Twitter

Follow palashbiswaskl on Twitter

Friday, November 2, 2012

Fwd: [New post] विचार : लूट-तंत्र में बदलता लोकतंत्र



---------- Forwarded message ----------
From: Samyantar <donotreply@wordpress.com>
Date: 2012/10/30
Subject: [New post] विचार : लूट-तंत्र में बदलता लोकतंत्र
To: palashbiswaskl@gmail.com


समयांतर डैस्क posted: "यह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय की बात है। उस समय प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में दो लोग का"

New post on Samyantar

विचार : लूट-तंत्र में बदलता लोकतंत्र

by समयांतर डैस्क

brijesh-mishra-nk-singhयह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय की बात है। उस समय प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में दो लोग काफी ताकतवर थे और नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता रखते थे। इनमें एक थे वाजपेयी के बहुत ही विश्वासपात्र ब्रजेश मिश्र (जो उस समय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे) और दूसरे थे पीएमओ में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (आर्थिक मामले) एन.के. सिंह। ये दोनों औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए तत्पर रहते थे। उस समय सत्ता के गलियारों में इन दोनों की ताकत की चर्चा रहती थी। पर प्रामाणिक तौर पर इसका खुलासा आउटलुक अंग्रेजी पत्रिका के पांच मार्च 2001 के अंक में वित्त मंत्रालय में सचिव (आर्थिक मामले) रहे डॉ. ईएएस सरमा ने किया था। अपने साक्षात्कार में उन्होंने कहा था- ''बहुत सारे औद्योगिक घराने और लॉबिंग करने वाले लाभ प्राप्त करने के वास्ते छूटों और अन्य चीजों के लिए सरकार पर निर्भर रहते हैं। जब मंत्रालयों और प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिकाएं और जवाबदेही धूमिल हो जाती है, जैसा कि अब हो रहा है (उस समय वाजपेयी की सरकार थी), लॉबिंग एक तरह से रोज का नियम बन जाती है।... जहां तक ब्रजेश मिश्र और एन.के. सिंह का सवाल है तो ये दोनों मुख्य पदाधिकारी हैं और नीतियों को प्रभावित करने की हैसियत में हैं।... रिलायंस के हिरमा प्रोजेक्ट के मामले में परियोजना के अनुकूल और गारंटी सहित जल्द से जल्द स्वीकृतियां दिलाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय अनावश्यक दिलचस्पी लेता रहा है। हिरमा प्रोजेक्ट में बीस हजार करोड़ का निवेश शामिल है। यदि सरकार काउंटर गारंटी देती है तो यह रिलायंस को अगले बीस साल तक एक निश्चित बड़ी रकम लौटाने के समान होगा।...बिजनेस लॉबिंग जैसे रिलायंस, एस्सार और हिंदूजा ने पीएमओ पर जोर लगाना शुरू कर दिया है और यह वांछित प्रवृत्ति नहीं है।... जो लोग सत्ता में हैं हिंदूजा बंधु उनके बहुत ही करीब हैं। हिंदूजा इतने ताकतवर थे कि अपनी पहल पर कैबिनेट की बैठकें बुला सकते थे।''

यह पीएमओ का ग्यारह साल पुराना परिदृश्य है। जो वक्त के साथ और भी बदरंग होता चला गया है। हमारी सरकारों का वास्तविक चरित्र कैसा है, सरमा की उपरोक्त बातों से साफ हो जाता है। कॉरपोरेट घरानों और मंत्रियों-नेताओं का एक ऐसा नापाक गठजोड़ (जिसकी दीवार किसी भी उच्चतम श्रेणी के ईंट-गारे से हजारों गुना ज्यादा मजबूत है) बना हुआ है जिसने भारत को एक 'बनाना रिपब्लिक' में तब्दील कर दिया है। राजनीतिक विज्ञान में 'बनॉना रिपब्लिक' एक ऐसे देश को कहा जाता है जो प्राइमरी-सेक्टर प्रोडक्शन पर निर्भर है, जिस पर धनिकतंत्र शासन करता है और जो राजनीतिक-आर्थिक ऑलिगार्की (सीमित लोगों में निहित सत्ता वाला शासन) के माध्यम से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का इस्तेमाल करता है।

दरअसल भारत में जहां भी कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट और अन्य प्राकृतिक संसाधन भरपूर मात्रा हैं वहां सरकारों की मदद से कॉरपोरेट घराने किसी भी तरह से अधिक मुनाफा कमाने के लिए इनका अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों और राष्ट्रीय संपदाओं की लूट के लिए होड़ मची है। सरकारों में अपने प्रभाव के बल पर जो जितना हथिया सकता है उतना हथिया रहा है। कॉरपोरेट घरानों के लिए नीतियों को इस तरह से बदला जाता है जिससे उन्हें हर हाल में छप्पर फाड़ मुनाफा (विंडफॉल गेन्स) हो।

इसका एक उदाहरण कांग्रेस के युवा सांसद नवीन जिंदल की कंपनी जिंदल पावर लिमिटेड (जेपीएल) है, जो कि जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड (जेएसपीएल) की सब्सिडरी कंपनी है। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में इसका कोयला आधारित पावर प्लांट है। यह भारत का पहला ऐसा प्रोजेक्ट है जिसका 'मर्चेंट पावर' के आधार पर परिचालन होता है। इसका अर्थ यह है कि यह उन दूसरे प्रोजेक्टों जैसा नहीं है जो कि राज्य सरकारों के साथ दीर्घावधि के बिजली खरीद समझौते के जरिए निश्चित शुल्कों से बंधे होते हैं। जेपीएल बाजार में किसी भी खरीददार को हाजिर दर (स्पॉट रेट) पर बिजली बेचने के लिए स्वतंत्र है। कंपनी का एक हजार मेगावाट का प्लांट 2008 में पूर्णतया परिचालन होने लगा था। अगले साल के दौरान कंपनी ने छह रुपए प्रति यूनिट से अधिक की औसत कीमत पर बिजली बेची। इसने वर्ष 2010 तक बहुत अधिक प्राप्ति से न केवल अपनी चालू लागत को पा लिया बल्कि 4338 करोड़ के निवेश को भी पूरा कर दिया। इंफ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञों के अनुसार पावर प्रोजेक्टों में पूंजी निवेश के लिए व्यय ऋण को चुकाने में पांच से सात साल लग जाते हैं। हालांकि इस प्रोजेक्ट में ऐसा कुछ नहीं है। रिसर्च फर्म मोतीलाल ओसवाल की जुलाई 2011 की रिपोर्ट में कहा गया है कि ''अपने परिचालन के दो साल के भीतर ही जिंदल पावर कम लागत के कारण अत्यधिक धनापूर्ति की वजह से ऋणमुक्त हो गई।'' कम लागत का सबसे बड़ा कारक यह था कि इसे केवल दस किलोमीटर दूर केप्टिव कोयला खान- संयुक्त आरक्षित कोयला 24 करोड़ 60 लाख टन- से सस्ता कोयला मिलना था। (सीक्रेट ऑफ जिंदल्स सक्सेस : चीप कोल, कॉस्टली पावर, सुप्रिया शर्मा, संडे टाइम्स 9 सितंबर 2012)।

naveen-jindal-on-the-backfootइसका एक और उदाहरण कोयला ब्लाकों के आवंटन में कैग की रिपोर्ट से भी साफ हो जाता है। कोल ब्लॉक आवंटन में सबसे अधिक लाभान्वित होने वालों में अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस पावर लिमिटेड (आरपीएल) भी है। ऊर्जा और कोयला मंत्रालयों की जबरदस्त खिंचाई करते हुए कैग ने कहा कि आरपीएल को उसके चार हजार मेगावाट के सासन मेगा पावर प्रोजेक्ट के लिए बोली (बिड्स) लगाने से पूर्व छूटें दी गईं। कैग का कहना है कि यह बोली की प्रक्रिया को दूषित करना ही नहीं है बल्कि डेवलेपर को 29,033 करोड़ रुपए का 'अनुचित लाभ' प्रदान करना है। दरअसल कॉरपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने के मामले में पार्टी लाइन और विचारधारा सब धूमिल हो जाती है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (भाजपा नेता) ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया था कि सासन प्लांट के कैप्टिव ब्लॉकों से अधिशेष कोयला के इस्तेमाल की आरपीएल को अनुमति दे दी जाए। कोयला ब्लॉकों के आवंटन के इस काले धंधे में लाभ पाने वाली कंपनियों में से कुछ के नाम हैं- टाटा ग्रुप, रिलायंस पावर, जिंदल पावर एंड स्टील, अभिजित ग्रुप, भूषण ग्रुप, इलेक्ट्रोस्टील, आधुनिक ग्रुप, एसआर रूंगटा ग्रुप, सज्जन जिंदल, गोदावरी इस्पात, ओपी जिंदल ग्रुप, जयप्रकाश गौड़, गोयनका ग्रुप। कोयला घोटाले में भी केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों की संलिप्तता का आए दिन खुलासा हो रहा है। इसमें केंद्रीय पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय, कांग्रेस सांसद विजय दर्डा (उनके भाई राजेन्द्र दर्डा महाराष्ट्र सरकार में मंत्री हैं), केंद्रीय राज्य मंत्री जगत्रकशाकन (द्रमुक) और राजद के प्रेम गुप्ता (यूपीए की पिछली सरकार में कॉरपोरेट मामलों के मंत्री थे) का नाम सामने आया है। इसके अलावा केंद्र में मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल और सुशील कुमार शिंदे पर भी आरोप लग रहे हैं। इनके अलावा पूर्व कोयला मंत्री संतोष बरगोदिया ने अपने भाई को किस तरह से खनन का ठेका दिलाया यह भी मीडिया रिपोर्टों में सामने आया है। लेकिन इन सब के अलावा यह 'अजब संयोग' है कि कोयला ब्लॉकों के आवंटन के इस मामले के तार सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय तक जुड़ते हैं। जैसा कि कैग ने कहा है कि इससे सरकारी खजाने का 1.86 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। प्रधानमंत्री कार्यालय का एक पत्र साफ दर्शाता है कि यह पीएमओ ही था जिसने कोयला मंत्रालय द्वारा जाहिर की गई चिंताओं के बावजूद स्क्रीनिंग कमेटी की प्रक्रिया के जरिए कोयला ब्लॉकों के आवंटन की विवादास्पद पद्धति को अपनाया। (टाइम्स नाउ टीवी चैनल)। उस समय कोयला मंत्रालय का प्रभार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास था।

मनमोहन सिंह ने जब 90 के दशक के शुरू में आर्थिक सुधारों की शुरुआत की तो उस समय कहा गया था कि देश की आर्थिक तरक्की के लिए लाइसेंस राज को समाप्त किया जाना जरूरी है। यह भी कहा गया था कि सबको बराबर का मौका मिलना चाहिए और बिजनेस के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी माहौल बनाया जाएगा। इसी के तहत 1993 में कोल माइंस (नेशनलाइजेशन) एक्ट 1973 में संशोधन करके निजी कंपनियों के कैप्टिव इस्तेमाल के लिए कोयला ब्लॉकों का आवंटन का रास्ता खोला गया था। लेकिन जब 2005 में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने पारदर्शी तरीके से प्रतिस्पर्धी बोली की बजाय अपारदर्शी रास्ता अपनाया।

हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने यह कोयला आवंटन में ही नहीं किया बल्कि गोवा में लौह अयस्क के खनन के मामले में भी 'रिकार्ड' कायम किया। जस्टिस एमबी शाह आयोग की रिपोर्ट के अनुसार गोवा में वर्ष 2006 से 2011 के बीच गैरकानूनी खनन से 34,935 करोड़ का नुकसान हुआ। शाह आयोग ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को इस बात के लिए दोषी ठहराया है कि उसने नियमों और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नजरअंदाज करते हुए हरी झंडी दी जिसने कि गोवा में लौह अयस्क के अनियंत्रित खनन का रास्ता साफ किया। लौह अयस्क के खनन को यह मंजूरी उस समय दी गई थी जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास पर्यावरण एवं वन मंत्रालय का भी प्रभार था। गोवा में 11 हजार हेक्टेयर वन भूमि का खनन के लिए इस्तेमाल किया गया। गोवा में भी खनन घोटाले में राज्य के दो पूर्व मुख्यमंत्री, मंत्री और कई नेता शामिल हैं। लौह अयस्क के गैर कानूनी तरीके से खनन और उसके अवैध निर्यात का एक बड़ा केंद्र बेल्लारी भी है। जहां रेड्डी बंधुओं (जी जनार्दन रेड्डी, जी करुणाकर रेड्डी और जी सोमशेखर रेड्डी) का एकछत्र राज चलता है। ये रेड्डी बंधु इतने ताकतवर हैं कि राज्य में सरकार बनवाने और उसे गिराने तक की हैसियत रखते हैं। रेड्डी बंधु 1999 में लोकसभा चुनाव के दौरान उस समय चर्चा में आए थे जब उन्होंने बेल्लारी सीट से सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव में खड़ी भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज के समर्थन में काम किया था। जी करुणाकर रेड्डी 14वीं लोकसभा में बेल्लारी संसदीय क्षेत्र से भाजपा के सांसद थे। जी जनार्दन रेड्डी कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में राजस्व मंत्री थे। इसी महीने सात सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को इस बात के लिए कड़ी फटकार लगाई कि उसने गैर कानूनी तरीके से खनन किए गए 50.79 लाख टन लौह अयस्क को गोवा के बेलकरी पोर्ट के जरिए निर्यात करने दिया। अवैध तरीके से खनन किया गया यह लौह अयस्क बेल्लारी से चार सौ किलोमीटर दूर बेलकरी पोर्ट ले जाया गया था। कर्नाटक के लोकायुक्त का आकलन था कि 2006-07 और 2010 के बीच गैरकानूनी तरीके से लौह अयस्क के निर्यात से राज्य को 12,228 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

भारत में यह सब क्रोनी कैपिटलिज्म (अपने अंतरंग मित्रों, करीबियों और खास लोगों को फायदा पहुंचाने का पूंजीवाद) के साथ-साथ पूंजीवाद के साम्राज्य के आक्रामक अभियान का हिस्सा है। कॉरपोरेट घरानों और क्रोनी कैपिटलिज्म के इस अभियान में सरकारों के अंदर बहुत सारे उनके अंतरंग मित्र भी शामिल हैं। नीरा राडिया (जो कि बड़े औद्योगिक घरानों के लिए सत्ता के भीतर लॉबिंग का काम करती थी) कांड के खुलासे में हम देख चुके हैं कि महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों का मंत्री कौन होगा यह काम भी अब कॉरपोरेट घराने ही करते हैं। टू जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस आवंटन घोटाला (1.72 लाख करोड़ रुपए का) इसका एक बड़ा उदाहरण है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज को कृष्णा-गोदावरी गैस बेसिन में किस तरह से लाभ पहुंचाया, इसका आरोप कैग ने अपनी रिपोर्ट में लगाया है।

लेकिन मामला अब सिर्फ लॉबिंग और लॉबिंग करने वालों और बिजनेस घरानों द्वारा राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले चंदे तक ही सीमित नहीं है। पूरा परिदृश्य अब बदल चुका है। अब एक तरह से सरकारों का ही कॉरपोरेटीकरण हो रहा है। सरकारों के मुखिया जनता के प्रतिनिधि की जगह कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) ज्यादा नजर आने लगे हैं। सत्ता के गलियारों में दलाल और मध्यस्थ तो अपनी तरह से सक्रिय हैं ही, लेकिन अब बड़ी-बड़ी कंपनियों ने एक काम यह किया है कि वे अब अपने नुमाइंदों को राज्यसभा में भी भेज रहे हैं। इसका एक फायदा यह होता है कि कंपनी का आदमी जब सांसद हो जाता है तो सत्ता के भीतर बहुत सारी जगहों पर उसकी पहुंच आसान हो जाती है। एक सांसद होने के नाते वह कई समितियों में पहुंच जाता है। मंत्रियों से मुलाकात करने पर कोई शक की निगाह से भी नहीं देखता। कुछ उद्योगपति तो खुद ही किसी भी पार्टी के टिकट से राज्यसभा पहुंच जाते हैं। अनिल अंबानी और उनके बड़े भाई मुकेश अंबानी की सत्ता से बहुत ही करीबी कोई छुपी हुई बात नहीं है। अनिल अंबानी तो राममनोहर लोहिया के समाजवाद को आगे बढ़ाने वाले मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी से राज्यसभा पहुंचे थे।

parimal-nathwani-website-photoबड़े भैया मुकेश अंबानी खुद तो नहीं लेकिन अपने लोगों को राज्यसभा में भिजवाते हैं। राज्यसभा के एक सांसद हैं परिमल नाथवानी। इनका कारोबारी कार्यक्षेत्र गुजरात रहा है। नब्बे के दशक में गुजरात में रिलायंस की रिफाइनरी के लिए बड़े पैमाने पर किए गए भूमि अधिग्रहण में नाथवानी की अहम भूमिका रही है। नाथवानी गुजरात से नहीं बल्कि झारखंड से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा पहुंचे हैं। उन्हें जितवाने के लिए सभी दलों ने अपनी दलीय भावनाओं का परित्याग कर दिया था। वैसे भी राज्यसभा चुनाव में विधायकों की खरीद-फरोख्त के लिए झारखंड काफी बदनाम है। नाथवानी के चुनाव के दौरान भी कई तरह के आरोप लगे थे। सांसदी के अलावा नाथवानी के पास जो कारोबारी पद हैं वह कुछ इस प्रकार हैं- ग्रुप प्रेसिडेंट (कॉरपोरेट अफेयर्स), रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड चेयरमैन, रिलायंस रुरल डेवलेपमेंट ट्रस्ट। एक सांसद के बतौर वह नागरिक उड्डयन मंत्रालय की सलाहकार समिति (कन्सल्टटिव कमेटी) के सदस्य हैं। साथ ही विदेश मंत्रालय की सलाहकार समिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य भी हैं। उनकी वेबसाइट में उनकी फोटो के ठीक नीचे बायीं ओर रिलायंस का लोगो लगा है और उसके ठीक दायीं ओर संसद भवन का चित्र है। नाथवानी ने अपनी वेबसाइट में लिखा है कि जब उन्होंने राज्यसभा के लिए मैदान में उतरने का प्रस्ताव किया तो मुकेश अंबानी ने उन्हें प्रोत्साहित किया। नाथवानी आगे लिखते हैं कि वह किसी शब्द को कमतर नहीं कर रहे हैं जब वह यह कहते हैं वह जो कुछ भी प्राप्त कर सके हैं वह इसलिए कि उन्होंने (मुकेश अंबानी) उन पर (नाथवानी) भरोसा और समर्थन जताया था। एक और सांसद हैं डॉ. वाई.पी. त्रिवेदी। वह महाराष्ट्र से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के टिकट से निर्विरोध चुनकर राज्यसभा पहुंचे। वह रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और रिलायंस पेट्रोलियम लिमिटेड में निदेशक हैं। अब जदयू के राज्यसभा सांसद एन.के. सिंह को ही लें, जिनका जिक्र शुरू में ईएएस सरमा के साक्षात्कार में किया गया है। एन.के. सिंह नीति संबंधी मामलों में अंग्रेजी अखबारों में कॉलम भी लिखते हैं। पुराने अफसरशाह हैं। उनकी एक उपलब्धि यह भी है कि वह रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड द्वारा प्रायोजित थिंक टैंक ऑब्जर्वर फाउंडेशन से जुड़े हैं। विजय माल्या कर्नाटक से निर्दलीय के रूप में राज्यसभा पहुंचे और उन्हें तमाम दलों का समर्थन मिला। वह नागरिक उड्डयन मंत्रालय की सलाहकार समिति के सदस्य हैं। उनकी किंगफिशर एयरलाइंस भी चलती है। जो वित्तीय हालत पतली होने के चलते चर्चा में है। वह सरकार से आर्थिक पैकेज की मांग कर रहे थे। वह तो उन्हें नहीं मिला, लेकिन सरकार ने नागरिक उड्डयन क्षेत्र को एफडीआई का तोहफा जरूर दे दिया है। क्या इसे संयोग ही कहा जाए कि माल्या की खुद एयरलाइंस कंपनी है लेकिन फिर भी वह नागरिक उड्डयन मंत्रालय की सलाहकार समिति के सदस्य हैं। वीडियोकोन कंपनी के मालिक वेणुगोपाल धूत के भाई राजकुमार धूत शिवसेना की ओर से राज्यसभा में सांसद हैं। राजकुमार धूत वित्त मंत्रालय की सलाहकार समिति के सदस्य हैं। यह दिलचस्प है कि जिसके जिस व्यवसाय से हित जुड़े हैं वह उस मंत्रालय की समिति का सदस्य है। राज्यसभा सांसद कंवर दीप सिंह (के.डी. सिंह) का मामला भी खासा दिलचस्प है। वह दस हजार करोड़ रुपए के स्वामित्व वाली अलकेमिस्ट समूह के मालिक हैं। वह चाहते हैं वर्ष 2020 तक उनका समूह पचास हजार करोड़ रुपए के स्वामित्व वाला हो जाए। चंडीगढ़ का यह व्यवसायी झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायकों के समर्थन से झारखंड से जीतकर राज्यसभा पहुंचा। बाद में के.डी. सिंह ने पाला बदल लिया और वह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के साथ चले गए। केडी सिंह का कारोबार फूड प्रोसेसिंग, होटल्स-रिसोर्ट, हेल्थकेयर, रेस्टोरेंट और रोड टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में है। उनके दार्जीलिंग में दो और असम में तीन चाय बागान भी हैं। वह अपनी पॉपुलर रिटेल चेन 'रिपब्लिक ऑफ चिकन' के सौ आउटलेट पूर्वी भारत में खोलना चाहते हैं। उनके साथ भी यह संयोग ही है कि वह खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के नेशनल मीट एंड पॉलिट्री प्रोसेसिंग बोर्ड के अध्यक्ष हैं। साथ ही शहरी विकास की स्थायी समिति के सदस्य भी हैं। इसके अलावा नागरिक उड्डयन मंत्रालय की सलाहकार समिति के सदस्य हैं। यह जो तस्वीर बन रही है क्या इसे यह माना जाए कि राज्यसभा का धीरे-धीरे कॉरपोरेटीकरण हो रहा है।

ऐसे नेताओं, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों की लंबी फौज है जिनका राजनीति के साथ-साथ अपना कारोबार भी चल रहा है। और चल ही नहीं रहा बल्कि उनके कारोबार की ग्रोथ रेट काफी छलांगे मारती नजर आती है। प्रफुल्ल पटेल मनमोहन सरकार के करोड़पति मंत्रियों के शीर्ष की कतार में शामिल हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि उनके नागपुर और विदर्भ (जो कई वर्षों से किसानों की आत्महत्या के कारण लगातार चर्चा में बना हुआ है) के गोंदिया में कारोबारी हित हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले में जेल की हवा खा चुके कांग्रेस सांसद सुरेश कलमाड़ी साई सर्विस ग्रुप चलाते हैं, जो मारुति और बजाज के वाहनों की डीलरशिप का काम करती है। इसके अलावा महिंद्रा वाहनों की मार्केट का काम भी इस समूह के पास है। डीएमके सांसद और पूर्व दूरसंचार मंत्री दयानिधि मारन विवादास्पद एयरसेल-मैक्सिस सौदे में फंसे हुए हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने इस सौदे में मलेशियाई कंपनी से 547 करोड़ रुपए की रिश्वत ली थी। सीबीआई उनसे पूछताछ कर चुकी है। दयानिधि मारन और उनके भाई कलानिधि मारन के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। कलानिधि मारन सन नेटवर्क के निदेशक हैं। दक्षिण भारत के कद्दावर नेता एम करुणानिधि का परिवार और उनकी पार्टी द्रमुक किस तरह से सौदों की दलाली में फंसी हुई थी यह टू जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस आवंटन घोटाले के मामले में सबके सामने आ चुका है। उनके पुत्र और केंद्रीय मंत्री अझागिरि का बेटा दुरई दयानिधि के खिलाफ ग्रेनाइट के अवैध निर्यात के मामले में एफआईआर दर्ज की गई है। ताजा उदाहरण केंद्रीय मंत्री और एनसीपी के मुखिया शरद पवार के भतीजे अजित पवार (धांधली के आरोपों में घिरने के बाद 26 सितंबर को उप मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा) का है। उन पर आरोप है कि जब राज्य के जल संसाधन मंत्री थे तो उन्होंने अपने इस कार्यकाल में 2009 में आठ महीने के भीतर बीस हजार करोड़ रुपए के प्रोजेक्टों को स्वीकृति दी और यह सब विदर्भ सिंचाई विकास निगम के गवर्निंग काउंसिल की अनिवार्य मंजूरी के बिना किया गया।

और अंत में भाजपा और आरएसएस के हिंदू हृदय सम्राट नरेंद्र मोदी के गुजरात में क्रोनी कैपिटलिजम की बात। अदानी ग्रुप, जिसकी 40 कंपनियां है, इन दिनों गुजरात में एक सर्वव्यापी 'चमत्कार' है। गौतम अदानी (समूह के प्रबंध निदेशक) अरबपतियों की सूची में सातवें अमीर भारतीय बताए जाते हैं। 1986 तक गौतम अदानी अहमदाबाद में कपड़ा व्यापारी थे। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि वह छोटे मोटे 'आयात-निर्यात' डीलर थे। वर्ष 1993-94 में उन्होंने अमेरिकी कॉरपोरेशन कारगिल के साथ मिलकर नमक का कारोबार करने के बहाने मुंद्रा समुद्रतट पर जमीन खरीदी। नमक का यह काम वास्तव में कभी शुरू नहीं हुआ। लेकिन कुछ समय बाद अदानी पोर्ट, कंटेनर टर्मिनल, वैकअप एरिया, सड़कों और आखिर में सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) के लिए भूमि अधिग्रहण करने में कामयाब हो गए। कॉरपोरेट की दुनिया में अदानी की यह उन्नति वर्ष 2011 में वाइब्रंट गुजरात समिट में महत्त्वपूर्ण रूप से चिह्नित की गई जब उन्होंने राज्य में पोर्टों, इंफ्रास्ट्रकचर और ऊर्जा संयंत्रों में 80 हजार करोड़ रुपए निवेश करने की योजना की घोषणा की। वह वाइब्रंट गुजरात समिति के मुख्य अतिथि थे। बाद में जो हुआ वह एक गाथा है कि कैसे अदानी समूह ने कच्छ में तटीय भूमि तटीय विनियमन कायदों और औद्योगिक विनियम का उल्लंघन करके हासिल की। दिसंबर 2010 में केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अधिकारियों की टीम ने मुंद्रा पोर्ट और सेज का निरीक्षण करने के दौरान पाया कि अदानियों ने खाड़ी में पानी के बहाव को रोक रखा था और मैनग्रोव के वनों को काट रखा था। टीम ने यह भी पाया कि अंत:ज्वारीय (इन्टर्टाइडल) क्षेत्र में तलकर्षण (ड्रेजिंग) डिस्पोजल पाइपलाइन बनाई गई थी। यह पोर्ट के जमीनी वाले क्षेत्र की ओर तलकर्षण (ड्रेजड) सामग्री को ले जाने के लिए थी। यह सब उस जमीन पर दावे के लिए किया गया था। जो कि तटीय विनियम जोन अधिसूचना का उल्लंघन था। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की रिपोर्ट यह भी कहती है कि उस क्षेत्र में समुद्र टाउनशिप और अस्पताल का निर्माण तटीय विनियम जोन के नियमों का उल्लंघन था। अदानी समूह को मुंद्रा तट के साठ किलोमीटर क्षेत्र में बहु-उत्पाद विशेष आर्थिक जोन को अनुमति देने का फैसला 15 जून 2005 को मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में लिया गया और तीन हजार करोड़ रुपए कीमत वाली 315 लाख स्क्वेर मीटर से ज्यादा जमीन उसके विकास के लिए मात्र 33 करोड़ रुपए में दे दी गई। औद्योगिक विकास के अति उत्साह में गुजरात सरकार ने प्रस्तावित सेज के मामले में स्टाम्प ड्यूटी और भूमि के हस्तांतरण की रजिस्ट्रेशन फीस, बिक्री कर, क्रय कर, विलासिता कर, मनोरंजन कर, साख पत्रों और अन्य करों में छूट देकर बड़े पैमाने पर कर प्रोत्साहन देने का फैसला किया। विडंबना यह है कि सेज के लिए अदानियों को इस जमीन को देने का राज्य सरकार का फैसला अपने ही पूर्व आदेश का उल्लंघन था। यह आदेश गौचर भूमि को किसी अन्य उद्देश्य के लिए हस्तांतरित करने पर रोक लगाता है। फिर भी, वर्ष 2005 में 23 गांवों की 6582 एकड़ चारागाह की भूमि अदानियों को देने के लिए गुजरात सरकार ने एक दिन 23 आदेश पारित किए। वर्ष 2009 में वाइब्रंट गुजरात समिट के दौरान नरेंद्र मोदी ने एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत अदानी ग्रुप को अपने सेज के लिए अगले 15 सालों के दौरान 15 हजार करोड़ रुपए के विस्तार की अनुमति दी गई। (पर्स्पेपेक्टिव्स- स्विमिंग अगेंस्ट द टाइड- ईपीडब्ल्यू, 21 जुलाई 2012)।

जिस गुजरात की आर्थिक तरक्की को लेकर पूरे देश का वातावरण गुंजायमान बना रहता है उस गुजरात की एक तस्वीर यह भी है कि यहां ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में नियमित और अनियमित मजदूरों की मजदूरी दर अन्य राज्यों के मुकाबले बहुत कम है। वर्ष 2011 की जनगणना के ताजा आंकड़े बताते हैं कि पीने योग्य पानी उपलब्ध कराने और स्वच्छता (सैनिटेशन) के मामले में बहुत से राज्यों से गुजरात बहुत पीछे है। 43 फीसदी ग्रामीण परिवारों को ही उनके घर के आंगन में पानी की आपूर्ति मिल पाती है और केवल 16.7 प्रतिशत परिवारों को ही नल का पानी उपलब्ध है। ग्रामीण परिवारों का पांचवा हिस्सा, खासकर महिलाएं, पानी लाने के लिए बहुत दूर-दूर तक जाती हैं। जहां तक सैनिटेशन का सवाल है तो गुजरात में 67 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास शौचालय नहीं हैं। जहां तक बीमारियों का सवाल है तो 44 प्रतिशत गांवों में पीलिया होने, 30 फीसदी गांवों में मलेरिया, 40 फीसदी गांवों में आंत्रशोध और 25 प्रतिशत में किडनी में स्टोन, त्वचा संबंधी रोग, जोड़ों में दर्द और दांतों की बीमारियों के बारंबार होने की सूचना मिलती है। (इंदिरा हिरवे, द हिंदू 27 सितंबर 2012)।

दरअसल, आर्थिक सुधारों, नवउदारीकरण की नीतियों के जरिए भारत में विकास का जो मायाजाल बुना जा रहा है उसके असली लाभार्थी मु_ी भर कॉरपोरेट घराने हैं और जिन्होंने सरकारों और नेताओं के साथ मिलकर भारत के लोकतंत्र को लूटतंत्र में तब्दील कर दिया है। इनका पूंजी का साम्राज्य प्राकृतिक संसाधनों और राष्ट्रीय संपदाओं की जबरदस्त लूट की बुनियादी पर खड़ा है।

Comment    See all comments

Unsubscribe or change your email settings at Manage Subscriptions.

Trouble clicking? Copy and paste this URL into your browser:
http://www.samayantar.com/democracy-robocracy-n-corporates/



Condemn the violence in Faizabad

All India Secular Forum

                 

We condemn the attack on Mosque, the office of Aapki Takat and Shops of Muslims in Faizabad

 

On 24 October 2012, when the immersion procession of Durga was going on, a girl was molested by few miscreants. Making this as a pretext few people started stone throwing in the nearby areas. A rumor also spread in Faizabad that Muslims are doing the stone throwing. The mob went on to burn nearly 25 shops of Muslim traders. They also rampaged the office of bilingual (Urdu and Hindi) paper Aap Ki Takat. This paper is continuously giving the message of Peace and calling for Hindu-Muslim unity. They also rampaged the mosque.

 

According to local activist Yugal Kishore Sharan Shastri, this was a pre-planned attack. The editor of the paper Mehdi Manjar feels, this is an attempt to silence the voice of Peace. The police took long time to reach the spot and did not intervene effectively. Similarly the fire brigade also took four hours to reach, by which time the shops were totally destroyed.

 

Faizabad, neighboring Ayodhya, is a symbol of Peace. The act of communal forces in targeting the shops of Muslims, the mosque and the office of Aap ki Takat, is highly condemnable. We appeal to the local and state administration to bring in peace and to rehabilitate the violence victims on urgent basis. The owners of shops and the office of paper, Aap ki Takat, must be totally compensated for immediately. Strict action is needed against the police officials for neglect of their duty and also against the fire brigade for such a lapse on their part. The guilty must be punished with the due process of law

 

Asghar Ali Engineer, L.S. Hardenia, Ram Puniyani, Irfan Engineer Mohammad Arif

 

All India Secular Forum

ANHAD INVITES YOU TO CELEBRATE DIVERSITY

         AJWADI WATEY

VIVIDHTA KA JASHN

AN ARTISTS KARWAN TRAVELS ACROSS GUJARAT

October 29- November 8, 2012

 

MALLIKA SARABHAI TO FLAG OFF ARTISTS CARAVAN ON OCTOBER 29, 2012 AT 3PM AT SABARMATI ASHRAM, AHMADABAD

 

CITY

DATE

Time

Address

FLAG OFF:Ahmadabad

29/10/2012

3.00PM

Sabarmati Ashram, Ahmadabad

Surat

30/10/2012

8.00PM

Ishwar Farm,In Union Park Street, Ghoddod-Bhatar Road, Opp. Krushi Farm, Surat.

Ankleshwar

31/10/2012

7.30PM

GIDC Town Hall, Ankleshwar

Ahmadabad

1/11/2012

7.00PM

Darpana Academy, Usmanpura, Ahmadabad

Anand

Anand

02/11/2012

FRIDAY

8.00pm

Town Hall, Anand

Mehsana

04/11/2012

8.00pm

Samarpan Chawlk, Near Lake ,Mehsana- 384001

Rajkot

06/11/2012

9.30pm

Hemu Gadhvi Hall, Tagor Road,Rajkot.

Bhuj

Bhuj

08/11/2012

THRSDAY

8.00pm

Town Hall, Bhuj

 

 
























Cultures, civilizations grow and develop because they constantly take from each other. Civilizations borrow from others and give to others. And it is in this process of give and take that each civilization, each country, each nation constantly reinvents itself. It defines and redefines itself. The idea is not to purge what we consider alien but to recognize that it is impossible to say what is ours and what is not. What we need to do is to see what is relevant, living and robust in our culture as it exists today, to accept what will enrich our lives and help us to improve as human beings and to reject and discard all that is likely to sustain prejudice and malice towards other human beings.

 

The search for the meaning of culture is a continuous process in the historical evolution of all societies. The dynamism of Indian culture is derived from its diversity, which molded the cultural practices of the people.

Anhad as part of its campaign Bole Gujarat is celebrating this diversity.


The programme's objective is to contribute in creating a conducive environment for safeguarding cultural diversity, to promote and design ways of ensuring access to culture to all and to create platforms for artists to promote peace, diversity and pluralism. The programme also aims at strengthening the capacities of professional and rural  artists and youth at large to contribute towards a diverse and composite cultural atmosphere in Gujarat.


An Artist Caravan (musicians, dancers, poets, writers, designers, filmmaker etc will travel across seven small and large towns of Gujarat and perform in seven cities: Surat, Ankleshwar, Ahmadabad, Anand, Mehsana, Rajkot and Bhuj between October 30 and November 8, 2012.


Performing artists include: Siddi Goma Tribal Dance Group, Avni Sethi- a classical dancer from Ahmadabad, Odyssey Rock band from Surat, Sufi singer- Dhruv Sangari from Delhi and Namrata Pamnani –a Kathak dancer of international repute. A number of video spots and celebrity interviews will be screened during these concerts.


The programme called 'Us Subah Ki Khatir'- Ajwadi Watey- hopes to spread the message of peace, communal harmony and non-violence through the artistic expression and celebrate the intermingling of different streams of cultural expression.  


The artists will stop on the way to interact with local villagers in a number of villages on November 3, 5 and 7, 2012. 

 

Information on Performing Artists


Dhruv Sangari


Dhruv Sangari began training in Hindustani classical music at the age of 7 under Smt. Shahana Bannerjee and Tabla with Pt. B.S. Ramanna. Later, he developed an interest in Sufism and Sufi music,and began learning Qawwali under Ustad Meraj Ahmed Nizami of the Delhi-Qawwalbachhe Gharana. He was also given training and guidance by the legendary Qawwali and Classical maestro late Ustad Nusrat Fateh Ali Khansaheb.


Dhruv has a masters degree in Hindustani Classical music from the University of Delhi and has been performing professionally since 2001 with his Sufi music troupe 'Rooh'. His repertoire includes Persio- Arabic poetry, Punjabi-Hindvi Sufi poetry and Urdu Poetry from the works of famed poets and saints such as Amir Khusrau, Sant Kabir, Baba Farid , Bulleshah, Meerabai,  Hafez,  Rumi ,  Jami,   Baba Nanak, Sant Tulsidas


In addition to stage concerts at major festivals and international collaborations with artistes in more than 15 countries including China, India, Morocco, Turkey, Italy, Germany, France, U.K. and Spain; he has recorded for a number of private albums, film and solo projects like Jet-Lag (Phat-Phish Records, Mumbai, India.) and Rooh e Sufi.


Dhruv has taught and performed Sufi music in several universities, museums and cultural institutions such as Colby College, Maine, University of Boston, Massachusetts, University of York, UK; Nehru Center, London, UK; House of World Cultures, Berlin, Germany; Stadt Theatre, Freiburg-Breigsau, Germany; Louvre Museum, Paris, France; Smithsonian Museum, Washington DC, Society for Ethical Cultures, New York, US Library of Congress; Washington DC, Embassy of India, Washington DC, and Johns Hopkins University, Washington DC etc.


Avni Sethi


Avni  Sethi is an interdisciplinary artist who works with multiple mediums. Her work extends from choreographing large ballets or performing small solos to creating sound installations in parks to creating new forms of organisms in a lab to devising performance pedagogy for schools.

Her focus has primarily been on exploring the politics and poetry of humanity through her artistic practice. She is presently curating a museum of conflict in Ahmedabad.

 

Siddi Goma Tribal Dance Group


The Siddis of Gujarat are a tribal Sufi community of East African origin which came to India eight centuries ago and made Gujarat their home. They carried with them their exceptionally rich musical tradition and kept it alive and flourishing through the generations, unknown to the rest of the world.


A traditional occupation of African-Indian Sufis in Gujarat has been to perform sacred music and dance as wandering faqirs, singing songs to their black Sufi saint, Bava Gor.


Sidi Goma perform in a group of twelve: four lead musicians (drummers and singers) and eight dancers. While the music gradually gets more rapid and excited, the dances unfold with constantly evolving individual and small-group acts of animal imitations, climaxing in a coconut-breaking feat.


The exuberant energy and joy Sidi Goma brings to the stage is captivating and powerful, their unique African-Indian heritage a fascinating discovery, and every performance an exhilarating experience!


NAMRATA PAMNANI


Born in 1980, Namrata Pamnani began her training in Kathak with Guru Smt. Bharti Gupta with later specialization under Pt. Jaikishan Maharaj at the National Institute of Dance, Kathak Kendra, in New Delhi. A graduate in Economics from Delhi University, Namrata decided to take up her passion as a profession. She has also taken formal training in Hindustani classical music and holds a diploma from Prayag Sangeet Samiti; she is also learning the nuances of dhrupad singing from the Gundecha brothers.

Namrata believes that dance is a form of self purification. 


Some of her major overseas performances have been at the Lincoln Centre in New York, the International Kathak Festival in Chicago, the Avignon Festival in France, and at venues in Switzerland, Estonia, Finland, South Korea, Shanghai, Los Angeles, Moscow, Sri Lanka and Germany.


Within India she has been featured at the Kathak Mahotsava (Baroda), Konark Festival, Pt. Lacchu

Maharaj Utsav, Kalakshetra Festival, Natya Vriksha Festival, Taj Mahotsava and Kathak Yatra by Sangeet

Natak Academy. Namrata has been a member of the renowned Kathak Kendra Repertory, New Delhi where she had the opportunity of working under some of the best gurus.


Odyssey Rock Band


Sometime in 2009, in the historical city of Surat, Odyssey was formed with the aim of creating independent, original music. Hailing from the diamond city draped in textile, Odyssey is a rock band with a unique touch to it. Five guys, each having more than a decade of stage experience, combine to create music that is not restricted to any specific genre. Each band member is a vital piece of the jigsaw puzzle that is Odyssey. The band strives to put Surat, a city more known for its trade and cuisine (not to forget its trademark slang!), on the global music scene.


ENTRY TO PERFORMANCES IS FREE AND DOES NOT REQUIRE ANY INVITATION ON FIRST COME FIRST SERVE BASIS.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 






-- 
ANHAD
23, Canning Lane
New Delhi-110001
Ph: 23070722/23070740



-- 
ANHAD
23, Canning Lane
New Delhi-110001
Ph: 23070722/23070740



-- 
ANHAD
23, Canning Lane
New Delhi-110001
Ph: 23070722/23070740

MUSINGS ON NOVEMBER - Whoever is US president, he champions global capitalism Cutting Corners - Ashok Mitra

http://www.telegraphindia.com/1121102/jsp/opinion/story_16132670.jsp#.UJPLP2fRnKQ

MUSINGS ON NOVEMBER

- Whoever is US president, he champions global capitalism

Early November, American citizens will rush to the polling booths on the Tuesday following the first Monday of the month to choose, for the coming four years, their president, automatically the prime defender of global capitalism. Next time the occasion arises, it would be most proximate to the centenary of the great Bolshevik Revolution, the cause of such headache for capitalism. With the collapse of the Soviet system a couple of decades ago, that centenary will not be much of a celebration. Some circles are now doubly reluctant to describe the seemingly cataclysmic developments that took place in November 1917 as great. One or two pundits belonging to the picky school go a step further: the beastly thing that happened around Moscow's Winter Palace during this month that year was, they argue, no revolution at all; it was a conspiracy between a handful of Bolshevik Party bureaucrats and a handful of military officers aimed to waylay the uprising the masses were waiting for; what actually transpired was in effect a counter-revolution. Yet another formulation of this thesis travels a bit even beyond: since the likes of Mikhail Gorbachev and Boris Yeltsin were instrumental in putting that counter-revolution to an end, they richly deserve a place in history as true revolutionaries.

Such a daring assertion calls for careful handling. A failed enterprise in any case has few friends and suffers from a surfeit of adversaries. It would nevertheless be awesomely difficult not to admit that an elegant rationality was at work which led to the Bolshevik revolt. Throughout the 19th century, kings strewn across Europe used to fight one another for territorial control; they often also arrived at mutual understanding on how to allocate among themselves areas of influence in remote, newly conquered parts of the world. What was in order for sovereigns and, slightly later, capitalist regimes succeeding the monarchies, should have been equally valid for ordinary people not excluding the toiling classes. Certainly no reason exists on grounds of symmetry, to look askance if members of the working class too tried to join hands across national borders in furtherance of their specific interests. This was in fact the core idea germane in the Communist Manifesto written jointly by Karl Marx and Friedrich Engels while they were still in their late twenties. The first step towards uniting the workers on an international scale was to unite them within a particular country. The November 1917 phenomenon, its enthusiasts will claim, did precisely that; the feeling of emancipation experienced after the event by the proletariat classes in Russia was no ersatz commodity. The next logical step, from the point of view of the ideologues, was however to build working class alliances on a global scale, a development symmetrical to the ententes reached first by feudal monarchs and subsequently by the hegemony of capitalists who supplanted the feudal order in Europe.

But no, it was ordained that what was a normal arrangement for kings and capitalists did not belong to the working classes and curtains be better drawn on airy-fairy notions of symmetry. The ruling classes had by then travelled extensively along the learning curve; it suited them to have one set of rules for themselves and another set for those antagonistically situated to them in terms of class interests. The 20th century saw the emergence of huge multinational and transnational corporations; establishment circles greeted them with open arms. The call to the workers of the world to unite, though, continued to be regarded as a heresy and a sacrilege. Leaders of nascent working class organizations in different countries refused to be cowed down, was not rationality on their side? The class war was very much on, leading to the establishment — in the metropolitan centres of Europe — of international societies with representatives of toiling masses from diverse lands. Since these societies were officially banned, they had to go underground and were duly dubbed an international conspiracy. Their leaders would meet, furtively, in Brussels or Zurich or London. As World War I was wearing itself down, all of a sudden circumstances became ripe in Russia for a workers' uprising; one such leader-in-exile, V.I. Lenin, availed of the train in Finland to arrive in time and take charge of things.

Subsequent revolutions — or attempts at revolution-making — have followed more or less the same pattern. They occurred, or were cajoled to occur, because the ruling classes were allergic to the rationale of symmetry. Allergy tends to get integrated to the psyche. Times change, the character of national economies — and their conflagration — assumes new hues, but the psyche of the ruling order is unable to discard the irrationality it is burdened with.

One needs only to cross over to the present era for confirmation of this harsh truth. The ruling idea is of course globalization. The nations are losing fast their separate identities, goods and resources are expected to move across countries and continents without let or hindrance, tariff barriers are under instruction to wither away, any impediment to the free movement of capital and finance, it hardly needs to be added, is to be severely frowned upon. The International Monetary Fund is the stern taskmaster ready to dress down country-governments which show a lingering weakness for the heinous instrument of capital control. The World Trade Organisation is the other supranational watchdog to ensure the unhindered transit of commodities between countries. Flowery speeches on the magical qualities of that charming notion — freedom — constitute the standard menu of round-the-year discourses. Life is enhanced if free movement of concepts, commodities and services from one location to another is not sought to be interfered with in any manner. Where that freedom is lacking, living is diminished for humanity.

Beautiful blah-blah-blah. And yet, the glaring asymmetry featuring the supposedly globalized world hurts; it insults the intelligence too. A near-total replica of the story from the ending decades of the 19th century and the early beginnings of the 20th, when capitalists had begun savouring the juicy advantages flowing from the formation of multilateral corporations and the triumphal march of international finance capital, representatives of the emerging working classes were, however, not allowed the freedom to mobilize globally. The Gorbachevs and the Yeltsins have made an effective contribution to kill off the grand idea of the international brotherhood of the toiling masses; the leadership of China's Communist Party is altogether disinterested in the matter. So no threat today exists from that end. Even so, problems refuse to disappear. In this epoch of full-blown economic liberalization, finance and capital must be permitted to move freely from affluent countries to the under-developed and developing economies; the latter are duly admonished not to exhibit reluctance to intrusions — any kind of intrusion — of external capital. The phobia against the working classes never ceases though. An altogether different set of norms applies with respect to the international movement of labour. Economic liberalization does not mean the end of national regulations governing the migration of labour. The visa regimes in the United States of America and Europe, particularly for aspiring migrants from Asia and Africa, are extraordinarily rigid, no international ombudsman is assigned the responsibility of scrutinizing or modulating them.

That holy-holy word, freedom, evidently embraces the freedom to be arbitrary. Liberalization, as is being understood at this moment, ordains unfettered movement of capital while labour is kept in fetters. How irrational, one may whimper. But is not such irrationality an integral constituent of the arbitrariness that dominates the environment? Once the Tuesday following the first Monday of November is past, global capitalism world will have a new super-spokesperson to articulate its themes over the next four years. Whether he happens to be once more Barack Obama or it is Mitt Romney, the arbitrary order will remain unhampered.


हिंदुत्ववादी ताकतें फिर तैयार करने लगीं दंगों की जमीन

Bookmark and Share हिंदुत्ववादी ताकतें फिर तैयार करने लगीं दंगों की जमीन

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/31971-2012-11-02-05-53-10
Friday, 02 November 2012 11:22

अंबरीश कुमार / त्रियुग नारायण तिवारी, लखनऊ। उत्तर प्रदेश में माहौल बिगाड़ने की तैयारी नए सिरे से शुरू हो गई है। दशहरा, दुर्गा पूजा और बकरीद निकल गई और फैजाबाद को छोड़ दूसरा कोई जिला प्रभावित नहीं हुआ पर जिस तरह पुलिस प्रशासन  फैजाबाद में दंगों से निपटा अगर वह किसी और जिले में दोहराया गया तो हालात बेकाबू होंगे। फैजाबाद के बाद अब बारी गोरखपुर, बस्ती, मऊ, आजमगढ़ और सिद्धार्थ नगर जैसे पूर्वांचल के कई जिलों की है। भड़काने वाली भाषा बोली जा रही है।
पूर्वांचल में हिंदुत्ववादी ताकतें खुल कर सामने आ रही हैं। ये ताकतें अब चुनावी दंगों की तैयारी में हैं। फैजाबाद में इन्ही ताकतों ने माहौल बिगाड़ा और आगे भी तैयारी है। फैजाबाद में दुर्गा पूजा के दौरान लगातार नारा लगता रहा-अब भी जिस हिंदू का खून न खौला, खून नहीं वह पानी है। 24 सितंबर को चार बजे रुदौली में हिंसा होती है तो छह बजे फैजाबाद, आठ बजे भदरसा, नौ बजे शाहगंज और बारह बजे टिपरी में हिंसा हो जाती है।
फैजाबाद में जो दंगा हुआ उसके पीछे स्थानीय हिंदुत्ववादी वे ताकतें थीं, जो विधानसभा चुनाव हार गई थीं पर दंगा अगर फैला, तो उसके लिए सीधे सीधे पुलिस प्रशासन का शीर्ष नेतृत्व जिम्मेदार है। क्योंकि जब समूचे फैजाबाद को यह पता था कि शहर में दंगे की तैयारी है, तब सिर्फ जिले के कलक्टर और एसएसपी को यह जानकारी नहीं थी। जब दंगों में दुकानें जलाई जा रही थी, तब दो दमकलों में से  एक से पानी ही नहीं निकला तो दूसरी का पानी खत्म हो गया। वह जो पानी लेने गर्इं, तो लौट के नहीं आई।
यह बानगी है उस जिले की जो राज्य का सबसे संवेदनशील जिला है। यहां जिस तरह दंगाइयों ने पहले काली प्रतिमा की चोरी को लेकर माहौल बनाया और फिर मूर्ति मिल जाने के बाद भी दंगों की तैयारी की, उससे इन दंगों की राजनीति को आसानी से समझा जा सकता है। अयोध्या से पांच बार विधायक रहे लल्लू सिंह विधानसभा का पिछला चुनाव हार चुके हैं जो 1991 से लगातार चुनाव जीतते रहे हैं। यह एक बड़ा झटका रहा और फिर सामने 2014 का लोकसभा चुनाव है।
फैजाबाद से त्रियुग नारायण तिवारी के मुताबिक फैजाबाद का दंगा राजनीतिक ज्यादा रहा है, जिसमें यहां के नेताओं की बड़ी भूमिका रही है। भाजपा के एक विधायक रामचंद्र यादव के खिलाफ इस सिलसिले में मामला भी दर्ज हुआ। समूचे दुर्गा पूजा के दौरान दंगों का माहौल बनाया गया। उत्तेजक नारे लगे। योगी आदित्यनाथ के कैसेट चलाए। पेट्रोल जमा किया गया। दुकानें चिह्नित की गई ताकि उन्हें लूटने में आसानी हो पर जिला प्रशासन इन सबसे बेखबर था ।
इससे पहले सांप्रदायिक हिंसा की जो घटनाएं हुर्इं, उनमें जून में मुजफ्फरनगर, कोसीकलां (मथुरा) के बाद प्रतापगढ़ के अस्थाना गांव में एक दलित बालिका से सामूहिक दुष्कर्म के बाद हुई हत्या से माहौल बिगड़ा। गुरुवार को तो भाजपा ने बाकायदा सूची जारी कर इसका ब्योरा दिया। भाजपा की खुद क्या भूमिका रही है, इस पर भी गौर करना चाहिए। बहरहाल, इसके बाद बरेली, गाजियाबाद, कानपुर और इलाहाबाद आदि का नाम लिया गया है पर भाजपा ने इस सब की जो वजह बताई है उससे भी उसकी नीयत पर सवाल उठता है।
पार्टी के मुताबिक आतंकवादियों को छोड़ने की कार्रवाई शुरू करना, बुनकरों के बिजली बिल माफ करना, रंगनाथ मिश्र आयोग और सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को लागू करने का संकल्प व्यक्त करने के साथ वर्ग विशेष की छात्राओं को 30 हजार की आर्थिक सहायता आदि के कारण यह परिस्थिति पैदा हो गई है। भाजपा के इन आरोपों से साफ है कि वह अल्पसंख्यकों के खिलाफ माहौल बनाने के प्रयास में है। पूर्वांचल में शुरुआत हो गई है।
सिद्धार्थ नगर से विनयकांत मिश्र के मुताबिक पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में योगी आदित्यनाथ की हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं ने धरना प्रदर्शन कर आग उगलना शुरू कर दिया है। सिद्धार्थनगर जनपद में हियुवा के जिलाध्यक्ष रमेश गुप्ता ने धरने के दौरान कहा कि यदि सरकार ने गोकसी पर प्रतिबंध नहीं लगाया, तो आप पुलिस को बिना सूचना दिए हुए मस्जिदों के सामने सूअर काट दें। भारत-नेपाल सीमा पर सिद्धार्थनगर जनपद में दो दिन पहले विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय के विधानसभा क्षेत्र इटवा के मुख्य चौराहे पर दिनदहाड़े गोकसी की घटना से हियुवा के कार्यकर्ता गुस्से में थे। उनका कहना था कि जब विधानसभा अध्यक्ष के क्षेत्र में इस तरह की घटनाएं हो रही हैं, तो पूरे राज्य की स्थिति का आकलन किया जा सकता है।


समानता के पहरुए

समानता के पहरुए

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/31965-2012-11-02-05-40-49

Friday, 02 November 2012 11:10

अरुण माहेश्वरी
जनसत्ता 2 नवंबर, 2012: नवउदारवाद के लगभग चौथाई सदी के अनुभवों के बाद मुख्यधारा के राजनीतिक अर्थशास्त्र को बुद्ध के अभिनिष्क्रमण के ठीक पहले 'दुख है' के अभिज्ञान की तरह अब यह पता चला है कि दुनिया में 'गैर-बराबरी है', और इससे निपटे बिना मुक्ति, यानी आर्थिक-संकटों की लहरों में डूबने से बचने का रास्ता नहीं है। 'द इकोनॉमिस्ट' पत्रिका के ताजा अंक (13-19 अक्तूबर) में विश्व अर्थव्यवस्था के बारे में उन्नीस पन्नों की एक विशेष रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। शायद पहली बार 'इकोनॉमिस्ट' ने सिर्फ 'गैर-बराबरी' की समस्या को केंद्र में रख कर विश्व अर्थव्यवस्था का सिहांवलोकन किया है।
1989 में सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के देशों में समाजवाद के पराभव और  'इतिहास के अंत' के विचारों से तैयार हुई जमीन पर जब अमेरिका ने एकध्रुवीय विश्व कायम करने के उद्देश्य से अपने वैश्वीकरण का अश्वमेध शुरू किया, तब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्वबैंक और परवर्ती डब्लूटीओ से लेकर संयुक्त राष्ट्र के सारे बहुस्तरीय विश्व संगठनों की बड़ी-सी सेना पूरे दम-खम के साथ उसकी इस विश्व विजय की लड़ाई में उतर गई थी। मान लिया गया था कि अब रास्ता पूरी तरह साफ है, घोड़ा दौड़ाना भर बाकी है और सभी स्वतंत्रताओं के मूल, 'वाणिज्यिक स्वतंत्रता' के ध्वजाधारी अमेरिका के नेतृत्व में दुनिया को संवरते देर नहीं लगेगी; जैसे अमेरिका के पास कभी साधनों की कोई कमी नहीं रही, उसी प्रकार अब पलक झपकते दुनिया की सारी समस्याओं के समाधान में कोई बाधा नहीं रहेगी।
आनन-फानन में साल भर के अंदर, 1990 में ढेर सारी प्रतिश्रुतियों के साथ यूएनडीपी की ओर से पहली मानव विकास रिपोर्ट आई। 'समाजवाद' नहीं रहा तो उसका गम क्या? गरीबों के परवरदिगार और भी हैं! कहा गया कि आर्थिक विकास को मानव विकास में बदलने का रास्ता किसी विचारधारा का मोहताज नहीं है, बस इसके लिए जरूरी है प्रश्नों की पहचान और उनके समाधान की ठोस कोशिशें। मानव विकास रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र के तत्त्वावधान में उसी दिशा में उठाया एक महत्त्वपूर्ण कदम बताया गया।
1990 में मानव विकास की अवधारणा को परिभाषित करने और उसे मापने के मानदंड निर्धारित करने के उद्देश्य से प्रकाशित पहली मानव विकास रिपोर्ट में तत्कालीन दुनिया की ठोस परिस्थितियों का जायजा लेते हुए लक्षित किया गया था कि पिछले तीन दशकों में विकासशील देशों ने मानव विकास की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। आमदनी के मामले में खाई बढ़ने पर भी मूलभूत आर्थिक विकास के मामले में उत्तर-दक्षिण के बीच का फासला काफी कम हुआ है। मानव विकास में प्रगति के औसत आंकड़ों से विकासशील देशों के अंदर- शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच, आदमी और औरत के बीच, धनी और गरीब के बीच- भारी विषमताओं पर परदादारी होती है।
इसी प्रकार, उसका अवलोकन था कि कम आमदनी के बावजूद मानव विकास का सम्मानजनक स्तर प्राप्त करना संभव है। साथ ही यह भी कहा गया कि आर्थिक विकास और मानव प्रगति के बीच कोई स्वचालित संबंध नहीं है। गरीबों को सामाजिक क्षतिपूर्ति की जरूरत है। विकासशील देश इतने भी गरीब नहीं हैं कि वे आर्थिक विकास के साथ ही मानव विकास की कीमत न चुका सकें। समायोजन के लिए मानव कीमत अनिवार्य नहीं, बल्कि चयन की बात है। मानव विकास की नीतियों की सफलता के लिए अनुकूल बाहरी परिवेश जरूरी है। कुछ विकासशील देशों, खासकर अफ्रीका के कुछ देशों को विदेशी सहायता की आवश्यकता है।
विकासशील देशों में मानव क्षमताओं को बढ़ाने के लिए तकनीकी सहयोग देना होगा। मानव विकास के कामों में सफलता के साथ गैर-सरकारी संगठनों को शामिल करना होगा। आबादी में वृद्धि को रोकना जरूरी है। तेजी के साथ लोग शहरों में जमा हो रहे हैं और भावी पीढ़ियों की जरूरतों के साथ कोई समझौता किए बगैर आज की पीढ़ी की जरूरतों को पूरा करने के लिए विकास की एक टिकाऊ नीति तैयार करनी होगी। इन्हीं सोलह अवलोकनों और निष्कर्षों के आधार पर मानव विकास की अवधारणा और उसे मापने के मानदंड तय किए गए।
आगे इसी अवधारणा और माप के मानदंड के आधार पर दुनिया की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के नाना पक्षों के बारे में पिछले इक्कीस वर्षों से हर साल एक के बाद एक मानव विकास रिपोर्ट आ रही है। गौर करने लायक बात यह है कि इन सभी रिपोर्टों में किसी न किसी रूप में, प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से राष्ट्रों के बीच और राष्ट्रों के अंदर गैर-बराबरी से जुड़े ढेरों तथ्य प्रकाशित हुए हैं। लेकिन गैर-बराबरी का सवाल मानव विकास के भौतिक और आत्मिक, दोनों पक्षों के लिए सबसे अहम और केंद्रीय सवाल होने पर भी मजे की बात यह है कि आज तक मुख्यधारा के सामाजिक-आर्थिक विमर्श में इसे अलग से विचार का विषय नहीं बनाया गया है।
संयुक्त राष्ट्र की तर्ज पर ही दुनिया के विभिन्न देशों में भी सरकारी स्तर पर मानव विकास संबंधी रिपोर्टें तैयार करने का सिलसिला शुरू हो गया। खुद संयुक्त राष्ट्र ने क्षेत्र विशेष के लिए ऐसी अलग-अलग रिपोर्टें तैयार कीं। इन सबको एक प्रकार के नए दृष्टिकोण के आधार पर सामाजिक-आर्थिक समस्याओं से रूबरू होकर उनके समाधान की नई रणनीतियों की दिशा में बढ़ने का उपक्रम कहा जा सकता है।
इन सांस्थानिक और सरकारी उपक्रमों के साथ ताल मिलाते हुए अर्थनीति के अध्येताओं की भी एक नई फौज सामने आई। इनमें विशेष तौर पर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव कोफी अन्नान के विशेष सलाहकार जैफ्री सैक्स की किताब 'द एंड आफ पावर्टी', और अभिजीत वी बनर्जी और एस्थर दुफ्लो की 'पुअर इकोनॉमिक्स' की चर्चा की जा सकती है।
गरीबी में फंसे लोगों को उससे उबारने के लिए दुनिया के अलग-अलग कोनों की ठोस समस्याओं के ठोस उपायों को बताने वाली बनर्जी-दुफ्लो की किताब के पहले अध्याय में ही पूरे निश्चय के साथ घोषणा की गई है कि इस किताब का संदेश गरीबी के फंदों से कहीं परे जाता है। जैसा कि हम देखेंगे विशेषज्ञजन, राहतकर्मी या स्थानीय नीति नियामकों में अक्सर तीन आई- आइडियोलॉजी, इग्नोरेंश और इनर्शिया (विचारधारा, अज्ञान और अंतर्बाधा)- से इस बात को जाना जा सकता है कि नीतियां (अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में) क्यों विफल होती हैं और क्यों किसी सहायता का अपेक्षित फल नहीं मिल पाता।
कहने का तात्पर्य यह नहीं कि संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं या अर्थशास्त्रियों की नई फौज के इन अध्ययनों में कोई सचाई नहीं है और विश्व अर्थव्यवस्था के विकास की समस्याओं में इन अध्ययनों का कोई महत्त्व नहीं है। वास्तविकता यह है कि इस प्रकार के छोटे-छोटे स्तरों तक जाकर नाना प्रकार के विषयों की ठोस और गहन अध्ययन की कमियों ने दुनिया में समाजवाद की पूरी परिकल्पना का जितना नुकसान पहुंचाया उसकी थाह पाना मुश्किल है। कहा जा सकता है कि समाजवादी प्रकल्प की विफलता के मूल में 'तथ्यों से सत्य को हासिल करने' की वैज्ञानिक पद्धति की अवहेलना ने प्रमुख भूमिका अदा की थी। छोटी-छोटी सचाइयों को विचारधारा के भारी-भरकम कालीन के नीचे दबा कर समाजवादी दुनिया की नौकरशाहियां अपना उल्लू सीधा कर रही थीं।
इसीलिए, अर्थनीति का दुनिया के कोने-कोने की ठोस सचाइयों की ओर मुखातिब होना सिर्फ सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए नहीं, अर्थनीतिशास्त्र को भी अपनी आत्मलीनता से उबारने के लिए बेहद जरूरी है और इस दिशा में होने वाली हर कोशिश का स्वागत किया जाना चाहिए। इसके बावजूद गैर-बराबरी दूर करने, यानी समानता का प्रश्न आखिरकार विचारधारात्मक है। इस परिप्रेक्ष्य को गंवा कर मानव विकास की यात्रा लंबी दूरी तय नहीं कर सकती- समाजवाद के पराभव के बाद के बाईस वर्षों के अनुभवों से यह जाहिर है। पूंजीवादी परिप्रेक्ष्य से चिपक कर गैर-बराबरी खत्म करने की उम्मीद एक प्रकार से अर्थनीतिशास्त्र से इच्छा-मृत्यु की अपेक्षा करने जैसा है।
समाजवाद ने सभ्यता विकास की प्रक्रिया में आदमी की अकूत सर्जनात्मकता के उन्मोचन के अलावा जिस सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न की ओर मनुष्यता का ध्यान खींचा वह समानता, गैर-बराबरी को दूर करने का प्रश्न था। यह आर्थिक आधार से लेकर अधिरचना के पूरे ताने-बाने से सबसे अभिन्न रूप में जुड़ा प्रश्न है।
फ्रांसीसी क्रांति के झंडे पर स्वतंत्रता और भाई-चारे को जोड़ने वाली अनिवार्य कड़ी के तौर पर समानता की बात कही गई थी, लेकिन कालक्रम में देखा गया कि समानता की लड़ाई सिर्फ समाजवाद की लड़ाई बन कर रह गई। समाजवाद के पराभव के बाद इसी गैर-बराबरी दूर करने के सवाल को आर्थिक चर्चाओं की किसी सुदूर पृष्ठभूमि में डाल दिया गया।
गरीबी दूर करने की बात होती है, पिछड़ेपन के दूसरे सभी रूपों से मुक्ति की चर्चा की जाती है, लेकिन जब गैर-बराबरी का सवाल आता है तो उसे लगभग अटल सत्य मान कर उसके निवारण की चर्चा से सख्त परहेज किया जाता है। इसीलिए 'इकोनॉमिस्ट' जैसी मुख्यधारा की आर्थिक पत्रिका के ताजा अंक में गैर-बराबरी को अध्ययन का विषय बनाया जाना हैरानी पैदा करता और विचारणीय लगता है।
'इकोनॉमिस्ट' ने अपनी इस पूरी चर्चा को 'सच्चा प्रगतिवाद' बताया है। इसके सार-संक्षेप में कहा गया है कि उन्नीसवीं सदी के अंत तक वैश्वीकरण के प्रथम युग और अनेक नए आविष्कारों ने विश्व अर्थव्यवस्था को बदल दिया था। लेकिन वह 'सुनहरा युग' भी गैर-बराबरी के लिए प्रसिद्ध था, जब अमेरिका के लुटेरे शाहों और यूरोप के 'कुलीनों' ने भारी मात्रा में धन इकट्ठा किया था: 1899 से ही 'उत्कृष्ट उपभोग' की अवधारणा आ गई थी।
अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई (और समाजवादी क्रांति के भय) ने थियोडर रूजवेल्ट के 'न्यास भंजन' (ट्रस्ट बस्टिंग) से लेकर लॉयड जार्ज के जनता के बजट तक के सुधारों की एक धारा पैदा की। सरकारों ने प्रतिद्वंद्विताओं को बढ़ावा दिया, प्रगतिशील कर-प्रणाली लागू की और सामाजिक सुरक्षा के जाल के धागे बुने। अमेरिका में प्रगतिशील युग के रूप में जाने जाने वाले इस नए युग का उद्देश्य था उद्यम की ऊर्जा को कम किए बिना एक न्यायसंगत समाज तैयार करना।
इसी संदर्भ में 'इकोनॉमिस्ट' का कहना है कि आधुनिक राजनीति को इसी प्रकार के पुनराविष्कार की, आर्थिक विकास को बिना आहत किए गैर-बराबरी दूर करने के मार्ग के साथ सामने आने की जरूरत है।
गौरतलब है कि यह समूची चर्चा आज राष्ट्रपति चुनाव के मौके पर अमेरिकी राजनीति का एक केंद्रीय विषय बनी हुई है। ओबामा समर्थक रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी को लुटेरा शाह कह रहे हैं, तो रोमनी समर्थक ओबामा को 'वर्ग योद्धा' कह कर कोस रहे हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रास्वां सोलेड ने अमीरों पर आयकर की दर बढ़ा कर पचहत्तर प्रतिशत करने की मांग की है। तमाम साजिशों को धता बताते हुए समाजवाद की शपथ लेकर फिर एक बार वेनेजुएला के राष्ट्रपति चुनाव में शानदार जीत हासिल करने वाले शावेज का कहना है कि अगर वे अमेरिका में होते तो आगामी राष्ट्रपति चुनाव में ओबामा का समर्थन करते।
नोम चोमस्की ने एक बार कहा था कि आज की विश्व परिस्थितियों में अमेरिकी सत्ता की नीतियों में मामूली परिवर्तन भी दुनिया की राजनीति में भारी परिवर्तनों का सबब बन सकती है। इसलिए भी इस ओर खास नजर रखने की जरूरत है।


Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Welcome

Website counter

Followers

Blog Archive

Contributors