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Thursday, September 19, 2013

विमान बसु को भीष्म पितामह की तरह सेनापति बनाकर कुरुक्षेत्र की लड़ाई लड़ने की माकपा की मजबूरी

विमान बसु को भीष्म पितामह की तरह सेनापति बनाकर कुरुक्षेत्र की लड़ाई लड़ने की माकपा की मजबूरी


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​


माकपा राज्य नेतृत्व में अंदरुनी दबाव के बावजूद किसी बड़े फेरबदल की संभावना नहीं है। माकपा राज्य सचिव की कुर्सी सुरक्षित है। सिर्फ जिलास्तर पर कुछ फेरबदल हो सकते हैं। पंचायत चुनावों के बाद बारह पालिकाओं के चुनाव में भी पार्टी के सामने कड़ी शिकस्त का खतरा मंडरा रहा है। राज्य सरकार के खिलाफ जंगी आंदोलन छेड़ने के आसार भी कम है। घटक दल इसके लिए तैयार नहीं है।खोये हुए जनाधार के मद्देनजर माकपा अब घटक दलों की राय को दरकिनार करके अकेले ही आंदोलन की हालत में कतई नहीं है। दूसरी ओर,संगठन के मौजूदा हालत में जनप्रिय माग के मुताबिक राज्य शीर्ष नेतृत्व में बड़ा परिवर्तन करके पार्टी में अंतर्कलह तेज होने का जोखिम उठाने की हालत में भी नहीं है माकपा। जबकि सच तो यही है कि बंगाल में माकपा के लिए सांगठनिक संकट के बजाय ममता के मुकाबले खड़े हो पाने नेतृत्व का संकट ज्यादा प्रबल है।इस समस्या का कोई समाधान फिलहाल माकपा के पास नहीं है। बुद्धदेव को जैसे मजबूरन विधानसभा चुनावों में सिपाहसालार बनाकर लड़ना पड़ा माकपा को वैसे ही माकपा में अब विमान बसु को भीष्म पितामह की तरह सेनापति बनाकर कुरुक्षेत्र की लड़ाई लड़ने की माकपा की मजबूरी है।

वैकल्पिक नेतृत्व तैयार ही नहीं हुआ

पंचायत चुनावों के कम से कम दस जिलों में माकपा उम्मीदवार भी खड़ा करने की हालत में नहीं थी। विधानसभा चुनाव ,पंचायत चुनाव और अब पालिका चुनाव में भी माकपा का सत्तादल के सामने एकतरफा आत्मसमर्पण है।जमीनी स्तर से नेतृत्व में बदलावकी मांग बहुत तेज हो गयी है। जिसके मद्देनजर कुछ जिलों में सचिव बदलना मजबूरी हो गयी है। लेकिन  राज्य स्तर पर वैकल्पिक नेतृत्व तैयार नही ंहुआ ह।कोई विकल्प ही नहीं है माकपा के पास।

सांगठनिक कवायद में माकपा बुरीतरह फेल

सांगठनिक कवायद में जाहिर है कि माकपा बुरी तरह फेल है।विधानसभा चुनावों से पहले भी तृणमूल कांग्रेस के पास कोई संगठन नहीं था। माकपा का संगठन तब भी दुर्भेद्य लग रहा था। लेकिन जनाधार कटाव इतना तेज हो गया कि अपने अजेय किलों में भी माकपा का नामलेवा कोई नहीं दीख रहा है। पुराने लोग ही नहीं रहे। नये लोग आ नहीं रहे हैं। तो परिवर्तन काहे का। राज्य कमेटी और वर्द्धित राज्य कमिटियों की बैठकों में घनघोर माथापच्ची करने के बावजूद कोई रास्त खल नहीं रहा है।


जिला स्तर पर भी बड़ा परिवर्तन असंभव

राज्य सत्र पर न सही,माकपा की सांगठनिक शक्ति का इतना ह्रास हुआ है कि जिन जिलों में सबसे खराब नतीजे आये हैं और जहां कार्यकर्ता नेतृत्व परिवर्तन की मांग सबसे ज्यादा बुलंद आवाज में उठा रहे हैं,माकपा वहां भी परिवर्तन करने की हिम्मत नहीं कर पा रही है। क्या पता कि परिवर्तन करने से हालत और पतली न हो जाये।

चिड़िया चुग गयी खेत

सत्ता में रहते हुए पार्टी नेतृत्व को कोई चुनौती देने की हिम्मत ही नहीं कर सकता था। अब हालात बदल गये हैं। हाथी को भी चींटी की लात हजम करनी पड़ रही है।सत्ता में रहते हुए सांगठनिक कवायद और नेतृत्व परिवर्तन की जरुरत सिरे से समझी नहीं गयी। जबकि तब यह सब निर्विरोध संभव है। जैसे अब तृणमूल कांग्रेस में तमाम विवाद के बावजूद नेतृत्व के सवाल पर पूरी पार्टी एकजुट है। माकपा के लिए स्थिति इसकी उलट है। सामने खड़ा होकर जनसमर्थन मांगने वाला नेता या जनांदोलन की अगुवाई करनेवाला कोई नेता माकपा के पास नहीं है।चिड़िया चुग गयी खेत,अब पछताये क्या होत है।

सिर्फ औपचारिकता

समझा जा रहा है कि महज परिवर्तन की औपचारिकता पूरी करने की गरज से कोलकाता,पूर्व मेदिनीपुर और पश्चिम मेदिनीपुर जिलों के सचिव बदलने पर सहमति बनाने की कोशिश हो रही है।अन्यत्र परिवर्तन अंसभव है।पश्चिम मेदिनीपुर में मौजूदा सचिव दीपक सरकार है,जिनकी कभी तूती बोलती थी।अब उन्हीं पर गाज गिरने की आशंका है।लेकिन उनको आखिर कैसे हटाया जाये, यह भी भारी समस्या है।जितना भी संगठन इस जिले में बचा है, उस पर दीपकबाबू की पकड़ है।उन्हें जिले से हटाकर पार्टी मुख्यालय में लाने के विकल्प पर सोचा जा रहा है।

बूढ़े शेर

बुद्धदेव भट्टाचार्य अस्वस्थ हैं। वे कोई जिम्मेवारी ले नहीं सकते। इसीतरह श्यामल चक्रवर्ती भी बहुत बूढ़ा चुके हैं। विमानदा खुद जवान नहीं हैं।जिलों में जौसे पूर्व मेदिनीपुर में जिला सचिव अस्वस्थ और बूढ़े हैं.जिन्हें पदमुक्त करने पर शायद वे ही सबसे ज्यादा खुश हों। गनीमत है कि पूर्व मैदिनीपुर में ऐसा किया जा रहा है। लेकिन अन्यत्र बूढ़े शेरों को आजमाते रहने के अलावा माकपा के पास को ई दूसरा चारा नहीं  है।

अनसुलझी गुत्थी

जैसे कोलकाता के सचिव रघुनाथ कुशारीअपनी बढ़ती उम्र की वजह से अब और काम करने की जिम्मेदारी उठोने को इच्छुक नहीं है और पार्टी से उन्हें छुट्टी नहीं मिल रही है।अब उन्हींको पदमुक्त करके परिवर्तन की औपचारिकता निभाने की तैयारी है।लेकिन कोलकाता जिले में पार्टी की बागडोर किसे दी जाये यह गुत्थी अभी नहीं सुलझी है।

वर्दमान को बांटने पर एतराज

राज्य नेतृत्व सांगठनिक सुविधा के मद्देनजर वर्दमान जिले के दो हिस्सों में बांटने के पक्ष में है। लेकिन जिला नेतृत्व इसके पक्ष में नहीं है। जाहिर है कि वर्दमान में भी कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है।

मजबूत क्षत्रप

उत्तर और दक्षिण 24 परगना में क्षत्रप इतने मजबूत हैं कि पार्टी नेतृत्व को उनकी मर्जी के खिलाफ चूं तक करने की हिम्मत नही ंहै अब।इसीतरह उत्तर बंगाल में भी पार्टी राज्य नेतृत्व का कोई नियंत्रण नहीं है और वहां भी परिवर्तन असंभव है।





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