके यौन उत्पीड़न का उत्सव मनाने का यह पशुत्व हम में नहीं होता।पशुत्व कहना शायद पशुओं के साथ ज्यादती है और ऐसा लिखने पर कम से कम अपने घर में सविता मुझे बख्शेगी नहीं।कारपोरेट राज के नागरिक मनुष्यों की तुलना पशुओं से करना पशुों का अपमान है जो अपने समाज और अपने अनुशासन के प्रति कहीं ज्यादा संवेदनशील और जिम्मेदार हैं।


हम न पशु हैं और न हम मनुष्य रह गये हैं।हम अपने कंप्यूटरों,विजेट और गेजेट,उनसे बने वर्चुअल यथार्थ की तरह, रोबोट की तरह अमानवीय हैं।इसीलिए सारी विधाएं,सारे माध्यम,सारी भाषाएं,सारी कलाएं अबाध भोग को समर्पित है,मनुष्यता को नहीं।हमारा सौंदर्यबोध चूंकि क्रयशक्ति निर्भर है. तो बाजार में टिके रहने के लिए यथासंभव क्रयशक्ति हमारे जीने का एकमात्र मकसद है और हम सारे लोग बाजार के व्याकरण के मुताबिक आचरण कर रहे हैं ।उस व्याकरण के बाहर न राजनीति है और न जीवन।


तमाम लोग इसी क्रयशक्ति के कारोबार में भय और आतंक का माहौल रच रहे हैं। अकेले नरेंद्र मोदी नहीं।माध्यमों में जो आवाजें अभिव्यक्त हो रही हैं,वे अब सबसे ज्यादा दहशतगर्द हैं। बाजार की तरह धर्मोन्माद और सांप्रदायिकता भी पुरुषतांत्रिक है,जो अब निर्लज्ज तरीके से स्त्री अस्मिता से युद्धरत है। धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की तरह माफ करना दोस्तों, धर्मनिरपेक्षता भी अब भय और आतंक पैदा करने लगा है और इसका जीवंत उदाहरण मुजफ्परनगर है।


इस सर्वव्यापी सर्वशक्तिमान कारपोरेट राज के तहत दुनिया भर में सबसे ज्यादा असुरक्षित स्त्री है और पुरुषतंत्र की नजर में योनि से बाहर उसका कोई वजूद ही नहीं। इस वैश्वक लूटतंत्र की जायनवादी व्यवस्था में राजनीति का शिकार हर देश के अल्पसंख्यक हैं।मसलन भारत में मुसलमान,ईसाई,सिख और बौद्ध तो बांग्लादेश में हिंदू और बौद्ध,पाकिस्तान में हिंदू और ईसाई, हिंदू राष्ट्र नेपाल में मदेशिया हिंदू तो श्रीलंका में तमिल हिंदू और म्यांमार में फिर मुसलमान।सिर्फ उत्पीड़ितों की पहचान देश काल के मुताबिक बदलती है ,उत्पीड़न की सत्ता का चरित्र समान है जो अब कारपोरेट है। धर्म और जाति के आरपार नस्ली और भौगोलिक भेदभाव है,जिसके कारण उत्तराखंड और पूर हिमालयी क्षेत्र में सांप्रदायिक या धार्मिक नहीं अंधाधुंध कारपोरेट विकास का आतंक है। जो इस देश में और दुनिया भर में प्रकृति से जुड़े तमाम समुदायों और प्रकृति के संरक्षक समुदायों की भारत के हर आदिवासी इलाके की तरह समान नियति है।


अब गौर करे तो यह धर्मोन्मादी सांप्रदायिक हिंसा भी दरअसल विकास का आतंक है और एकाधिकारवादी कारपोरेट आक्रमण है। अस्सी के दशक में उत्तरप्रदेश में दंगों का कारपोरेट चेहरा हमने खूब देखा है और उस पर जमकर लिखा भी है,हालांकि विद्वतजनों ने मेरे लिखे का कभी नोटिस ही नहीं लिया है।


विडंबना यह है कि करीब दस साल से परंपरागत लेखन छोड़कर विशुद्ध भारतीय नागरिकों और विशुद्ध मनुष्यता को संपादक, आलोचक ,प्रकाशक के दायरे से बाहर संबोधित करने की कोशिश कर रहा हूं।


दीवारसे सिर टकराने का नतीजा सबको मालूम है।

हम रोज लहूलुहान होते हैं लेकिन नयनदाज्यू हमारे अपने को फर्क नहीं पड़ता। उत्तराखंड पर लिखने पर हमारे लिखे पर संवाद नहीं होता ,बल्कि हमारे असली या नकली उत्तराखंडी होने की जांच पड़ता ल ही होती है।


अब लग रहा है कि इस आखिरी माध्यम से भी हम बहुत जल्दी बेदखल होने वाले हैं।

किसको क्या फर्क पड़ता है ,नयनदाज्यू।


हिमालयी जलसुनामी से किसको क्या फर्क पड़ा है नयनदाज्यू,बतायें। हम लोग  तो केदार के पट खुलने के वैदिकी मंत्रोच्चार में ही निष्णात है गये।


याद करें कि चिपको के वक्त पहाड़ में कितने गैर सरकारी संगठन थे और डूब में शामिल पहाड़ में समाज सेवा के लिए कितना विदेशी प्रत्यक्ष निवेश है।कमोबेश यही माहौल है।


भारत नमोमय बने या न बने, केजरीवाल या नंदन निलेकणि प्रधानमंत्री बने या नहीं बने,अब कारपोरेट राज से मुक्ति असंभव है और इस भय,आतंक,गृहयुद्ध और युद्ध से भी रिहाई असंभव है।


मूक भारत है बहुत लेकिन शोर है।

कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.

-अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार, डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन व अन्य

Harnot Sr Harnot

आप सभी को क्रिसमिस की हार्दिक शुभकामनाएं-एस आर हरनोट

Unlike ·  · Share · 2 hours ago ·


Himanshu Kumar

समस्या मार्ग की नहीं है समस्या ये है कि तथाकथित सही मार्ग पता होने पर भी उस पर चला न जाय .


आज के वख्त की सबसे बड़ी त्रासदी यही है .

Like ·  · Share · 18 minutes ago near Delhi ·

Palash Biswas हिमांशु जी, मुश्किल है कि स‌ही रास्ता कोई कामयाबी के शिखर पर पहुंचने का शार्ट कट नहीं होता,बल्कि यह नाकामी की अग्नि नदी में डूबकर निकलने और फिर भी विचलन स‌े बचने की चुनौती है।निपट अकेले हो जाने का जोखिम है और स‌बकुछ दांव पर लागाने के बाद हारते जाने का आतंक पर जीत की भी चुनौती है।सारे लोग जो फास्ट फूड के आदी हैं,वे रसोई चलाने की जहमत तो उठा नहीं स‌कते।


Himanshu Kumar and Shamshad Elahee Shams shared a link.

अब इन घरों में रहने कोई नहीं आएगा - BBC Hindi - फ़ोटो-वीडियो

bbc.co.uk

मुसलमानों के पलायन के बाद मुज़फ़्फ़रनगर के कई गाँवों में घर वीरान पड़े हैं. दंगों के सौ दिन बाद मुज़फ़्फ़रनगर के कुटबा गाँव पहुँचे दिलनवाज़ पाशा. देखें तस्वीरें.

  • Himanshu Kumar
  • अब इन घरों में रहने कोई नहीं आएगा , ये उन मुसलमानों के घर हैं जिन्हें मुज़फ्फर नगर दंगों के दौरान राष्ट्रवादी लोगों ने मोदी साहेब को प्रधानमंत्री बनाने के लिए जला दिया .

  • Like ·  · Share · 6246 · 2 hours ago near Delhi ·

  • Shamshad Elahee Shams
  • जिसे भारत पर गर्व हो वह ये तस्वीरे देख ले.....कभी ये मिसाले कश्मीर से भगाए हिन्दुओ की, कभी मुज़फ्फर नगर के मुसलमानों की-कभी असम तो कभी गुजरात. धर्मान्धता का शिकार देश की आज़ादी से लेकर अभी तक इंसान हो रहा है. किसी भी रंग के हुक्मरानों ने इंसान की जिंदगी को धर्म के ठेकेदारों से महफूज़ नहीं की; बल्कि इन भेडियों को खूब पाला पोसा है, और जब-जब इनकी जरुरत पडी उनसे मानवता को खुसटवाने-नुचवाने का काम खूब किया करवाया है ताकि सियासत की भट्टी पर सत्ता का सालन वोटो के इंधन से पकाया जा सके. कुछ मतिमूढ़ कहते है कि भारत मंगल गृह पर पहुँच गया है ..लानत.

  • Like ·  · Share · 2753 · 12 hours ago ·

  • hares

  • Meherzaman Khan सियासत का खुला लंगर हूं मैं

  • कांपती-खोखली अगर-मगर हूं मैं

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  • 2 hours ago · Like · 4

  • Sanjay Garg नहीं !मोदी ने नहीं सेक्युलर कहलाने के लिए लालायित सियासत दानो की कारिस्तानी है ये सब ! में फिर कहता हूँ मोदी के अलाबा कोई देश का तत्काल में भला नहीं कर सकता ! जिस तरह हर मर्ज की दबा भी भिन्न भिन्न होती है उसी तरह देश की वर्तमान परिस्थिति का इलाज सिर्फ मोदी है !

  • about an hour ago · Like

  • Siraj A Kakorvi घरों के साथ मुजफ्फर नगर की एकता को भी आग लगा कर जला दिया......और ऐसा करने से उन दरिंदों को सम्मानित भी क्या गया

  • about an hour ago via mobile · Like

  • Azhar Ali क्या वे पून्ह वापस आपाएंगे

  • about an hour ago · Like

  • Palash Biswas जनादेश जो कारपोरेट बनने की इजाजत हम देते रहे हैं,उसकी तार्किक परिणति यही है।मेरठ के दंगे के भूगोल पर मेरा उपन्यास उनका मिशन एक लघु पत्रिका में स‌ीमाबद्ध होकर रह गया।हमें इसका चश्मदीद गवाह बनने का निरपेक्ष पेशेवर यथार्थ का स‌ामना करना पड़ा है मेरठ और बरेली में छह स‌ाल के मंदिर मस्जिद गृहयुद्धकालीन पत्रकारिता स‌मय में।जो अनुभव मेरे कहानी स‌ंग्रह अंडे स‌ेंते लोग में मैंने दर्ज भी कराये हैं।भारतीय धर्मोन्मादी कारपोरेट राजनीति और इस उपमहाद्वीप में अल्पसंख्यकों के वध की वैदिकी हिंसा की परंपरा की गर्जना,सिंहनाद और हुंकार की यह लहलहाती फसल है।भय और आतंक का यह दहशतजदा वक्त बार बार मलियाना और हाशिमपुरा और लज्जा को दोहराता जायेगा।

  • भारत,बांग्लादेश,पाकिस्तान,श्रीलंका,म्यांमार,नेपाल,भूटान स‌र्वत्र। बीबीसी की टीआरपी जनसंख्या स‌्थानांतरन के बाद स‌े लगातार उछाले पर है इसी निरपेक्ष यथार्थ के लिए।विडंबना यह है कि हम इस पूरे महादेश की जनता की गोलबंदी के जरिये इस दहशत को तोड़ने के बजाय हम स‌ारे लोग जाने अनजाने इसी दहशत राज की पैदल स‌ेना के स‌िपाहसालार बन गये हैं।जनादेश का नतीजा जो भी हो,हमेशा अल्पसंख्यकों और शरणार्थियों की गरदने या हलात होती रहेगी या जिबह।अखिलेश का समाजवादी राज और उत्तर प्रेदेश के बहुप्रचारित सामाजिक बदलाव के चुनावी समीकरण का नतीजा मुजफ्फरनगर है तो नमोमयभरत के बदले केजरीवाल भारत बनाकर भी हम लोग क्या इसन हालात को बदल पायंगे,बुनियादी मसला यही है।।इस स‌िलसिले को तोड़ने के लिए हम शायद कुछ भी नहीं कर रहे हैं।गर्जना,हुंकार और शंखनाद के गगनभेदी महानाद में हमारी इंद्रियों ने काम करना बंद कर दिया है।

  • a few seconds ago · Like

Ashok Kumar Pandey

जिन लोगों ने मार्क्सवाद को सिर्फ "देखा" है और उसका ककहरा पढने की भी कोशिश नहीं की कभी वे अब मार्क्सवाद की आलोचना ही नहीं करते, बाक़ायदा शिक्षा देते हैं. कल एक मित्र तोहमत लगा रहे थे कि मार्क्सवाद देह-मुक्ति का सिद्धांत देता है यानि फ्री सेक्स वगैरह की वकालत करता है. मैंने चुनौती दी की एक ऐसा उद्धरण दीजिये तो अब तक जवाब न आया.


ज़ाहिर है वह कम्युनिस्ट नैतिकता क्यों पढेंगे? औरतों को घर-चूल्हे के भीतर क़ैद रखने की आवाजें तमाम जगहों से कभी चेतावनी तो कभी स्नेहिल उपदेश के रूप में आती हैं. और इसका विरोध करने वाली हर आवाज़ उन्हें "मार्क्सवादी" लगती है.


हिंदी की कथित नारीवादियों का जो हाल है वह सब जानते हैं कि किस तरह निजी अनुभवों और कुछ कल्पित-अकल्पित सेक्स कथाओं को उन्होंने यहाँ नारीवाद का प्रतीक बना दिया है और उसे नारीवाद की कसौटी पर कसने का आलोचकों में न तो साहस है न विवेक. लेकिन मार्क्सवाद के इन कथित आलोचकों द्वारा उन सभी को "मार्क्सवादी" बना देने का खेल अद्भुत है.


पितृसत्ता के खेल में यौनिकता के दमन और नियंत्रण की बेहद शातिराना भूमिका है तो उसकी आज़ादी की लड़ाई में इन पर उसके अपने अधिकार की बात शामिल होगी ही. लेकिन "मुक्त स्त्री" का कोई अर्थ सभी के उपभोग के लिए मुक्त स्त्री नहीं. इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि उस पर किसी और का नियंत्रण नहीं होगा बल्कि वह इससे जुड़े निर्णय खुद लेगी.


ऐसे ही, हालिया मामले में किसी ने नए क़ानून का विरोध नहीं किया है. सबने मांग इसी क़ानून के तहत न्याय की की है. लेकिन जिन्हें शोर मचाना है जिन्हें वे तो मचाएंगे ही.


मुझे किसी की आलोचना से कोई दिक्कत नहीं...बात बस इतनी है कि बिना देखे सिनेमा और बिना पढ़े सिद्धांतों की आलोचना को गंभीरता से कैसे लिया जाय.

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  • Mohan Shrotriya, Shamshad Elahee Shams, Sushil Yati and 39 others like this.

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  • Ashok Kumar Pandey सिद्धांत लगभग सबका कैसे अच्छा होता है? क्या मनु स्मृति या कुरआन या बाइबल स्त्री को वे अधिकार देते हैंSantosh Singh जी?

  • 31 minutes ago · Like · 2

  • Santosh Singh ये कौन कह रहा है?...वो तो पूर्वमध्यकालीन कृतियाँ है...मै तो आधुनिक मैनिफेस्टो की बात कर रहा था उपर के कमेंट में..वैसे, उसी स्टेटस में मनुस्मृति और कुरान माननेवाले पर भी बात की गयी है, भाई...

  • 24 minutes ago via mobile · Edited · Like

  • Ashok Kumar Pandey यह यहाँ कही बात पर है भाई जी कि सिद्धांत सभी के अच्छे होते हैं

  • 16 minutes ago · Like

  • Prakash K Ray Aise jhanduon ko list mein kyon rakhte hain? Bahar khadediye.

  • 10 minutes ago · Like

  • Ashok Kumar Pandey अरे नहीं प्रकाश भाई...ऐसे न कहिये.

  • 7 minutes ago · Like

  • Palash Biswas अपढ़ लोगों के प्रवचन स‌े ही गुलशन का कारोबार चल रहा है,अशोक जी। लेकिन स‌ामाजिक शक्तियों के नेतृत्व में तो हमारे मार्क्सवादी मित्र ही रहे हैं।भारतीय वामपंथी आंदोलन में स‌त्तर के दशक तक स्टडी स‌र्कल अनिवार्य था।इसके बावजूद वामपंथी आंदोलन स‌ामाजिक शक्तियों को गोलबंद करने में बुरीतरह फेल हुआ तो स‌ामंती पुनरूत्थान के दौर में यह अखंड प्रवचन स‌मय है।अगर स्त्री अस्मिता बनाम धर्मनिरपेक्षता का गृहयुद्ध इसीतरह जारी रहा और भारतीय नारी अलग ध्रूवीकरण के तहत कारपोरेट राज को ही मजबूत बनाने के खेल में शामिल हो गयी,तो गर्जना,सिंहनाद और हुंकार स‌े शिथिल इंद्रियों के दोबारा काम पर लौटने की गुंजाइश बेहद कम है।चुनौती वामपंथियों के लिए है,धर्मनिरपेक्षों के लिए है,देशभक्तों और बहुजनों के लिए भी है कि इस स‌ामंती कारपोरेट जायनवादी दहशतगर्द तंत्र के खिलाफ कैसे एकजुटता की फौलादी दीवार तामीर की जा स‌कें।बरखिलाफ इस ताकीद के हमारे जो स‌मर्थ लोग हैं वे तो मुक्तिबोध के ही शब्दों में सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक् चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं उनके ख़याल से यह सब गप है मात्र किंवदन्ती। रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध ये सब लोग नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे। प्रश्न की उथली-सी पहचान राह से अनजान वाक् रुदन्ती।

  • a few seconds ago · Like

  • Ashok Kumar Pandey Prakash Ray agreed. Lekin ve shararti nahin hain. Asahamat hain asabhya nahi. Asabhya logon se main baat bhi nahi karta.

  • a few seconds ago via mobile · Like



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Chandra Shekhar Joshi

46 minutes ago near Dehra Dun ·

  • अवैध खनन पर रोक लगाने को सरकारी मशीनरी के हाथ किसने बांध रखे थे- wwwe.himalayauk.org
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    • Palash Biswas चंद्जोर शेखर जोशीजी,हिमालयकीखबरें खुल नहीं पातीं।हम स‌ाइटपर जाकर हताश हो चुके हैं।इसे थोड़ा य़ूजर फ्रेंडली बनायें।हो स‌कें तो हम जैसे लोगों को स‌ामग्री की स‌ूची भेज दें,ताकि जरूरी जानकारी छूट न जाये।इससमाचार का जैसे आपने लिंक दिया है,वैसा ही लिंक फेसबुक पर जारी करते रहें तो लोगों तक हगिमालय की स‌ूचनाएं अबाध पहुंच स‌केंगी।यह स‌ंदेश उन स‌भी मित्रों के लिए है जो स‌ूचना युद्ध के योद्धा हैं।

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    • Chandra Shekhar Joshi जी बिल्‍कुल, मैं अभी इस ओर दिखवाता हूं-* आपकी खबरें हम प्रमुखता से प्रकाशित कर रहे हैं- बहुत बहुत आभार

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Rajiv Nayan Bahuguna

उफ़ तुम्हारा यह गर्जन - तर्जन , छुट्टे सांड की सी द्ल्हार . लकड़ब्ग्घे की तरह मुंह खोल कर नर मांस की गंध युक्त भाप निकालना . तख्तो - ताज , राज - पाट जो चाहो ले लो , पर बंद करो काल महिष पर बैठ कर यह गर्जना . गायें दूध देना बंद कर देंगी , नदियों की गति सहम जायेगी

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Chandra Shekhar Joshi

अवैध खनन पर रोक लगाने को सरकारी मशीनरी के हाथ किसने बांध रखे थे- wwwe.himalayauk.org

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  • Palash Biswas चंद्जोर शेखर जोशीजी,हिमालयकीखबरें खुल नहीं पातीं।हम स‌ाइटपर जाकर हताश हो चुके हैं।इसे थोड़ा य़ूजर फ्रेंडली बनायें।हो स‌कें तो हम जैसे लोगों को स‌ामग्री की स‌ूची भेज दें,ताकि जरूरी जानकारी छूट न जाये।इससमाचार का जैसे आपने लिंक दिया है,वैसा ही लिंक फेसबुक पर जारी करते रहें तो लोगों तक हगिमालय की स‌ूचनाएं अबाध पहुंच स‌केंगी।यह स‌ंदेश उन स‌भी मित्रों के लिए है जो स‌ूचना युद्ध के योद्धा हैं।

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Rajiv Nayan Bahuguna

लोक तंत्र का तकाजा यह है कि कर्मठ , लोक प्रिय , त्यागी - तपस्वी , उत्तराखंड के इतिहास , भूगोल एवं संस्कृति में रचे - बसे मुख्य मंत्री श्री विजय बहुगुणा की धर्म पत्नी सुधा भाभी को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाए . साकेत भैया को टिहरी से जिता कर केंद्र में राज्य मंत्री ( स्वतंत्र प्रभार ) बनाया जाए . शेखर भैया उत्तराखंड से राज्य सभा में भेजे जाएँ . गौरी बहू युजना आयोग की उपाध्यक्ष हों . रीता दीदी को भी उत्तराखंड भेजा जाए . वह बीस सूत्रीय कार्य क्रम की बाग़ डोर संभालें . इन सबके सलाहकार आर्येन्द्र शर्मा जी & सूर्यकांत धस्माना जी हों . देखता हूँ राज्य कैसे तरक्क़ी नहीं करता

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Rajiv Nayan Bahuguna

बोध कथा

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सुकन्या ब्रह्मचारी योगाचार्य बाबा से --- बाबा जी क्या आप बाल ब्रह्मचारी हैं ?

बाबा - हाँ , हम अखंड , आ जन्म , आमरण ब्रह्चारी हैं . रति और मदन को अपने योग बल से भस्म चुके हैं .

सुकन्या -- बाबा जी अगर मैं अर्ध्द वस्त्र विहीन होकर उद्दीपक नृत्य करूँ तो आपको कुछ कुछ होगा ?

बाबा - कहा न , हमें काम नहीं व्यापता , हमें कुछ नहीं होगा .

सुकन्या --- बाबा जी अगर पूर्णतः निर्वसन हो जाऊं तो ?

बाबा-- कुछ भी करो , हमारी तपस्या नहीं डिगेगी

सुकन्या -- बाबा जी अगर पूर्णतः निर्वस्त्र होकर आपके अंक में आ बैठूं , तब भी क्या निस्पृह रहेंगे ?

बाबा -- चल झूठी बातूनी कहीं की , तबसे बस बोले जा रही है , करती कुछ नहीं

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  • Kripal Bisht, Ajay Kanyal, त्रिभुवन चन्द्र मठपाल and 33 others like this.

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  • Rajiv Nayan Bahuguna Rps Gautam आप प्रोफाइल पर अपना मूल फोटो लगाईये , यह कार्टून हटाईये . आपका मित्रता प्रस्ताव चट से स्वीकार करूँगा

  • 41 minutes ago · Like · 1

  • Rajiv Nayan Bahuguna गढवाली में कहावत है - कव्वा न छोडू अपनी लव्वा . कुछ मित्रों ने अपनी पुरानी आदत के मुताबिक़ फिर से अपने प्रोफाइल पर खुद की जगह किसी एक्टर , खिलाड़ी , नेता , भगवान , बच्चे या दृश्य का फोटो लगाना स्टार्ट कर दिया है . कुछ फोटो की जगह ब्लैंक छोड रहे हैं . यह ...See More

  • 40 minutes ago · Like · 2

  • Soban Singh Bisht सत्य कथा।

  • 33 minutes ago via mobile · Like · 1

  • Rps Gautam Rajivji, on this ID I am working as Common Man. I like Hindi Poetry for that I requested you. For literary purpose I will use new ID with my own Photo. I can send my photo to you on mail, if required I can come even on Webcam Sir. I appreciate your poetry that is why I sent request. If you have problem I am withdrawing it. Your comment is your opinion for which you are free.

  • 31 minutes ago · Like · 1

  • Rajiv Nayan Bahuguna Rps Gautam प्रोफाइल पिक के बारे में मैं संघ परिवार की तरह कट्टर हूँ . आप जिस फोटो को अधिक पसंद करते हों , उसे अपना कवर पिक बना सकते हैं , लेकिन प्रोफाइल पर खुद का लगाईये , जैसे पास पोर्ट या आई कार्ड पर लगाते हैं .

  • 8 minutes ago · Like

  • Palash Biswas यह भी स‌ामाजिक यथार्थ की बोधकथा है।

  • a few seconds ago · Like

Rajiv Nayan Bahuguna

चार राज्यों में पाँचों खाने चित्त होकर भी कांग्रेस हाइ कमान का उत्तराखंड में अब तक के सर्वाधिक अलोक प्रिय और अवांछित मुख्य मंत्री विजय बहुगुणा की विदाई में देर करना यह साबित करता है की वह ऊंचा सुनता है और उसे हिन्दी नहीं आती . कोई बात नहीं , चार महीने बाद जनता ठीक से समझा देगी , आने दो लोक सभा चुनाव

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Himanshu Kumar

मंदिर के परिसर में बैठ कर गरीबों को ब्याज़ पर पैसा देने वाले साहूकारों पर जीसस कोड़े ले कर टूट पड़ा था और उन्हें मार मार कर वहाँ से भगा दिया और उनकी मेजें उलट दी थीं .


दुनिया को लूटने वाले और सारे संसार पर युद्ध थोपने वाले अमरीका और यूरोप के पूंजीवादी राष्ट्र खुद को जीसस का अनुयायी कहते हैं . यही संस्थागत धर्म की त्रासदी है .

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Reyazul Haque

12 hours ago

(Not I or he. The reader will wonder what poetry

says to us in time of disaster )

Blood

and blood

and blood

in your land.


In my name and in your name

in the almond blossoms

in the light and shade

in the children's milk

in the grain of wheat

in the tin of salt,

skillful hunters hit the targets

with distinction.


Blood

and blood

and blood.


This land is too small for the blood of its children,

who stand on the threshold

of the Resurrection in masses.

Is this land really blessed or baptized


in blood

and blood

and blood,


which neither prayer nor sand dries.

There is not enough justice

in the pages of the holy book

to rejoice martyrs as they walk free above the clouds.


Blood by day,

blood in the dark,

blood in words.


From 'Counterpoint' (For Edward W. Said) - Mahmoud Darwish


Himanshu Kumar

8 hours ago near Delhi

पुराना धर्म कहता था दांत के बदले दांत और आँख के बदले आँख ही धर्म है .


जीसस ने पहली बार कहा कि नहीं यह धर्म नहीं है . बल्कि धर्म तो यह है कि कोई तुम्हारे एक गाल पर तमाचा मारे तो दूसरा गाल भी आगे कर दो .


और कोई तुमसे तुम्हारी कमीज़ मांगे तो तुम उसे अपना कोट भी दे दो .


जीसस ने कहा सूईं के छेद से ऊँट का निकलना संभव है लेकिन एक भी अमीर का स्वर्ग में प्रवेश असम्भव है .


जीसस गरीब की तरह पैदा हुआ , गरीब बन कर ही जिया और गरीबों की तरह अकेला ही मर गया .


कामरेड जीसस को लाल सलाम .

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Himanshu Kumar shared a link.

December 22 near Delhi · Edited

''उन्होंने पहले मेरी बड़ी बेटी को खींचा और उसके साथ बारी बारी से बलात्कार किया . फिर उन्होंने दूसरी बेटी को खींच लिया और उसके साथ बलात्कार किया और उसके गुप्तांग में डंडे से मारा . ''


- मुज़फ्फर नगर में राहत शिविर में रह रही माओं से मिल कर लौ...See More

Thread Bared | Neha Dixit

www.outlookindia.com

They had invested hope in the village pradhan. He had said he'd protect them. Instead, what happened at his house during the morning of the riots will make you shudder. <i>Outlook</i> meets Muslim women at the camps, the faceless Nirbhayas of Muzaffarnagar....

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Sudha Raje

मान लो

और मानने लायक बात भी है ।

कम से कम हमारे निजी विचार से ।

कि एक और क़ानून बने कि ।

किसी पुरुष का किसी भी ऐसी स्त्री से दैहिक संबंध दंडनीय घोषित कर दिया जाये ।

जिस स्त्री की आयु पुरुष की आयु से 10बर्ष से भी कम है ।


यानि तब कोई विवाह बेमेल नहीं हो सकेगा ।

कोई

लङकी को ""सहमति"" के दुष्ट बहाने से नहीं चकमा दे सकेगा कानून को ।

अलबत्ता सज़ा भले ही तीन साल हो या पाँच

मगर ऐसे हर पुरुष को सज़ा होनी जरूर चाहिये

जो अपनी आयु से 10वर्ष से भी अधिक छोटी स्त्री से विवाह करे या दैहिक संबंध बनाये ।

दूसरे मामलों में स्त्री पर भी दंड घोषित हो जिन मामलों में स्त्री अपनी आय़ु से दस साल से भी छोटी आयु के पुरुष से विवाह करती है या दैहिक संबंध बनाती है ।

चाहे कम ही समय की सज़ा हो मगर अवैध घोषित होना ही चाहिये ऐसे संबंध लागू होने की ताऱीख के बाद


इसका लाभ उन विधवाओं को भी मिलेगा जिनको संपत्ति बँटवारा रोकने के लिये उस देवर से ब्याह दिया जाता है जो उसके ब्याह के दिन आठ साल का बच्चा था ।

और फिर उसको हमेशा कुंठा में जीना पङता है ।

पता है बात गले नहीं उतरेगी कट्टर मर्दवादियों के और रूढ़वादी स्त्रियों के भी ।

किंतु एक इस कानून में करोङों की जिंदग़ी के सुकून लिखे हैं ।

©सुधा राजे

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TaraChandra Tripathi

6 hours ago ·

  • कभी-कभी जब में पेट की भाषाओं के दबाव तले दम तोड़ती भाषाओं के बारे में विचार करता हूँ तो मुझे निश्वास लग जाता है. मुझे लगता है कि जिस प्रकार हम सब अपनी बोलियों की उपेक्षा कर रहे हैं, हमारी बोलियाँ भी अगले बीस-पचीस साल में विश्व की अब तक दम तोड़ चुकी उन सैकड़ों भाषाओं और दुद्बोलियों में शामिल हो जाएंगी जिनका आज कोई नाम लेवा भी शेष नहीं है. संसार में जो समाज अपनी मातृ भाषाओं या दुदबोलियों के प्रति जागरूक नहीं हैं, उनकी बोलियों को मक्खन लगी रोटी की भाषाएँ निगलती जा रही हैं. आधी दुनियाँ की सैकड़ों बोलियों को स्पेनी निगल चुकी है, अफ्रीकी भाषाएँ स्वहिली भाषा के प्रकोप से मर रही है, रूसी पूर्वी यूरोप की भाषाओं को निगलने के लिए तैयार बैठी है और अंग्रेजी की महामारी आत्मगौरव से सम्पन्न फ्रेंच, जर्मन, जापानी, चीनी जैसी कुछ भाषाओं को छोड़ कर दुनियाँ की सारी बोलियों को उजाड़ देने पर तुली हुई है.
  • लोग कहते हैं इस इसमें क्या बुरा है? यदि सारी दुनिया की एक ही भाषा हो तो विभिन्न देशों, जातियों और समाजों के बीच संवाद में कितनी सुविधा होगी. लेकिन वे भाषा को केवल आपसी बात-चीत का माध्यम भर मानने की भूल करते है. वे भूल जाते हैं कि किसी भी बोली को बनने में हजारों वर्ष लगते हैं. सोचिये हमारे पुरखों ने प्रकृति के विविध रूपों और प्रभावों को स्पष्ट पहचान देने के लिए कितना कुछ किया है.होगा. वर्षा हुई होगी तो उसने उसके विविध रूपों को कुछ नाम दिये , ह्ल्की वर्षा के लिए उन्होनें द्यो बुराणों कहा , तो .उससे कुछ तेज वर्षा के लिए झुण- झुण बर्ख और तेज वर्षा के लिए द्योक तहड़ और कई दिनों तक होने वाली वर्षा को सतझड़ नाम दिया. अपने बच्चों को खेल लगाने के लिए वर्षा की ध्वनि को भी 'द्यो लागो दण दण बुड़ि भाजी बण-बण" में संजोया. जब हिमपात आरंभ हुआ तो उन्होंने उसके विभिन्न रूपों को भी पहचान दी. उसके हल्के रूप को ह्यूँ-मुन कहा और जब खूब हिमपात हुआ होगा तो उसने उसे हिमाव कहा. खेल खेल में ही वह ' ह्यूँ पडो मा (माघ) ग्यूँ धरूँ काँ द्वारा हिमपात के गेहूँ की उपज में वृद्धि होने के अपने अनुभव को अगली पीढियों को सौंपते चले गये. चाँद निकला तो उसके सबसे भव्य रूप को फूल-फटक ज्यूनि कह कर रूपायित किया. सुबह जल्दी उठने पर भु्र-भुर उजाला देखा तो वह घुप्प अन्यार से परेशान भी हुए . पौष मास के जाड़े से उन्हें गडगड़ाट हुआ तो बुखार आने पर झरझराट हुआ.
  • अपने आस-पास की वनस्पतियों को उनके रंग, रूप, प्रकार, और प्रभाव और उपयोग को परखते हुए अपनी बोली के शब्द समूह से उपयुक्त शब्द चुन कर उनके नाम रखे, कहीं उनके रूप को आधार बनाया तो कहीं उनके प्रभाव को और उनके इतने प्रकारों को नाम देते चले गये कि उन वनवासी आदिम पूर्वजों की सूक्ष्म दृष्टि पर आश्चर्य होता है. यही उन्होंने अपने आस-पास के जीवों को पहचान देने में किया. कहीं उनकी आवाज को आधार बनाया तो कहीं उनके रूप को और कहीं उनके व्यवहार को आधार बनाया.
  • उन्होंने परिवार बनाया, समाज का गठन किया. अपने समाज से जुड़ाव विकसित किया. हर एक नाते को नाम दिया, इजा, बौज्यू, ठुल बा, ठुलि इजा, कैंजा, काक, काखि, बुबु, दिदि, बैणि, भिंज्यू, मामा, भतिज, भतिजि, नाति, नातिणि, मम-पुसी भै- बैणि और भी न मालूम कितने सम्बन्धों को उस ने पहचान दी.
  • उन्होंने परंपरओं को जन्म दिया, विश्वासों को जगाया, भ्रान्तियाँ भी पालीं, उनका उपचार भी ढूँढा. विभिन्न वनस्पतियों और खनिजों के रोग-निवारक तत्वों को पहचाना, उनसे चिकित्सा विज्ञान का सूत्रपात किया. उसने मनोरोगों के उपचार के लिए शाबर मंत्रो की रचना की. देवयोनियों की कल्पना की, उनके प्रभाव के बहाने समाज का नियमन किया.
  • उन्होंने गीत गाये, अपने पूर्वजों के गौरव को ही नहीं उनकी बुराइयों को भी अपने गीतों, गाथाओं, कथाओं, में संजोया, बालगीत बनाये,पहेलियाँ सृजित कीं, खेलों की रचना की, अल्पनाएँ विकसित कीं उनमें अपने विश्वासों और पूर्वजों की यादों को संजोया. यह सब कुछ एक दिन में नहीं हुआ. इसमें पल- पल कर हजारों वर्ष लग गये. और उ्नके प्रयासों से हमें एक पहचान मिली. यह पहचान भी उन्होंने एक शब्द 'ई' (यथा कुमाऊनी, गढ़्वाली, बुन्देली, मराठी, गुजराती, मलयाली पंजाबी,) की पोटली में बाँध कर अगली पीढियों को सौंपते जाने के लिए हमें दी.
  • हमारा साहित्य, हमारा ज्ञान-विज्ञान, हमारे उपकरण, हमारे संसाधन एक दिन में नहीं पनपे हैं उनको वर्तमान रूप में आने में हजारों वर्ष लगे हैं. इसीलिए डार्विन के जीवों की उत्पत्ति और हमारे अवतार वाद में समानता की झलक मिलती है. बिग बैंग और ओ3म में एक सा अनुनाद सुनाई देता है. ब्रह्मांड की काल-गणना और ब्रह्मा- विष्णु- महेश की क्रमिक जीवनावधि गणना में समानता दिखती है.
  • यह जो मनुष्य की गर्दन पर बैठा हुआ है, जिसे हम दिमाग या मस्तिष्क कहते हैं, एक दिन में नहीं बना है. अनन्त काल में बनता चला गया है. इसमें भी जिसने जड़ की कंजड़ मे जाने की चेष्टा की वह अपने युग से सैकड़ों साल पहले केवल बाँस की नालियों के सहारे वह सिद्ध कर गया, जिसका लोहा आज रेडियो दूरवीन भी मान रही हैं. और यह सब हमारी भाषाओं और बोलियॊं में संचित है
  • मित्र, बोली या भाषा केवल संवाद का माध्यम नही होती वह एक विशाल विश्वकोश होती है. वह किसी क्षेत्र की निवासियों की पहचान होती है. यदि बोली का अवसान हुआ तो समझ लीजिये दुनिया के छ; अरब लोगों में हमारी पहचान क्या होगी.
  • हमारे बच्चे अंग्रेजी में भी महारत हासिल करें, अपने प्रदेश और देश की राजभाषा में भी प्रवीण हों. समृद्धि उनके कदम चूमे पर माँ तो माँ है माँ के दूध से मिली बोली. दुदबोली. उसकी उपेक्षा न करें. यह कोई कठिन काम भी नहीं है. जरा सा अपनी बोली के प्रति हीनताबोध से बचें. घर में और अपने सगे संबन्धियों से अपनी बोली में बोलना आरंभ कर दें. बस. हमारी बोली, हमारे पूर्वजों की युगों के अन्तराल में बड़े परिश्रम से संचित विरासत युगों तक न केवल बनी रहेगी अपितु विकास के साथ समृद्ध भी होती जायेगी.
  • जरा सोचिये तो!
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9 hours ago

काश कि ऐसा होता: नरेंद्र मोदी ने अपने समर्थकों को सकते में डालते हुए साल 2002 के गुजरात नरसंहार के लिए माफी मांग ली. वही हैरान-परेशान प्रसंशकों ने उनके बयान से दूरी बना रखी है. पढ़िए इंडिया टुडे की खास फैंटेसी रिपोर्ट.

http://aajtak.intoday.in/story/modi-shocks-with-sorry-1-749799.html

modi shocks with sorry: इंडिया टुडे: आज तक

aajtak.intoday.in

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के 2002 के गुजरात नरसंहार के लिए मांफी मांगने से आलोचक हैरान और समर्थकों की जमात सकते में.

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13 hours ago

कड़ी मेहनत, चाकचौबंद योजना और प्रेरणादायी नेतृत्व के जरिए सियासत में अनाड़ी आप ने कांग्रेस, बीजेपी को सबक देते हुए जीता दिल्ली का दिल.

the rise of everyman: इंडिया टुडे: आज तक

aajtak.intoday.in

कड़ी मेहनत, चाकचौबंद योजना और प्रेरणादायी नेतृत्व के जरिए सियासत में अनाड़ी आप ने कांग्रेस, बीजेपी को सबक देते हुए जीता दिल्ली का दिल.

अयोध्या में बाबरी दोहराव की कोशिश !

शाह आलम

प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी, अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभार, मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगे के बाद क्या अयोध्या एक बार फिर हिंदुत्व की सियासत की प्रयोग स्थली का केंद्र बनने जा रही है? दरअसल अयोध्या में एक पुरानी मस्जिद की मरम्मत को लेकर फिर से बाबरी जैसे मुद्दे को हवा देने की कोशिश से यहाँ की राजनीति और समाज तमाम आशंकाओं की चपेट में है। एक ओर मस्जिद के बहाने अयोध्या में एक बार फिर धर्म के नाम पर अपने-अपने हिस्से के खुदाओं की खोजबीन में बड़ा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का बड़ा मुद्दा तैयार किया जा रहा है। भले ही अयोध्या का अवाम ढाई दशक से सांप्रदायिक राजनीति से आजिज आ गया हो, यहां के व्यापारियों को अयोध्या में मंदिर आंदोलन की गतिविधियों के कारण फजीहतों से गुजरना पड़ता हो- बावजूद इन चिंताओं से परे अयोध्या में कई लोग अपनी राजनीति को नए कलेवर में तराश रहे हैं। जाहिर है इस स्थिति में पुराने दिनों के खौफ में गुजर चुकी अयोध्या भविष्य के मद्देनजर डरी हुई है। अयोध्या में एक बार फिर मस्जिद के बहाने राजनीति-धर्म और प्रशासन का ताना बाना फिर गुत्थम-गुत्था नजर आ रहा है।

बाबरीमस्जिद/ राम जन्मभूमि के ठीक पीछे कुबेर टीला है। यहां के एक पेड़ पर 1857 के गदर के बाद अवध के क्रांतिकारियों को संरक्षण देने के अभियोग में दो बागियों, हनुमान गढ़ी के बाबा रामचरण दास और हसनू कटरा मोहल्ले के अमीर अली को फांसी पर लटका दिया गया था। बता दें कि बहुत दिनों तक यहांसाझी शहादत का मेला लगता रहा है। बस इसी जगह के नजदीक दुराही कुआं की पुरानी मस्जिद मौजूद है। यहां के बड़े-बुजुर्ग, दुराही कुआं को बाबरी मस्जिद की हमशक्ल बताते हैं।

दुराही कुआंमस्जिद की देखरेख करने वाले 75 साल के बुजुर्ग मुश्ताक अहमद भी बताते हैं कि 'यह मस्जिद हूबहू बाबरी मस्जिद की हमशक्ल थी। 6 दिसंबर 1992 के दिन बाबरी मस्जिद के साथ ही दुराही कुआं मस्जिद भी कारसेवकों का निशाना बन गई थी'। उस दौरान कारसेवकों ने दुराही कुआं मस्जिद के साथ 23 अविवादित मस्जिदों और सैकड़ों मजारों को नुकसान पहुंचाया था। दुराही कुआं मस्जिद के चारों ओर की दीवार ढहा दी थी। मुश्ताक बताते हैं कि 'तब मुख्य दरवाजे को तोड़ दिया गया था, मस्जिद की तीनों गुम्बदों को भी ढहा दिया गया। उस तूफान में दुराही कुआं मस्जिद के बीच की दीवाल ही किसी तरह बच गई थी'।

वर्तमान में जो अधिग्रहित परिसर है उससे सटकर ही मुश्ताक अहमद और उनके पट्टीदारों का घर है। 6 दिसंबर का वह काला दिन मुश्ताक अहमद के परिजनों की स्मृतियों से गायब नहीं हुआ है। 6 दिसंबर की घटना को याद करते हुए वे बताते हैं कि 'जब सभी मुसलमानों का घर जलाया जा रहा था उस दौरान उनके हिन्दू पड़ोसी डॉ. भास्कर ने रातों रात किसी तरीके हमारे परिवार सहित 12 लोगों को सुरक्षित किया। डॉ. भास्कर, हमें एम्बुलेंस वाहन में बैठाकर फैजाबाद ले गये और सुरक्षित रहने की पूरी व्यवस्था की'। मुश्ताक बताते हैं कि 6 दिसंबर की घटना के 4 महीने बाद ही हम अयोध्या में अपने घर लौट पाए। लौटने पर हमने दुराही कुआं मस्जिद की मरम्मत की कोशिश की लेकिन उसे रुकवा दिया गया। तब अधिकारियों ने कहा कि जांच चल रही है। तब से हम जब भी हम टूटी-फूटी मस्जिद के मरम्मत की कोशिश करते हैं, जांच और कानून का हवाला देकर कार्य रुकवा दिया जाता है। मुश्ताक बताते हैं कि अभी 20 साल बीत जाने के बावजूद अधिकारियों की जांच पूरी नहीं हुई।

विहिप से साठ-गांठ का आरोप

1992 में दुराही कुआं के पास जिन मुसलमानों के घरों और दुकानों को जलाया गया था, उस दौरान उनके पुनरुद्धार पर स्थानीय प्रशासन ने रोड़े डालने की कोशिश की थी। उस दौरान राज्यपाल ने स्वयं मौके का मुआयना कर अधिकारियों को निर्देश दिया था कि मरम्मत कार्यों में दखल न दिया जाए। जलाए गए स्थानों को बनाना कोई नया निर्माण नहीं है। इसके बावजूद दुराही कुआं मस्जिद के जीर्णोद्धार की हालिया कोशिश पर इसे रुकवाकर जिला मजिस्ट्रेट ने कानूनी पहलुओं के अध्ययन की बात कही थी। उल्लेखनीय है कि अयोध्या में मुसलमानों की ओर से हमेशा ही प्रशासन पर धार्मिक भेदभाव के आरोप लगते आए हैं। प्रशासन ने मस्जिद के ऊपर रखी टीन की पन्नियों को हटवा दिया। दूसरी ओर हाल ही में रामजन्म भूमि न्यास समिति के सदस्यपूर्व सांसद रामदास वेदांती के साथ विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के नेताओं ने भी दुराही कुआं मस्जिद पर जिलाधिकारी विपिन कुमार द्विवेदी से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। प्रतिनिधिमंडल ने मांग किया कि यह खंडहर है। अधिग्रहित परिसर के नजदीक होने के कारण दुराही कुआं मस्जिद में कोई निर्माण सुरक्षा के लिए खतरा है। प्रतिनिधिमंडल ने यह भी कहा कि 1949 में प्रशासन की ओर से निर्माण पर रोक लगा हुआ है। मुस्लिम समुदाय द्वारा इस खंडहर को साजिश के तहत मस्जिद बताया जा रहा है। यहां यथास्थिति बरकरार रखी जाए। प्रतिनिधिमंडल ने मस्जिद से रामकोट की परिक्रमा के बाधित होने की भी बात सौंपे गए ज्ञापन में कही है।

उल्लेखनीयहै कि अयोध्या में इस रवैये का कोपभाजन सिर्फ दुराही कुआं की मस्जिद को ही नहीं बनना पड़ रहा है, दूसरी और भी अविवादित मस्जिदों को विवाद का विषय बनाया जा रहा है। अभी हाल ही में रायगंज चौकी इंचार्ज ने गोड़ियाना की मस्जिद के मरम्मत का काम यह कहकर रुकवा दिया कि अगर मस्जिद की मरम्मत करवानी है तो पहले 'सीओ' से आर्डर लेकर आओ। जीर्णोद्धार में चौकी इंचार्ज ने और परेशानियां खड़ी करने के बाद कोतवाली अयोध्या की ओर से रेजिडेंट मजिस्ट्रेट को एक रिपोर्ट भेजने की चर्चा है। सूत्रों के मुताबिक इसमें कहा गया है कि 'मस्जिद' की मरम्मत करने से शहर के हालात खराब हो सकते हैं। जबकि इसका दूसरा पक्ष यह है कि आरएम के पास न तो इस सम्बन्ध में कोई शिकायत मिली और न ही कोई नोटिस जारी की गई है।

इस पर मुसलमानों का आरोप है कि विहिप से साठगांठ के कारण मस्जिद की मरम्मत रोकने के लिए ऐसे प्रसाशनिक फरमानों का बहाना बनाया जाता है।

उधर,  अयोध्या में पुराने मस्जिदों के जीर्णोद्धार के सवाल पर प्रशासन की भूमिका को लेकर आरटीआई कार्यकर्ता अतहर शम्सीका कहना है कि यहां की पुलिस, विहिप के इशारे पर मस्जिदों की मरम्मत और दीगर कामों में खलल डालती है। झूठे कानून के सहारे अयोध्या-फैजाबाद की मस्जिदों, मकबरों, दरगाहों, कब्रिस्तानों की मरम्मत, रख-रखाव और रंगाई-पुताई से रोका जाता है। पुलिस से जब सवाल पूछा जाता है तो वह 'उत्तर प्रदेश शासन के किन्हीं निदेर्शों का हवाला देती है। शम्सी ने बताया कि इस बारे में जब मैंने आरटीआई से जवाब मांगा तो पता चला कि 'अयोध्या में शासन की ओर से मस्जिदों की मरम्मत पर किसी प्रकार की पाबन्दी नहीं है'। अब सवाल उठता है कि जब मस्जिदों के जीर्णोद्धार पर पाबंदी नहीं है तो पुलिस किस आधार पर मरम्मत कार्य रुकवा देती है ?

शम्सी के मुताबिक कायदे से 'जिला प्रशासन को चाहिए कि मरम्मत कार्य में बाधा डालने वालों पर कार्रवाई करे लेकिन अयोध्या में इसका उलटा हो रहा है शम्सी इसमें 1992 में बाबरी के दोहराव की आशंकाएं ढूंढते हैं।

विवाद से राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश

पिछले कुछ महीने प्रदेश में जिस तरीके का सांप्रदायिक उभार हुआ है और अयोध्या में विहिप की गतिविधियां बढ़ी हैं उससे अयोध्या पर नजर रखने वाले जानकार परेशान हैं। अयोध्या में परिक्रमा को लेकर बड़ा विवाद है। इस पर पिछले दिनों यहां काफी तनातनी भी देखी गई। गौरतलब है कि दुराही कुआं की मस्जिद की मरम्मत के मामले में भी प्रशासन को सौंपे निवेदन में विहिप ने एक खास बात कहा है। विहिप ने किसी अज्ञात शास्त्र का हवाला देते हुए कहा है कि 'दुराही कुआं मस्जिद में निर्माण, रामकोट परिक्रमा के रास्ते में बाधक है'। अब सवाल उठता है कि विहिप जिस अनाम शास्त्र के हवाले से परिक्रमा रास्ते का सैद्धांतिकरण कर रही है, उसका तथ्यात्मक आधार क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि इस मुद्दे के बहाने यूपी में भाजपाई सियासत को परवान चढ़ाने की कोशिश हो रही है। उल्लेखनीय है कि पूर्व में भी 84 कोसी परिक्रमा को लेकर भाजपा शासित नगरपालिकाओं; जो फैजाबाद के आस-पड़ोस में थी- वहां शास्त्रीय हवाला देकर एक प्रस्ताव पारित किया गया था। प्रस्ताव यह था कि अयोध्या के 84 कोस की परिक्रमा की परिधि में कोई मस्जिद नहीं बनने दी जाएगी। अब बड़ा सवाल यह है कि 84 कोसी परिक्रमा की सीमा का आधार क्या है? दुराही कुआं मस्जिद को लेकर शुरू पूरी प्रक्रिया से आखिर क्या निष्कर्ष निकाला जाए? परिक्रमा सीमा पड़ोस के कई जिलों तक फैली है। और यह कैसे संभव है कि 84 कोस सीमा में न तो कोई शव दफनाया जाए और न ही कोई अंतिम क्रिया की जाए

क्याइस बात से इनकार किया जा सकता है कि मोदी की दिल्ली यात्रा में अहम पड़ाव यूपी में राजनीतिक लाभ के लिए दुराही कुआं मस्जिद के बहाने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को जिंदा किया जा रहा है।


Abot The Author

शाह आलम घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के पत्रकार व डॉक्युमेंट्री निर्माता हैं।

इशरत जहां केस: अमित को क्लीन चिट

नई दिल्ली।। गुजरात के इशरत जहां एनकाउंटर केस में बीजेपी के महासचिव और यूपी प्रभारी अमित शाह को बड़ी राहत मिली है।

बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खासमखास माने जाने वाले अमित शाह को इस फर्जी मुठभेड़ कांड में क्लीन चिट मिल गई है। सीबीआई ने इस केस में जो अपनी सप्लिमेंट्री चार्जशीट दायर की है उसमें अमित शाह का नाम नहीं है।




साझी विरासत की प्रतीक हज़रत शीश पैगंबर की दरगाह

अयोध्या में फ़ासिज़्म का उभार!

अयोध्या। जैसे–जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे सांप्रदायिक ताक़तें अपना फन फैलाए डँसने के लिए हमारी आगवानी मे खड़ी हैं, उनकी साजिशें चरम पर हैं। उनकी धुरी का केंद्र फिर अयोध्या बनी है ताकि नफरत की आग भड़काई जा सके और इस आग की तपिश में वे अपनी सियासी समीकरण को साध सकें।

ताज़ा मामला 21दिसंबर की रात को लगभग 7बजे अंधेरे का फायदा उठाकर अराजक तत्वों ने साझी विरासत की प्रतीक हज़रत शीश पैगंबर की दरगाह पर तोड़ फोड़ किया। अयोध्या की आवाज के महंत युगल किशोर शरण शास्त्री बताते हैं कि इनके नापाक मंसूबों का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पैगंबर की मज़ार को नुकसान पहुंचाने के बाद पच्छिम की तरफ 250 कदम पर पुरानी कब्रों और जंगलों के बीच स्थित जिन्नाती मस्जिद परिसर में मौजूद कब्रों को नुकसान पहुंचाया, साथ ही मस्जिद मे मौजूद दानिश की बेरहमी से पीट-पीट कर हत्या कर दी, दानिश पास के परमहंस डिग्री कॉलेज मे बी ए (एजी) का छात्र था। खैर प्रशासन अपनी सूझ–बूझ से शांति बनाने मे कामयाब रहा। प्रशासन ने मस्जिद के मुतवल्ली मंजूर अहमद एवं कज़ियाना मुहल्ले के मोहम्मद सलीम 'शब्बू' की साझा तहरीर के आधार पर इस मामले में IPC धारा 302, 452,143, 295 के तहत अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज़ किया है,जिसकी जांच अभी जारी है।

इस मामले में शब्बू भाई का कहना है कि पुलिस कि भूमिका कुछ समझ में नही आ रही है वह मुकदमे को पी जाना चाहती है, चिश्ती सद्भावना पुरस्कार से सम्मानित युगलकिशोर शरण शास्त्री ने तत्काल साथियों सहित घटना स्थल का दौरा करने के बाद घोर रोष प्रकट करते हुए कहा कि यह जुलाई 2005 जैसी ही आतंकवादी घटना है यह अयोध्या की साझी विरासत को तोड़ने का बहुत बड़ा कुचक्र था, जो विफल हो गया, यहाँ के मुस्लिमों ने भारी धैर्य का परिचय दिया जिसकी सराहना की जानी चाहिए। पुलिस की भूमिका पर हम अपने साथियों सहित कड़ी निगाह रखे हुए हैं, यहाँ के मेल जोल को हम टूटने नही देंगे।

सामाजिक कार्यकर्ता आफाक का कहना है कि अराजक सांप्रदायिक दंगा को अंजाम देना चाहते थे। हत्या के बाद भागने के बजाय उनके हौसले इतने बुलंद थे कि मज़ारों को तोड़ा। महफूज कहते हैं कि शीश पैगंबर की घटना एक साजिश है और धार्मिक उन्माद पैदा करने का षड्यंत्र किया गया था, सबूत मिटाने के लिए दानिश की हत्या कर दी गयी। अयोध्या के पूर्व सभासद घनश्याम दास का कहना है कि प्रशासन ने दंगा रोकने मे अच्छा प्रयास किया, सबको मिलाकर मामला आगे बढ़ने से रोका। अयोध्या निवासी वसीम भाई कहते हैं इसमे सांप्रदायिक लोगों का पूरा हाथ लगता है। इसमें स्थानीय अराजकों का हाथ हो सकता है बाहरी लोगों का नहीं।

बाबा असलम कहते हैं कि मुझे नहीं लगता कि यह दंगा की साजिश है क्योंकि ऐसा कभी नही हुआ था।

युगल किशोर शरण शास्त्री ने कहा बहरहाल अयोध्या की साझी विरासत आज भी उतनी ही मजबूत है। यहाँ का मुस्लिम समुदाय ऐसी हरकतों से चिंतित है, फिर भी सौहार्द की डोर मजबूत है। समय-समय पर फिरकापरस्त ताक़तें हमारी मेल जोल का ऐसी घिनोनी हरकतें करके इम्तेहान लेती रहती हैं। लाख कोशिशों के वावजूद वे अपने मकसद में कामयाब नही होते दिख रहे हैं। भले ही इसकी कीमत आए दिन ऐसी घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं। हम सभी को इनसे सतर्क रहने की जरूरत है। अयोध्या की साझी विरासत टूटेगी तो देश की विरासत कमजोर होगी।


Che Danish

June 12

THE WESTERN GHATS TRIBAL PEOPLE RIGHTS MOVEMENT ORGANISER COMRADE MANUEL AREESTED IN THE CASE OF IPC 124......


BINAYAKSEN ALSO ARRESTED ON THIS ACT


CONDEMN THE UNDEMOCRATIC ACTION OF SATHIYAMANGALAM POLICE IN TAMILNADU


RAISE VOICE FOR HIS RELEASE WITHOUT ANY DEMAND


நேற்று தோழர் பினாயக் சென் இன்று தோழர் மனுவேல்


மக்கள் ஊழியர்கள் மக்கள் விரோதி என்றால் ........இந்த அரசு மக்களுக்கு யார் ?


1897 ல் பாலகங்காதர திலகர் மற்றும் 1922 ல் மகாத்மா காந்தி உள்ளிட்ட இந்திய தேசத் தலைவர்களுக்கு வாய்பூட்டு போடுவதற்காக பிரிட்டிஷ் காலனித்துவ ஆட்சியில் கொண்டுவரப்பட்ட சட்டத்தின் எச்சமான இந்திய குற்றவியல் பிரிவு 124 (பிரிவினை) ஐ பினாயக் சென்னுக்கு எதிராக அரசாங்கம் பயன்படுத்தியது அரசு தரப்பின் மிக பிற்போக்கான குணத்தை நிரூபித்தது ..


இன்று மீண்டும் மேற்குத்தொடர்ச்சி மலைவாழ்மக்கள் உரிமை இயக்கம் ஒருங்கிணைப்பாளர் மனுவேல் ..நேற்று சத்தியமங்கலம் காவல் துறையால் விசாரணை என்ற பெயரில் அழைத்து செல்லப்பட்டு ..பின் கைது செய்யப்பட்டு 124 தேசத் துரோக வழக்கில் கைது செய்யப்பட்டுள்ளார் ...


காடும், காட்டுவளமும் பழங்குடி - மலைவாழ் மக்களுக்கே சொந்தம்!


இந்திய அரசே!

• சத்தியமங்கலம் புலிகள் காப்பகத் திட்டம் உள்ளிட்ட அனைத்து புலிகள் காப்பகத் திட்டங்களையும் கைவிடு! வன உரிமைச் சட்டத்தை அமல்படுத்து!


தமிழக அரசே!

• இந்திய அரசின் புலிகள் காப்பகத் திட்டங்களுக்கு ஒத்துழைப்புத் தராதே! அத்திட்டங்களை எதிர்த்து சட்டமன்றத்தில் தீர்மானம் நிறைவேற்று!


தொழிலாளர்களே! விவசாயிகளே! சிறு வியாரிகளே! மாணவர்களே! அறிவாளர்களே!

• பழங்குடிகள், மலைவாழ் மக்களுடன் இணைந்து காட்டையும், நாட்டையும் பாதுகாக்கப் போராடுவோம்!


என்ற முழக்கத்துடன் மக்களுகாக போராடி வரும் தோழரை


.தேசத்ரோகி என்ற பெயரில் கைது செய்த காவல் துரையின் அடக்கு முறையை வன்மையாக கண்டிப்போம்


எந்த நிபந்தனை இன்றி விடுதலை செய்ய குரல் கொடுப்போம்


பாசிச அரசின் மக்கள் விரோத அடக்கு முறையை கண்டிப்போம் — withAibsf Jnu and 90 others.

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Democratic Students Union

May 23

Condemn the cold blooded butchery of 8 adivasi villagers in Bijapur! — with Reyazul Haque and 45 others.

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3 hours ago

भूखे बच्चे से भगवान

- लैंग्स्टन ह्यूज़


भूखे बच्चे!

तुम्हारे लिए नहीं बनाई है

मैंने यह धरती

तुमने तो ख़रीदा ही नहीं है

मेरी रेल कम्पनी का स्टॉक

मेरे कॉरपोरेशन में

कोई निवेश भी नहीं किया है

स्टैंडर्ड ऑयल में

कोई शेयर भी तो नहीं है तुम्हारा


इस धरती को मैंने अमीरों के लिए बनाया है

जो होने वाले अमीर हैं

और जो हमेशा से अमीर हैं

उनके लिए

तुम्हारे लिए नहीं

भूखे बच्चे!


मूल अंग्रेज़ी से अनुवाद : राम कृष्ण पाण्डेय

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6 hours ago

http://janchetnabooks.org/?product=bhagat-singh-aur-unke-sathiyon-ke-sampurna-uplabdh-dastavez

भगत सिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

janchetnabooks.org

All available documents of Bhagat Singh and his comrades.

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जो बन जाते हैं आदत के गुलाम,

चलते रहे हैं हर रोज़ उन्हीं राहों पर,

बदलती नहीं जिनकी कभी रफ्तार,

जो अपने कपड़ों के रंग बदलने का जोखिम नहीं उठाते,

और बात नहीं करते अनजान लोगों से,

वे मरते हैं धीमी मौत।

http://ahwanmag.com/Slow-death-Pablo-Neruda

धीमी मौत – पाब्लो नेरूदा

ahwanmag.com

जो अपने कपड़ों के रंग बदलने का जोखिम नहीं उठाते,

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हाल के चुनावी नतीज़ों ने यह साबित कर दिया है कि लोगों में वर्तमान व्यवस्था के प्रति अविश्वास और गुस्सा व्याप्त है, और वह व्यवस्था में बदलाव चाहती है। व्यवस्था के प्रति लोगों के इस गुस्से को इस तरह तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे क...See More

आवेग: जनता क्या चाहती है: व्यवस्था में परिर्वतन या सत्ता में लोगों का परिर्वतन??

aavegpatrika.blogspot.com

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ऐसी कोई भी बड़ी वैज्ञानिक खोज नहीं है, चाहे वो आग की खोज हो या उड़ान की, जो किसी भगवान की तौहीन न हो।

http://ahwanmag.com/Experiment-of-artificial-cell-and-morality

कृत्रिम कोशिका का प्रयोग और नैतिकता

ahwanmag.com

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जुलाई-अक्‍टूबर 2010

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मूलभूत कर्तव्यः राज्य की विफ़लता का ठीकरा जनता पर फोड़ने की बेशर्म क़वायद


यह महज़ संयोग नहीं है कि भारतीय राज्य ने नागरिकों को उनके मूलभूत कर्तव्यों की याद उस समय दिलाई जब आज़ादी के समय दिखाये सपनों के तार-तार होने के बाद जन-असंतोष इतना गह...See More

कैसा है यह लोकतन्त्र और यह संविधान किनकी सेवा करता है? (सत्रहवीं किश्त)

www.mazdoorbigul.net

भारतीय संविधान के भाग 4क में नागरिकों के लिए कुछ मूलभूत कर्तव्य गिनाये गये हैं। ग़ौरतलब है कि यह भाग मूल संविधान में नहीं था, बल्कि इसे 1976 में 42 वें संशोधन के द्वारा संविधान में डाला गया था। यह महज़ संयोग नहीं है कि भारतीय राज्य ने नागरिकों को उनके मूलभूत कर्तव्यों की याद उस समय दिलाई जब आज़ादी क...

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धर्म के नाम पर सभी सन्त लोगों को आत्मसुधार के प्रवचन देते हैं लेकिन कभी भी खुद पर इन प्रवचनों को लागू नहीं करते। अन्य पूँजीपतियों की तरह ये पूँजीपति सन्त भी मुनाफ़े के अंधे भक्त हैं और लोगों की लूट से परजीवी और अय्याशी का जीवन जीते हैं। जनत...See More

आसाराम ही नहीं बल्कि समूचे धर्म के लुटेरे चरित्र की पहचान करो!

www.mazdoorbigul.net

बलात्कार के मामले में आजकल जेल की हवा खा रहे आसाराम के काले कारनामों के बारे में टी.वी. चैनलों, अखबारों, मैगज़ीनों आदि के जरिए रोज़ाना नये-नये खुलासे हो रहे हैं। अधिकतर बात इस पर हो रही है कि एक सन्त होने का दावा करने वाले व्यक्ति द्वारा अपने भक्तों की श्रद्धा का नाजायज फायदा उठाया गया है, कि सन्त कह...

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Satya Narayan

December 21

जब 1953 में स्तालिन का निधन हुआ, तो सोवियत संघ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी औद्योगिक, वैज्ञानिक और सैन्य ताक़त बन चुका था और इस बात के स्पष्ट संकेत थे कि इन सभी क्षेत्रों में वह जल्दी ही अमेरिका को भी पीछे छोड़ देगा। और यह ज़बर्दस्त तरक़्क़ी तब हुई थी जब दूसरे महायुद्ध के दौरान फ़ासिस्टों को पराजित करने में उसे इतना भीषण नुकसान उठाना पड़ा जो किसी भी अन्य देश को कई दशकों तक पीछे धकेलने के लिए काफ़ी था। युद्ध में सोवियत जनता ने अपने दो करोड़ बेहतरीन बेटे-बेटियों को गँवाया था और उसके आर्थिक संसाधनों की भारी तबाही हुई थी। लेकिन चन्द ही वर्षों में स्तालिन के नेतृत्व में सोवियत जनता ने नये-नये चमत्कार रचते हुए सोवियत संघ को फिर से अगली कतार में जा खड़ा किया। देश से भुखमरी और अशिक्षा पूरी तरह ख़त्म हो चुके थे। खेती का पूरा सामूहिकीकरण हो चुका था और उसकी पैदावार कई गुना बढ़ चुकी थी। सभी नागरिकों को निशुल्क बेहतरीन चिकित्सा सुविधा उपलब्ध थी। हर स्तर पर शिक्षा मुफ़्त थी। सोवियत संघ में दुनिया के किसी भी देश से ज़्यादा किताबें छपती थीं और वहाँ बोली जाने वाली हर भाषा में छपती थीं। बेरोज़गारी, महँगाई, वेश्यावृत्ति, नशाख़ोरी आदि का तो 1930 के दशक तक ही ख़ात्मा हो चुका था। दुनिया में पहली बार महिलाओं को चूल्हे-चौखट की दासता से निजात मिली थी और वे जीवन के हर क्षेत्र में बराबरी से आगे बढ़ रही थीं। विश्वयुद्ध की भीषण तबाही और उथल-पुथल के दौरान और उसके बाद भी सोवियत संघ की विभिन्न राष्ट्रीयताओं की जनता एकजुट थी। यह सब कुछ स्तालिन के कुशल नेतृत्व में ही सम्भव हो सका था।

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Satya Narayan

December 21

त्रात्स्की लाल सेना का प्रमुख था लेकिन मज़दूरों और आम सिपाहियों पर भरोसा करने के बजाय वह ज़ारशाही फ़ौज के अफ़सरों को अपनी ओर मिलाने और उन्हें क्रान्तिकारी सेना की कमान सौंपने की कोशिशों में ज़्यादा समय ख़र्च करता था। जनता के जुझारूपन और साहस पर भरोसा करने के बजाय वह तकनीक पर ज़्यादा यक़ीन करता था। इसका नतीजा था कि लाल सेना को एक के बाद एक हारों का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर स्तालिन मज़दूरों और किसानों के नज़रिये से सैन्य स्थिति को समझते थे और उनकी क्षमताओं और सीमाओं से अच्छी तरह वाकिफ़ थे।


1919 में स्तालिन को वोल्गा नदी के किनारे महत्वपूर्ण शहर ज़ारित्सिन के मोर्चे पर रसद आपूर्ति बहाल करने की ज़िम्मेदारी देकर भेजा गया। ज़ारित्सिन को क्रान्ति की दुश्मन फ़ौजों ने घेर रखा था और शहर के भीतर भी दुश्मन की ताक़तों ने घुसपैठ कर रखी थी। स्तालिन ने त्रात्स्की का अतिक्रमण करके फ़ौरन कमान अपने हाथों में सँभाल ली और फौलादी हाथों से काम लेते हुए फ़ौजी अफसरों और पार्टी के भीतर से प्रतिक्रान्तिकारियों को निकाल बाहर किया और फिर शहर और पूरे क्षेत्र को दुश्मन से आज़ाद करा दिया। नाराज़ त्रात्स्की ने स्तालिन को वापस बुलाने की माँग की लेकिन इसके बाद तो स्तालिन को गृहयुद्ध के हर अहम मोर्चे पर भेजा जाने लगा। हर जगह स्तालिन ने फौरन ही क्रान्तिकारी जनता का सम्मान अर्जित कर लिया और कठिनतम परिस्थितियों में भी जीत हासिल करने में उनका नेतृत्व किया। गृहयुद्ध ख़त्म होने तक स्तालिन एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर स्थापित हो चुके थे जिसे मालूम था कि काम कैसे किया जाता है। यह गुण अभिजात वर्गों से आये उन बुद्धिजीवी कम्युनिस्ट नेताओं में नहीं था जो अपने को सर्वहारा वर्ग के महान नेता समझते थे। अप्रैल 1922 में स्तालिन को कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय कमेटी का जनरल सेक्रेटरी बनाया गया।

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स्तालिन के जन्मदिवस (21 दिसम्बर) के अवसर पर

यह अफ़सोस की बात है कि आज आम घरों के नौजवानों और मज़दूरों में से भी बहुत कम ही ऐसे हैं जो स्तालिन और उनके महान कामों और विश्व क्रान्ति में उनके योगदान के बारे में जानते हैं। बुर्जुआ झूठे प्रचार के ...See More

स्तालिन: पहले समाजवादी राज्य के निर्माता

www.mazdoorbigul.net

मज़दूर वर्ग के पहले राज्य सोवियत संघ की बुनियाद रखी थी महान लेनिन ने, और पूरी पूँजीवादी दुनिया के प्रत्यक्ष और खुफ़ि‍या हमलों, साज़िशों, घेरेबन्दी और फ़ासिस्टों के हमले को नाकाम करते हुए पहले समाजवादी राज्य का निर्माण करने वाले थे जोसेफ़ स्तालिन। स्तालिन शब्द का मतलब होता है इस्पात का इन्सान – और स्त...

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Marx Pandianposted toAnand Teltumbde

December 7, 2011

"Report of Public Inquest on the Paramakudi Firing" was released on Dec-3rd at Chennai. All party leaders including CPI, CPI-M, CPI(ML)Liberation, CPI(ML)Peoples Liberation leaders and ex.MP VAI.KO, Thirumavalavan.MP partcipated. The programme organized by "Action Committee Against the Paramakudi Firing" comprising Dalith organizations, Left organizations and Human right organizations.


TaraChandra Tripathi

December 22 at 8:25pm ·

  • 'गया और बोधगया
  • कुछ छोटी-­छोटी पहाड़ियों से परिवृत गया। विज्ञापन करने में महारथी पौराणिकों ने कथा बना दी कि इसकी यह भौगालिक संरचना विष्णु के द्वारा अपने पावों तले पिचका कर मारे गये गयासुर की देह की देन है। गयासुर ने मरते समय विष्णु से वरदान माँगा कि उसकी देह का स्पर्श भी नरक से मुक्ति दिलाने वाला हो। बस क्या था उसके मरते ही देवताओं ने उसके शरीर पर अपनी कालोनी बसा ली। दूर­-दूर से अपने पितरों को नरक से मुक्ति दिलाने के लिए लोगों के समूह उमड़ पड़े। गयासुर की देह तीर्थ बन गयी।
  • आज भी गया पिचका कर मारे गये असुर की देह सी ही लगती है। चारों ओर भयंकर गंदगी। लोभ और अंधविश्वासों के सहारे पलते पंडे और पुरोहित। यहाँ इतना रख, वहाँ उतना रख, नहीं तो तेरे पूर्वज की मुक्ति नहीं होगी। एक नहीं, दो नहीं पूरे 54 स्थानों पर पिंडदान का विधान। स्वयं नरक की ओर बढ़ते, स्वर्ग का परमिट देते मुक्ति के ठेकेदार।
  • निर्मला जी की जिद पर पंडे को पाँच सौ रुपये देकर, माता¬­पिता के लिए स्वर्ग का परमिट माँगा। श्राद्ध के समापन में पंडा बोला, अब आपके माता­.पिता को स्वर्ग मिल गया है। मैंने अनुरोध किया कि उनका मोबाइल नंबर तो बता दें ताकि उनसे पूछ सकूँ कि इतने में उन्हें सही सीट मिली या नहीं? पंडा बोला यह तीर्थ है, परिहास की जगह नहीं।
  • विष्णुपद पर विष्णु की भव्य मूर्ति के दर्शन किये। सूखी पीली पड़ी फल्गु नदी के तट पर बालू के पिंड बनाते लोगों को देखा, ब्रह्मयोनि में एक संकरी सी कंदरा को पार कर पुनर्जन्म से मुक्ति के परमिट के लिए भीड़ लगाए श्रद्धालु दिखायी दिये। प्रेतशिला में अपने उदर के बोझ से छुटकारा पाने के अभ्यस्त लोगों के योगदान से निर्मित नरक के बीच मंदिर में बैठी धर्मराज यम की पाषाणी प्रतिमा के भी दर्शन किये। लगा इन नरकों के कारण ही शायद गया में पितरों की मुक्ति की कल्पना की गयी होगी। जो इस नरक से मुक्त हो गया, उसके लिए तो सर्वत्र स्वर्ग ही स्वर्ग है।
  • 'गया से मात्र सत्रह कि.मी. दूर फल्गु नदी के तट पर स्थित बोधगया। बोधिवृक्ष के वर्तमान वंशज की छाया में महाबोधि विहार। रम्य और शान्त। उसके चारों ओर एक वृत्त सा बनाते हुए तिब्बत, नेपाल, भूटान, म्याँमार श्रीलंका, चीन, कोरिया, थाइलैंड और जापान, के बौद्ध विहार। हर एक की अपनी विशिष्ट वास्तु और शिल्प प्रस्तुति। चीनी बौद्ध विहार में बुद्ध की दो सौ वर्ष पुरानी प्रतिमा स्थापित है तो जापान के बौद्ध विहार में बुद्ध की ध्यान मुद्रा में आसनस्थ विशाल मूर्ति के अलावा उनके दस प्रिय शिष्यों-सारिपुत्र, मौद्गल्यायन, महाकश्यप, सुभूति, पूरण मैत्रायनीपुत्र, कात्यायन, अनिरुद्ध, उपालि, राहुल और आनन्द की मानवाकार प्रतिमाएँ स्थापित हैं।
  • महाबोधि विहार के स्वच्छ, शान्त और स्निग्ध परिवेश में आज भी बुद्ध की उपस्थिति का आभास होता है। देश­विदेश के उपासकों द्वारा निर्मित भव्य मंदिर और शिल्पाकृतियाँ, जाति, प्र्रजाति, प्रदेश और देश से परे उपासकों का समूह, शंख और घड़ियालों के हंगामे से मुक्त शान्त भाव से होती प्रार्थनाएँ। किसी भी मंदिर में जाने के लिए शुल्क नहीं, चढ़ावा नहीं, पीछे पड़ा परेशान करता पंडा नहीं - लगता था, हम गया के निकट नहीं, भगवान बुद्ध के सान्निध्य में हैं।
  • मुझे याद आया, यही फल्गु नदी बुद्ध के युग में नीरंजना कहलाती थी। इसी के तट पर पीपल के पेड़ के नीचे उनचास दिनों तक निराहार समाधि लगाने के बाद, आदिवासी कन्या सुजाता द्वारा अर्पित खीर का पहला ग्रास ग्रहण करते ही सिद्धार्थ गौतम को लगा कि दुष्कर, क्लेशकर तपस्या का मार्ग न तो श्रेयस्कर है और न जन साधारण के लिए साध्य। शरीर को अनावश्यक क्लेश देना दुखों से मुक्ति का मार्ग नहीं हो सकता और न कपिलवस्तु के राजमहल का भोगविलास।
  • यह उनकी प्रयोग सिद्ध उपलब्धि थी। राहुल के जन्म तक वे वैभव और विलास में रहते हुए भी अशान्त रहे। घर छोड़ा, प्रवज्या ली, अनेक गुरुओं सेे संपर्क किया, पर संतोष नहीं हुआ। निराश होकर कठोर साधना में प्रवृत्त हुए। कठोर साधना से भी उनके मन को चैन नहीं मिला। लेकिन पायस के पहले ही ग्रास ने उनकी अन्तर्दृष्टि जगा दी। दुखों से मुक्ति का उपाय मिला - मज्झिम पटिपदा या मध्यम प्रतिपदा, या बीच का मार्ग। न शरीर को क्लेश देने वाला कठोर तप (अतिकल्मशप्रनुयोग) और न कामसुख में संलिप्ति (कामसुखल्लकयोग)।
  • जब भी मैं तथागत का स्मरण करता हूँ, मुझे उनकी धीर¬­गंभीर वाणी सी सुनाई देने लगती है। जैसे कह रहे हों - "जो उत्पन्न होता है, वह सब कर्माें का हेतु होता है। सब धर्मों का हेतु होता है। ईश्वर अनीश्वर की कल्पना, पर विचार करना व्यर्थ है। यह जगत् है, यह रहेगा। श्रेयस्कर है उत्तम आचरण। श्रेयस्कर है उत्तम शासन (आत्मानुशासन)। दुख से भागने की आवश्यकता नहीं है। जगत् से भागने की आवश्यकता नहीं है। भाग कर कोई बच नहीं सकता। कर्म का चक्र सबको चलाता रहेगा। हम स्वयं अपने कर्मो के परिणाम हैं।"
  • मायावती जी तथा बहुत से अन्य भद्र जन भले ही जनता को भ्रमित करने के लिए बौद्ध होने का दिखवा करें यह कभी ध्यान में नहीं लाते कि उत्तम आचरण और उत्तम आत्मानुशासन ही सिद्धार्थ गौतम का बुद्धत्व है। बोध गया इसी की स्मारक है। (लेखक की पुस्तक- महाद्वीपों के आर-पार के एक निबन्ध 'पूर्व की ओर' का एक अंश)
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Reyazul Haque

Ashutosh का नोट, खुर्शीद अनवर की मौत से जुड़े कुछ पहलुओं पर.

हाशिया: त्रासदी, मीडिया ट्रायल और इन्साफ के सवाल

hashiya.blogspot.com

Ashutosh का नोट, खुर्शीद अनवर की मौत से जुड़े कुछ पहलुओं पर.

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Avinash Das

सूख चुकी आंखों का पानी बचा रहा है आम आदमी

आज सियासत को उंगली पर नचा रहा है आम आदमी


लूट मार करने वालों के बोल बचन संतों सा सुनिए

उनके ताने उनकी गाली पचा रहा है आम आदमी


गंदी बस्ती ढक कर नकली खुशबू का धोखा दे डाला

खूब उधम उनकी दिल्ली में मचा रहा है आम आदमी


जात-पात-दंगों के अंक-गणित में उलझाते हैं वे, पर

शातिर से शातिर लोगों का चचा रहा है आम आदमी


पहली बार शहर में थोड़ी ताजा ताजा हवा चली है

नये नये इस मौसम में अच-कचा रहा है आम आदमी


‪#‎DasDarbhangvi‬

Shamshad Elahee Shams

जिनका कोई मार्ग नहीं होता उनका स्वभाविक मार्ग 'मध्यमार्ग' होता है, और यह मध्यमार्ग सरकारी टुकड़खोर जमात को बड़ा रास आता है क्योकि इस 'मार्ग' की सत्ता में उसे कुछ भी, कभी भी खोना नहीं पड़ेगा ....यही इसी सवाल पर वह पूरा आश्वस्त होना चाहता है. इसके प्रमाण के बाद वह पूरी तरह एक स्वान दर्शन को जन्म देता है जिसकी तूती 'आप' के रूप में दिल्ली में बोल रही है. 'आप' अभी चरम पर नहीं है. दूसरे चुनाव में वह चरम पर होगी और तीसरा चुनाव उसके पराभव का होगा.

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Thread Bared | Neha Dixit

outlookindia.com

They had invested hope in the village pradhan. He had said he'd protect them. Instead, what happened at his house during the morning of the riots will make you shudder. <​i>Outlook<​/i> meets Muslim women at the camps, the faceless Nirbhayas of Muzaffarnagar....

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Economic and Political Weekly

The National Pharmaceutical Pricing Policy was instituted so that everyone could afford medicines. Yet the patient does not benefit from trade schemes, marketing strategies, or the free pharmaceutical market even now. What could make medicines affordable to the common citizen?

An Economic and Political Weekly Special Article:

http://www.epw.in/special-articles/tracking-medicine-prices-supply-chain.html




इस मामले से जुड़े कुछ विशेष पहलुओं पर आशुतोष कुमार ने यह नोट लिखा है, जिसे हाशियापर पोस्ट किया जा रहा है.


खुर्शीद अनवर की अस्वाभाविक मृत्यु के बाद मीडिया/सामाजिक मीडिया पर चली चर्चाओं और बहसों का जो रूप उभर कर आया है, उस से कुछ हैरतंअगेज़ सवाल उठते हैं. इन सवालों पर गौर करना हमारे दौर में न्याय की समझदारी और संभावना, न्याय के लिए किये जाने वाले संघर्ष और उसमें मीडिया और नागरिक समाज की भूमिका का सटीक आकलन करने के लिए जरूरी है.


पहला सवाल: यह क्यों और कैसे मान लिया गया कि 18 दिसंबर की त्रासद घटना एक 'आत्महत्या' थी ?  ऐसी किसी भी घटना के बाद सहज रूप से जो पहला सवाल उठता है , वह यही होता है कि यह कोई दुर्घटना थी, अथवा ह्त्या या आत्महत्या. मौजूदा मामले में, शोक, सदमे और चिंता की व्यापक अभिव्यक्ति के बावजूद यह बुनियादी सवाल क्यों नहीं उठाया गया?  जबकि परिस्थितियाँ-व्यक्तिगत और वस्तुगत दोनों-ऐसी थीं, जो चीख-चीख कर आत्महत्या की थियरी के भोथरेपन की ओर इशारा कर रही थीं?


क्या एक ऐसे शख्स के अचानक आत्महत्या कर लेने की बात स्वाभाविक प्रतीत होती है,जो महीनों से कथित 'मीडिया ट्रायल' का मजबूती से, प्रभावशाली मुखरता के साथ, सामना करता आया हो? दूसरे पक्ष से जम कर बहसें की हों, उन्हें बार बार चुनौती दी हो?


जिसने किसी और के लेने के पहले खुद अपनी ओर से आरोपों के सम्बन्ध में डंके की चोट पर अपना नाम जाहिर किया हो?


जिसने अभी-अभी कथित दुष्प्रचार-कर्ताओं के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया हो?


जो बार-बार संघर्ष करने का अपना संकल्प दुहराता आया हो?


जिसने 'पीड़िता' के सामने आने और और मामले के सम्बन्ध में एफ आइ आर दर्ज किए जाने की लगातार मांग की हो?


जिसे लम्बी दुखद प्रतीक्षा के बाद अपनी निर्दोषिता साबित करने का पहला वास्तविक मौक़ा हासिल हुआ हो?


जो समझ सकता हो कि मृत्यु यह अवसर उस से अंतिम रूप से छीन सकती है?


मान भी लें कि किसी वज़ह से, गहन अवसाद के किसी तात्कालिक झोंके में, उन्होंने अपने जीवन के समापन का फैसला कर लिया तो क्या वे उसके लिए द्वारका से वसंत कुंज तक का लंबा सफर तय करने लायक समय खुद को दे सकते थे? क्या सचमुच इतना समय था उनके पास? जबकि कहा जा रहा है कि वे सुबह दस बजे अपने  दोस्त के घर से, द्वारका से, निकले और दुखद घटना का समय साढ़े दस बजे के पहले का बताया जा रहा है?


जबकि वे समझ सकते हों कि तीसरे माले की छत से गिरने पर मृत्यु सुनिश्चित नहीं है, ज़िंदगी भर की किसी भीषण शारीरिक क्षति के साथ जीवित रह जाना अधिक संभावित है?


क्या ये सारी परिस्थितियाँ चीख- चीख कर नहीं कह रहीं कि जो कुछ हुआ, वह आत्महत्या के सिवा कोई दुर्घटना या सुनियोजित ह्त्या तक हो सकती है?


तब एक बार भी यह सवाल क्यों नहीं उठाया गया ?


आत्महत्या की थियरी को हवा दे कर उनके कथित मित्रो की तरफ से इस तरह के कयासों को पनपने का मौक़ा क्यों दिया गया, कि अब तक पूरी शिद्दत से लड़ते आये खुर्शीद अनवर लड़की के द्वारा आरोपों की पुष्टि होते ही खुद को अकेला और अरक्षित महसूस करने लगे?


आखिर अभी तक किसी के पास कोई आधार, कोई कारण, नहीं है, यह मान लेने का.


हो सकता है, आत्महत्या हो. लेकिन नहीं भी हो सकता है.


सवाल यह है कि इस सवाल को क्यों उठने नहीं दिया गया?


दूसरा सवाल, एकमत से कथित आत्महत्या के लिए 'मीडिया ट्रायल' को जिम्मेदार बताया जा रहा है.


लेकिन इस सिलसिले में दो जगजाहिर हकीकतों की जान बूझ कर उपेक्षा की जा रही है. एक -17 दिसम्बर के इंडिया टीवी के कार्यक्रम के पहले फेसबुक के अलावा कहीं इस प्रकरण की कोई चर्चा नहीं थी. फेसबुक पर मरहूम की सक्रियता और चर्चाकारों के खिलाफ मानहानि का उनका मुक़दमा दिखाता है कि कम से कम उसे इस हादसे का एकमात्र कारण मान लेना सहज नहीं है. तब क्या एकमात्र टीवी कार्यक्रम को मीडिया ट्रायल की संज्ञा दी जा सकती है? क्या यह संभावना नहीं हो सकती कि उन्हें सदमा मीडिया के व्यवहार से ज़्यादा अपने कथित करीबी दोस्तों द्वारा उस टीवी कार्यक्रम के तत्काल और तत्पर स्वागत से पहुंचा हो? क्या यह कोई संभावना ही नहीं है? क्या यह विचार -योग्य ही नहीं है?


अगर है, तो क्यों इसकी लगातार उपेक्षा की गयी है?


दो-  फेसबुक पर चली चर्चाएँ कभी एकतरफा नहीं थीं. रेप की कहानियां सुनाने वाले जितने थे, उनका विरोध करने वाले उनसे कई गुना ज्यादा थे. इन चर्चाओं में शुरुआत से ही 'पीडिता' का जम कर चरित्रहनन किया गया. वह भी बेहद अश्लील और हिंसक भाषा में. बार बार. सिर्फ उसे ही नहीं, जिस किसी ने उसके पक्ष में मुंह खोलने की हिम्मत की, उसे ही इस फेसबुकी हिंसा का निशाना बनाया गया.


तब 'मीडिया ट्रायल' की चर्चा चलाने वाले इस प्रसंग के इस पहलू की तरफ क्यों ध्यान नहीं दे रहे? अगर फेसबुक की भूमिका पर ही जोर दिया जा रहा है, तो पीड़िता के साथ किया गया व्यवहार उसका अनिवार्य और उतना ही तकलीफदेह हिस्सा है. इस हिस्से की सम्पूर्ण उपेक्षा को बहुत ध्यान से देखना और समझना बेहद जरूरी है. इस उपेक्षा को सिर्फ इसलिए महत्वहीन नहीं माना जा सकता कि पीड़िता एक उपेक्षित इलाके की है, गरीब है, और हमारी मित्र -परिचित नहीं है.


इन दो सवालों के जोड़ से तीसरा और सब से भारी सवाल पैदा होता है.


क्या एकतरफा 'मीडिया ट्रायल' की थियरी को एकमात्र और अंतिम सत्य के रूप में स्थापित करने के लिए ही 'आत्महत्या' की थियरी को, बिना किसी संदेह और सवाल के, प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है?


क्योंकि ये दोनों थियरियाँ एक दूसरे से जुड़ कर आसानी से भरोसा करने लायक 'खबर' बन जाती हैं. मीडिया ट्रायल की वज़ह से आत्महत्या की बात इस तरह से दिमाग में उतर जाती है कि मन में कोई सवाल ही पैदा न हो. दुर्घटना या हत्या की संभावना की ओर इशारा करने से इसमें खलल पैदा हो सकता था.


हम ये बिलकुल नहीं कह रहे कि 18 दिसम्बर का हादसा आत्महत्या हो ही नहीं सकता.


हम सिर्फ यह कह रहे हैं कि ऐसा नहीं भी हो सकता है.


और यह कि इस भी का गायब हो जाना, इस संभावना का सम्पूर्ण नकार, अत्यंत आश्चर्यजनक और अस्वाभाविक बात है.


और ऐसी स्थिति में हमें अपने आप से और हर किसी से एक सवाल जरूर पूछना होगा.


किसी तात्कालिक भावनात्मक दबाव में मीडिया ट्रायल की वज़ह से आत्महत्या की थियरी को एकतरफा ढंग से, अंतिम सत्य के रूप में, प्रचारित करके क्या हम  कमजोर और उत्पीड़ित तबके के मन में उस सामाजिक मीडिया के इस्तेमाल को लेकर नए सिरे से भय और दहशत की भावना नहीं पैदा कर देंगे, जिससे पहली बार उसे आवाज की एक जगह हासिल हुई है? अभी तो जिसके पास कोई सत्ता नहीं, मीडिया नहीं, सुरक्षा नहीं, समर्थन नहीं, उसके पास सामाजिक मीडिया और उसकी आज़ादी उम्मीद की एक किरण है. इस किरण के होने भर से सत्ता तंत्रों में  भारी बेचैनी और बौखलाहट है. वे पहले से इसे बुझा देने को आतुर हैं. अगर यह शर्त लाई जाए कि जब तक अदालत में आरोप साबित न हों, तब तक उस पर चर्चा करना 'मीडिया ट्रायल' या अपराध है, तो सब से पहले और सब से ज़्यादा उत्पीड़ितों को ही इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा.


बेशक मीडिया ट्रायल के गम्भीर खतरे हैं. लेकिन किसी चर्चा को मीडिया ट्रायल बता कर उस पर दोषारोपण करने के पहले क्या उस चर्चा के सभी पक्षों को पर समान रूप से  ध्यान नहीं देना चाहिए? क्या यह नहीं देखना चाहिए कि वह निराधार चर्चा है या उसका कोई प्राथमिक आधार मौजूद है? क्या यह नहीं देखना चाहिए कि उस चर्चा के पीछे नीयत किसी अन्याय की संभावना को उजागर करने की है या उस पर पर्दा डालने की?


पिछले कई दिनों से कुछ भयभीत और कुछ भावावेशग्रस्त मित्र फेसबुक पर हमें हत्यारा घोषित करते घूम रहे हैं. हमें दिनरात अश्लील और हिंसक गालियों से नवाज रहे हैं. पीड़िता और उसके हक में कुछ भी कहने की हिम्मत करने वाले किसी भी व्यक्ति से वे ऐसा ही सलूक कर रहे हैं. हमने उन्हें जवाब नहीं दिया है, न देंगे. लेकिन हम समूची घटना की, उसके हर पहलू की, मुकम्मल जांच की मांग करते रहेंगे. यह तय है कि अदालत में दोष सिद्ध होने तक किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता, लेकिन यह भी तय  है कि कहीं न कहीं कोई अपराध हुआ जरूर है. अपराध की अवस्थिति इन दो पक्षों में कहीं हो हो या किसी तीसरे पक्ष में. उसका पता चलना ही चाहिए ताकि निर्दोषता स्थापित हो सके और दोष उजागर.


इससे आगे बढ़ कर हम यह मांग भी करते हैं कि इस प्रसंग में हुए समूचे मीडिया-प्रकरण की  जांच की जाए. सभी संबधित लोगों और एजेंसियों की भूमिकाओं की जांच की जाये , जिससे पता चले कि किस ने कहाँ कहाँ अपराध के इलाके में आवाजाही की है.


चूंकि झूठ का चौतरफा प्रचार चल रहा है, सिर्फ मित्रों और शुभ-चिंतकों के लिए,  हम यहाँ यह भी दर्ज करना चाहते हैं कि इस मामले में हमारी वास्तविक भूमिका क्या रही है. हमारे पास जब इसे लाया गया तब हमने ऐपवा की नेता कविता कृष्णन के साथ मशविरा किया और जो इसे ले कर आये थे, उनको दिवंगत के अपने संस्थान में आतंरिक और गोपनीय जांच के लिए ले जाने की सलाह दी.


हमने आज तक सिर्फ एक बार इस घटना के बारे में फेसबुक पर लिखा है. निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए एक छोटा सा नोट. यह नोट 18 दिसंबर को 11 बजे पोस्ट किया गया. यानी मर्मान्तक घटना के वास्तव में घटित हो चुकने के बाद, हालांकि हमें तब तक उसकी जानकारी नहीं हुई थी. कुछ ही समय बाद, फेसबुक से ही हमें हादसे की जानकारी हुई और हमने शोक और सदमे के हवाले से उसे तत्काल हाइड कर दिया और अपनी दीवार पर दर्ज कर दिया दिया कि अगर जरूरत हुई तो इसे अन्हाइड भी किया जा सकेगा. लेकिन वह सुरक्षित है, और उन लोगों के नाम भी सुरक्षित हैं, जिहोंने उसे लाइक किया, लेकिन जिनमें से कई अब हमें संगसार करने के अभियान में शरीक हो गए हैं.  कोई त्रासदी दूसरी से कमतर नहीं होती. हम बीती हुई त्रासदियों को मिटा नहीं सकते, लेकिन आने वाली त्रासदियों से बचने के लिए उनसे सीखने की कोशिश जरूर कर सकते हैं.

http://hashiya.blogspot.in/2013/12/blog-post_24.html

जनज्वार डॉटकॉम

वाजिब प्रश्न है कि स्वयं नभ किशोर या बाकी 235 एनजीओ वाले या उनके प्रमुख अपने ही गृहप्रदेश की लड़की शक्ति के साथ हुए बलात्कार को लेकर चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? मानवाधिकार के सवालों पर दिल्ली-मणिपुर एक कर देने वाले लोग पीड़िता के पक्ष में मणिपुर या दिल्ली में एक विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं कर पा रहे हैं? तो क्या ऐसे में यह मान लिया जाए कि विरोध भी 'पेड' हुआ करता है? क्या यह मान लिया जाए कि यह चुप्पी एनजीओ के एकाधिकार और वर्चस्व के कारण है...http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-00-20/25-politics/4637-khursheed-ke-swal-par-chup-kyon-ngo-by-janjwar-for-janjwar

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The Economic Times

Gap between mid-level, freshers' wages in IT industry is set to widen by 8 times http://ow.ly/s2s2I

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Vallabh Pandey

65 सालों में हम आबादी के काफी बड़े हिस्से को पीने का शुद्ध पानी तक नहीं दे पाये हैं तो भारत उदय, शाइनिंग इण्डिया, फील गुड, भारत निर्माण जैसे स्लोगन पर इतराने का कितना हक है हमारा ?

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Economic and Political Weekly

As the AAP decides on government formation, here are two articles looking at the AAP phenomenon from Economic and Political Weekly - Web Exclusives:


1) AAP: Government of the Governed? - http://www.epw.in/web-exclusives/aam-aadmi-party-government-governed.html


2) Translating Symbolism into Action: AAP's jhadus -http://www.epw.in/web-exclusives/translating-symbolism-action-aaps-jhadus.html

गंगा सहाय मीणा

मां ने JNU वाले क्‍वार्टर के आंगन में एक चूल्‍हा भी बनाया है. जब भी चूल्‍हे की रोटी खाने का मन करे, आ जाइएगा. जेएनयू के जंगल में सूखी लकडि़यों की भी कोई कमी नहीं है. हां, रोटी बनाने में आपको मदद करनी पड़ेगी.

Like ·  · Share · 21 hours ago ·

Palash Biswas गंगा भाई,अब कभी दिल्ली आना हुआ तो मां के इस चूल्हे की रोटी के लिए जेएनयू के जंगल में जरुर भटकना है ,भशर्ते कि तब तक वह जंगल शहरीकरण की आंधी स‌े बची रहे।

a few seconds ago · Like

Avinash Das

नारे खूब उछाले जा

संसद में तू साले जा


चीनी की औकात नहीं

वादे कप में डाले जा


वोट प्लेट में लाता हूं

दो कौड़ी में जा ले जा


जागी जागी आंखों से

सपने मन में पाले जा


गोरे आते जाते हैं

थोड़े थोड़े काले जा


अच्छे वाले बैठे हैं

उठ कर गंदे वाले जा


अभी अभी मैंने खाया

तू भी तो अब खा ले जा


नेताओं के सांचे में

आम आदमी ढाले जा


ठंडा ठंडा मत जाना

गुस्सा यही उबाले जा


‪#‎DasDarbhangvi‬

Gopikanta Ghosh shared The Zeitgeist Movement Global'sphoto.

Yet rulers prefer war and poor die

Money is a social polluter... there is a different waywww.thezeitgeistmovement.com

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Money is a social polluter... there is a different waywww.thezeitgeistmovement.com

The Economic Times

Delhi's strong finances to help Arvind Kejriwal deliver for aam aadmihttp://ow.ly/s2gRL

Like ·  · Share · 4882176 · 5 hours ago ·

Sunil Khobragade likes a link.

Anilji I already explained in my status why these false campaign is trigured by Brahminical media. Brahminical forces never thinks about country but their self interests.I personally feel that we should work to build 'Nation within Nation.' severe all interactions with Brahmins and Banias.try to build bridge with victims of Brahminism and focus on networking huge consumer market of Sc/St's,Obc's and of Muslims.create trade links with china,japan Korea etc.for a while you eat grass but dont touch delicacies offered by Brahmin-Bania's.say no to Brahminical Media.raise all out financial war with Brahmins and Bania's

देवयानीवरचा ताजा आरोप खोटा

aisiakshare.com

देवयानी खोब्रागडे यांचं अमेरीकेत जे प्रकरण चालू आहे हा देशाचा अवमान आहे. अशा वेळी तिच्या पाठीशी उभे राहण्याची गरज आहे. असं असताना बातम्यांची मोडतोड करून तिचे वडील म्हणजे जणू कुणी बराक ओबामांपेक्षा शक्तीशाली व्यक्ती आहेत आणि त्यांनी सांगितलं कि सरकार गुडघे टेकवतं अशा थाटाच्या बातम्या प्रसिद्ध होऊ लाग…

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The Economic Times

Last month, SC told the oil ministry to revise its gas-allocation policy. This gives Gujarat access to cheap domestic gas, while Mumbai and Delhi would have to use more of costly imported gas. As a result, city gas prices are falling in Gujarat, and increasing in metropolitan cities like Delhi and Mumbai. For Modi's govt in Gujarat, it's a moment of victory. Is Modi's stand against central PSUs vindicated? Read here to know more http://ow.ly/s2jwK


Economic and Political Weekly

Increasingly, nurses in Kerala are organising strikes against their corporate hospitals to demand, among a slew of other measures, higher wages. This article looks at the labour-capital conflicts in Kerala's hospital industry, class formation and unionisation of nurses and the approach of political parties and the government to the question of labour.

http://www.epw.in/commentary/angels-are-turning-red.html


Economic and Political Weekly

"...has fought the Delhi police sharply in her mother tongue more than once as recently as in December 2013. She rebuilt the tent which the police pulled down in this winter with no notice at all; she even captured the vagaries of the police with her own cell-phone camera to hand over to the media later on. Jazeera continues her fight for Kerala's coastal life in the biting cold of Delhi, very unfamiliar to her in all ways, evolving her own strategies as she intensifies her struggle. "


Jazeera's struggle against the Kerala sand mafia Economic and Political Weekly web exclusives:

http://www.epw.in/web-exclusives/crusade-against-sand-mafia.html

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Bhargava Chandola with Umesh Tiwari and 68 others

"जनता को सूचनार्थ"

आम आदमी पार्टी उत्तराखंड का 22-12-2013 का अल्मोड़ा में प्रदेश कार्यकर्त्ता सम्मेलन का ब्यौरा

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मित्रों आम आदमी पार्टी के राज्य सम्मेलन का प्रदेश संयोजक पर ही अतिरिक्त भार को देखते हुए आम आदमी पार्टी के सक्रीय कार्यकर्त्ता श्री पंकज पांडे (पवन पांडे) जी ने सहयोग स्वरुप 1,000/- रूपये का सहयोग किया |

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Economic and Political Weekly

"If the government of Singapore wants to prevent the occurrence of riots, similar to the one which took place recently in Little India involving Indian migrant workers, it must urgently address the concerns of the voiceless and low-skilled migrant community, which finds it difficult to assimilate culturally and otherwise in the host country." - An Economic and Political Weekly Web Exclusive:

http://www.epw.in/web-exclusives/indian-migrant-workers-rioting-singapore-revisiting-acculturation-paradigms.html

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Rajiv Nayan Bahuguna

5 hours ago ·

  • लोक तंत्र का तकाजा यह है कि कर्मठ , लोक प्रिय , त्यागी - तपस्वी , उत्तराखंड के इतिहास , भूगोल एवं संस्कृति में रचे - बसे मुख्य मंत्री श्री विजय बहुगुणा की धर्म पत्नी सुधा भाभी को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाए . साकेत भैया को टिहरी से जिता कर केंद्र में राज्य मंत्री ( स्वतंत्र प्रभार ) बनाया जाए . शेखर भैया उत्तराखंड से राज्य सभा में भेजे जाएँ . गौरी बहू युजना आयोग की उपाध्यक्ष हों . रीता दीदी को भी उत्तराखंड भेजा जाए . वह बीस सूत्रीय कार्य क्रम की बाग़ डोर संभालें . इन सबके सलाहकार आर्येन्द्र शर्मा जी & सूर्यकांत धस्माना जी हों . देखता हूँ राज्य कैसे तरक्क़ी नहीं करता
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चन्द्रशेखर करगेती

बदलती राजनीति पर इतना लिखना तो बनता ही है !


"आम आदमी पार्टी" (आप) की हर कार्यवाही कितना रोमांच पैदा कर रही है मन में l इस लोकतंत्र में रहकर जितना किया जा सकता है उतना पूरे जज्बे व सादगी के साथ "आप" करती दिखाई दे रही है l


कुछ कुछ समाजवादी से इस केजरीवाल माडल के दिल्ली में लागू होने के बाद लोगों का चुनावी वामपंथी पार्टियों को कोसना लाजमी ही तो है l बेशक समाजवादी समाज बना पाना कितना दुरूह है लेकिन सच में जब पूंजीवादी लोकतंत्र में तक इतनी लोकतांत्रिकता लायी जा सकती हो तो समाजवादी समाज कितना लोकतान्त्रिक व सादगीपूर्ण होगा ?


गैर चुनावी वामपंथी तो खैर जनता के बीच जनताना सरकार चला ही रहे हैं l जिस भी लाइन पर चल रहे कम से कम जनता के बीच तो हैं, लेकिन चुनावी वामपंथियों को अपने बौद्धिक बहस मुहाबिसों के बिलों से बाहर निकल जनता के बीच जाने की जरूरत है !


आखिर कहाँ गया वामपंथ का जनता से वह मछली पानी का रिश्ता ? महंगाई, ऍफ़डीआई पर साल में दर्जन भर दिल्ली कूच कर लेने व यूनियनें बना लेने भर से बदलाव नहीं आ जाएगा, सच तो यही है कि क्रांति के ऐसे सिपाही अब दुर्लभ ही रह गए हैं जो सुख विलास छोड़ जनता के बीच डटे रह सकें l


हम सब भी जिम्मेदार हैं इसमें कहीं न कहीं... जो भी हो, आप; एक सपना तो दे रहा है आम आदमी की आँखों में, जिसे देखना भी किसी समाजवादी सुख से कम नहीं...


साभार : सुनीता भाष्कर

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S.r. Darapuri

दलित आन्दोलन पर एक ज़रूरी बहस

हाशिया: आनंद तेलतुंबड़े

hashiya.blogspot.com

राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मामले

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Feroze Mithiborwala

An important book on the Asuras.

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Vidya Bhushan Rawat

A wind of change is blowing here. The responses to our Humanise India Initiative has been positive. Load of work to be done, lessons to be learnt even in adversity. One thing is clear that this is not really the issue of poverty. It is a cultural subjugation for years. But positive side is that people have come out against it and living a better life. Interestingly many of the people feel that Humanism is nothing but the broad vision of Dr Ambedkar for an enlightened, compassionate and humane India for all. If one thing we realise here is that the rural poor who may not be too articulate in his or her vision on Ambedkar respected and realised that it is the vision of Baba Saheb Ambedkar that we are carrying and frankly speaking we are just talking of reasoning, compassion, complete abolition of caste system. The most likable thing to quote Ambedker here is,' I am Indian first, Indian last'. It is important to eliminate these artificial superstructure which have destroyed our humanity on the fictitious and superfluous caste order. A complete abolition of caste is the only way to Humanise India. Caste system has only destroyed the idea of India. It is time to spread it, have introspection and speak up unambiguously so that we have an enlightened, compassionate and inclusive society. So, far our message is loud and clear and we hope our struggle will continue. These are our small efforts but we are overwhelmed with the response of the people where we are going, in these basties which have not seen light of the day. We hope the oppressed masses will demolish this dictatorial caste structure one day to make India a land of human beings whose relationship will be on the basis of equality, fraternity and liberty.

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राहत शिविर सच में यातना शिविर हैं, नन्हे-मुन्नों के क़त्लगाह हैं

पहले दंगाइयों ने मारा अब ठंड मार रही है

मौत-घर बन रहे हैं मुजफ्फरनगर के राहत शिविर

फेसबुक पर "मुज़फ्फ़रनगर के राहत शिविर, राहत शिविर नहीं हैं, यातना शिविर हैं", यह कहा आचार्य उमाशंकर सिंह परमार ने। वरिष्ठ साहित्यकार मोहन श्रोत्रिय जी ने उसमें सिर्फ़ इतना जोड़ा, "राहत शिविर सच में यातना शिविर हैं, नन्हे-मुन्नों के क़त्लगाह हैं।" जी हां, लेकिन इन शब्दों और हकीकत का असर न उत्तर प्रदेश सरकार पर है न प्रशासन पर। नेता जी पूरी मौज में हैं, सुना गया है कि वह कहते पाए गए हैं कि #मुज़फ्फरनगर के राहत शिविर में कोई दंगा पीड़ित नहीं बचा है….वहां केवल कांग्रेस और बीजेपी के लोग रुके हुए हैं जो साजिश करके सरकार की छवि ख़राब कर रहे हैं….. ऐसे संवेदनहीन क्रूर माहौल में वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी इस रिपोर्ट में काला सच सामने रख रहे हैं…

सं.-ह.

किसी राजनीतिक पार्टी को कोई फ़र्क़ पड़ता नज़र नहीं आता !

पंकज चतुर्वेदी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जो इलाका अभी कुछ महीनों पहले तक चीनी की चाशनी के लिए मशहूर था, आज नफरत, हिंसा, अमनावीयता की मंद-मंद आग से तप रहा है। भले ही दंगों की लपटें समाप्त दिखाई दे रही हैं लेकिन उसके दूरगामी दुष्परिणाम समाज शिद्दत से महसूस कर रहा है। विडंबना है कि अविश्वास, गुरबत और सामाजिकता के छिन्न-भिन्न होने का जो सिलसिला सितंबर-2013 में शुरू हुआ था वह दिनों-दिन गहराता जा रहा है। सरकार व समाज दोनों की राहत की कोशिशें कहीं पर घाव को गहरा कर रहे हैं। मुजफ्फरनगर और उसके करीबी पांच जिलों में आंचलिक गांव तक फैली दंगे के दावानल को आजादी के बाद उ.प्र. का सबसे बड़ा दंगा कहा गया जिसमें कोई एक लाख लोग घर-गांव से पलायन करने को मजबूर हुए। अब सामने दिख रहा है कि ना तो इसे अपराध के तौर पर और ना ही सामाजिक समस्या के रूप में आकलिन व निवारण के प्रयास करने में सरकारी मशीनरी विफल रही है। आज भी दंगा पीड़ित लोग तिल-दर-तिल मर रहे हैं और उनके सामने भविश्य के नाम पर एक श्याह अंतहीन गली दिख रही है। हर रोज किसी झुग्गी से कोई लाश उठ रही है- असल में यह जनाजा मौसम की मार, सरकार की बेरूखी, लाचारी, गुरबत और खौफ के कंधों पर कब्रिस्तान तक जाता है। भले ही कोई इसे सियासत कहे, लेकिन राहुल गांधी ने उस इलाके में जा कर उन भुला चुके लोगों की ओर देश का ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास तो किया है।

यह सभी जानते हैं कि देश की कुल गन्ने की फसल व चीनी उत्पादन का बड़ा हिस्सा पश्चिमी उ.प्र.के सात जिलों से आता है। इस बार किसान अपना गन्ना लेकर तैयार था तो चीनी मिल दाम को लेकर मनमानी पर उतारू थीं। भारतीय किसान यूनियन ने जब इसका विरोध करने के मोर्चे निकाले तो उस पर दंगों का साया साफ दिखा- प्रदर्शन बेहद फीके रहे क्योंकि ऐसे धरने-जुलूसों में तरन्नुम में नारे लगाने वाले, नए-नए जुमले गढ़ने वाले मुसलमान उसमें शामिल ही नहीं थे। कुंद धार आंदोलन होने का ही परिणाम रहा कि किसान को मन मसोस कर मिल मालिक की मर्जी के मुताबिक गन्ना देना पड़ा।  दंगे के दौरान जिस तरह कई जगह खड़ी फसलों को आग के हवाले किया गया, जिस तरह दूसरे समुदाय के लोगों के खेतों पर कतिपय लोगों ने अपने खूंटे गाड़ दिए, इसके दुष्परिणाम अगले साल देखने को मिलेंगे- यह बात किसान भी समझ गए हैं।

गांव-गांव में जाटों के खेतों पर मजदूरी करने वाले मुसलमान भूमिहीनों ने कभी यह समझा ही नही था कि वह किसी गैर के यहां मजदूरी कर रहा है, लेकिन अब ना तो वह भरोसा रहा और ना ही वह मेहनतकश हाथ वहां बचे हैं।

शामली जिले के मलकपुर, सुनेती गांवों के बाहर खुले मैदान हों या फिर मुजफ्फरनगर के लोई, जोउला या कबाड़ के बाहर खेत- दूर से तो वहां रंगबिरंगी पन्नी व चादरों के कैंप किसी मेला-मिलाद की तरह दिखते हैं, लेकिन वहां हर रंगीन चादर के नीचे हजारों दर्द पल रहे हैं किसी का गांव में दो मंजिला मकान व लकड़ी का कारखाना था, आज वह कैंप के बाह कचरे की तरह पड़े पुराने कपड़ों में से अपने नाप की कमीज तलाश रहा है। बीते दो महीनों में कोई सौ से ज्यादा बच्चियों का निकाह जायद उम्र से पहले करने के पीछे भी उन बच्चियों की रक्षा कैंप में ना होने की त्रासदी है।

शामली के मलकपुर कैंप में कोई 1500 परिवार हैं और यहां दीवाली के बाद से 26 मौत हो चुकी हैं मरने वाले बहुत से छोटे बच्चे हैं। मुजफ्फरनरगर के कैंपों में चालीस से ज्यादा बच्चे काल के गाल में समा चुके हैं। दिन में तीखी धूप खुले आसमान के नीचे बने अस्थाई कैंपों में कहर बरपाती हैं रात में यहां ठंड व ओस से लोग गीले हो जाते हैं। कैंपों के पास चल रहे सरकारी अस्पताल बंद हो चुके हैं, वैसे भी वे अस्पताल में महज प्राथमिक उपचार की दवाएं ही दे रहे थे। नवंबर के पहले सप्ताह से सरकारी राशन बंटना बंद होना भी भुखमरी का कारण बन गया है। कुछ मुस्लिम संगठन यहां इमदाद बांट रहे हैं, लेकिन बगैर तेल-मसाले-जलावन के उनका आटा, चावल या दाल कोई काम का नहीं है।

सबसे बुरी हालत देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों की है। इन कैंपे के बाहर कई सौ ऐसे किशोर मिल जाएंगे जो अभी तक कालेज या हायर सैकेंडरी स्कूलों में जाते थे। दंगे में उनकी किताबों- कापियों, पुराने सनद-दस्तावेजों सभी को राख में बदल दिया है। अब वे ना तो किसी नई जगह दाखिला ले सकते हैं और ना ही अपने पुराने स्कूल-कालेजों में जा सकते हैं। जब मां-बाप एक-एक निवाले की जुगाड़ में सारा दिन बिताते हैं तो उन तीन हजार से ज्यादा स्कूली बच्चों की परवाह कैसे की जा सकती है जिनके लिए कैंपों में शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं हे। जरा सोचें कि अभी भी खौफ के साये में जी रहे इन चालीस हजार से ज्यादा लोगों के कई हजार बच्चे बगैर माकूल शिक्षा या प्रशिक्षण के, इस तरह के शोषण-भयावह और अन्याय के महौल से बड़े हो कर किस तरह मुल्क के विकास में योगदान दे पाएंगे।

कहने को राज्य सरकार ने राहत शिविरों से घर ना लौट रहे लोगों को पांच-पांच लाख रूपए दे कर बसाने की योजना बनाई है और इसके तहत 1800 लोगों को मुआवजा भी दिया जा रहा है। इसके एवज में 900 लोग हलफनामा दे चुके हैं कि वे कभी भी अपने घर-गांव नहीं लौटेंगे।

जरा गौर करें कि यह कितनी असहनीय व सरकार की असहाय होने की योजना है। सरकार में बैठे लोग गांव-गांव में दोनों फिरकों के बीच विश्वास बहाली नहीं कर पा रहे हैं या फिर एक साजिश के तहत उन विस्थापित लोगों के घर-खेतों पर कतिपय लोगों को कब्जा करने की छूट दी जा रही है। संयुक्त परिवार में रह रहे लोगों को मुआवजे के लिए आपस में झगड़ा होना, इतने कम पैसे में नए सिरे से जीवन शुरू कठिन होना लाजिमी है। सनद रहे कि इलाके के गांवों में मुसलमानों की घर वापिसी पर मुकदमे वापिस लेने, साथ में हुक्के के लिए नहीं बैठने, मनमर्जी दर पर मजदूरी करे जैसी शर्तें थोपी जा रही हैं, इसकी जानकारी पुलिस को भी है, लेकिन विग्रह की व्यापकता और उनका प्रशिक्षण इस तरह का ना होने से हालात जस के तस बने हुए हैं।

जिन दंगों ने डेढ़ सौ से ज्यादा जान लीं, जिसमें कई करोड़ की संपत्ति नष्ट हुई, जिसके कारण एक लाख से ज्यादा लोग पलायन करने पर मजबूर हुए, सबसे बड़ी बात जिस दंगे ने आपसी विश्वास और भाईचारे के भव्य महल को नेस्तनाबूद कर दिया- ऐसे गंभीर अपराध पर प्रशासन की कार्यवाही इतनी लचर थी कि इसके सभी आरोपी सहजता से जेल से बाहर आ गए और मुजरिम नहीं, हीरो के रूप् में बाहर आए।

पश्चिमी उ.प्र के हालातों को सामान्य बनाने के लिए किसी सरकारी दस्तावेज या कानून से कहीं ज्यादा मानवीय और दूरगामी योजना की जरूरत है। इलाके के राहत शिविरों में कई मुस्लिम तंजीमें इमदाद के काम कर रही है। जाहिर है कि लोग उनसे ही प्रभावित होंगे और इसके असर कहीं ना कही दुखदाई भी हो सकते हैं।

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पंकज चतुर्वेदी, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।


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नवउदारवादी और सांप्रदायिक ताकतें एकजुट होकर समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष ताकतों को पीछे धकेल रही हैं

सोपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक दिल्ली में संपन्न।

पूर्ण रोजगार कानून बनाया जाए; पानी पर कंपनियों का नहीं, जनता हक रहे; शिक्षा का बाजारीकरण बंद हो; राजनीतिक पार्टियां आरटीआई के दायरे में हों; सातवें वेतन आयोग की समीक्षा की जाए।

90 वर्ष के हुए जस्टिस राजेंद्र सच्चर

नई दिल्ली। सोशलिस्ट पार्टी ने माना है कि नवउदारवादी और सांप्रदायिक ताकतें एकजुट होकर समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष ताकतों को पीछे धकेल रही हैं। इस चुनौती का सामना नवउदारवादी और सांप्रदायिक ताकतों के साथ किसी भी तरह का समझौता करके नहीं, उनका पूर्ण विरोध करके किया जाना चाहिए। सोशलिस्ट पार्टी यही करती है और आगे भी करेगी।

21-22 दिसंबर को संपन्न पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक में यह मत बना। अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी सीमित सीटों पर चुनाव लड़ेगी। हर राज्य में सीटों के चयन का काम पूरा हो गया है। 31 जनवरी तक सभी चुनाव क्षेत्रों और उममीदवारों के नाम घोषित कर दिए जाएंगे। चुनाव में पार्टी नवउदारवाद का आमूल विरोध करने वाले राजनीतिक दलों के साथ ही तालमेल करेगी।

बैठक में पारित प्रस्ताव में मांग की गई कि पूरे देश में सभी बेरोजगारों को रोजगार की गारंटी देने वाला कानून बनाया जाए। आर्थिक नीतियों का निर्धारण और लक्ष्य संविधान के नीति निर्देशक तत्वों की रोशनी में सभी सक्षम स्त्री-पुरुषों के लिए रोजगार पैदा करना रखा जाए। नवउदारवादी आर्थिक नीतियों और विकास के पूंजीवादी मॉडल की जगह कृषि-उद्योग-सहकारी मॉडल अपनाया जाए। पानी प्रकृति की देन और मनुष्य समेत सभी जीवधारियों का प्राकृतिक हक है। पानी का किसी भी रूप में निजीकरण बंद हो। पानी का सबसे पहले मनुष्यों और अन्य जीवधारियों के पीने और कृषि की सिंचाई के लिए उपयोग हो।

प्रस्ताव में सरकार द्वारा घोषित सातवें वेतन आयोग की कड़ी समीक्षा करने की मांग की गई है। सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि पांचवें और छठे वेतन आयोग से सरकारी क्षेत्र के उच्चाधिकारियों और निम्न श्रेणी के कर्मचारियों के वेतन में भारी असमानता पैदा हो गई है। साथ ही चौथी ओर तीसरी श्रेणी के पद खाली होने पर भरे नहीं जाते हैं और उन पर ठेके पर नियुक्तियां की जाती है। पार्टी की मांग है कि सातवें वेतन आयोग में वेतन की असमानता को घटाया जाए। तीसरी और चौथी श्रेणी के पदों पर विधिवत नियुक्तियां की जाएं। केंद्र, राज्य और पंचायती राज स्तर पर प्रशासनिक खर्च कम किया जाए। सार्वजनिक छुट्टियों की संख्या कम की जाए।

प्रस्ताव में मांग की गई है कि केजी से पीजी तक सबको मृफ्त, समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का काम राज्य करे। राजनीतिक पार्टियों के खाते में पारदर्शिता लाने के लिए उन्हें सूचना का अधिकार कानून के दायरे में लाया जाए।

पार्टी के वरिष्ठ सदस्य जस्टिस राजेंद्र सच्चर 22 दिसंबर को 90 वर्ष के हो गए हैं। एक विशेष प्रस्ताव रख कर उन्हें बधाई दी गई और दीर्घायु होने की कामना की गई। यह तय किया गया कि अगले एक साल तक जस्टिस सच्चर के सम्मान में देश के विभिन्न शहरों में समाजवादी आंदोलन और विचारधारा पर आधारित संगोष्ठियों का आयोजन किया जाएगा।

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भाई वैद्य की अध्यक्षता में संपन्न हुई बैठक में 20 राज्यों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। हाल में पांच राज्यों में संपन्न हुए चुनावों की समीक्षा की गई।

मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों की अवाज दबाना चाहती है सरकार- रिहाई मंच

Posted by: Amalendu Upadhyaya November 9, 2013 in देश

संगीत सिंह सोम जैसे दंगाइयों पर से रासुका हटाना

सरकार की सांप्रदायिक मानसिकता को दर्शाता है- रिहाई मंच

मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों की

जनसुनवाई में पहुंचे इंसाफ पसन्द अवाम- रिहाई मंच

लखनऊ 8 नवंबर 2013। रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा कि कल 9 नवंबर को कैसर बाग स्थित जयशंकर प्रसाद हाल लखनऊ में रिहाई मंच के तत्वावधान में मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों के सवाल पर आयोजित जनसुनवाई कार्यक्रम को अखिलेश सरकार के इशारे पर खुफिया एजेंसियों व स्थानीय प्रशासन द्वारा रोकने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन मुजफ्फरनगर से सैकड़ों साप्रदायिक हिंसा पीड़ित इंसाफ के लिए प्रदेश की राजधानी में डेरा डाल चुके हैं। रिहाई मंच इंसाफ के सवाल पर आयोजित मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा से पीड़ितों की जनसुनवाई व सपा राज में सांप्रदायिक दंगे- गुनहगार कौन ? सम्मेलन को तय समय पर तय जगह पर करने के लिए प्रतिबद्ध है।