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Thursday, September 9, 2021

इस अग्निपथ पर हमसफ़र मिलना मुश्किल। पलाश विश्वास

 इस अग्निपथ पर हमसफ़र मिलना मुश्किल


समीर भी, हमारी लड़ाई सामाजिक मोर्चे की है।लड़ाई जारी रहेगी।तुम्हारे मेरे होने न होने से कोई फर्क नही पड़ेगा


पलाश विश्वास



कल हमारे छोटे भाई और रिटायर पोस्ट मास्टर समीर चन्द्र राय हमसे मिलने दिनेशपुर में प्रेरणा अंशु के दफ्तर चले गए। रविवार के दिन मैं घर पर ही था। हाल में कोरोना काल के दौरान गम्भीर रूप से अस्वस्थ होने की वजह से उसे जीवन में सबकुछ अनिश्चित लगता है।


इससे पहले जब वह आया था,रूपेश भी हमारे यहां था। उसदिन भी उसने लम्बी बातचीत छेड़ी थी। 


उसदिन उसने कहा था कि गांवों में स्त्री की कोई आज़ादी नहीं होती।हमें उन्हें आज़ाद करने के लिए हर गांव में कम से कम 5 युवाओं को तैयार करना चाहिए। 


हम सहमत थे।


उस दिन की बातचीत से वह संतुष्ट नहीं हुआ। उसके भीतर गज़ब की छटपटाहट है तुरन्त कुछ कर डालने की। आज हमारे बचपन के मित्र टेक्का भी आ गए थे। बाद में मुझसे सालभर का छोटा विवेक दास के घर भी गए।


बात लम्बी चली तो मैंने कहा कि मैं तो शुरू से पितृसत्ता के खिलाफ हूँ और इस पर लगातार लिखता रहा हूँ कि स्त्री को उसकी निष्ठा,समर्पण,दक्षता के मुताबिक हर क्षेत्र में नेतृत्व दिया जाना चाहिए। लेकिन पितृसत्ता तो स्त्रियो पर भी हावी है। इस पर हम प्रेरणा अंशु में सिलसिलेवार चर्चा भी कर रहे हैं। जाति उन्मूलन, आदिवासी,जल जंगल जमीन से लेकर सभी बुनियादी मसलों पर हम सम्वाद कर रहे हैं ज्वलन्त मसलों को उठा रहे हैं।


हमारे लिए सत्ता की राजनीति में शामिल सभी दल।एक बराबर है। विकल्प राजनीति तैयार नहीं हो सकी है। न इस देश में राजनैतिक आज़ादी है। 


सामाजिक सांस्कृतिक सक्रियता के लिये भी गुंजाइश बहुत कम है। 


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है।


स्त्री आज़ादी के नाम पर पितृसत्ता के लिए उपभोक्ता वस्तु बन रही है। क्रयक्षमता उसका लक्ष्य है और वह गांव और किसिन के पक्ष में नहीं ,बाजार के पक्ष में है या देह की स्वतंत्रता ही उसके लिए नारी मुक्ति है तो मेहनतकश तबके की,दलित आदिवासी और ग्रामीण स्त्रियों की आज़ादी,समता और न्याय का क्या होगा?


समीर अम्बेडकरवादी है।


 हमने कहा कि अम्बेडकरवादी जाति को मजबूत करने की राजनीति के जरिये सामाजिक न्याय चाहते हैं,यह कैसे सम्भव है?


साढ़े 6 हजार जातियों में सौ जातियों को भी न्याय और अवसर नहीं मिलता। 


संगठनों,संस्थाओं और आंदोलनों पर,भाषा, साहित्य, सँस्कृति,लोक पर भी जाति का वर्चस्व। 


फिर आपके पास पैसे न हो तो कोई आपकी सुनेगा नहीं।कोई मंच आपका नहीं है।


समीर हरिदासपुर प्राइमरी स्कूल में दूसरी कक्षा में पढता था और उसका मंझला भाई सुखरंजन मेरे साथ। उनका बड़ा भाई विपुल मण्डल रंगकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता थे। जिनका हाल में निधन हुआ।


70 साल पुराना वह हरिदासपुर प्राइमरी स्कूल बंद है। इलाके के तमाम प्राइमरी स्कूल रिलायंस को सौंपे जा रहे हैं। क्या यह कोई सामाजिक राजनीतिक मुद्दा है?


नौकरीपेशा लोगों के लिए समस्या यह है कि पूरी ज़िंदगी उनकी नौकरी बचाने की जुगत में बीत जाती है। चंदा देकर सामाजिक दायित्व पूरा कर लेते हैं। नौकरी जाने के डर से न बोलते हैं और न लिखते हैं।कोई स्टैंड नहीं लेते। लेकिन रिटायर होते ही वे किताबें लिखते हैं और समाज को, राजनीति को बदलने का बीड़ा उठा लेते हैं।


सामाजिक काम के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है। जैसे मेरे पिता पुलिनबाबू ने खोया। हासिल कुछ नहीं होता।


 राजनीति से कुर्सी मिलती है लेकिन सामाजिक सांस्कृतिक काम में हासिल कुछ नहीं होता। इसमें सिर्फ अपनी ज़िंदगी का निवेश करना होता है और उसका कोई रिटर्न कभी नहीं मिलता।


समाज या देश को झटपट बदल नहीं सकता कोई। यह लम्बी पैदल यात्रा की तरह है। ऊंचे शिखरों, मरुस्थल और समुंदर को पैदल पार करने का अग्निपथ है।


इस अग्निपथ पर साथी मिलना मुश्किल है।


जो हाल समाज का है, जो अधपढ अनपढ़ नशेड़ी गजेदी अंधभक्तों का देश हमने बना लिया, युवाओं को तैयार कैसे करेंगे।


मुझे लगता है कि इस मुद्दे पर भी सार्वजनिक सम्वाद जरूरी है।


मेरे भाई,समीर, निराश मत होना।हम साथ हैं और हम लड़ेंगे। लेकिन यह लड़ाई सामाजिक मोर्चे की है और यह संस्थागत लड़ाई है,जिसे जारी रखना है।


तुम्हारे मेरे होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

Wednesday, September 8, 2021

उत्तराखंडी बंगाली समाज के दो डॉक्टर भाई,इनमें से एक सीएमओ

 हमारे उत्तराखंडी बंगाली समाज के दो डॉक्टर भाई, इनमें से एक रिटायर्ड सीएमओ


तृतीय पुरुष स्त्री क्यों,प्रथम क्यों नहीं? आप भी लिखें तो पूरी होंगी सारी अधूरी कथाएं

पलाश विश्वास


पश्चिम बंगाल के भद्रलोक बंगाली बंगाल से बाहर देश के 22 राज्यों में बसे 11 करोड़ बंगालियों को बंगाली नहीं मानते और वे बंगाल के इतिहास भूगोल के बाहर हैं।


 विभाजन के शिकार बंगालियों से उनकी वैसी कोई स














हानुभूति कभी नहीं रही, जैसे सिंधी,भूटानी, तमिल, कश्मीरी,पंजाबी और सिख शरणार्थियों से इन सभी समुदायों के लोगों की रही है।


 इन सभी 22 राज्यों में राजनीति चाहे जो हो,स्थानीय समुदायों के सहयोग और समर्थन से बंगाली समुदाय बंगाल के लोगों के मुकाबले हर मामले में आगे बढ़ रहे हैं,मातृभाषा, बांग्ला संस्कृति, पहचान और आरक्षण से वंचित होने के बावजूद।


ताज़ा उदाहरण रुद्रपुर,उत्तराखण्ड के मनोज सरकार हैं,जिनका पैरा ओलिम्पिक पदक उत्तराखण्ड और 22 राज्यों के विभाजन शिकार बंगालियों के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि हैं।


 उन्हें बंगाल के भद्रलोक बंगाली बंग संतान और बंगाल का बताते हुए जश्न तो मना रहे हैं लेकिन उन्हें उत्तराखण्ड के बजाय बंगाल का बता रहे हैं।


वैसे ही सुष्मिता सेन के विश्व सुंदरी बनने पर बंगाली अखबारों ने उनकी तसवीर और बंग ललना की विश्वजय शीर्षक से मुखपन्ने पर एक ही खबर छापी थी। सुष्मिता दिल्ली की थी।


 उसीतरह जैसे कवि और हिन्दू मानने से भी इंकार करने वाला बंगाली भद्रलोक समाज ने अस्पृश्य  रवींन्द्र नाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार पाने के बाद बंगाली अस्मिता का प्रतीक बना लिया।


असम, त्रिपुरा,ओडीशा,बिहार,झारखण्ड में भी बंगला साहित्य रचा जाता है,जिसे कभी मान्यता नहीं मिलती।


 विभाजन के शिकार बंगाली भी मनोरंजन व्यापारी किन्त्रः साहित्यकार हैं। 


बड़े बड़े पत्रकार हैं। फिल्मकार,संगीतकार, अभिनेता, रंगकर्मी, आईएएस,आईपीएस अफसर, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर,वकील, वगैरह हैं। बंगाल की मदद के बिना। बनागल के लोगों को यह हजम नहीं होता।


दिनेशपुर के गांव सुंदरपुर में ऐसे हो दो डॉक्टर भाई हैं- डॉ अरविंद मण्डल और डॉ जगदीश मण्डल। दोनों हमारे भी भाई हैं।


जिनमे से डॉ जगदीश मण्डल बगेश्वरबके सीएमओ पड़ से रिटायर हुए तो डॉ अरविंद हाल के कोरोनकाल तक राजधानी नई दिल्ली में अपना अस्पताल और क्लीनिक चलाते हुए आम जनताबकी सेवा करते रहे हैं।


 दोनों मुझसे छोटे हैं। 


अरविंद बड़ा है। जब मैं डीएसबी से एमए कर रहा था,तब वह बीएससी कर रहा था। उनके घर हम बचपन से आते जाते रहे हैं। दोनों मुझे बड़ा भाई मानते रहे हैं।


डॉ जगदीश गरीब बच्चों की पढ़ाई का बोझ उठाते हैं और दिनेशपुर में आ लोगों का इलाज करते हैं। दिनेशपुर नें ही उन्होंने अपना घर बना लिया है। दोनों भाइयों की बेटियां भी अस्पतालों में कार्यरत हैं। जो हमारी भी बेटियाँ हैं।


इन दिनों सविता जी थोड़ी अस्वस्थ चल रही हैं और डॉ जगदीश उनका इलाज कर रहे हैं। परसो जब मैं उनके लिए दवा लेने गया तो बोले कि डॉ अरविंद अस्वस्थ हैं और उन्होंने दिल्ली छोड़ दिया है।गांव में हैं और आपको खूब याद कर रहे हैं।


तभी से बेचैन था। दोपहर बाद रिटायर्ड पोस्ट मास्टर समीर मिलने आये इस शिकायत के साथ कि हम सामाजिक परिवर्तन के बारे में उनके विचारों के बारे में नहीं लिखते।


हमने उन्हें बताया कि हमारा कोई इतिहास नहीं है,साहित्य नहीं है, हमारे विचार  हैं  क्योंकि हम अपनी बात खुद नहीं कहते।खुद नहीं लिखते। हम हमेशा  चाहते हैं कि दूसरे लिखे। दूसरे लिख भी दें तो यह उनकी बात होगी। 


तृतीय पुरुष या  होकर जीते रहे हैं हम,प्रथम पुरुष या स्त्री कब बनेंगे?


हमने बताया कि मेरे पिताजी कक्षा दो तक पढ़े थे और कहते थे कि ये हमारे लोग हैं।इनके लिए कोई बाहरी कुछ नहीं करेगा। जो कुछ करना है,मुझे करना है। जो कहना लिखना है ,मुझे लिखना है।चाहे मुझमें काबिलियत हो या न हो,यह अनिवार्य कार्यभार है। इसके लिए जो भी योग्यता,दक्षता जरूरी हैं ,मुझे हासिल करने ही हैं।


हम हर किसी से यही कहते हैं।


 यही प्रेरणा अंशु का मिशन भी है। 


हर व्यक्ति अपनी बात खुद कहें,खुद लिखें, हम उनकी हर सम्भव मदद करेंगे।


इसके बाद डॉ अरविंद के बारे में बताया तो तुरन्त मुझे लेकर रवाना हो गया सुंदरपुर।


बरसों बाद उनके घर गए, जहां अक्सर जाना होता था।वही खेत,वही हरियाली,वही आकाश। 


उसकी पत्नी से बात हुई तो वह मकरंदपुर की बेटी निकली। उसके परिवारवाले भी हमारे परिजन निकले।


हर किसीके बारे में न मैं जानता हूँ और न लिख सकता हूँ। ज़िन्दगी बहुत छोटी होती है। अपनी कथा कभी पूरी भी नहीं होती।हर कथा अधूरी छूट जाती है।


आप लोग भी लिखें तो पूरी होगी सारी कथाएं भी।

Saturday, September 4, 2021

कौन नहीं हैं हमारे शिक्षक? पलाश विश्वास

 कौन नहीं हैं हमारे शिक्षक?

पलाश विश्वास












शिक्षक दिवस पर समस्त शिक्षकों को प्रणाम।प्राइमरी स्कूल हरिदासपुर के पीताम्बर पन्त, हाई स्कूल दिनेशपुर के पीएम बुधलाकोटी, सुरेशचंद्र शर्मा,महेश चंद्र वर्मा,केएल साह, शक्तिफार्म हाइस्कूल के हैदर अली, प्रसादजी,जीआईसी के जगदीश चन्द्र पन्त,ताराचन्द्र त्रिपाठी,रमेशचन्द्र सती और हरीश सती ने बचपन से मेरी दिशा तय कर दी थी। फिट डीएसबी कालेज के सभी विभागों के प्राध्यापक हमारे दिग्दर्शक रहे।


जीवन में गिर्दा,राजीव लोचन साह, पवन राकेश,शमशेसर बिष्ट,सुंदरलाल बहुगुणा,ब्रह्मदेव सिंह शर्मा,कामरेड एके राय, विनोद बिहारी महतो,शेखर जोशी, शेखर पाठक,महाश्वेता देवी, आनन्द तेलतुंबड़े, नबारून भट्टाचार्य जैसे हमारे असंख्य सजोक्षक हैं।


हमारे पुरखे और उनके इतिहास से भी हमें शिक्षा मिलती है।गौतम बुद्ध,बाबासाहेब अम्बेडकर,बिरसा मुंडा,रामदयाल मुंडा,तांत्या भील, सिधो कान्हो,महात्मा ज्योतिबा फुले,सावित्री बाई फुले, हरिचांद गुरुचाँद ठाकुर,कार्ल मार्क्स, सुकरात,अरस्तू,प्लेटो, आइंस्टीन,स्टीफन हॉकिंग, हाब्स लॉक रूसो,लेनिन,शेक्सपीयर, टैगोर,मदर टेरेसा जैसे पुरखे हर देश के हर मनुष्य के शिक्षक हैं।


हमारे सबसे बड़े शिक्षक बच्चे हैं।जिनसे सवाल करने और सवाल के जवाब खोजने के अलग अलग यरीक़े रोज़ सीखता हूँ।


उनसे बड़े शिक्षक आम मेहनतकश लोग हैं,जिनसे जीवन जीने के तरीके और जीवन संघर्ष,जिजीविषा की ऊर्जा मिलती है।


प्रकृति,मौसम और जलवायु से भी सीखता हूँ।


शिक्षक दिवस पट इन सभी को प्रणाम।

Friday, September 3, 2021

क्या हम डायनासोर की तरह विलुप्त होंगे? पलाश विश्वास

 क्या हम डाइनासोर की तरह विलुप्त हो जाएंगे?

पलाश विश्वास






डायनासोर 23 करोड़ साल पहले पृथ्वी पर आए और साढ़े छह लाख साल पहले विलुप्त भी हो गए। मनुष्यों का इतिहास शुरू होने से पहले।बहुत पहले।मनुष्य का इतिहास सिर्फ 50 लाख साल पुराना है।

छनछन और उत्कर्ष से चर्चा हो रही थी।आजकल ये बच्चे सवाल बहुत करने लगे हैं। हमें बचपन में इतनी जानकारी होतो नहीं थी। न ही हमारे सवालों का जवाब देनेवाला कोई होता था।

दोनों ने एकसाथ पूछ लिया की डायनासोर क्यों विलुप्त हो गया?

छनछन दूसरी कक्षा में आई है तो उत्कर्ष सातवीं में। उनके साथ श्रेया अभी पहली में है।तीनो को एकसाथ जवाब देना होता है।

देवेन दा की तरह न मुझे विज्ञान आता है और न विज्ञान कथा सुनाना आता है। आज उत्कर्ष ने पूछा कि मस्तिष्क का कौन सा हिस्सा कैसे काम करता है। बिना पढ़े ऐसे कठिन सवालों का सही जवाब देना मुज़हक़ील होता है।

हमने सामान्य ज्ञान पर भरोसा किया।

हमने उल्टे उनसे पूछा कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तापमान अगर 55 से 60 डिग्री सेल्सियस हो गया तो क्या होगा?

पूछा कि तापमान बढ़ने से समुद्र का जलस्तर बढ़ता चला गया तो क्या होगा?

तापमान और बदलते जलवायु के कारण ग्लेशियर सुख गए तो क्या होगा?

मनुष्य को हवा,पानी और भोजन नहीं मिले तो क्या होगा?

प्रदूषण से ओज़ोन की परत खत्म हो गयी तो क्या होगा?

बच्चों ने जवाब दिया,डायनासोर की तरह मनुष्य भी विलुप्त हो जाएगा।

हमने कहा कि प्रकृति में इस तरह के बदलाव से ही डायनासोर विलुप्त हो गए हैं।

वैज्ञानिक शोध और खोज के बारे में आप लोग खुद पढ़ लेना।

तीनो बच्चे उदास हो गए।

पृथ्वी नहीं बचेगी तो हम कैसे बचेंगे?

बचचो को जो बात इतनी आसानी से समझ में आती है,बड़ो को क्यों नहीं आती?

इसकी वजह कोई वैज्ञानिक खोज से मालूम करना होगा क्या?

बच्चे जैसे सोच सकते हैं क्या हम उस तरह भी सूचने के काबिल नही रह गए?

Wednesday, September 1, 2021

वैज्ञानिक सत्यशोधक होता है और आस्था विज्ञान के खिलाफ।पलाश विश्वास

 वैज्ञानिक सत्यशोधक होता है और आस्था विज्ञान के खिलाफ

पलाश विश्वास




तस्लीमा नसरीन के इस्लाम की आलोचना से बाग बाग लोगों को अपने मिथकों की आलोचना पर इतना गुस्सा क्यों आता है?  

अम्बेडकर को जाहिर है कि पढ़ने से परहेज है,भले ही उसकी जय जय करते रहे। 

दयानन्द सरस्वती,राजा राममोहन राय, विवेकानन्द, रामकृष्ण, हरिचांद ठाकुर,पेरियार, गौतम बुद्ध,गुरु नानक और कबीर के नाम तो जानते ही होंगे।

शंकराचार्य के शाश्त्रार्थ के बारे में मालूम तो होगा?

वैदिकी काल में वेद,उपनोशद,स्मृति, ब्राह्मण, पुराण की आलोचना करने वाले नास्तिक चार्वाक और लोकायत दर्शन की लंबी परम्परा के बारे में कुछ तो जाना होगा।

यूरोप के नवजागरण,सुधार आंदोलन,भारत के सन्त आन्दोलम  और तुर्की में कमाल पाशा की गौरवशाली आंदोलनों के बारे में कुछ तो जानते होंगे?

आर्यसमाज और ब्रह्मसमाज क्या हैं?

 कुछ भी नही जाना समझा तो विज्ञान और तकनीक तो जानते ही होंगे?

असहमति पर इतनी तीखी प्रतिक्रिया तो इस्लमामिक कट्टरपंथ की आलोचना क्यों करते हैं?

आप जायज हैं तो वे क्यों नाजायज है?

हम जितने तस्लीमा और दूसरी धर्म सत्ता या राज सत्ता के खिलाफ विचारों के साथ हैं उतने ही असहमति के स्वरों का समर्थन करते हैं,उनके साथ खड़े हैं।

भले ही हम उनसे असहमत हों।हम तस्लीमा की सारी बातों से सहमत नहीं है।

जनता की आस्था का भो मैं सम्मान करता हैं और मैने अपने लेखन में हमेशा जनता की आस्था का सम्मान किया है।

लेकिन आलोचक हमेशा प्रगति और विकास में सहायक है।

आलोचना और प्रश्न,जिज्ञासा और सत्य की खोज धर्म भी है और विज्ञान भी।

कोपरनिकस ने जब कहा था कि पृथ्वी सूरज की परिक्रमा करती है,न कि सूरज पृथ्वी की परिक्रमा करता है।यह धर्म विरोधी बात थी और कोपरनिकस को जनता के गुस्से का सामना करना पड़ा।

सूकरात को आस्था के मुकाबले सच कहने के लिए जहर पीना पड़ा।

ऐसे ही लोगों की बदौलत आज यह वैज्ञानिक तकनीकी आधुनिक सभ्यता है।

विज्ञान हर प्रश्न का जवाब अनेसन्धान और शोध में करता है।हर वैज्ञानिक सत्यशोधक होता है।

सत्य और आस्था दोनों में अन्तर्विरोध है लेकिन इसी टकराव से होती है प्रगति।प


Thursday, August 26, 2021

गेल ओम्वेट Gail Omvedt के जैसे फुले अम्बेडकर के अनुयायी कौन? पलाश विश्वास

 गेल ओम्वेट के जैसे फुले अम्बेडकर अनुयायी कौन है?

पलाश विश्वास

बहुत दुःखद समाचार।



अमेरिकी मूल की भारतीय विदुषी, समाजशास्त्री, मानवाधिकार कार्यकर्ता  गेल ओम्वेट Gail Omvedt  के निधन की ख़बर आ रही है। वे 81 वर्ष की थीं। उनकी किताबें आने वाली पीढ़ियों के लिए रौशन राहें हैं। उन्होंने जाती व्यवस्था,दलित राजनीति और अम्बेडकर आंदोलन पर लगातार लिखा है।


गेल सत्तर के दशक में अमेरिका से महात्मा ज्योति बा फुले के आंदोलन का अध्ययन करने भारत आई थी। उसके बाद वे तजिंदगी फुले अम्बेडकर के रास्ते पर चली।


 अम्बेडकरी आंदोलन और भारतीय  समाज का इतनी गहराई से किसी भारतीय समाजशास्त्री या लेखक या खुद अम्बेडकर के किसी अनुयायी ने वैज्ञानिक दृष्टि और अकादमिक विधि से लिखा हो,कम से कम मुझे इसकी जानकारी नहीं है। 


आनन्द तेलतुंबड़े की ही याद आती है,जिन्हें भीमा कोरेगांव मामले में जेल में कैद रखा गया है। जिनके बारे में भी दलितों को खास आता पता नहीं है।बहुजन राजनीति के लोग उन्हें कम्युनिस्ट मानते हुए खारिज करते रहे हैं। 


अम्बेडकर परिवार से होने के बावजूद बहुजनों ने उनकी गिरफ्तारी का विरोध नहीं किया। 


वास्तव में उन्होंने न तेलतुंबड़े को पढा और न जेल ओम्वेट को।


दलित,पिछड़ा,स्त्री,आदिवासी विमर्श से जुड़े लोगों को न कारपोरेट राज से शिकायत है,न फासिज्म के तानाशाह राजकाज से और न साम्राज्यवाद से। उन्हें बस अपना हिस्सा चाहिए। सत्ता में हिस्सेदारी के लिए समता और न्याय की भी उन्हें परवाह नहीं है।उनके लेखन में वही घृणा और हिंसा संक्रमित है,जो वर्चस्ववादी सत्तावर्ग में। उनके लेखन में न भाषा का सामंजस्य है, न वैज्ञानिक दृष्टि और न अकादमिक विधि।


 एकतरफा आरोप प्रत्यारोप से लेकर विशुद्ध गालीगलौज में निष्णात है अम्बेडकरी आंदोलन,जिनका अम्बेडकर से, दलितों,पिछडो, आदिवासियों,अल्पसंख्यकों और स्त्रियों के मुक्ति संघर्ष,समता और न्याय से कुछ लेना देना नहीं है।


इसीलिए गेल ओम्वेट का अवसान भारतीय मेहनतकश समाज और अम्बेडकरी आंदोलन के लिए अपूरणीय क्षति है।


पहले Vidya Bhushan Rawat रावत ने यह सूचना दी।फिर एक एक करके तमाम मित्रों के सन्देश मिल रहे है।


उनसे हिंदी के पाठक कितने परिचित हैं ,कहना मुश्किल है। लेकिन उन्होंने ज़िन्दगी भर हाशिये के लीन लोगों के लिए लिखा,वे शायद उनका नाम भी नहीं जानते।


मुक्त बाजार में वही सर्वश्रेष्ठ हैं,जो बिकता है। इस हिसाब से सत्तर अस्सिक के दशक में जो लुगदी साहित्य फुटपाथ पर भी धड़ल्ले से बिकता था,आज के पैमाने पर वे ही सर्वश्रेष्ठ है।


सामाजिक यथार्थ को वैज्ञानिक दृष्टि से लगातार पेश करने और हाशिये की आवाज़ उठाने वालों की शायद आज किसीको जरूरत नहीं है। हाशिये के लोगों को कतई नहीं।


Dr #GailOmvedt passed away today. She is an American-born Indian scholar, sociologist & human rights activist. She is a prolific writer and has published numerous books on the anti-caste movement, Dalit politics, & women's struggles in India.


Humble Tributes.


हालात बदलने का सपना देखने वाले पहले इन्हें जरूर पढ़ें।


प्रेरणा अंशु परिवार की ओर से


श्रद्धांजलि 💐

Friday, August 20, 2021

जमीन और जड़ों की पहचान नहीं,हवाई उड़ानें अनन्त । पलाश विश्वास

 नैनीताल डीएसबी कालेज से पढ़ा लिखा। पर्यटन स्थलों और पर्यटन में मेरी रुचि नहीं रही। देश को देखने समझने में ज़िन्दगी खपा दी। 



इंडियन एक्सप्रेस समुह में संपादकी की तो सारी ऊर्जा देश के लोग,उनके इतिहास भूगोल,उनके जीवन यापन,उनकी भाषा,संस्कृति, उनकी समस्याओं और उनके संघर्ष में लगा दी। 


विदेश से आमंत्रण आते रहे।लेकिन मैंने पासपोर्ट भी नही बनाया।बांग्लादेश और नेपाल भी नहीं गए। कोलकाता से दक्षिणपूर्व एशिया इतना नजदीक था, जा नहीं सका।


किसी देश में रचे बसे बिना यात्रा वृत्तांत के लिए जाने की पर्यटन इच्छा और समय की कमी रही।


फिर ग्लोबल दुनिया तो हाथ की मुट्ठी में है। विदर्श यात्रा से क्या इससे ज्यादा जान समझ पाता।


दुनिया नहीं देखी,इसका अफसोस नहीं है।

अफसोस यह है कि पूरी ज़िंदगी खपा देने के बावजूद देश को न पूरा देख सका और न समझ सका। देश के लोग अब भी अजनबी जैसे अनजाने हैं।


यह हमारी सबसे बड़ी असफलता है किनपनी जमीन और जड़ों किंफचन भी नहीं है और हवाई उड़ानें अनन्त हैं।

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