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Wednesday, November 30, 2016

गरीब कल्याण? लक्ष्य समता और न्याय का? अकेले घिरे तानाशाह के बचाव में राजनीति में ओबीसी मोर्चाबंदी की शुरुआत? पलाश विश्वास

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गरीब कल्याण?

लक्ष्य समता और न्याय का?

अकेले घिरे तानाशाह के बचाव में राजनीति में ओबीसी मोर्चाबंदी की शुरुआत?


पलाश विश्वास

इंदिरा गांधी को यह देश शायद भूल गया है।देश अभी अमेरिका बनने को है और इस डिजिटल देश में शायद किसी इंदिरा गांधी की कोई प्रासंगिकता नहीं बची है।इंदिरा गांधी की चर्चा इस देश में अब आपातकाल के संदर्भ में ही ज्यादा होती है।

इन्हीं इंदिरा गांधी ने पहलीबार गरीबी हटाओ का नारा देते हुए देश को समाजवादी बनाने का वायदा किया था।

अब सत्ता में जो लोग हैं,उन्हें नेहरु इंदिरा की विरासत से कोई वास्ता नहीं है।लेकिन बिना टैक्स चुकाये कालाधन जमा करनेवाले जिन आर्थिक अपराधियों के खिलाफ जिहाद के नाम नोटबंदी में नागरिकों के मौलिक अधिकारों और उनकी नागरिकता को निलंबित करके रंगभेदी नस्ली वर्चस्व और एकाधिकार के लिए यह डिजिटल नोटबंदी है,उन्हीं राष्ट्रविरोधी तत्वों को उनके कालाधन को सफेद करके साफ बरी कर देने की योजना को मौजूदा तानाशाही की सत्ता ने गरीबी हटाओ का मुलम्मा पहना दिया है।

कालाधन आम माफी के लिए सिर्फ लोकसभा में वित्त विधेयक पास करके संसद और सांसदों को अंधेरे में रखकर राष्ट्रपति के मुहर से जो क्रांति की जा रही है,उसका नाम प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना रखा गया है।

गौरतलब है कि स्वेच्छा से बेहिसाब नकदी को सफेद बनाने की पिछली योजना 30 सितबर के खत्म हुई थी।जिससे चूंचूं का मुरब्बा निकला था और नोटबंदी का अंजाम भी वहीं चूं चूं का मुरब्बा है तो फिर नोटबंदी लागू करने के बीस दिनों के बाद फिर उसी चूं चूं के मुरब्बे को नये मुलम्मे के साथ गरीब कल्याण योजना में तब्दील कर देने के वित्तीय प्रबंधन के औचित्य पर किसी विमर्श की गुंजाइश भी नहीं है।इसके राजनीतिक आशय को समझना ज्यादा जरुरी है।

इसीके साथ इस आर्थिक नस्ली नरसंहार को जायज ठहराने और मारे जाने वाले बहुजनों को झांसा देने के लिए इस योजना का लक्ष्य संविधान की प्रस्तावना के मुताबिक बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर और संविधान निर्माताओं के सपनों के भारत के अंतिम लक्ष्य न्याय और समता रखा गया है।

समरसता अभियान की यह नई परिभाषा रोहित वेमुला और नजीब की संस्थागत हत्या परिदृश्य में बेहद हैरतअंगेज है लेकिन इसका न बाबासाहेब और बहुजनों से कोई रिश्ता है और न गरीबी हटाओ या इंदिरा गांधी से कोई रिश्ता है।

सत्ता की सर्वोच्च प्राथमिकता जनगणमन गाते हुए देश और देश के संसाधनों को बेच डालने का है और इसीलिए नोटबंदी के बाद देश अब डिजिटल है।

गौरतलब है कि देश में सिर्फ 54 फीसद लोगों के पास कोई बैंक खाता है,जनधन योजना के बावजूद।लोगों को सर छुपाने के लिए छत है नहीं और बेरोजगारी है तो शून्य बैलेंस के खाते का पासबुक और चेक उनके पास कितने हैं,यह आंकड़ा हमारे पास नहीं है।इसी बीच बाबासाहेब की वजह से बने रिजर्व बैंक के सभी अंगों प्रत्यंगों का निजीकरण हो गया है।

भारतीय बैंकिग के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स खत्म करने के साथ इंदिरा गांधी ने संसाधनों के राष्ट्रीयकरण की नीति अपनाते हुए समाजवादी विकास का जो माडल लागू किया था,इस गरीब कल्याण योजना के नाम पर उन्हीं सरकारी बैंकों को दिवालिया बना दिया गया है और पूरी अर्थव्यवस्था को देशी विदेशी पूंजी के हवाले करके देश और देश के सारे संसाधनों को सत्ता वर्ग के नस्ली वर्चस्व के लिए बेच दिया जा रहा है।

यह पूरा कार्यक्रम भारतीय संविधान के बदले मनुस्मृति अनुशासन के तहत बहुजनों को संपत्ति के अधिकार से वंचित करके उन्हें जीवन  के हर क्षेत्र में उनके तमाम हक हकूक,उनकी आजीविका,उनके रोजगार छीनने का है।

यह नरसंहारी अश्वमेध अभियान का नया नामकरण है।

इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीच्यूट के मुताबिक नकदी में देश में मौजूद कालाधन महज चार सौ करोड़ रुपये हैं जिन्हें निकालने के लिए की गयी नोटबंदी का खर्च बारह हजार करोड़ रुपये है।

यह नोटबंदी की अर्थव्यवस्था है और जब बैंकों और एटीएम से बड़ी संख्या में लाशें निकलने लगी हैं तो कालाधन आम माफी योजना गरीब कल्याण योजना बतौर पेश कर दी गयी है।बीस दिन का नर्क जीने के बाद पंद्रह फीसद कालाधन भी नहीं निकला है।जबकि अब कालाधन को आम माफी भी दे दी गयी है।

यह नोटबंदी योजना बुरी तरह फेल है।हालात नियंत्रित हो,ऐसा कोई वित्तीय प्रबंधन नहीं है।क्योंकि सरकार नकदी में लेन देन सिरे से बंद करना चाहती है और इसीलिए नोटबंदी के एलान के करीब तीन हफ्ते बाद भले ही बैंकों और एटीएम के बाहर कतारें थोड़ी कम हो गई हो, लेकिन अभी बैंकों में 500 रुपए के नए नोटों की किल्लत बरकरार है।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने आश्वासन दिया है कि 500 रुपए के नोटों की कोई दिक्कत नहीं है। अब इस नोट की प्रिटिंग दोगुनी कर दी गई है। रोजाना छप रहे 500 रुपए के 80 लाख नोट। फिर भी क्यों है इसकी किल्लत?फिरभी क्यों बैंकों और एटीएम से सिर्फ दो हजार के नोट निकल रहे हैं?दो हजार का नोट खुल्ला करके कारोबार जो लोग चला नहीं सकते ,उनके बाजार से सफाये का यह इंतजाम है।

बैंकों के दिवालिया हो जाने का नतीजा यह है कि सैलरी और पेंशन की टेंशन ने बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों में खौफ पैदा कर दिया है। इन्हें डर है कि कैश की कमी के चलते ग्राहक भड़केंगे और हंगामा करेंगे इसलिए बैंकों में पुलिस की तैनाती होनी चाहिए। इसके लिए ऑल इंडिया बैंक एम्पलॉय असोसिएशन और ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन ने इंडियन बैंक असोसिएशन से चिट्ठी लिखकर मदद मांगी है। नोटों की कमी के चलते ग्राहकों को संतुष्ट करना मुश्किल हो रहा है। अक्सर ग्राहक हंगामा करते हैं और गाली-गलौच पर उतर आते हैं। पेंशन और सैलरी का वक्त होने के चलते अगले दस दिन ज्यादा तनाव भरे होंगे।

बहरहाल जनधन योजना से आम जनता को बैंकिंग के दायरे में लाने का बेहतरीन नतीजा अब सामने आ रहा है कि नोटबंदी के बाद देश में कायदा कानून मुताबिक 30 लाख करोड़ रुपये सुरक्षित बाहर भेज दिये जाने के बाद नकदी में बचा कालाधन ज्यादातर इन्हीं खातों में जमा कराया गया है जिन खातों से खाताधारक अब ज्यादातर मामलों में बेदखल हैं।

खाता जिनके नाम हैं तो भी उन्हें इसका फायदा नहीं है।क्योंकि कल से बैंकों और एटीएम पर फिर कतारे लगी होंगी वेतन और पेंशन के लिए तो बैंकों के पास नकदी नहीं है बीस दिन नोटबंदी के बीत जाने के बावजूद और जनधन योजना खाता से भी निकासी की कोई उम्मीद नहीं है।गौरतलब है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत खुले लगभग 26 करोड़ बैंक खातों से पैसा निकालने की सीमा तय कर दी है। इन खातों से अब अगली सूचना तक एक महीने में सिर्फ 10,000 रुपये की निकासी की जा सकती है। रिजर्व बैंक के मुताबिक जिन जनधन खातों की केवाईसी प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है उनसे एक महीने में 10,000 रुपये निकाले जा सकते हैं। वहीं जिन खातों की केवाईसी प्रक्रिया अभी लंबित है उनसे एक महीने में महज 5,000 रुपये ही निकाले जा सकते हैं। 26 करोड़ जनधन खाते हैं और देश में सभी को बैंकिंग से जोड़ने के लिए अगस्त 2014 में प्रधानमंत्री जनधन योजना की शुरुआत हुई थी।

सवा अरब जनता में से नब्वे करोड़ लोग हर हाथ में रोजगार के बदले मोबाइल हो जाने के बावजूद इंटरनेट नेटवर्क से बाहर हैं।जो लोग फेसबुक,व्हाट्सअप का खूब इस्तेमाल कर लेते हैं वे ज्यादातर लाइक और शेयर और फोटो अलबम से बाहर न हार्ड वेयर न साफ्ट वेयर,न हैकिंग और न साइबर क्राइम के बारे में कुछ जानते हैं।ध्यान रहे कि साइबर संसार में कुछ एप और सॉफ्टवेयर ऐसे हैं जो कंप्यूटर पर टाइप होने वाले सभी बटन की जानकारी का डाटा तैयार करते हैं। इससे वह आपके कार्ड की जानकारी सेव कर सकते हैं। इस समस्या से बचने के लिए यूजर ऑन स्क्रीन कीबोर्ड और इकॉग्निटो टैब का प्रयोग कर सकते हैं।हाल में एटीएम का पिन चार महीनों से हैक होता रहा और मालूम होते हुए बैंकों ने इसकी कोई जानकारी ग्राहकों को नहीं दी और न ही कहीं एफआईआपर तक दर्ज करायी।बत्तीस लाख डेबिट कार्ट खारिज कर दिये।

जाहिर है कि जबरन डिजिटल इंडिया बना दिये जाने के बावजूद भारत में शापिंग माल और ईटेलिंग,रेलवे टिकट बुकिंग के बाहर सारा कारोबार करीब 97 फीसद तक नकदी में होता है।

मकान किराया का भुगतान नकदी में होता है।राशन पानी नकदी में चलता है।दिहाड़ी नकदी में मिलती है। सरकारी और संगठित क्षेत्र के दो चार करोड़ व्हाइट कालर लोगों को छोड़कर बाकी लोग दिहाड़ी में जीते हैं।कायदे कानून से बाहर जो असंगठित क्षेत्र हैं,वहा सारा लेन देन नकदी में होता है और ज्यादातर मामलों में न पे रोल होता है और न हिसाब किताब होता है और असंगठित क्षेत्र के ये तमाम मेहनतकश लोग अस्थाई मजदूर हैं जिन्हें नकदी की किल्लत की हालत में दिहाड़ी तो फिलहाल मिल ही नहीं रही है,उनकी नौकरी भी छंटनी में तब्दील हैं।

अभी हाल में हम अपनी एक बेटी के घर में गये थे।जो ब्याह से पहले हमारे साथ रहती थी और घर के कामकाज में हमारा हाथ बंटाती थी।तमाम परिचित लोग उसे हमारी बेटी मानते रहे हैं।हम उसे खूुब कोशिश करके भी पढ़ा लिखा नहीं पाये और उसने कम उम्र में शादी कर ली।सोलह साल हो गये उसकी शादी के।उसने प्रेम विवाह किया पोस्टर और होर्डिंग बनाने वाले एक दिहाड़ी मजदूर से ।उनकी शादी को सोलह साल हो गये।उनका कोई बच्चा नहीं है और परिवार संयुक्त है।उसका जेठ अभी अविवाहित है और स्थानीय कल कारखानों को लोहे के कलपुर्जे सप्लाई करने के लिए उसने घर में कारखाना लगाया हुआ है।दिहाडी अब पहले की तरह मिल नहीं रही है।कारखाना का काम रुक रुककर चल रहा है।

वे लोग मंकी बातें बड़ी ध्यान से सुनते हैं और उन्हें उम्मीद है कि कालाधन निकलेगा तो उनके जनधन खाते में जमा हो जायेगा और वे इससे अपना अधूरा मकान बना लेगें।वे नोटबंदी का समर्थन करते हैं।

कुल मिलाकर मध्यम वर्ग और निम्न मध्यवर्ग से लेकर गरीब और तमाम पिछड़े लोग इसी उम्मीद में एटीएम और बैंकों से पैसे न मिलने के बावजूद नोटबंदी के जबरदस्त समर्थक हैं।

अब वस्तुस्थिति यह है कि नोटबंदी से पहले तक सितंबर से पहले बैंकखातों में भारी पैमाने पर कालाधन चामत्कारिक तरीके से सफेद हो जाने की वजह से भारतीय बैंकों के पास करीब सौ लाख करोड़ रुपये जमा थे।जीवन बीमा,रेलवे जैसे सरकारी उपक्रमों में जो जमा है,उसका अलग हिसाब है।नोटबंदी के बाद अब तक सिर्फ साढ़े आठ लाख करोड़ रुपये जमा हैं।कालाधन के लिए आधी रकम के टैक्स चुकाने के बाद आम माफी के इस नये फरमान के बाद शायद  दस बीस लाख हद से हद और बैकों में जमा हो सकते हैं जबकि इससे पहले की योजनाओं में ऐसा कोई चमत्कार हुआ हो,हमें इसकी कोई जानकारी नहीं है।

अब सवाल है कि बैंकों में सौ लाख करोड़,केंद्र और राज्य सरकार के खजाने और सरकारी उपक्रमों में जमा पूंजी के बावजूद पिछले दो साल के राजकाज में 14 मई 2014 के बाद अविराम स्वच्छता अभियान के तहत गरीबी उन्मूलन कितना हुआ है।

अब अतिरिक्त बीस तीस लाख करोड़ रुपये के साथ गरीबी हटाओ का यह नारा कितना छलावा है और कितनी राजनीतिक इच्छा है,बहुत जल्द दूध का दूध,पानी का पानी हो जाना है।

इस वक्त खेती का मौसम है।खरीफ फसल का बाजार ठप है और रबी फसल की तैयारी खटाई में है।आगे भुखमरी की नौबत है।करोडो़ं लोग बेरोजगार हो जायेंगे तो खुदरा कारोबार खत्म है।हाट बाजार किराना खत्म है।चाय बागानों में से लेकर कल कारखानों में मृत्यु जुलूस अलग निकलने वाला है।

गौरतलब है कि उत्पादन प्रणाली का भट्ठा बैठाकर मुक्तबाजार में देश को तब्दील करने के लिए कृषि उत्पादन विकास दर शून्य हो जाने के बावजूद,सर्विस सेक्टर को औद्योगिक उत्पादन के मुकाबले तरजीह देने के बावजूद और निर्माण, विनर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर में विदेशी पूंजी और कालाधन के बावजूद,सारे के सारे सरकारी उपक्रमों के साथ साथ प्रतिरक्षा और आंतरिक सुरक्षा तक में विनिवेश कर देने के बावजूद जनसंख्या के मुताबिक रोजगार का सृजन हुआ नहीं है और आजीविकाओं और रोजगार से जल जंगल जमीन और नागरिकता के साथ अंतहीन बेदखली जारी है।

ऐसे में अब भी अमेरिका बनने चला डिजिटल देश में सत्तर फीसदी लोग खेती और कृषि पर निर्भर हैं।जलवायु,मौसम और मानसून पर निर्भर हैं।

तो देश के बहुजन आरक्षण राजनीति और संवैधानिक रक्षा कवच के बावजूद अब भी करीब नब्वे फीसद खेती पर निर्भर हैं।

इन्हीं बहुजनों के सफाये का अश्वमेध यज्ञ है।

कुल मिलाकर देश में सवा अरब जनसंख्या के मध्य कमाऊ जनता की जनसंख्या 50 करोड़ भी नहीं है।

करीब 75 करोड़ लोग जिनमें से ज्यादातर औरतें ,बच्चे और वृद्ध हैं,कमाउ परिजनों पर निर्भर हैं।

उत्पादन प्रणाली में खेती को हाशिये पर रख दिये जाने की वजह से पूरा परिवार किसी आजीविका में खपने की अब कोई संभावना नहीं है। ऐसे कमाउ लोगों में बमुश्किल एक दो फीसद लोग ही संगठित या असंगठित क्षेत्र में नौकरीपेशा हैं।इनमे से भी सिर्फ संगठित,सरकारी और कारपोरेट सेक्टर के स्थाई कर्मचारियों और पे रोल पर संविदा कर्मचारियों को वेतन बैंक मार्फत मिलता है।

नतीजतन कमाउ पचास करोड़ लोग हैं को समझ लीजिये कि करीब 47 करोड़ कमाउ लोगों में से 44 करोड़ लोग नकदी में लेन देन करते हैं।

खेती में देश की आबादी की सत्तर फीसदी अब भी हैं तो सीधा मतलब है कि करीब अस्सी पचासी या नब्वे करोड़ लोगों का दस दिगंत सत्यानाश का पुख्ता इंतजाम है कालाधन सफेद करके कारोबार और लेनदेन में सत्ता वर्ग के नस्ली वर्चस्व के लिए यह डिजिटल नोटबंदी और बैंकिंग प्रणाली को दिवालिया कर देने का अभूतपूर्व कार्यक्रम। इससे गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम का क्या वास्तव है,जब तक आम जनता समझ सकेगी,करोड़ों लोगों का काम तमाम है।

खासकर यह हालत सबसे खतरनाक इसलिए है कि देश के तमाम जनप्रतिनिधि और राजनेता,बुद्धिजीवी और पढ़े लिखे लोगों को आम जनता की कोई परवाह नहीं है और उनमें से ज्यादातर इस खुली लूट में शामिल हैं और बहती गंगा में नहा धोकर शुद्ध पतंजलि बन जाने की जुगत में हैं।

डा.अमर्त्य सेन से लेकर कौशिक बसु तक तमाम अर्थशास्त्री और तमाम रेटिंग एजंसियां नोटबंदी से अर्थव्यवस्था और विकास दर का बाजा बज जाने की आशंका जता रहे हैं।उद्योग और कारोबार जगत में भारी खलबली मची हुई है।

तो ऐसे हालात में अब तक गरीबों का भला न कर पाने वाली सरकार कैसे अतिरिक्त महज बीस तीस लाख करोड़ रुपये से गरीबों की सारी समस्याएं सुलझा देंगी,इसका बाशौक इंतजार करते हुए मुलाहिजा फरमाये।

मीडिया के मुताबिक इसी बीच नीतीश कुमार के बाद अब राजद नेता लालू प्रसाद यादव ने अब नोटबंदी का समर्थन कर दिया है। राहुल के नोटबंदी विरोधी खेमे का साथ छोड़ते हुए पटना में विधायकों से कहा कि वह सिर्फ इसे लागू करने के तरीके का विरोध कर रहे हैं, न कि इसके पीछे की वजहों का। इस तरह अपने इस कदम से लालू ने बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार के सुर में सुर मिला दिया है। नीतीश कुमार शुरू से ही नोटबंदी पर केंद्र सरकार के निर्णय का समर्थन कर रहे हैं। बिहार में बने महागठबंधन में जेडी यू और आरजेडी के साथ कांग्रेस भी शामिल है।

क्या यह भारतीय राजनीति में ओबीसी मोर्चाबंदी की शुरुआत है?

नोटबंदी को लेकर भीतर ही भीतर संघ परिवार में जो घमासान मच रहा है,उसके मद्देनजर प्रधानमंत्री के अकेले घिर जाने की हालत में कहीं यह नया राजनीतिक समीकरण की शुरुआत तो नहीं है?

आज नोटबंदी का 22 वां दिन है लेकिन बैंक और एटीएम के आगे कतार कम होने का नाम नहीं ले रही। आज पेंशन का दिन है और सुबह से ही बैंकों के सामने पेंशनधारकों की लंबी लाइन लगी हुई। यानी पेंशन का टेंशन बना हुआ है। इसके अलावा आज ज्यादातर कंपनियां अपने कर्मचारियों के अकाउंट में सैलरी डाल देंगी। बड़ा सवाल ये है बिना कैश के  पेंशन और सैलरी का टेंशन कैसे दूर होगा।

सीएनबीसी-आवाज़ के तमाम रिपोर्टरों ने देश के अगल अलग शहरों में पेंशनधारकों की हो रही परेशानी का जायजा लिया। नोएडा के पेंशनधारकों की मिलीजुली प्रतिक्रिया रही। कुछ लोग एटीएम में कतार बहुत लंबी होने से परेशान है तो कुछ इस मुहिम में मोदी जी के साथ नजर आ रहे हैं।

अब तो सीनियर सीटिजेंस भी पेटीएम और एटीएम का यूज कर रहें है। बैंक ने भी काफी मदद की है इनका मानना है तो पेंशन आने से परेशानी नहीं होगी और इनका मानना है की जल्द ही ये लाइंने खतम होंगी।

इधर मुंबई के पेंशनधारक भी पेंशन के लिए सुबह से ही कतार में लगे है। घंटों इंतजार के बाद नंबर आ रहा है। पेंशन की ही नहीं सैलरी का भी संकट है। कल सैलरी आने वाली है और आज कुछ लोगों की सैलरी आ भी गई है। ऐसे में सैलरी निकालने के लिए एटीएम के सामने फिर से भीड़ जुटने लगी है।

उधर सैलरी और पेंशन की टेंशन ने बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों में खौफ पैदा कर दिया है। इन्हें डर है कि कैश की कमी के चलते ग्राहक भड़केंगे और हंगामा करेंगे इसलिए बैंकों में पुलिस की तैनाती होनी चाहिए। इसके लिए ऑल इंडिया बैंक एम्पलॉय असोसिएशन और ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन ने इंडियन बैंक असोसिएशन से चिट्ठी लिखकर मदद मांगी है। नोटों की कमी के चलते ग्राहकों को संतुष्ट करना मुश्किल हो रहा है। अक्सर ग्राहक हंगामा करते हैं और गाली-गलौच पर उतर आते हैं। पेंशन और सैलरी का वक्त होने के चलते अगले दस दिन ज्यादा तनाव भरे होंगे।





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Tuesday, November 29, 2016

कालाधन के लिए आम माफी #PowerPoliticswithoutcasuewhatsoever कालाधन हो गया सफेद,अब देश हुआ गोरों का! कामरेड केसरिया चले क्यूबा ,क्रांति वहीं करेंगे! लखनऊ मा दीदी दहाड़े,मोदी हटायेंगे! इस कवायद का अंजाम कैसलैस इंडिया है या लेस कैश इंडिया है तो इसे कालाधन निकालने के लिए कालाधन के खिलाफ जिहाद कैसे कह सकते हैं? नोटबंदी का नतीजा अगर डिजिटल कैसलैस इंडिया है तो समझ लीजिये अब काले अछूतों,पिछड़ों,आदिवासियों और अल्प�

कालाधन के लिए आम माफी
#PowerPoliticswithoutcasuewhatsoever
कालाधन हो गया सफेद,अब देश हुआ गोरों का!
कामरेड केसरिया चले क्यूबा ,क्रांति वहीं करेंगे!
लखनऊ मा दीदी दहाड़े,मोदी हटायेंगे!
इस कवायद का अंजाम कैसलैस इंडिया है या लेस कैश इंडिया है तो इसे कालाधन निकालने के लिए कालाधन के खिलाफ जिहाद कैसे कह सकते हैं?
नोटबंदी का नतीजा अगर डिजिटल कैसलैस इंडिया है तो समझ लीजिये अब काले अछूतों,पिछड़ों,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का अब कोई देश नहीं है।वे आजीविका,उत्पादन प्रमाळी और बाजार से सीधे बेदखल है और यह कैसलैस या लेस कैश इंडिया नस्ली गोरों का देश है यानी ऐसा हिंदू राष्ट्र है जहां सारे के सारे बहुजन अर्थव्यवस्था से बाहर सीधे गैस चैंबर में धकेल दिये गये हैं।
संसदीय राजनीति इस नस्ली नरसंहार कार्यक्रम पर खामोश क्यों है?

पलाश विश्वास
यूपी के किसानों ने भारत के महामहिम राष्ट्रपति से मौत की भीख मांगी है।किसानों को अब इस देश में मौत ही मिलने वाली है।तो कारोबारियों को भी मौत के अलावा कुछ सुनहला नहीं मिलने वाला है।
पहले कानून बनाकर 30 लाख करोड़ रुपये सत्ता वर्ग के विदेशी ठिकानों पर सुरक्षित भेज दिये। उन्हें करों में राहत दी फिर नोटबंदी से पहले अपनी पार्टी के लिए देश भर में जमीनें खरीदीं और राष्ट्र के नाम रिकार्डेड भाषण दिया कि कालाधन निकालना है।लीक हुई नोटबंदी के तहत देश में खेती कारोबार इत्यादि को ठप करके मुक्तबाजार के नियमों और व्याकरण के खिलाफ उत्पादन और बाजार की गतिविधियां बंद करके चुनिंदा उद्योगपतियों को लाखों करोड़ का कर्ज माफ कर दिया।
देश की आम जनता ने कतारबद्ध होकर अपना सारा सफेद धन बैंकों में जमाकर कौड़ी कोड़ी के लिए मोहताज है और अपनी रोजमर्रे की बुनियादी सेवाओं और जरुरतों के लिए उन्हें रोज इंतजार करना होता है कि तामनाशाह का नया फरमान क्या निकलता है।
इस बीच कुल साढ़े आठ लाख की नकदी बैंकों में जमा हो गयी है,इसमें कितना कालाधन है,उसका कोई आंकड़ा नहीं है।बैंकों ने पैसे तो जनता से जमा कर लिया है लेकिन तानाशाह के फरमान के मुताबिक वे खुद दिवालिया हो गये हैं और जरुरत के मुताबिक कोई भुगतान करने की हालत में नहीं है।
अब वे सीना ठोंककर कह रहे हैं कैशलैस इंडिया या फिर लेसकैश इंडिया।रिजर्व बैक के गवर्नर दिवालिया बैंकों के हक में कैशलैस लेनदेन की गुहार लगा रहे हैं।
इस कवायद का अंजाम कैसलैस इंडिया है या लेस कैश इंडिया है तो इसे कालाधन निकालने के लिए कालाधन के खिलाफ जिहाद कैसे कह सकते हैं?
अब फिर कालाधन के लिए आम माफी का ऐलान है।
पचास फीसद टैक्स चुकाकर कालाधन सफेद कर सकते हैं।आम नौकरीपेशा लोगों को जब नाया वेतनमान मिलता है तो बकाया वेतन पिछली तारीख से लागू होने पर तीस फीसद तक का इनकम टैक्स भरना पड़ता है।जिनकी आय सबसे ज्यादा है,उन्हें साठ फीसद तक इनकाम टैक्स भरना पड़ता है तो उससे भी कम आधी रकम टैक्स में देकर बाकी रकम सफेद करने का बहुत बड़ा मौका है कालाधन के लिए।वैसे ज्यादातर कालधन तो पहले ही सफेद हो गया है।यह कर्जा माफी से बड़ा घोटाला है।
अब कालाधन के खिलाफ मुहिम के तहत आम लोगों को उनकी बचत बैंकों में जमा कराने के लिए उनके खिलाफ छापेमारी का जिहाद है।
फिर ऐसे माहौल में जब संसद में प्रधानमंत्री नोटबंदी पर बयान भी देने को तैयार नहीं है तो तनिक कल्पना करें कि कामरेड फिदेल कास्त्रो बातिस्ता सरकार के साथ सत्ता में साझेदारी करते हुए कभी विदेश यात्रा कर रहे हों।
कल्पना करें कि वे अमेरिकी राष्ट्रपतियों के न्यौते पर व्हाइट हाउस में मौज मस्ती करने पहुंचे हों।
कामरेड कास्त्रो के शोक संतप्त माकपा महासचिव सीताराम येचुरी वातानुकूलित राजधानी से संसद में सुनामी के मध्य़ केसरिया सिपाहसालर राजनाथ सिंह के साथ शोकयात्रा में शामिल होकर भारतीय जनता को उनका कर्मफल भोगने के लिए पीछे छोड़कर क्यूबा निकल रहे हैं।
शायद भारत में क्रांति हो न हो वे ट्विटर क्राति की जमीन पर खड़े वहीं क्रांति करेंगे।उनके साथ कामरेड राजा भी सहयात्री है।बाकी दलों के सांसद भी होंगे और अफवाह है कि दीदी के जिहाद से नाराज क्यूबा की शोकयात्रा के नजराने से तृणमूली सांसदों को वंचित कर दिया गया है।
तेभागा और खाद्य आंदोलन के बाद तीन राज्यों में सत्ता वर्चस्व हासिल करने से वाम राजनीति आम हड़ताल और बंद तक सीमाबद्ध हो गयी।सत्ता के दम पर हड़ताल और बंद की राजनीति।1991 से लेकर अबतक वाम राजनीति ने आर्तिक सुधार या मुक्तबाजार का अपनी राजनीतिक ताकत के मुताबिक कोई विरोध नहीं किया।
राजनीतिक मजबूरी के तहत राजनीतिक सिद्धांत और विचारधारा के मुताबिक सही राजनीति की रणनीति के तहत सांकेतिक विरोध करना ही वाम चरित्र बन गया है,जिसका महत्व किसी ट्वीट,फेसबुक पोस्ट या प्रेस बयान से तनिक ज्यादा नहीं है।
नोटबंदी के खिलाफ वाम विरोध भी सांकेतिक है।
सत्ता की राजनीति के मुताबिक है।उनके विरोध और ममता बनर्जी के विरोध में कोई फर्क नहीं है और वाम पक्ष और ममता बनर्जी एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं।न जनता के हक में न मोदी के खिलाफ।
बाकी विपक्ष का विरोध भी सांकेतिक है।
ममता बनर्जी नोटबंदी के तेइस दिन बाद जब आम लोगों ने अपने सारे नोट जमा करवा दिये हैं,पुराने नोटफिर बहाल करने का रागअलापते हुए मोदी को राजनीति से बाहर करने की जिहाद का ऐलान कर रही है।आम जनता की इतनी तकलीफों के बाद पुराने नोटों को बहाल करने की मांग करके वे किसका हित साध रही हैं।अब तक बंगाल में वामपक्ष के सफाये के लिए बंगाल के केसरियाकरण का हरसंभव चाकचौबंदइंतजाम करने के बाद वे किस तरह संघ परिवार का क्यों विरोध कर ही हैं,शारदा नारदा संदर्भ और प्रसंग में इस पर शोध जरुरी है।वामपक्ष का दिवालिया हाल है कि नोटबंदी के खिलाफ ममता दहाड़ रही हैं मैदान पर और य़ेचुरी राजनाथ सिंह के साथ क्यूबा जा रहे हैं।यह है विचारधारा और जमीनी राजनीति के बीच का बुनियादी फर्क।
1991 से लेकर अब तक आर्थिक सुधारों से लेकर आधार कार्ड तकका सर्वदलीय संसदीय सहमति की राजनीति के तहत सारे कायदे कानून बदले जाते रहे हैं और आज तो विपक्ष की मोर्चाबंदी के लिए कालाधन पर पचास फीसद टैक्स के साथ आम माफी का विधेयक भी लोकसभा में पारित हो गया है और राज्यसभा में अल्पमत होने के बावजूद विपक्ष के किसी न किसी खेमे के समर्थन से यह विधेयक कानून बन जायेगा।
खेती चौपट हो जाने के बाद निजीकरण और विनिवेश के अबाध पूंजी प्रवाह से देश बेचने का जो खुल्ला खेल फर्रूखाबादी जारी है,संसदीय राजनीति ने उसका कब और कितना विरोध किया है,इस पर भी शोध जरुरी है।
अपने अपने पक्ष की मौकापरस्त राजनीति के अलावा आम जनता की तकलीफों को वातानुकूलित अररबपति करोड़पति कारपोरेट कारिंदे राजनेताओं को कितनी परवाह है,इसपर बहस बेमतलब है।
इसके मुताबिक हकीकत यह है कि अर्थव्यवस्था चौपट हो जाने के बावदजूद संघ परिवार के हिंदुत्व एजंडे के नल्सी नरसंहार कार्यक्रम का ओबीसी ट्रंप कार्ट चल गया है।
महाराष्ट्र और गुजरात के निकायों के चुनावों में साफ हो गया है कि वोटों पर नोटबंदी का कोई असर नहीं हुआ है।नोटबंदी के नतीजे समझाने की कोई कवायद विपक्ष ने बेमतलब हो हल्ला के अलावा वैसे ही नहीं किया है जैसे परमाणु संधि के नतीजों पर मनमोहनके दोबारा जीतने के बाद वामपक्ष ने भूलकर भी चर्चा नहीं की है।
सिद्धांत या विचारधारा,राजनीति या अर्थशास्त्र के हिसाब से संसदीय राजनीति नहीं चलती।सत्ता के  दो ध्रूवों संघ परिवार या गांधी परिवार के साथ वक्त की नजाकत और वोटबंदी के गणित के हिसाब से बाजार और कारपोरेट के मौसम जलवायु तापमान के मुताबिक चलती है संसदीय राजनीति।
नोटबंदी का नतीजा अगर डिजिटल कैसलैस इंडिया है तो समझ लीजिये अब काले अछूतों,पिछड़ों,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का अब कोई देश नहीं है।
सारे बहुजन आजीविका,उत्पादन प्रणाली और बाजार से सीधे बेदखल हैं और यह कैसलैस या लेस कैश इंडिया नस्ली गोरों का देश है यानी ऐसा हिंदू राष्ट्र है जहां सारे के सारे बहुजन अर्थ व्यवस्था से बाहर सीधे गैस चैंबर में धकेल दिये गये हैं।
संसदीय राजनीति इस नस्ली नरसंहार कार्यक्रम पर खामोश क्यों है?
आपको भारत अमेरिकी परमाणु संधि का किस्सा तो याद होगा।जिसके विरोध में वामपक्ष ने मनमोहन सरकार से समर्थन वापस लिया था।लेकिन सरकार गिराने में नाकामी के बाद अगले चुनाव में फिर मनमोहन की जीत के बाद वामपक्ष ने कब और कहां उस संधि का विरोध किया है,बतायें।
क्या उन्होंने देश व्यापी जागरुकता अभियान चलाया?
कुड़नकुलम जलसत्याग्रह में वाम भूमिका क्या है?
उस संधि के बाद पूरे देश को परमाणु भट्टी में तब्दीलस कर दिया है,क्या इसके खिलाफ वामपक्ष ने कोई आंदोलन किया है,बतायें।
अमेरिका के बाद हर देश के साथ जो परमाणु समझौते हुए हैं,क्या उसका वामपक्ष ने कोई विरोध किया है।सारी ट्रेड यूनियनें उनकी और फिरभी मेहनतकशों के रोजगार और आजीविकता छीन जाने खिलाफ ,सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के खिलाफ सांकेतिक विरोध के अलावा वामपक्ष ने सचमुच का कोई जनांदोलन खड़ा किया हो तो बतायें।
जमीनी स्तर पर साम्यवादी तौर तरीके न अपनाने के कारण बंगाल,केरल और त्रिपुरा में बाकी देश की तुलना में सबसे तेज केसरियाकरण हुआ है और हाल यह है कि नोटबंदी आंदोलन की कमान भी वामपक्ष से ममता बनर्जी ने छीन ली है।
सत्ता वर्चस्व के लिए साम्यवाद को तिलांजली देकर जो नस्ली बंगाली राष्ट्रवाद को लेकर दुर्गापूजा संस्कृति के साथ कैडरतंत्र के तहत राजकाज चलाता रहा वामपक्ष, ममता बनर्जी उसी को और बढ़िया तरीके से लागू कर रही हैं। वामपक्ष बेदखल हो गया बंगाल से। नोटबंदी के खिलाफ आम हड़ताल को जनसमर्थन नहीं मिला है,बाकायदा प्रोस सम्मेलन बुलाकर लेफ्ट फ्रंट चेयरमैन विमान बोस ने इसका बाबुलंद ऐलान खुद कर दिया है।
भारत में रंगबिरंगे अनेक दल हैं।लेकिन सत्ता में भागीदारी के दो ध्रूव है संघ परिवार और गांधी परिवार।राज्यों में क्षत्रपों की अलग जमींदारी और रियासतें हैं।केंद्र में सत्ता में साझेदारी इन गदो परिवार में से किसी के साथ नत्थी होकर ही मिल सकती है।
1977 तक गांधी परिवार का एकाधिकार वर्चस्व रहा है भारत की सत्ता राजनीति पर और संघ परिवार का हिंदुत्व एजंडा को कांग्रेस के माध्यम से ही लागू किया जाता रहा है।
15 अगस्त 1947 से ही भारत हिंदू राष्ट्र है और भारत का संविधान के विपरीत समांतर शासन बहुजन जनता को जीवन के हर क्षेत्र में वंचित करने वाला मनुस्मृति अनुशासन का रहा है।
1977 में आपातकाल के कारण सत्ता और लोकतंत्र में संघ परिवार की घुसपैठ शुरु हुई जो सिखों के नरसंहार और बाबरी विध्वंस के बाद समांतर सत्ता में तब्दील है।
गांधी परिवार का नर्म हिंदुत्व अब संघ परिवार का गरम हिंदुत्व है।लेकिन दरअसल भारत में सत्ता का चरित्र कहीं बदला नही है।राजनीति या राष्ट्र का चरित्र बदला नहीं है।
सोवियत संघ के अवसान और खाड़ी युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था लेकिन सिरे से बदल गयी है और इस बदलाव के महानायक डा.मनमोहन सिंह रहे हैं।
16 मई 2014 के बाद अचानक भारत हिंदू राष्ट्र नहीं बना है और न भारत मुक्तबाजार कल्कि महाराज के राज्याभिषेक से बना है।इसे पहले मन ले तो बहस हो सकती है।15 अगस्त,1947 से हिंदू राष्ट्र है।
ये दोनों मुद्दे खास महत्वपूर्ण हैं।
1977 से लेकर 2011 तक भारतीय राजनीति में वामपक्ष केंद्र की सरकारें बनाने की सत्ता साझेदारी खेल में निर्णायक भूमिका निभाता रहा है।
1977 में लोकसभा चुनाव में वाम सहयोग से ही बंगाल में जनतादल को सीटें मिली थी तो फिर विश्वनाथ सिंह की सरकार को वामपक्ष और संघ परिवार दोनों का समर्थन रहा है।
सारी अल्पमत सरकारें और मनमोहन सिंह की पहली सरकार वाम समर्थन से चलती रही हैं।
नरसिंह राव के जमाने में या अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में नहीं भारत को मुक्तबाजार बनाने का काम डा.मनमोहन सिंह के जमाने में शुरु हुआ है और इसे अब अंजाम तक पहुंचा रहे हैं ओबीसी कल्कि महाराज।
संघ परिवार ने भारत की सत्ता हासिल करने के लिए अपने ब्राह्मण सिपाहसालारों को छोड़कर ओबीसी कार्ड अपनाया तो राममंदिर आंदोलन में भी बजरंगी इन्हीं ओबीसी समुदाय से सर्वाधिक हैं।
जाति वर्चस्व की रंगभेदी नीति वाले संघपरिवार बहुजनों के सफाये के लिए ओबीसी को नेतृत्व देने को तैयार हो गया और जाति का तिल्सिम तोड़ने के लिए वर्गीय ध्रूवीकरण का विकल्प चुनने की कोई जहमत वामपक्ष ने नहीं उठायी।
भारत के तमाम बुद्धिजीवियों में सबसे ज्यादा वाम बुद्धिजीवियों ने पुरस्कार पद सम्मान और विदेश यात्रा का लाभ उठाया है 16 मई 2014 तक।क्रांतिकारी विचारधारा के हो हल्ले के बाद वे कभी जनता के बीच नहीं गये तो किसानों और मजदूरों के संगठनों,छात्रों और महिलाओं के संगठनों में करोड़ों सदस्य होने के बावजूद जमीन पर किसी जनांदोलन का नेतृत्व संसदीय वाम ने नहीं की।
बंगाल,केरल और त्रिपुरा की राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल और उस सत्ता के बचाव की राजनीति बंगाली और मलयाली राष्ट्रीयता के आवाहन के साथ किया है वामपक्ष ने जो कुल मिलाकर हिंदुत्व राजनीति का दूसरा खतरनाक रुप हैं।
वामपक्ष ने जमींदारी हितों की हिफाजत में वाम पक्ष ने बंगाल,त्रिपुरा और केरल में जीवन के हर क्षेत्र में नस्ली वर्चस्व कायम रखा और बहुजनों को वाम राजनीतिक नेतृत्व देने से झिझकता ही नहीं रहा,बाकी भारत में वाम राजनीति को हाशिये पर रखने का काम भी इन्होंने खूब किया है और खास तौर पर हिंदी क्षेत्र को राजनीतिक नेतृत्व और प्रतिनिधित्व से इनने वंचित किया।
1977 से पहले तेभागा और खाद्य आंदोलन में,तेलगंना और श्रीकाकुलम,ढिमरी ब्लाक जनविद्रोहों में जो वामपक्ष सर्वहारा वर्ग के साथ उनके नेतृत्व में सत्ता से टकरा रहा था,1969 में बंगाल में सत्ता का स्वाद चखते ही वह सत्ता राजनीति में तब्दील होता रहा और वाम नेतृत्व के इसी विश्वास घात के खिलाफ बंगाल में नक्सल विद्रोह हुआ चारु मजुमदार के नेतृत्व में।
इस नक्सली आंदोलन का दमन भी माकपा ने कांग्रेस के साथ मिलजुलकर किया और तबसे लेकर अबतक वामपक्ष कांग्रेस से नत्थी रहा है।
आपातकाल के खिलाफ माकपा जरुर थी लेकिन बंगाल में आपातकाल के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं हुआ।
कमसकम उत्तरभारत के दक्षिणपंथी जैसे आपातकालका विरोध कर रहे थे,वैसा विरध वामपक्ष ने कतई नहीं किया और बहुसंख्य वामपंथी बुद्धिजीवी सीपीआई और रूस के बहाने आपातकाल से पहले,आपातकाल के दौरान और आपातकाल के बाद सत्ताा और नस्ली वर्चस्व का लाभ उठाते रहे और इन लोगों ने वाम नेतृत्व के साथ कदम से कदम बढ़ाकर भारत के बहुजनों को जीवन के हर क्षेत्र से वंचित करने का मनुस्मृति धर्म निभाया।
इसीलिए संघ परिवार का ओबीसी ट्रंप कार्ड का कोई जवाब वामपंथियों के पास नहीं है।
आरक्षणविरोधी आंदोलन के जरिये हर कीमत पर ओबीसी आरक्षण रोकने की कोशिश में भारतीय सत्ता की राजनीति के मंडल बनाम कमंडल ध्रूवीकरण करने वाले संघ परिवार ने राम की सौगंध खाते हुए वीपी सिंह का महिषासुर वध कर दिया और फिर भारत की सबसे बड़ी ओबीसी आबादी को अपनी पाली में कर लिया।
इस सत्ता समीकरण में दमन और उत्पीड़न,रंगभेदी नरसंहार के शिकार दलितों,आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का साथ वामपक्ष ने भी नहीं दिया।
इसीकी तार्किक परिणति यह सिलसिलेवार नरसंहार है।

भारतभर में वाम राजनीति के हाशिये पर चले जाने की वजह से फासिज्म का यह रंगभेदी राजकाज निरंकुश है।

Monday, November 28, 2016

#SystematicEthnicCleansingbytheGovernanceofFascistAparhteid इतनी सारी कम्युनिस्ट पार्टियां क्यों हैं भारत में? फिदेल कास्त्रो ने कामरेड ज्योति बसु से पूछा था उपभोक्ता जनता की कोई राजनीति नहीं है। उपभोक्ता जनता छप्पर फाड़ क्रयशक्ति के इंतजार में है और इस देश में ऐसी कोई राजनीति नहीं है जो उन्हें कायदे से समझा सकें कि छप्फर फाड़कर क्रयशक्ति नहीं,मौत बरसने वाली है। कमसकम भारते के कामरेडों की राजनीति ऐसी नहीं है। बाकी

#SystematicEthnicCleansingbytheGovernanceofFascistAparhteid

इतनी सारी कम्युनिस्ट पार्टियां क्यों हैं भारत में?

फिदेल कास्त्रो ने कामरेड ज्योति बसु से पूछा था

उपभोक्ता जनता की कोई राजनीति नहीं है।

उपभोक्ता जनता छप्पर फाड़ क्रयशक्ति के इंतजार में है और इस देश में ऐसी कोई राजनीति नहीं है जो उन्हें कायदे से समझा सकें कि छप्फर फाड़कर क्रयशक्ति नहीं,मौत बरसने वाली है।

कमसकम भारते के कामरेडों की राजनीति ऐसी नहीं है।

बाकी संघ परिवार और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं है।

पलाश विश्वास

केरल और त्रिपुरा को छोड़कर भारत बंद का कहीं कोई असर नहीं हुआ है।केरल और त्रिपुरा में वामपंथी इस वक्त सत्ता में हैं,तो वहां बंद कामयाब रहा।बाकी देश में नोटबंदी के खिलाफ इस बंद का या आक्रोश दिवस का कोई असर नहीं हुआ है।भारतबंद का आयोजन वामपक्ष की ओर से था तो अब कहा जा रहा है कि किसी ने भारत बंद का आवाहन नहीं किया था।बंगाल के कामरेडों ने फेसबुक और ट्विटर से निकलकर देश भर में आम हड़ताल की अपील जरुर की थी,जिसाक मतलब भारत बंद है,ऐसा उन्होंने हालांकि नहीं कहा था।लेकिन इस आम हड़ताल में नोटबंदी के खिलाफ गोलबंद विपक्ष का नोटबंदी विरोध की मोर्चा तितर बितर हो गया।अचानक इस मोर्चे की महानायिका बनने के फिराक में सबसे आगे निकली बंगाल की मुख्यमंत्री ने नोटबंदी के विरोध के बजाय बंगाल से वाम का नामोनिशान मिटाने की अपनी राजनीति के तहत बंद को नाकाम बनाने के लिए अपनी पूरी सत्ता लगा दी और साबित कर दिया कि बंगाल में वाम के साथ आवाम नहीं है।बिहार में लालू और नीतीश के रास्ते अलग हो गये।नीतीश ने लालू से कन्नी काटकर मोदी की नोटबंदी का समर्थन घोषित कर दिया और जल्द ही उनके फिर केसरिया हो जाने की संभावना है।मायावती या मुलायम या अरविंद केजरीवाल किसी ने मोर्चाबंदी को कोई कोशिश नहीं की।

साफ जाहिर है कि इस नोटबंदी का मतलब सुनियोजित नरसंहार है,जिसके तहत करोड़ों लोग उत्पादन प्रणाली, रोजगार, अर्थव्यवस्था और बाजार से बाहर कर दिये जायेंगे और आहिस्ते आहिस्ते भारतीय किसानों और मजदूरों की तरह वे आहिस्ते आहिस्ते बेमौत मारे जायेंगे।असंगठित क्षेत्र के और खुदरा बाजार के तमाम लोगों को मारने के लिए उनसे क्रयशक्ति छीन ली गयी है।

अब अर्थशास्त्री और उद्योग कारोबार के लोग भी कल्कि महाराज के इस दांव के खतरनाक नतीजों से डरने लगे हैं।विकास दर पलटवार करने जा रही है और मंदी का अलग खतरा है तो भारतीय मुद्रा और भारतीय बैंकिंग की कोई साख नहीं बची है।कालाधन निकालने के बजाये रिजर्व बैंक के गवर्नर ने अचानक मुखर होकर डिजिटल बनने की सलाह दी है नागरिकों को तो कल्कि महाराज का मकसद डिजिटल इंडिया कैशलैस इंडिया है,संघ औरसरकार के लोग खुलकर ऐसा कहने लगे हैं।तो मंकी बातों में नोटबंदी का न्यूनतम लक्ष्य लेसकैश और अंतिम लक्ष्य कैशलैस इंडिया बताया गया है जो दरअसल मेकिंग इन हिंदू इंडिया है।

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भारत में इतनी कम्युनिस्ट पार्टियां क्यों हैं?

फिदेल कास्त्रो ने कामरेड ज्योति बसु से पूछा था।ज्योतिबसु ने फिदेल कास्त्रो को क्या जबाव दिया था,इसका ब्यौरा नहीं मिला है।

अब चाहे तो हर कोई कामरेड कास्त्रो पिर हवाना सिगार के साथ इस देश की सरजमीं पर प्रगट हों तो जवाब दे सकता है।कामरेडवृंद यथास्थिति की संसदीय राजनीति में अपना अपना हिस्सा कादे से समझ बूझ लेना चाहते हैं और वे सबसे ज्यादा चाहते हैं कि भारत में सर्वहारा बहुजन का राज कभी न हो और रंगभेदी अन्याय और अराजकता का स्थाई मनुस्मृति बंदोबस्त बहाल रहे,इसलिए वे सर्वहारी बहुजन जनता की कोई पार्टी नहीं बनाना चाहते,बल्कि अना नस्ली वर्चस्व कायम रखने के लिए वामपंथ का रंग बिरंगा तमासा पेश करके आम जनता को वामविरोधी बनाये रखनेके लिए नूरा कुश्ती के लिए इतनी सारी कम्युलनिस्ट पार्टियां बना दी है कि आम जनता कभी अंदाजा ही नहीं लगा सकें कि कौन असल कम्युनिस्ट है और कौन फर्जी कम्युनिस्ट है।

फिदेल ने अमेरिकी की नाक पर बैठकर एक दो नहीं,कुल ग्यारह अमेरिकी राष्ट्रपतियों के हमलों को नाकाम करके मुक्तबाजार के मुकाबले न सिर्फ क्यूबा को साम्यावादी बनाये रखा,बल्कि पूरे लातिन अमेरिका और अफ्रीका की मोर्चाबंदी में कामयाब रहे।सोवियत यूनियन,इंधिरा गांधी और लाल चीन के अवसान के बाद भी।फिदेल और चेग्वेरा ने मुट्ठीभर साथियों के दम पर क्यूबा में क्रांति कर दी जबकि क्यूबा में गन्ना के सिवाय कुछ नहीं होता और वहां कोई संगठित क्षेत्र ही नहीं है।जनता को राजनीति का पाठ पढ़ाये बिना फिदेल ने क्रांति कर दी और करीब साठ साल तक लगातार अमेरिकी हमलों के बावजूद न क्यूबा और न लातिन अमेरिका को अमेरिकी उपनिवेश बनने दिया।

हमारे कामरेड करोडो़ं किसानों और करोड़ों मजदूरों,कर्मचारियों और छात्रों,लाखों प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं के बावजूद भारत में मेहनतकशों के हकहकूक की आवाज भी बुलंद नहीं कर सके क्योंकि वे सत्ता में साजेदार थे या सत्ता के लिए राजनीति कर रहे थे और उनका लक्ष्य न सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व था और न संविधान निर्माताओं के लक्ष्य समता और न्याय से उन्हें कुछ लेना देना था।

हम अब न सामाजिक प्राणी हैं और न हमारी कोई राजनीति है।समाज के बिना राजनीति असंभव है।

हमारा कोई देश भी नहीं है।देशभक्ति मुंहजुबानी है।वतन के नाम कुर्बान हो जानेवाला शहीदेआजम भगतसिंह,खुदीराम बोस, मास्टर सूर्यसेन या अपने लोगों के हकहकूक के लिए शहीद हो जाने वाले बिरसा मुंडा,सिधो कान्हो जैसा कोई कहीं नहीं है।हमारे देश में किसी लेनिन या माओ से तुंग या फिदेल कास्त्रो के जनमने के आसार है क्योंकि बच्चे अब हगीज के साथ सीमेंट के दड़बों में जनमते हैं और जमीन पर कहीं गलती से उनके पांव न पड़े,माटी से कोई उनका नाता न हो,तमाम माता पिता की ख्वाहिश यही होती है।हालांकि हमने किसी बच्चे को सोना या चांदी का चम्मच के साथ पैदा होते नहीं देखा।हगीज के साथ पैदा हो रहे बच्चों का चक्रव्यूह रोज हम बनते देख रहे हैं।जिनमें मुक्ति कीआकांक्षा कभी हो ही नहीं सकती क्योंकि उन्हें उनकी सुरक्षा की शर्तें घुट्टी में पिलायी जा रही है।

अब इस देश में कामयाब वहीं है जो विदेश जा बसता है।हमारी फिल्मों,टीवी सीरियल में भी स्वदेश कहीं नहीं है।जो कुछ है विदेश है और वहीं सशरीर स्वर्गवास का मोक्ष है।

हमारे सारे मेधावी लोग आप्रवासी हैं और हमारे तमाम कर्णधार,जनप्रतिनिधि,अफसरान,राष्ट्रीय रंगबिरेंगे नेता, राजनेता, अपराधी भी मुफ्त में आप्रवासी हैं।

इसकी वजह यह है कि हमारा राष्ट्रवाद चाहे जितना अंध हो,हमारा कोई राष्ट्र नहीं है।

हमारा जो कुछ है,वह मुक्तबाजार है।

हम नागरिक भी नहीं है।

हम खालिस उपभोक्ता है।

उपभोक्ता की कोई नागरिकता नहीं होती।

न उपभोक्ता का कोई राष्ट्र होता है।

उपभोक्ता का कोई परिवार भी नहीं होता।

न समाज होता है।

न मातृभाषा होती है और न संस्कृति होती है।

उसका कोई माध्यम नहीं होता।

न उसकी कोई विधा होती है।

उसका न कोई सृजन होता है।न उसका कोई उत्पादन होता है।

इसलिए मनुष्य अब सामाजिक प्राणी तो है ही नही,मनुष्य मनुष्य कितना बचा है,हमें वह भी नहीं मालूम है।

इसलिए हमने जो उपभोक्ता समाज बनाया है,उसके सारे मूल्यबोध और आदर्श क्रयशक्ति आधारित है।

जिनके पास क्रयशक्ति है,वे बल्ले हैं।

जिनकी कोई क्रयशक्ति नहीं है,उनकी भी बलिहारी।

वे भी उत्पादन और श्रम के पक्ष में नहीं है और न उनके बीच कोई उत्पादन संबंध है।

वे टकटकी बांधे छप्परफाड़ क्रयशक्ति के इंतजार में हैं और उपभोक्ता वस्तु में तब्दील हर चीज,हर सेवा यहां तक कि हर मनुष्य को खरीदकर राज करने के ख्वाब में अंधियारा के कारोबार में शामिल हैं और उन्हें यकीन है कि आजादी का कोई मतलब नहीं है।

गुलामी बड़ी काम की चीज है अगर भोग के सारे सामान खरीद लेने के लिए क्रयशक्ति हासिल हो जाये।

वे मुक्तबाजार को समावेशी बनाने के फिराक में हैं।

वे मुक्तबाजार में अपना हिस्सा चाहते हैं चाहे इसकी कोई भी कीमत अदा करनी पड़े।यही उनकी राजनीति है।

मसलन तमिलनाडु,केरल और हिमाचल प्रदेश में इसी राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी नागरिक हर पांच साल में सत्ता बदल डालते हैं तो उन्हें इससे कोई मतलब नहीं है कि शासक का चरित्र क्या है।तमिलनाडु में जो चाहिए राशनकार्ड पर उपलब्ध है तो हिमाचल में गरीबी कहीं नहीं है।किसी को कोई मतलब नहीं है कि उनका शासक कितना भ्रष्ट या गलत है।केरल के कामरेड भी हर पांच साल में दक्षिणपंथी हो जाते हैं।

कल्कि महाराज का आम जनता विरोध नहीं कर रही है क्योंकि आमं जनता को अपने अनुभव से मालूम है कि विपक्ष की राजनीति का उनके हितों से,उनके हक हकूक और उनकी तकलीफों से कोई लेना देना नहीं है।वे सत्ता की लड़ाई लड़ रहे हैं।

उपभोक्ता जनता को कोई सत्ता नहीं चाहिए।

उपभोक्ता जनता की कोई राजनीति नहीं है।

उपभोक्ता जनता छप्पर फाड़ क्रयशक्ति के इंतजार में है और इस देश में ऐसी कोई राजनीति नहीं है जो उन्हें कायदे से समझा सकें कि छप्फर फाड़कर क्रयशक्ति नहीं,मौत बरसने वाली है।

कमसकम भारते के कामरेडों की राजनीति ऐसी नहीं है।

बाकी संघ परिवार और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं है।

हमने अमेरिका से सावधाऩ अधूरा और अप्रकाशित छोड़कर कुछ कविताएं और कहानियां जरुर लिखी हैं,लेकिन उन्हें प्रकाशन के लिए नहीं भेजा है।न हमारी किताबें उसके बाद छपी हैं।हम अपने समय को संबोधित करते रहे हैं और करते रहेंगे।पिछले दिनों बसंतीपुर से भाई पद्दो ने कोलकाता आकर कहा कि उसकी योजना है कि हमारी किताबें छपवाने की उसकी योजना है।हमने उससे कह दिया कि किताबें छापना हमारा मकसद नहीं है और न छपना हमारा मकसद है।ऐसा मकसद होता तो दूसरों की तरह आर्डर सप्लाी करते हुए अपनी कड़की का इलाज कर लेता।दिनेशपुर में पिता के नाम अस्पताल बना है,मैंने देखा नहीं है।

पद्दो ने कहा कि पिताजी की नई मूर्ति लगी है।वहां पार्क बना है और लाखों का खर्च हुआ है।मेरे पिता तो अपने लिए दो दस रुपये तक खर्च नहीं करते थे।इसलिए मुझे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि मेरे पिताजी के नाम कौन इतना सारा खर्च उठा रहा है और क्यों ऐसा हो रहा है।

हमने दरअसल किसी कद्दू में तीर नहीं मारा है।

बंगाल में न बिजन भट्टाचार्य की जन्मशताब्दी मनायी न समर सेन की।बिजन भट्टचार्ये के नबान्न से भारत में इप्टा आंदोलन सुरु हुआ।समरसेन को खुद रवींद्रनाथ भविष्य का कवि मानते थे।रवींद्रनाथ के जीते जी वे प्रतिष्ठित कवि हो गये थे।

फिर उन्होंने कविताएं नहीं लिखीं।कविता कहानी से ज्यादा जरुरी उन्हें अपने वक्त को संबोधित करना लगा और बाहैसियत पत्रकार जिंदा रहे और मरे।हाल में उनका बाबू वृत्तांत प्रकाशित हुआ जो उनका रचना समग्र है।जिसमें उनकी कविताएं भी शामिल हैं।

हमने इस संकलन से समयांतर के लिए फ्रंटियर निकलने की कथा और आपातकाल में बुद्धिजीवियों की भूमिका का बाग्ला से हिंदी में अनुवाद किया है।

समर सेन ने सिलसिलेवार दिखाया है कि वाम बुद्धिजीवी इंदिरा जमाने में आपातकाल में भी कैसे विदेश यात्राएं कर रहे थे और कैसे वे हर कीमत पर इंदिर गांधी के आपातकाल का समर्थन कर रहे थे।

यह ब्यौरा पढ़ने के बाद बंगाली भद्र समाज और बुद्धिजीवियों का वाम अवसान बाद हुए कायाकल्प से कोई हैरानी नहीं होती।

जबतक बंगाल,केरल और त्रिपुरा में सत्ता बनी रही वामदलों की वाम बुद्धिजीवियों की दसों उंगलियां घी की कड़ाही में थीं और सर भी।वे तमाम विश्वविद्यालयों,अकादमियों और संस्थानों में बने हुए थे।आजादी के बाद संघियों की सत्ता कायम होने से ठीक पहले तक विदेश यात्रा हो या सरकारी खर्च पर स्वदेश भ्रमण,वामपंथी इसमे केद्र के सत्ता दल से जुड़े बुद्धिजीवियों के मुकाबले सैकड़ों मील आगे थे।लेकिन उनकी इस अति सक्रियता से इस देश में सरवहारा बहुजनों को क्या मिला और उनके हकहकूक की लड़ाई में ये वाम बुद्धिजीवी कितने सक्रिय थे,यह शोध का विषय है।

सारा शोर इन्हीं बुद्धिजीवियों का है,बाकी जनता खामोश है।अपना सत्यानाश होने के बावजूद जनता सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने को तैयार नहीं है क्योंकि कोई वैकल्पिक राजनीति की दिशा नहीं है।

अब पिद्दी न पिद्दी का शोरबा तमाम कामरेड अखबारों के पन्ने भरते नजर आ रहे हैं क्यूबा की क्रांति,फिदेल कास्त्रो,अेरिकी साम्राज्यावाद के खिलाफ मोर्चा बंदी और क्यूबा यात्रा के संस्मरमों के साथ।इन तमा लोगों से पूछना चाहिए कि कुल उन्नीस लोगों को लेकर क्यूबा,लातिन अमेरिका और अफ्रीका की तस्वीर फिदले कास्त्रो ने बदल दी तो तमाम रंग बिरंगी कम्युनिस्ट पार्टियों,करोडो़ं की सदस्य संख्या वाले किसान सभाओं,मजदूर संगठनों,छात्र युवा संगठनों,महिला संगठनों आदि आदि के साथ वे अब तक किस किस कद्दू में तीर मारते रहे हैं।

उन्हींका वह तीर अब कल्कि महाराज हैं।

वह कद्दू अब खंड विखंड भारतवर्ष नामक मृत्यु उपत्यका है।


Sunday, November 27, 2016

জালিয়াতি কারবারের আঁতুড়ঘর ব্রাহ্মন্যবাদঃ Saradindu Uddipan


জালিয়াতি কারবারের আঁতুড়ঘর ব্রাহ্মন্যবাদঃ 

Saradindu Uddipan

আকারে একেবারে খর্বাকৃতি হলেও "বামন" রাজা মহাবলীকে হত্যা করতে পারে তার প্রতীকী কাহিনী আমরা ভগবত পুরাণে পেয়েছি। এই কাহিনীতে গর্বভরে দাবী করা হয়েছে যে বামন আকারে ক্ষুদ্র হলেও কূটকৌশল এবং বুদ্ধিতে অপ্রতিরোধ্য দুর্জেয়। এখানে বামন ভারতবর্ষের ৩.৫% ব্রাহ্মণের প্রতিনিধি এবং রাজা মহাবলী মূল ভারতের ৯৬.৫% জনগণের শাসক। এই বিশাল সংখ্যক মানুষকে যে বুদ্ধি এবং কৌশলে গোলামীর জঞ্জির পরিয়ে একেবারে প্রসাদান্নভোগী বা উচ্ছিষ্টভোগী পর্যায়ে নামিয়ে আনতে হয় তার নাম ব্রাহ্মন্যবাদ। 
বেদ থেকে একেবারে খ্রিষ্টীয় বার শতক পর্যন্ত লেখা ব্রাহ্মন্যবাদি গ্রন্থগুলি সতর্ক ভাবে পাঠ করলেই আমরা বুঝতে পারব যে ব্রাহ্মন্যবাদ টিকে আছে সম্পূর্ণ আবেগ ও অন্ধবিশ্বাসের উপরে। আর এই অন্ধ বিশ্বাসকে টিকিয়ে রাখার জন্য ব্রাহ্মণেরা মানুষের শরীরে বেড়ি না পরিয়ে মস্তিষ্কতে ঠুলি বসিয়ে দিয়েছে এবং মানুষের আবেগকে ধর্মীয় রসায়নে জারিত করে ব্রাহ্মণের বানীকে অমৃত ভক্ষন এবং তাদের কাজগুলিকে দৈবশক্তির মহিমা হিসবে চিরস্থায়ী করে তুলেছে। তাই এখনো ভারতের মানুষ ব্রাহ্মণের জালিয়াতি, লাম্পট্য, মিথ্যাচার, শঠতা, ভেদনীতি, নরহত্যা, গুপ্তহত্যা এবং নৈরাজ্যকে অন্ধের মত অনুসরণ করে। দেব লীলা হিসেবে মেনে নেয়। 
ভারতের আরএসএস এবং তার তৈরি বিজেপি এই ব্রাহ্মন্যবাদী ব্রিগেড। এদের প্রতিটি পদক্ষেপেই রয়েছে এই জালিয়াতির প্রকৌশল। নৈরাজ্য, অরাজকতা, খুন, সন্ত্রাস, ধর্ষণ, মহামারী, মন্বন্তর এবং মহাপ্রলয়কে এরা এদের ধর্ম প্রতিষ্ঠার উপযুক্ত সন্ধিক্ষণ বলে মনে করে। তাই সুযোগ পেলেই, ক্ষমতা পেলেই ব্রাহ্মণ্যশক্তি ধর্মপরায়ণ হয়ে ওঠে। 
ভারতের বর্তমান প্রধানমন্ত্রী নরেন্দ্র দামোদর দাস মোদি এই ব্রাহ্মন্যবাদীদের পুতবারি সিঞ্চিত এবং নরমেধ যজ্ঞের মনোনীত কান্ডারী। তার গোটা জীবনের প্রোফাইলটাই জালিয়াতী প্রামাণ্য দলিল। তার চা বিক্রেতা ভূমিকা থেকে গত নভেম্বরের ৮/১১/২০১৬ তারিখে নোট বন্ধ ঘোষণার সমস্তটাই জালি কারবার। 
তিনি ভারতের দূরদর্শনের মাধ্যমে দেশের জনগণের প্রতি যে জরুরী ঘোষণা করেন যে আজ মধ্য রাত্রের পরে ভারতের ৫০০টাকা এবং ১০০০টাকার নোট আর বাজারে চলবে না। সেগুলি এখন ছেড়া কাগজের টুকরা। এই ঘোষণাকে দূরদর্শনে লাইভ টেলিকাস্ট হিসেবে দেখানো হয়। কিন্তু গবেষক এবং সাংবাদিক সত্যেন্দ্র মুরালীর করা RTI (PMOIN / R / 2016/53416) এবং DOEAF / R / 2016/80904 and MOIAB / R / 2016/80180 থেকে পরিষ্কার হয়ে যায় যে প্রধানমন্ত্রীর এই টেলিকাস্ট লাইভ ছিল না। ধরা পড়ে যাবার ভয়ে এখনো এই তথ্য জানানো হচ্ছেনা। ঘোরানো হচ্ছে এ দপ্তর থেকে সে দপ্তরে। প্রশ্ন উঠছে এর পরেও নৈতিক দায়িত্ব নিয়ে নরেন্দ্র মোদির দেশের এক মহান দপ্তরে পদ আঁকড়ে থাকা উচিৎ কি না?
নোট বদলের আসল উদ্দেশ্য কি? 
নোট বদলের পরের দিনই পরিস্থিতি মূল্যায়ন করে আমি দাবী করেছিলাম যে এটি মোদির নেতৃত্বে "ভারতের খাজানা লুট" এর সব থেকে বড় কেলেঙ্কারি। সেই দাবীর সমর্থন মিলেছে ভূতপূর্ব রিজার্ভ ব্যাঙ্কের গভর্নর এবং প্রাক্তন প্রধান মন্ত্রী মনোমোহন সিংহের কাছ থেকে। মোদিজীর এই প্রক্রিয়াকে 'Organised Loot, Legalised Plunder' হিসেবে আখ্যা দিয়েছেন। তিনি এও বলেছেন যে পৃথিবীতে এমন কোন দেশ নেই যেখানে মানুষ ব্যাংকে টাকা রাখবেন কিন্তু তুলতে পারবেন না। এটা জোর করে মানুষের অধিকার কেড়ে নেওয়া।

আসল ঘটনাঃ 
এই মহুর্তে দেশের ব্যাঙ্কে মোট অনাদায়ী লোন (Bad loan) এর পরিমান হলো ৬,০০,০০০ কোটি৷
কয়েক সপ্তাহ আগে Credit Rating Agency মোদী সরকারকে রিপোর্ট দেয় যে এই মহুর্তে ভারতীয় ব্যাঙ্ককে ১.২৫ লক্ষ কোটি Capital Infusion দরকার৷
জুলাই ২০১৬ তে ১৩টি ব্যাঙ্ককে ২৩,০০০ কোটি টাকা inject করা হয়৷
২০১৫ সালে অর্থমন্ত্রী অরুন জেঠলি বলেন যে আগামী ৪ বছরে (PSU) ব্যাঙ্ককে চাঙ্গা করতে আরো ৭০,০০০ কোটি দেওয়ার লক্ষ্যমাত্রা নিয়েছে কেন্দ্র৷

এই পরিমাণে টাকা বাড়াতে পারলেই শিল্পপতিদের লোন মাফ করা যাবে এবং আবার তাদের নতুন লোন দেওয়া যাবে!
ব্যাঙ্ককে টাকা বাড়ানো এবং প্রিয় শিল্পপতিদের ঋণ মকুব ক্রবার জন্য মোদী ২০০০টাকার নোট বাজারে এনে ৫০০টাকা এবং ১০০০টাকার নোট বাতিল বলে ঘোষণা করে দিলেন। ঘোষণা করলেন এই টাকা ব্যাঙ্কে রাখা যাবে কিন্তু যেমন খুশি টাকা তোলা যাবে না। সংসার চালানোর জন্য সামান্য টাকা তুলতে পারবেন।
মোদী সরকার, মোদিপন্থী এবং তাদের পোষা মিডিয়াগুলি ঢাক পেটাতে শুরু করলেন যে এটি কালো টাকা উদ্ধার, জাল টাকা বন্ধ করা এবং সন্ত্রাসবাদীদের আটকানোর জন্য সঠিক পদক্ষেপ যা ৭০ বছর ধরে কোন সরকার করে নি। এই প্রক্রিয়ায় মোদিজী ভারতকে একেবারে ডিজিটাল দুনিয়ার সর্বোচ্চ দেশ হিসেবে টক্কর দেবেন। 
RBI এর তথ্যানুযায়ী ১৪লক্ষ কোটি টাকার মধ্যে ৩৮% নোট ১০০০টাকার, আর ৪৯% নোট ৫০০ টাকার৷
'Bussiness World' এর তথ্যানুযায়ী দেশে 'Fake note' 0.002% of Rs 1,000 notes, and 0.009% of Rs 500 notes. 
কাদের দিয়ে খাজানা লুট করলেন মোদি ? 
১) ভারতের সেরা ১০০ জন Wilful ডিফল্টার দের মধ্যে State bank of India ৬৩ জনের ৭,০১৬ কোটি টাকা যার মধ্যে Kingfisher এর বিজয় মালিয়ার ১,২০১ কোটি টাকা মুকুব (Write off) করলো সরকার৷ 
২) রিলায়েন্স গ্রুপের মালিক অনিল আম্বানি মোদীর এবং বিজেপির খুব স্নেহভাজন৷তিনি দেশের সবচেয়ে বড়ো ডিফল্টার৷
টাকার পরিমান মার্চ ২০১৫ তে ১.২৫ লক্ষ কোটি৷
৩)বেদান্ত গ্রুপের মালিক অনিল আগরওয়াল৷ ধাতু ও খনির ব্যাবসায়ী দ্বিতীয় বৃহত্তম ডিফল্টার যার পরিমান ১.০৩ লক্ষ্য কোটি৷
৪) ইএসএসআর গ্রুপের মালিক রুইয়া ব্রাদার্স (শশী রুইয়া ও রবি রুইয়া) ডিফল্টার, ঋনের পরিমান ১.০১ লক্ষ কোটি৷
৫) আদানী গ্রুপের মালিক গৌতম আদানি, মোদীর খাস লোক৷ডিফল্টার ৯৬,০৩১ কোটি টাকা৷
৬)জয়াপি গ্রুপের মালিক মনোজ গৌড় ৭৫,১৬৩ কোটি টাকার ডিফ্লটার।
৭) #JSW Group: মালিক সজ্জন জিন্ডাল৷ডিফল্টার রাশি ৫৮,১৭১ কোটি 
৮) #GMR Group: মালিক প্রোমোটার GM Rao. যিনি দিল্লী T3 International Airprt Terminal বানালেন৷ ডিফল্টার রাশি ৪৬,৯৭৬ কোটি টাকা৷
৯) #Lanco Group: যার মালিক মধূসুদন রাও৷ডিফল্টার রাশির পরিমান ৪৭,১০২কোটি টাকা৷
১০) #Videocon Group: মালিক বেণুগোপাল৷ডিফল্টার রাশি ৪৫,৪০৫ কোটি টাকা৷
১১) #GVK Group: মালিক GVK Reddy৷ডিফল্টার ৩৩,৯৩৩ কোটি টাকা৷
১২) #Usha Ispat: ডিফল্টার ১৬,৯৭১ কোটি টাকা৷কোম্পানিটির বর্তমানে কোনো হদিস নেই৷একটি সংবাদ সংস্থা তদন্ত করতে গিয়ে দেখে যে কোম্পানীটি বন্ধ এবং রহস্যময় ভাবে কোম্পানীর মালিকের অস্তিত্বই নেই৷
১৩) #Lloyeds Steel: ডিফল্টার ৯,৪৭৮ কোটি টাকা৷কোম্পানীটি বর্তমানে অন্য একটি কোম্পানী অধিকৃত৷
১৪) #Hindustan Cables Ltd.:ডিফল্টার ৪,৯১৭ কোটি টাকা৷বর্তমানে ব্যাবসা গুটিয়ে নিয়েছে৷
১৫) #Hindustan Petroliam Mfg.Co.: ডিফল্টার ৩,৯২৮ কোটি টাকা৷বর্তমানে কোম্পানীটি বন্ধ৷
১৬) #Zoom Developer: ডিফল্টার ৩,৮৪৩ কোটি টাকা৷কোম্পানীটির অস্তিত্ব মেলেনি৷
১৭) #Prakash Industry: ডিফল্টার ৩,৬৬৫ কোটি টাকা৷কোম্পানী চালু অাছে৷
১৮) #Crane Software International: ডিফল্টার ৩,৫৮০ কোটি টাকা৷কোং চালু অাছে৷
১৯) #Prag Bosimi International: ডিফল্টার ৩,৫৫৮ কোটি টাকা৷কোং চালু অাছে৷
২০) #Kingfisher Airlines: ডিফল্টার ৩,২৫৯ কোটি টাকা৷এখানে বলে রাখা প্রয়োজন এটা PNB অর্থাৎ পাঞ্জাব ন্যাশনাল ব্যাঙ্ক থেকে নেওয়া৷অার অাগে যেটা মাফ হয়েছে বললাম সেটা শুধু মাত্র SBI অর্থাৎ state bank of india র ৬৩ জনের তারমধ্যে Kingfisher এর বিজয় মালিয়া একজন৷kingfisher aviation ekhon বন্ধ৷
২১) #Malvika Steel: ডিফল্টার ৩,০৫৭ কোটি টাকা৷কোম্পানীটি বন্ধ৷ 
(তথ্য সংগৃহীত)
ইতি মধ্যে মাননীয় রঘুরাম রাজন হিসেব করে দেখিয়েছেন যে এ পর্যন্ত ৪০ হাজার কোটি টাকার রাজস্য, ১.৫ লক্ষ কোটি জিডিপি এবং ৩০ কোটি শ্রমদিবস নষ্ট হয়েছে। আরো ৫০ দিন এই ভাবে চললে যে পরিমাণে অর্থনৈতিক ক্ষতি হবে তা কালো টাকার কয়েক গুন বেশি। 
প্রখ্যাত নোবেল জয়ী এবং অর্থনীতিবিদ মাননীয় অমর্ত্য সেন এই প্রক্রিয়াকে স্বৈরতান্ত্রিক হিসেবে আখ্যা দিয়েছেন। কোন অর্থনৈতিকই বিশেষজ্ঞ মোদির এই নোট কাণ্ডকে কালোটাকা ফিরিয়ে আনা বা নোটের জাল কারবার রোখার জন্য সঠিক পদক্ষেপ বলে স্বীকার করেন নি। বরং মানুষের উপর জোর করে চাপিয়ে দেওয়া এই অর্থনৈতিক অবরোধ দেশের চরম ক্ষতি এবং নৈরাজ্যের কারণ হিসেবে ব্যাখ্যা করেছেন। 
আমরা দাবী করছি মোদি আসলে ব্রাহ্মন্যবাদী নৈরাজ্যের বাহক। ব্রাহ্মণ্য ধর্ম অনুসারেই মোদির এই জালিয়াতি দেশে মহামারী এবং মন্বন্তর ডেকে আনবে। এখনি সতর্ক হওয়া দরকার।

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