ਭਾਜਪਾ ਸਰਕਾਰ ਨੇਂ ਜਬਰੀ ਜ਼ਮੀਨ ਖੋਹਣ ਦਾ ਰਾਹ ਪਧਰਾ ਕੀਤਾ
ਕਾਰਪੋਰੇਟ ਟੋਲੇ ਦੀ ਜ਼ਮੀਨ ਹਥਿਆਊ ਧਾੜਵੀ ਮੁਹਿੰਮ ਨੂੰ ਹੱਲਾ ਸ਼ੇਰੀ
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| People protesting against POSCO Land acquisition |
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| People protesting against POSCO Land acquisition |
*लेख की घटनाएँ , स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में कथाएँ , चरित्र , स्थान केवल व्यंग्य रचने हेतु उपयोग किये गए हैं।
नयाँ वर्ष २०१५ को हार्दिक शुभकामना
यो नयाँ बर्षा २०१५ मा सम्पूर्ण मूलबासी मंगोल समुदायको मुक्ती होस ।
हामी मूलबासी मंगोल समुदाय र आदिबासी बाहुनहरू बिच द्वन्द्व नहोस ।
पहिचान सहितको संघियता र संघियता सहितको संबिधान बनोस ।
लिम्बुवान, खम्बुवान, तामसालिङ, तमुवान, मगरात, थारूहट, मिथिला र मधेशबासी जनताको मूक्ती होस ।
विश्वभरी छरीएर रहनु भएका मेरा सम्पूर्ण मान्यजन, ईष्टमित्र, शुभेच्छुक तथा समस्त नेपालीहरुमा नयाँ वर्ष २०१५ को हार्दिक मंगलमय शुभकामना व्यक्त गर्दछु ।
यस नयाँ वर्षमा हामी सबैलाई शान्ति र सम्बृद्धि मिलोस, सुस्वास्थ्य तथा दीर्घायु प्राप्त होस भन्दै मेरा सम्पूर्ण मान्यजन, ईष्टमित्रहरूको उत्तरोत्तर प्रगतिको शुभकामना व्यक्त गर्न चाहान्छु ।
यो नव वर्षमा यहाँहरुको प्रगति होस। चारैतिर हजुरहरुको गुणगान फैलीरहोस। एकआपसमा सधै माया र स्नेह वनि रहोस ।
तपाई हामीबाट कहीं कतैपनि हिंसा, हत्या, बन्द, बिस्फोट, बिभेद वा वलात्कार जस्ता मानव अधिकार तथा सामाजिक रुपमा अॉच अॉउने काम नगर्ने तथा नगराउने शक्तिको विकास होस । यो नयाँ बर्ष विश्व बन्धुत्व तथा भाईचाराको भावना वृद्दिका लागि समेत सहयोगी वन्न सकोस भन्ने शुभकामना व्यक्त गर्दछु ।
"एकता नै वल हो" भन्ने भावनालाई आत्मसात गर्दै नयाँ बर्षमा सम्पुर्ण नेपालीहरु एकजुट हुन सकौं । सम्पूर्ण नेपालीहरुको अधिकार सहितको नयाँ सम्बिधान प्राप्त होस । नयाँ वर्षको यही छ शुभकामना
!!!
कृष्ण बहादुर तामाङ्
फोन : ९८५१०३३५७८
काठमाण्डु, नेपाल
http://www.samabad.com/index.php
पीके फिल्म का विरोध, आखिर क्यों?
सुप्रसिद्ध फिल्मी नायक आमिर खान अभिनीत की "पीके" फिल्म से पाखंडी और ढोंगी धर्म के ठेकेदारों की दुकानों की नींव हिल रही हैं। इस कारण ऐसे लोग पगला से गये हैं और उलजुलूल बयान जारी करके आमिर खान का विरोध करते हुए समाज में मुस्लिमों के प्रति नफरत पैदा कर रहे हैं।
इस दुश्चक्र में अनेक अनार्य और दलित-आदिवासी तथा पिछड़े वर्ग के लोग भी फंसते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे सब लोगों के चिंतन के लिए बताना जरूरी है कि समाज में तरह-तरह की बातें, चर्चा और बहस सुनने को मिल रही हैं। उन्हीं सब बातों को आधार बनाकर कुछ सीधे सवाल और जवाब उन धूर्त, मक्कार और पाखंडी लोगों से जो फिल्म "पीके" के बाद आमिर खान को मुस्लिम कहकर गाली दे रहे हैं और धर्म के नाम पर देश के शांत माहोल को खराब करने की फिर से कोशिश कर रहे हैं।
यदि फिल्मी परदे पर निभाई गयी भूमिका से ही किसी कलाकार की देश के प्रति निष्ठा, वफादारी या गद्दारी का आकलन किया जाना है तो यहाँ पर पूछा जाना जरूरी है कि-
आमिर खान ने जब अजय सिँह राठौड़ बनकर पाकिस्तानी आतँकवादी गुलफाम हसन को मारा था, क्या तब वह मुसलमान नहीं था।
आमिर खान ने जब फुन्सुक वाँगड़ू (रैंचो) बनकर पढ़ने और जीने का तरीका सिखाया था, क्या तब वह मुसलमान नहीं था।
आमिर खान ने जब भुवन बनकर ब्रिटिश सरकार से लड़कर अपने गाँव का लगान माफ कराया था, क्या तब वह मुसलमान नहीं था।
आमिर खान ने जब मंगल पाण्डेय बनकर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की थी, क्या तब वह मुसलमान नहीं था।
आमिर खान ने जब टीचर बनकर बच्चों की प्रतिभा कैसे निखारी जाए सिखाया था, क्या तब वह मुसलमान नहीं था।
आमिर खान द्वारा निर्मित टी वी सीरियल सत्यमेव जयते, जिसको देख कर देश में उल्लेखनीय जागरूकता आई, क्या उसे बनाते वक्त वह मुसलमान नहीं था।
इतना सब करने तक तो आमिर भारत का एक देशभक्त नागरिक, लोगों की आँखों का तारा और एक जिम्मेदार तथा वफादार भारतीय नागरिक था। लेकिन जैसे ही आमिर खान ने "पीके" फिल्म के मार्फ़त धर्म के नाम पर कट्टरपंथी धर्मांध और विशेषकर हिन्दुओं के ढोंगी धर्म गुरुओं के पाखण्ड और अंधविश्वास को उजागर करने का सराहनीय और साहसिक काम किया है। आमिर खान जो एक देशभक्त और मंझा हुआ हिन्दी फिल्मों का कलाकार है, अचानक सिर्फ और सिर्फ मुसलमान हो गया? वाह क्या कसौटी है-हमारी?
क्या यह कहना सच नहीं कि आमिर खान का मुसलमान के नाम पर विरोध केवल वही घटिया लोग कर रहे हैं जो पांच हजार से अधिक वर्षों से अपने ही धर्म के लोगों के जीवन को नरक बनाकर उनको गुलामों की भांति जीवन बसर करने को विवश करते रहे हैं? यही धूर्त लोग हैं जो चाहते है-उनका धर्म का धंधा अनादी काल तक बिना रोक टोक के चलता रहे। जबकि इसके ठीक विपरीत ओएमजी में भगवान पर मुक़दमा ठोकने वाले परेश रावल को तो उसी अंध विचारधारा के पोषक लोगों की पार्टी द्वारा माननीय सांसद बना दिया गया है।
सच तो यह है कि इन ढोंगी और पाखंडियों को डर लगता है कि यदि आमिर खान का विरोध नहीं किया तो धर्म के नाम पर जारी उनका ढोंग और पाखंड, खंड-खंड हो जायेगा। उनके कथित धर्म का ढांचा भरभरा कर ढह जायेगा। ऐसे ढोंग और पाखंड से पोषित धर्म के नाम पर संचालित व्यवस्था को तो जितना जल्दी संभव हो विनाश हो ही जाना चाहिए। "पीके" जैसे कथानक वाली कम से कम एक फिल्म हर महिने रिलीज होनी ही चाहिए।

जाते हुए साल में बड़े गुस्से और अफसोस के साथ यह टिप्पणी लिखी, 'नैनीताल समाचार' के ताज़ा अंक के लिये :-
28 दिसम्बर 2014 की कैबिनेट बैठक के बाद मुख्यमंत्री हरीश रावत अब पूरी तरह बेनकाब हो गये हैं। वैसे भी एक साल से अधिक किसी मंत्री या मुख्यमंत्री को अपनी क्षमता दिखाने के लिये नहीं दिये जा सकते। डाॅ. राम मनोहर लोहिया कहते थे कि जिन्दा कौमें पाँच साल तक इन्तजार नहीं करतीं। हरीश रावत को लेकर सब को मुगालता था कि ग्रामीण पृष्ठभूमि, तृणमूल स्तर से राजनीति करने, अपनी पार्टी के भीतर विभिन्न पदों पर रहने और केन्द्र सरकार में एकाधिक मंत्रालयों में काम करने के अनुभव के कारण वे उत्तराखंड के सबसे सफल मुख्यमंत्री साबित होंगे। इससे पहले किसी मुख्यमंत्री में ये सभी योग्यतायें थीं तो वे थे नारायणदत्त तिवारी। मगर शुरू से ही पृथक राज्य के धुर विरोधी रहे तिवारी नये राज्य का निर्माण करने अथवा शासन करने नहीं, रिटायरमेंट के दिन काटने उत्तराखंड में आये थे।
रावत सरकार के पहले चार-पाँच महीनों के कामकाज पर किसी ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया, क्योंकि उन्हें विजय बहुगुणा का छोड़ा हुआ मलबा साफ करना था और उसी बीच लोकसभा व उसके बाद पंचायत चुनावों की आचार संहिता लग गई थी। अपनी सरकार के असंतुष्ट मंत्रियों से भी उन्हें बार-बार दो-चार होना पड़ रहा था। जब तक वे इनसे निपटते, उन्हें गंभीर चोट लग गई। आज भी उनकी गर्दन का पट्टा उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है।
मगर अब उन्हें लेकर मोहभंग की स्थितियाँ पूरी तरह साफ हो गई हैं। कोई भी व्यक्ति उनसे मिल कर बहुत संतुष्ट हो कर लौटता है, क्योंकि वे उत्तराखंड की सारी समस्याओं को समझते भी हैं और उनके समाधान में रुचि लेते भी दिखाई देते हैं। मगर अन्ततः फैसले वे वही लेते हैं, जो उनकी पार्टी के महिषासुरों, अर्थात् ठेकेदारों, दलालों और माफियाओं के हित के होते हैं। इसका ताजा उदाहरण 28 दिसम्बर की कैबिनेट बैठक में लिये गये सूक्ष्म एवं अति लघु विद्युत परियोजनाओं तथा ईको सेंसिटिव जोन सम्बन्धी निर्णय हैं।
जल परियोजनाओं को लेकर सूक्ष्म स्तर और ग्राम सभाओं तक जाने की बात हर समझदार व्यक्ति करता है (देखें नैनीताल समाचार, 15 से 31 दिसम्बर 2014)। मगर जब इस सिद्धान्त को जमीन पर उतारने की बात आई तो रावत फिर एक बार बड़ी पूँजी वालों और ठेकेदारों के पक्ष में झुके, ग्रामीणों और स्थानीय समुदाय के नहीं। कैबिनेट का यह फैसला लागू हुआ तो ग्रामीण एक बार अपना अंगूठा लगा देने के बाद फिर परियोजनाओं से बाहर हो जायेंगे, शायद अपने गाँवों से भी बाहर हो जायें। पानी से प्राप्त ऊर्जा का सारा मजा कम्पनियों वाले लेंगे। इससे पहाड़ी गाँवों में गरीबी और पलायन का तांडव और तेज होगा। चूँकि उत्तराखंड की बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं पर दुनियाँ भर में विवाद उठे थे, विशेषकर जून 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद। इसीलिये रावत सरकार ने गाँव वालों की आड़ में बड़ी कम्पनियों और ठेकेदारों को उपकृत करने का यह शातिर तरीका निकाला है।
कैबिनेट का दूसरा फैसला ईको सेंसिटिव जोन को वापस लेने के लिये केन्द्र सरकार से आग्रह करने के बारे में है। ईको सेंसिटिव जोन को लेकर विरोध दो तरह से हो रहा है। पहला, अब तक प्रदेश में अभयारण्यों आदि के रूप में जिस तरह स्थानीय समुदाय को वंचित किया गया है, उस अनुभव को देखते हुए वामपंथी सोच के लोग इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि ईको सेंसिटिव जोन से शायद स्थानीय ग्रामीण समुदाय एक बार फिर से विपरीत रूप में प्रभावित होगा। मगर न ईको सेंसिटिव जोन को लेकर पूरी बातचीत हुई है और न स्थितियाँ पूरी तरह साफ हैं। ईको सेंसिटिव जोन के विरोध को लेकर जो दूसरी लाॅबी मुखर है, वह कांग्रेस, भाजपा और उत्तराखंड क्रांति दल आदि के भीतर पैठी ठेकेदार लाॅबी है, जो चाहती है कि निर्माण कार्यों को लेकर चल रही उसकी ठेकेदारी में कोई रोक-टोक न हो। वे धड़ल्ले से तथाकथित विकास कार्य करें, चाहे उसके बाद केदारनाथ जैसे एक नहीं दर्जनों हादसे हो जायें और यह पूरा पर्वतीय प्रदेश मरुभूमि बन जाये। यह ठेकेदार लाॅबी उत्तराखंड की राजनीति मंे इतनी मजबूत है कि इस नवजात प्रदेश को मजाक में 'ठेकेदारखंड' भी कहा जाने लगा है। हरीश रावत सरकार ने इस ठेकेदार लाॅबी के दबाव में ही ईको सेंसिटिव जोन का मामला इतना अधिक चढ़ाया है, स्थानीय और ग्रामीण हितों की पैरोकार वाम ताकतों के पक्ष में नहीं। क्योंकि यदि हरीश रावत ईको सेंसिटिव जोन को नहीं मानते तो उन्हें यह भी तो बतलाना चाहिये कि फिर ठेकेदार लाॅबी को उपकृत करने के अतिरिक्त उत्तराखंड के विकास का कौन सा माॅडल उनके पास है ?