Wednesday, June 18, 2014

ये राज्य यूँ ही चलेगा....


चन्द्रशेखर करगेती feeling annoyed : बोल री, जनता तेरी तकदीर में क्या है ?
3 hrs · Edited · 

ये राज्य यूँ ही चलेगा....
अपनी स्वास्थ संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए अपने क्षेत्र के सांसद महोदय तक पहुँचने के लिए आप भी किसी पहुँच वाले व्यक्ति से जुगाड़ लगवायें ! याद रहें हमारे सरकारी अस्पतालों की व्यवस्थाओं को चाक चौबंद करना इनकी जिम्मेदारी नहीं है ! इनकी कृपा रही तों निजी चिकित्सालय (दुकानें) फलती-फूलती रहेंगी !
सरकारी स्वास्थ व्यवस्थाओं को चाक चौबंद करना हमारे जनप्रतिनिधियों का काम तो बिल्कुल भी नहीं है, वे सरकारी व्यवस्थाओं को चाक चौबंद किये जाने के बजाय सरकार से किसी भी पीड़ीत व्यक्ति के इलाज के लिए निजी चिकित्सा की दूकान के मनमाने कोटेशन पर इलाज हेतु धनराशि दिये जाने के लिए सरकार को पत्र ही लिख सकते हैं ! एक लोकसभा सांसद से इससे ज्यादा और क्या उम्मीद की जा सकती है ?
यह हमारे कुमाऊं क्षेत्र का दुर्भाग्य कहें कि यहाँ पर मेडिकल कॉलेज के नाम एक उच्च चिकित्सा संस्थान भी है, जहाँ की व्यवस्थाएं पता नहीं कैसी है, वहाँ के डॉक्टर कितने योग्य हैं, वहाँ का प्रशासन कैसा है, जो मण्डल की जनता को यह विस्वास नहीं दिला पा रहा है कि उनके शहर में एक मेडिकल कॉलेज नाम की संस्था भी है जहाँ से भावी चिकित्सक तैयार किये जाते है ? पता नही यह मेडिकल कॉलेज कैसा है, जिस पर गली मोहल्ले के दड़बे जैसे कमरों में स्वास्थ सुविधा के नाम पर चलने वाले अलां-फलां रिसर्च इंस्टीट्यूट भारी पड़ जा रहें हैं !
धन्य हैं मेरे शहर की जनता भी जो अपनी जान और माल की कीमत पर सब कुछ सह जाती है, धन्य है वे तमगेदार समाजसेवी भी जो अपना रोजगार का काम धाम छोड़कर उनके लिए धनराशि की व्यवस्था करवाने को इस प्रकार के प्रयत्न भी कर लेते हैं l
क्षेत्र की जनता के लिए इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है कि एक लोकसभा सांसद निजी अस्पताल को सरकारी धन दिये जाने की सिफारिस के लिए बिना सोचे समझें मुख्यमंत्री को पत्र भी लिख देते हैं ! हल्द्वानी का कृष्णा होस्पीटल ना हुआ एम्स से भी बड़ा अस्पताल हो गया ?
कुमाऊं के विभिन्न सरकारी अस्पतालों से सुविधाओं के अभाव में ना जाने कितने जगदीश रोज कृष्णा हॉस्पीटल जैसे चिकित्सा में मुनाफ़ा देख रही दुकानों को रेफर किये जाते हैं, उन निरीह और निर्बल जगदीशों के लिए पत्र कौन लिखेगा जो माननीय सांसद साहब तक नहीं पहुँच पाते हैं ?
समस्या को फौरी तौर पर निपटाने के बजाय इस समस्या की जड़ को मिटाया जाता तो मैं भी सच में सांसद साहब का गुणगान कर रहा होता ! काश, जगदीश का इलाज इन दड़बों में चलने वाले हॉस्पीटलों की बजाय देश के किसी उच्च सुविधाओं से सुसज्जित अस्पताल में निशुल्क हो पाता ?
पैसा मिलने के बाद क्या गारंटी कि जगदीश को ये ठीक कर देंगे ? जो इन निजी अस्पतालों को चाहिए वो मिल गया मरीज जाये भाड़ में, दुवा करें कभी आपको इस स्थिति से दो चार ना होना पड़े !

राज्य के खजाने पर भारी,बल हर दा तुम्हारे ये दर्जाधारी........

सरकार में अभी तक करीब तीन दर्जन कैबिनेट स्तर के दर्जाधारी हैं । इनमें से एक दर्जन सभा सचिव हैं और बाकी सरकारी उपक्रमों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष हैं । इनके अलावा राज्यमंत्री स्तर के दर्जाधारियों की भी अच्छी खासी संख्या है । सरकार में दर्जाधारियों की संख्या 100 का आंकड़ा पार कर चुकी है । सबसे ज्यादा 125 दर्जाधारी एनडी तिवारी सरकार में थे । एनडी के बाद 87 का आंकड़ा पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने छुआ और अब हरीश सरकार में दर्जाधारियों की सेंचुरी हो चुकी है । जिस तेजी से हरीश रावत ने दायित्व बांटे हैं, अगर वही तेजी रही तो एनडी तिवारी सरकार में बाँटे गये 125 दायित्वों का रिकार्ड टूट जाएगा । उत्तराखंड में कैबिनेट स्तर के एक दर्जाधारी का न्यूनतम खर्चा तीन से चार लाख रुपये महीना है । इस हिसाब से दर्जाधारियों पर सालाना खर्च ही करोड़ों में बैठता है । करोड़ों खर्च करने के बावजूद सरकारी कामकाज में इनकी हिस्सेदारी एक पैसे की भी नहीं है इनका संवैधानिक स्थिति "काम के ना काज के, दुश्मन खजाने के" की सी है ।

“नौछमी नारायण” कहे जाने वाले पूर्व सीएम एनडी तिवारी से लेकर सीएम हरीश रावत तक दायित्व की रेवड़ियां बांटने का एक ही ध्येय रहा है । सत्ता में जिसने भी दिक्कत की, उसका मुंह लालबत्ती या दायित्वों से बंद कर दिया । एनडी राज में तो पद बांटने के लिए जब विभाग-बोर्ड-निगम कम पड़ गए तो एक ही विभाग में कई-कई पद सृजित किए गए । लेकिन जब गली-मुहल्लों में टटपूंजियाँ टाईप के नेताओं की लालबत्तियों के हूटरों को सुन-सुनकर जनाक्रोश बढ़ा तो इन पर पर्दा डालने के लिए क, ख, ग और घ श्रेणियाँ बना दी गईं । एनडी ने अपने राज में 125 लालबत्तियां बांटी, उन ओहदों के चिन्ह और अवशेष आज भी कांग्रेसी नेताओं के आवासों की नाम पट्टिकाओं और लेटर हेडों में मिल जाएंगे जो पूर्व मंत्री होने के हैंगओवर से अब तक बाहर नहीं निकल पाए हैं । मजेदार बात यह है कि सारे पूर्व मंत्री कभी मंत्रिपरिषद का हिस्सा ही नहीं रहे । लेकिन ठसक मंत्रियों वाली ही रही, जैसे ही सरकार बनी तो विधायक से लेकर नेताओं तक में लालबत्ती, गाड़ी, बंगला, गनर, हूटर की वासना जाग उठी ।

2007 के चुनाव में भाजपा ने लालबत्ती को मुद्दा बनाया और सत्ता में आई । लेकिन समानांतर सत्ता के लोभ से वह भी पार न पा सकी । चूंकि लालबत्ती को इलेक्शन में मुख्य मुद्दा बनाकर सत्ता में आई थी । इसलिए उसने कान सीधे न पकड़कर उलटे पकड़ लिए । सत्ता में बैकडोर एंट्री के लिए उसने नया नाम गढ़ा । दर्जाधारी या दायित्वधारी यानी कांग्रेस राज में जो ओहदे लालबत्तियों का रैला, टोला सरीखी उपमाओं से नवाजे जाते थे, वो दायित्वधारी में तब्दील कर दिए गए । मजेदार बात ये है कि लालबत्ती के अलावा सरकारी सुख-सुविधाओं में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई । गाड़ी, बंगला, गनर, हूटर सब वही मिला । फर्क सिर्फ इतना रहा कि खंडूड़ी दायित्व बांटने में उतने उदार नहीं रहे और उन्होंने इनकी संख्या को 40 तक सीमित कर दिया । हालांकि पार्टी स्तर पर दायित्वों की संख्या बढ़ाये जाने को लेकर उन पर काफी दबाव रहा । लेकिन वे संख्या बढ़ाने को तैयार नहीं हुये जिसे संगठन के भीतर नाराजगी बढ़ती गई । यही नाराजगी आगे चलकर सत्ता से उनकी विदाई का कारण बनी ।

खंडूड़ी विदा हुए तो ओहदे भी बढ़ गए । निशंक ने 40 तक सिमटी संख्या को 87 तक पहुंचा दिया । चहेतों को ओहदे बांटने के मामले में उनकी तुलना भी एनडी तिवारी से की जाने लगी । वे सत्तारूढ़ कांग्रेस के तब मुख्य निशाने पर रहे । मगर विपक्ष की आलोचनाओं से बेपरवाह निशंक ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों तक दर्जे बांटे । ये सच्चाई है कि लालबत्तियों को मुद्दा बनाकर सत्तारूढ़ हुई भाजपा ने भी सत्ता की बंदरबांट में कांग्रेस राज के संस्कारों का ही अनुसरण किया । जिस तरह नेताओं और कार्यकर्ताओं के दबाव एनडी बर्दाश्त नहीं कर पाए, ठीक वैसे निशंक भी दबाव में रहे । खंडूड़ी ने दबाव में नहीं आए तो उन्हें विदा होना पड़ा ।

लालबत्तियों के मुद्दे पर मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भी कुछ इसी तरह के दबाव में रहे । उन्होंने 13 विधायकों को लालबत्तियों का तोहफा दिया । इनमें भी 11 कांग्रेस के, बीएसपी और निर्दलीय एक-एक विधायक था । बाकियों की मुराद उन्होंने जाने से पहले पूरी की । सत्ता की कमान संभालने के बाद मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी दायित्व बांटने का जो सिलसिला शुरू किया है, वो अब तक जारी है । हैरान करने वाला तथ्य है कि कांग्रेस के 31 में से छह विधायक मंत्रिमंडल में हैं । बाकी 25 में से 22 के पास कोई न कोई दायित्व है । इनमें से तकरीबन सभी का कैबिनेट मंत्री या राज्य मंत्री का दर्जा है ।

हालांकि जिस अंदाज से हरीश ने अपनी पारी का आगाज किया था, उससे यही लगा था कि वे सत्ता चलाने के शार्टकट तरीकों से परहेज करेंगे । लेकिन लोक सभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद जिस तरह से उन्होंने दायित्व बांटने का अभियान शुरू किया है, उसने जाहिर कर दिया है कि सरकार चलाने के पारंपरिक तौर-तरीकों से वे भी बाहर नहीं निकल पाए हैं । अब तो आलम यह है कि सुप्रीम कोर्ट के दखल से जिन दायित्वधारियों की लालबत्ती हटी थी, उनकी वापसी की कवायद शुरू हो गई है । राज्य में लालबत्ती का इस्तेमाल करने वाले चार दर्जन से ज्यादा महानुभावों में से सिर्फ 17 को ये अधिकार दिया गया है ।

लेकिन अब सरकार सभा सचिवों को भी ये अधिकार देने जा रही है । जाहिर है कि इसके बाद कैबिनेट और मंत्री के बीच कोई फर्क नहीं रह जाएगा क्योंकि मुख्यमंत्री इनके जरिये विभागों की फाइलें चलाये जाने के भी हिमायती नजर आ रहे हैं । जानकारों की मानें तो सरकार के पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है कि वह लोगों को सलाहकार, अध्यक्ष या विभागों, बोडरें या आयोगों आधिक का प्रमुख बनाकर कैबिनेट या राज्यमंत्री का दर्जा दे । सवाल इस बात का भी है कि इन लोगों के पास सरकार से जुड़ी जानकारियां होती हैं और इनकी पहुंच आधिकारिक दस्तावेजों तक होती है । ऐसे दस्तावेज जो सरकार की फैसलों की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं । कायदे से इन जानकारियों या दस्तावेजों तक उन्हीं लोगों की पहुंच होनी चाहिए जिन्होंने गोपनीयता की शपथ ली है । लेकिन उत्तराखंड में दायित्व काम के लिए नहीं नाम के लिए बांटने की परंपरा है, जो शायद ही कभी खत्म होगी । सूबे में किसी भी दल की सरकार हो, उसके खजाने पर ये प्रतिबद्ध देय है जिसे सरकार बचाने के लिए हर मुख्यमंत्री को चुकाना ही है ।

साभार : दैनिक जनवाणी
 — feeling annoyed : काश राज्य के बानर गुणी भी दर्जा राज्य मंत्री बन पाते.
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  • Palash Biswas

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