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Friday, February 1, 2013

दुधवा की दुर्दशा के तीन दशक By देवेंद्र प्रकाश मिश्र

दुधवा की दुर्दशा के तीन दशक



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दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना दो फरवरी सन् 1977 में वन प्रबन्धन, वन्यजीवों के संरक्षण व संवर्द्धन के लिये की गई थी। इसके लिये बताए गए नियम तथा कानून यथार्थ में खरे नही उतर रहें हैं। सन् 2000-01 से लागू किये गये दस वर्षीय मैनेजमेंट प्लान के अनुसार चल रहे कार्यो के आशातीत् सफल परिणाम नहीं निकले हैं। वरन वन्यजीवों की संख्या लगातार घटती ही जा रही है। तमाम वन्यजीवों के साथ ही आमरूप से वनराज बाघ के होने वाले दर्शन अब धीरे-धीरे दुर्लभ हो चले हैं। जिससे लग रहा है कि वन्यजीवों तथा बाघों से भरपूर रहने वाला दुधवा पार्क का लगभग दो दशकपूर्व वाला स्वर्णकाल लोगों के लिये भविष्य में यादगार बनकर रह जायेगा। उधर जंगल के समीपवर्ती गांवों के नागरिक जो वन एवं वन्यजीवों के संरक्षण व सुरक्षा में आगे रहकर सहभागिता करते थे वही अब पार्क कानून की पाबंदियों से उनके दुश्मन बन गए हैं। ऐसी स्थिति में आवश्यक हो गया है कि नागरिकों के हितों को अनदेखी किए बगैर वनजीवन तथा मानव के संबंधों को नई परिभाषा दी जाए तभी सार्थक व दूरगामी परिणाम निकल सकते हैं।

सन् 1861 में अंगे्रजी हुकूमत में काष्ठ उत्पादन के लिये खैरीगढ़ परगना क्षेत्र के 303 वर्ग किमी जंगल को संरक्षित किया गया। तत्पश्चात सन 1886 में मिस्टर ब्राउन द्वारा बनाए गए वैज्ञानिक प्लान के अनुसार यहां वन प्रबंधन की  शुरूआत की गई। सन् 1905 में वन विभाग का नियंत्रण हो जाने के बाद विलुप्त प्रजाति बारहसिंघा के संरक्षण के लिये 15.7 वर्ग किमी वनक्षेत्र को सोनारीपुर सेंक्चुरी के नाम से संरक्षित किया गया। कालांतर में वन्यजीवों के संरक्षण को ध्यान में रखकर सरकार ने इस क्षेत्रफल को बढ़ाकर 212 वर्ग किमी क्षेत्रफल को दुधवा सेंक्चुरी के रूप में संरक्षित कर दिया। सन् 1977 दो फरवरी को सरकार ने वन, वन्यजीवों के साथ ही जैव-विविधता को संरक्षण देने के लिये दुधवा राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना कर दी। 634 वर्ग किमी दुधवा के वन क्षेत्रफल में किशनपुर वन्यजीव बिहार का 204 वर्ग किमी वनक्षेत्र शामिल करके 1987 में दुधवा टाइगर रिजर्व की स्थापना की गई। सन् 1994 में 66 वर्ग किमी आरक्षित वनक्षेत्र दक्षिणी बफर के रूप में जोड़ने के साथ ही कतर्नियाघाट वंयजीव प्रभाग को भी इसमें शामिल कर दिए जाने के बाद कुल 1000 वर्ग किमी  वन क्षेत्रफल दुधवा टाइगर रिजर्व के तहत संरक्षित हो गया है।

गौरतलब है कि वन तथा वन्यजीवों को संरक्षण व सुरक्षा देने के उद्देश्य से वनपक्षी एवं पशु संरक्षण अधिनियम 1912, भारतीय वन अधिनियम 1927 के बाद वन्यजीव-जंतु संरक्षण अधिनियम 1972 बनाया गया। इनके लगभग बेअसर रहने पर सन् 1991 एवं 2000 और इससे पूर्व भी अधिनियम में किये गये तमाम महत्वपूर्ण संशोधनों के बाद भी उत्तर प्रदेश में वन माफिया एवं वन्यजीवों तस्करों और शिकारियों की कारगुजारियां बेखौफ जारी हैं। इसके अतिरिक्त वन्यजीवों तथा वन की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिये राष्ट्रीय उद्यान के भी नियम कानून बने हुए हैं। जो बदलते परिवेश में अब बेमानी हो गए हैं और दुधवा राष्ट्रीय उद्यान की प्रगति में बाधक बन गए हैं।

राष्ट्रीय उद्यान के कानून एवं नियमों में वन्यजीवों का जीवनचक्र प्रभावित न हो इसलिए उनके वासस्थल क्षेत्र में मानव प्रवेश निषिद्ध करके उनको प्राकृतिक वातावरण उपलब्ध कराने की इसमें परिकल्पना की गई है। साथ ही जैव विविधता को संरक्षण देने के उद्देश्य से जंगल में जो जैसा है वैसा ही रहेगा उसमें परिवर्तन न किए जाने का कानून भी बनाया गया है। किताब में तो यह कानून अच्छा है लेकिन यथार्थ के आइने में यह नियम-कानून खरे नहीं उतर रहें हैं। इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियाँ विषम हैं और ग्रामीणजन राष्ट्रीय उद्यान बनने से पूर्व जंगल से वन उपज का लाभ लेते रहे जिस पर अब पूर्णतया प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके कारण वन तथा वन्यजीवों के संरक्षण में संवेदनशील हो भावात्मक रूप से जुड़े ग्रामीणों का स्वभाव इनके प्रति क्रूर हो गया है तथा वन उपज की चोरी को बढ़ावा भी मिला है। 

इसके अलावा अब बनाधिकार कानून 2007 लागू हो जाने के बाद बन उपज पर अपना  अधिकार हासिल करने की मांग भी बढ़ रही है साथ ही इस कानून को ढाल बनाकर  ग्रामीण जंगल से जबरन जलौनी लकड़ी, खागर, घास-फूस लाने में जुट गए हैं इससे  वन विभाग और ग्रामीणों के बीच टकराव के नए अध्याय जुड़ने लगे हैं, यह संघर्ष न वंयजीवों के हित में ठीक है और न ही मानव जाति के लिये। ऐसी स्थिति में जरूरी है कि इस तरह के कुछ ऐसे रास्ते निकाले जाएं जिनसे बन विभाग और ग्रामीणों के बीच चैड़ी हो रही खाई भी पट जाए और वंयजीव भी शांति से जंगल में रह सके।

दुधवा में सफलता पूर्वक चल रही गैण्डा पुनर्वासन परियोजना के तहत विचरण करने वाले 32 सदस्यीय गैण्डा परिवार के सदस्य और हाथी समेत तमाम वनपशु अक्सर जंगल के बाहर आकर कृषि फसलों को भारी क्षति पहुचाते हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि प्रदेश सरकार द्वारा गैण्डों सहित अन्य वनपशुओं द्वारा की जाने वाली फसल क्षति का उचित मुआवजा का निर्धारण नही किया गया है साथ ही वनपशुओं से होने वाली जानमाल की क्षति की वाजिब भरपाई न होने से ग्रामीणजन हमेशा वन्यजीवों को दुश्मन की निगाह से देखते हैं।

दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना हो जाने के बाद सन् 1983 से 1993 तक वन विशेषज्ञ विश्वभूषण गौड़ द्वारा बनायी गई वन प्रबंधन कार्य योजना पर यहां कार्य किया गया। इसमें वन एवं वंयजीव संरक्षण जैव विविधता की सुरक्षा के साथ ही काष्ठ उत्पादन को भी प्रमुखता दी गई थी। तत्पश्चात सन् 1993-94 से 2000-01 तक डॉ आरएल सिंह की कार्य योजना के तहत वन प्रंबधन किया गया। वर्तमान में यहां तैनात रहे तत्कालीन फील्ड निदेशक व अब सूबे के प्रमुख वन संरक्षक रूपक डे द्वारा तैयार की गई कार्ययोजना पर पूर्णतया वैज्ञानिक ढ़ंग से प्रबंधन किया जा रहा है। इस प्लान में वैज्ञानिक ढंग से प्रबंधन, वन्यजीवों की प्रगति आधारित अनुश्रवण, आद्र क्षेत्रों का विकास, फायर कंट्रोल एवं प्राकृतवास पर प्रतिकूल कारकों को चिन्हिृत कर उनके नियंत्रण पर विशेष जोर दिया गया है। दस साल का समय व्यतीत हो गया है लेकिन इस कार्य योजना के भी अनुकूल परिणाम नही निकले हैं। अलबत्ता अति संरक्षण के चलते मानव एवं वन्यजीवों के बीच की खाई चैड़ी ही होती जा रही है और इससे जंगल में वन्यजीवों की संख्या में भी गिरावट दर्ज हो रही है। जबकि वन विभाग लगातार कागजों में वन्यजीवों की संख्या को बढ़ाकर दर्शित करता आ रहा है। वन एवं वन्यजीवों के संरक्षण व सुरक्षा के लिये विश्व प्रकृति निधि-भारत द्वारा नई कार्ययोजना का प्रारूप तैयार किया जा रहा है। लेकिन इससे पूर्व यह भी जरूरी है कि अब तक जिन कार्ययोजनाओं पर काम किया है उनके लाभ हानि का भी अवलोकन और  समीक्षा की जाए ताकि परिणामों का भी पता चल सके। बदलते समय के साथ  कार्ययोजना को तैयार करने वालों ने अगर वन्यजीवों के साथ में मानव के हितों को भी ध्यान में रखकर कार्ययोजना तैयार नही की तो शायद इसका हस्र भी पूर्ववर्ती कार्ययोजनाओं की तरह ही होगा। इस बात से इन्कार नही किया जा सकता है।

दुधवा राष्ट्रीय उद्यान को स्थापित हुए पैंतिस साल व्यतीत हो गए हैं। इसके लाभ-हांनि का यदि आंकलन मोटे तौर पर किया जाए तो बचे-खुचे वन तथा वन्यजीवों की सुरक्षा व संरक्षण की दृष्टि से आवश्यकता के अनुरूप किया जा रहा वन प्रबंधन समय की मांग है और इसमें सभी को सहयोग भी देना चाहिए। लेकिन संरक्षण की अधिकता में मानवहित को नजरंदाज किया जा रहा है इससे आशातीत परिणाम नहीं निकल रहें हैं। वन विभाग तथा आमजनता के बीच बढ़ी दूरियां वन प्रबंधन के लिये हितकर नहीं कही जा सकती हैं। इसका प्रत्यक्ष परिणाम है पिछले पांच साल में वन्यजीवों की लगातार घटती संख्या है। पार्क स्थापना से पूर्व जब जंगल में मानव प्रवेश निषेध नहीं था तब घास-फूस, जलौनी लकड़ी आदि वन उपज का लाभ ग्रामीणों को दिया जाता था अब इसे ग्रासलैण्ड मैनेजमेन्ट के तहत जलाया जाता है। इससे जमीन पर रेंगने वाले जीव-जंतु जलकर मर जाते हैं तथा कीमती लकड़ी जिसे बेंचकर राजस्व प्राप्त किया जा सकता है वह भी कोयला बन जाती है। वन विभाग संरक्षित वन क्षेत्र को पूर्णतया निषिद्ध बनाने के प्रयास में लगा हुआ है। इससे प्राकृतिक परिस्थितियां तो उत्पन्न हो जाएगीं। किंतु जो परिणाम अब तक नही निकल पाए हैं इससे सार्थक दूरगामी परिणाम क्या निकल पाएगें। इस पर सवालिया निशन पूर्ववत् लगा हुआ है। बढ़ती जनसंख्या, बदलते परिवेश एवं विषम परिस्थितियों में यह आवश्यक हो गया है कि अब वन एवं वन्यजीवों तथा मानव के संबंधों को नई परिभाषा दी जाए जिससे मानव का भावात्मक लगाव वन्यजीवों के प्रति पैदा हो सके। इसको नजरदंाज करके उठाए गए कदम फलदायक कदापि नहीं होगें।

महिलाओं को नंगा करना यौन अपराध नहीं!

महिलाओं को नंगा करना यौन अपराध नहीं!



नवेन्दु कुमार

sexual-harassment-at-workमहिलाओं की सुरक्षा और रेप जैसे घिनौने अपराध के लिए कानूनी सख्ती किए जाने की मांग तेज हो रही है। लेकिन गृह मंत्रालय की नजर में किसी लड़की या महिला का पीछा करना और कपड़े उतारना यौन अपराध की श्रेणी में नहीं आते हैं।

मंत्रालय का तर्क है कि इन्हें कोर्ट में परिभाषित करना और साबित करना कठिन होता है। इसलिए सरकार ने नए 'आपराधिक कानून संशोधन बिल-2012' में पीछा करने, कपड़े उतारने, नग्न परेड कराने और बाल मुंडवाने को यौन अपराध की अलग श्रेणी में नहीं रखने का फैसला किया है। मंत्रालय का कहना है कि पीछा करने, कपड़े उतारने जैसे कृत्यों पर उच्चाधिकार प्राप्त कमेटी में विचार किया गया, जिसमें यह राय बनी कि ऐसे अपराधों को साबित करना मुश्किल है, इसलिए नए बिल में इसे शामिल न किया जाए। प्रताडना इत्यादि को परिभाषित करना कठिन और अदालत में स्थापित करना मुश्किल है, इसलिए इन्हें शामिल नहीं किया जा सकता।

नए बिल में महिला संगठनों की इस सिफारिश को भी दरकिनार कर दिया गया है कि यदि महिलाओं के प्रति अपराध सरकारी अधिकारियों द्वारा किया गया हो तो उच्च अधिकारियों और संस्थान को उत्तरदायी ठहराया जाये।

(वरिष्ठ पत्रकार नवेन्दु कुमार मौर्य टीवी के राजनीतिक संपादक एवं समाचार प्रमुख हैं)


मरते हाथी बेघर होते आदिवासी

मरते हाथी बेघर होते आदिवासी



छत्तीसगढ़ सरकार की दोहरी नाकामी 

गरीब आदिवासियों की बस्तियां मलबे में तब्दील हो चुकी हैं. वे अब वन विभाग द्वारा बनाए गये अस्थायी कैंपों में शरण लिए हुए हैं. जंगली इलाकों में जो आदिवासी बस्तियां हैं सरकार ने उनके पुर्नवास के लिए जमीन के पट्टे दिए हैं. लेकिन आदिवासी मातृभूमि का मोह नहीं छोड़ पा रहे...


संजय स्वदेश

विकास के नाम पर योजनाओं की आड़ लेकर गरीब-आदिवासियों के हटाने और उनके पुर्नवास को लेकर संघर्ष की खबर कोई खबर नहीं हैं. बेघर होने पर सरकार से संघर्ष के तरीके की रोचकता के अनुसार ऐसी खबरों को मीडिया में जगह मिल जाती है, लेकिन उस स्थिति में क्या जब विस्थापन करने वाली सरकार और भूमाफिया नहीं, बल्कि मूक जंगली पशु हों.

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छत्तीसगढ़ के जशपुर, कोरबा, रायगढ़, सूरजपुर, सरगुजा और बलरामपुर के जंगल से सटे अनेक ऐसे गांव हैं, जहां रहने वाले आदिवासियों को हाथियों के झुंड ने विस्थापित होने पर मजबूर कर दिया है. जैसे-जैसे जंगल कटे आदिवासी जगलों के पास सिमटते गए. मूक जानवर समझते हैं कि यह मानव उनके घर में घुसपैठ कर रहे हैं, इसलिए वे झुण्ड में आते हैं और तोड़फोड़ कर चले जाते हैं. इतना ही नहीं, इसमें कई जानें भी गई हैं.

आदमी और जानवरों की जंग में पिछले पांच वर्ष में सौ से भी ज्यादा लोगों की जानें जा चुकी हैं. जान जाने पर वन विभाग महज मुआवजा देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है. वन विभाग के मुआवजे के आंकड़े के अनुसार ऐसे मामलों में अब तक सवा सौ लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं और इससे कहीं ज्यादा लोग विकलांग हो चुके हैं. सैकड़ों मवेशी भी मारे जा चुके हैं.

ऐसा नहीं कि यह संघर्ष एकतरफा है. इस संघर्ष में करीब पांच साल के दौरान सवा सौ हाथियों की भी मौत हुई है. कई हाथी घायल होने के बाद संक्रमण फैलने से मरे हैं. वन विभाग के अनुसार धर्मजयगढ़ क्षेत्र में ही पिछले पांच वर्ष में 17 हाथियों की मौत हो चुकी है. हाथियों से बचने के लिए लोग शिकारियों का तरीका अपनाते हैं. वे हाई वोल्ट दौड़ते करंट वाले नंगे तार हाथियों के आवागमन की राम में बिछा देते हैं, लिहाजा, हाथियों की अधिकांश मौत बिजली के करंट से ही हुई है.

इस संघर्ष से गरीब आदिवासियों की बस्तियां मलबे में बदल चुकी है. वे अब वन विभाग द्वारा बनाए गये स्थायी कैंपों में शरण लिए हुए हैं. मजेदार बात यह है कि जंगली इलाकों में जो आदिवासी बस्तियां हैं सरकार ने उनके पुर्नवास के लिए जमीन के पट्टे दे दिए हैं. लेकिन ये आदिवासी अपनी मातृभूमि का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं. ये हर खतरे और संघर्ष के बाद भी अपनी बस्ती छोड़ कर नहीं जाना चाहते.

आदिवासी बस्ती में रहने वाले 47 वर्षीय चरण कहते हैं 'सरकार ने जमीन के अधिकार दे दिए हैं, लेकिन उसका क्या उपयोग. जहां बचपन से खेलते-कूदते जवान हुए अब जिंदगी के अंतिम समय में कहीं और क्यों जाएं.' यदि जंगल नहीं कटता तो यह हालात नहीं होते.'

आदिवासियों की इस बेबसी का सरकार स्थाई समाधान नहीं निकाल पाई है. ठोस पुर्नवास के लिए सरकार की जो नीति रही है वह संतोषजनक नहीं है. हाल में अब हाथियों के लिए कॉरीडोर बनाने का निर्णय लिया गया है. इसके लिए तीन अभ्यारण्यों को जोड़ा जाएगा, लेकिन जानकार कहते हैं कि यह योजना भी अव्यावहारिक लग रही है. जंगलों में बसी बस्तियों को हटाकर कारीडोर बनाना संभव नहीं. जहां जंगल था, वहां अब खेत और बस्तियां बन गर्इं हैं.

जब हजारों एकड़ के जंगल कट गए, तब भी हाथियों के बारे में किसी ने नहीं सोचा. हाथियों का कॉरीडोर बनने की प्रक्रिया अभी कागजों पर है. झारखंड,ओडिशा और मध्यप्रदेश की सीमाओं के जंगलों से घिरे होने के कारण हाथियों के लिए यह जगह अनुकूल रही है. जैसे-जैसे जगल कटे हैं, हाथियों का घर सिमटता गया है.

ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोग दिन रात कड़ी मेहनत कर फसल तैयार करते हैं, लेकिन फसल पकते ही हर वर्ष जंगली हाथी इन्हें अपने पैरों तले रौंदकर चौपट कर देते हैं. हाथियों ने जनवरी से दिसंबर तक 2961 ग्रामीणों की फसल चौपट की. कोरबा वन मंडल में हाथियों का बसेरा है. बेहतर रहवास व भोजन की पर्याप्त उपलब्धता के कारण हाथियों का झुण्ड करतला, कुदमुरा, बालको, कोरबा वन परिक्षेत्र में विचरण करता रहता है. हाथियों का यह झुंड ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर फसल को हानि पहुंचा रहा है.

ग्रामीणों ने कड़ी मेहनत कर अपने खेतों में धान रोपा था कि नवंबर में फसल काटकर धान को बेचकर पूरे वर्ष भर अपना गुजर- बसर करेंगे, लेकिन पिछले कई वर्षों से जंगली हाथी इन ग्रामीणों की मेहनत पर पानी फेर देते हैं. वर्ष 2012 के आंकड़ों पर गौर करें तो दिसंबर के महीने में हाथियों ने वनांचल क्षेत्र में जमकर उत्पात मचाते हुए 1321 ग्रामीणों की फसल को चौपट किया. इसी तरह फरवरी के महीने में 1310 कृषकों की फसल को अपने पैरों तले रौंद दिया है. वर्ष 2012 के जनवरी से दिसंबर तक हाथियों ने कुल 2961 ग्रामीणों की फसल को चट किया. मगर ग्रामीणों को मुआवजे के रूप में वन विभाग ने मात्र 2 लाख 30 हजार 925 रूपए बांटे.

हालाँकि कोरबा वन मंडल में हाथी रहवास के लिए बेहतर योजना बनाई गई, जिसके तहत वनविभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों की अलग से टीम बनाई गई है. इसका नाम हाथी मित्रदल रखा गया है. यह ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रमण कर ग्रामीणों को हाथी से बचाव की जानकारी देता है. साथ ही हाथियों को खदेड़ने का कार्य करता है. कुदमुरा, करतला व कोरबा वन परिक्षेत्र हाथियों का पसंदीदा इलाका है. पिछले दो दशकों से हाथियों का इस क्षेत्र में लगातार आना जाना लगा रहता है. पिछले कुछ वर्षों में हाथियों ने इन परिक्षेत्रों में जमकर जनहानि पहुंचाई है.

बारिश के सीजन में नए कोपल आते ही हाथी इन ग्रामीण क्षेत्रों की ओर खींचे चले आते हैं. हाथियों को ग्रामीण क्षेत्रों में घुसने से रोकने जंगल में बांस से सघन करने के लिए वर्ष 2011 में 100 हेक्टेयर में 40 हजार पौधे रोपे गए थे. अगर वन विभाग की यह योजना सफल होती है तो ग्रामीणों की जान-माल की सुरक्षा भी हो सकती है. बांस हाथियों का पसंदीदा आहार है. इन पौधों का रोपण कोरबा, करतला व कुदमुरा वन परिक्षेत्र के अंतर्गत किया गया है. 200 हेक्टेयर में 80 हजार पौधों की रोपणी कुछ वर्ष पूर्व की गई थी. जो अब सघन वन का रूप ले चुकी है.

sanjay-swadeshसंजय स्वदेश समाचार विस्फोट के संपादक हैं.

जीवनानन्द दास और सुकान्त भट्टाचार्य की कवितायें


जीवनानन्द दास और सुकान्त भट्टाचार्य की कवितायें

जीवनानन्द दास

वनलता सेन
हजार वर्षों से मैं मुसाफिर हूँ पृथ्वी की राहों का,
सिंहल समुद्र से रात के अँधेरे में मलय-सागर तक
बहुत घूमा हूँ मैं; बिम्बिसार और अशोक के धूसर जगत में
भी था मैं; और सुदूर अन्धकार में डूबी विदर्भ नगरी में;
मैं थका हुआ प्राणी एक, चारों ओर जीवन के सागर की लहरों का फेन,
मुझे दो घड़ी शान्ति दे गयी थी नाटोर की बनलता सेन !

केश उसके जाने कब के विदिशा की 
निशा के अन्धकार से हो गये एकाकार,
मुख उसका श्रावस्ती की नक्काशी में; 
सुदूर समुद्र के पार खो कर पतवार 
जो नाविक दिशा भूल चुका है
वह जैसे निहारता है हरी घास के प्रदेश दालचीनी के द्वीप में,
वैसे ही देखा है मैंने उसे अन्धकार में; कहा उसने -- कहाँ रहे इतने दिन ?
पक्षी के नीड़ सरीखी आँखें उठा कर बोली नाटोर की बनलता सेन।

समस्त दिनों के अन्त में शिशिर के शब्द की तरह 
आती है सन्ध्या; डैनों से धूप की गन्ध को झाड़ देती है चील;
पृथ्वी के सब रंग बुझ जाने पर पाण्डुलिपि करती है आयोजन
जब कहानी के लिए जुगनुओं के रंग झिलमिलाते हैं;
घर आते हैं पाखी सब -- सारी नदियाँ -- 
चुकता होता है इस जीवन का सब लेन-देन
रहता है केवल अन्धकार, सम्मुख रहती है केवल बनलता सेन।

हज़ार वर्ष सिर्फ़ खेलती है
हज़ार वर्ष सिर्फ़ खेलती है अन्धकार में जुगनुओं की तरह;
चारों ओर पिरामिड; कफ़नों की गन्ध; 
रेत के विस्तार पर चाँदनी; खजूरों की छाया यहाँ वहाँ
भग्न स्तम्भ की तरह; असीरया -- रुका हुआ मृत, म्लान;
हमारे शरीरों में परिरक्षित शवों की गन्ध -- 
पूरा हो चुका है जीवन का लेन-देन
'याद है ?' उसने स्मरण कराया, किया याद मैंने केवल 'बनलता सेन।'

सुकान्त भट्टाचार्य

इस नवान्न में
इस हेमन्त में धान की कटाई होगी
फिर ख़ाली खलिहान से फ़सल की बाढ़ आयेगी
पौष के उत्सव में प्राणों के कोलाहल से भरेगा श्मशान-सा नीरव गाँव
फिर भी इस हाथ से हंसिया उठाते रुलाई छूटती है
हलकी हवा में बीती हुई यादों को भूलना कठिन है
पिछले हेमन्त में मर गया है भाई, छोड़ गयी है बहन,
राहों-मैदानों में, मड़ई में मरे हैं इतने परिजन,
अपने हाथों से खेत में धान बोना,
व्यर्थ ही धूल में लुटाया है सोना,
किसी के भी घर धान उठाने का शुभ क्षण नहीं आया -
फ़सल के अत्यन्त घनिष्ठ हैं मेरे-तुम्हारे खेत।
इस बार तेज़ नयी हवा में 
जययात्रा की ध्वनि तैरती हुई आती है,
पीछे मृत्यु की क्षति का ख़ामोश बयान -
इस हेमन्त में फ़सलें पूछती हैं : कहाँ हैं अपने जन ?
वे क्या सिर्फ़ छिपे रहेंगे, 
अक्षमता की ग्लानि को ढँकेंगे,
प्राणों के बदले किया है जिन्होंने विरोध का उच्चारण ?

इस नवान्न में क्या वंचितों को नहीं मिलेगा निमन्त्रण?

बयान
अन्त में हमारे सोने के देश में उतरता है अकाल,
जुटती है भीड़ उजड़े हुए नगर और गाँव में
अकाल का ज़िन्दा जुलूस
हर भूखा जीव ढो कर ले आता है अनिवार्य समता।

आहार के अन्वेषण में हर प्राणी के मन में है आदिम आग्रह
हर रास्ते पर होता है हर रोज़ नंगा समारोह
भूख ने डाला है घेरा रास्ते के दोनों ओर,
विषाक्त होती है हवा यहाँ-वहाँ व्यर्थ की लम्बी साँसों से
मध्यवर्ग का धूर्त सुख धीरे-धीरे होता है आवरणविहीन
बुरे दिनों की घोषणा करता है नि:शब्द।
सड़कों पर झुण्ड-दर-झुण्ड डोलती हुई चलती है कंगालों की शोभा-यात्रा
आतंकित अन्त:पुरों से उठती है दुर्भिक्ष की गूँज।
हर दरवाज़े पर बेचैन उपवासी प्रत्याशियों के दल, 
निष्फल प्रार्थना-क्लान्त, भूख ही है अन्तिम सम्बल;
राजपथ पर देख कर लाशों को भरी दोपहरी में
विस्मय होता है अनभ्यस्त अँखों को।
लेकिन इस देश में आज हमला करता है ख़ूँख़ार दुश्मन,
असंख्य मौतों का स्रोत खींचता है प्राणों को जड़ से
हर रोज़ अन्यायी आघात करता है जराग्रस्त विदेशी शासन,
क्षीणायु कुण्डली में नहीं है ध्वंस-गर्भ के संकट का नाश।
सहसा देर गयी रात में देशद्रोही हत्यारे के हाथों में
देशप्रेम से दीप्त प्राण ढालते हैं अपना रक्त, जिसका साक्षी है सूरज;
फिर भी प्रतिज्ञा तैरती है हवा में अकेले,
यहाँ चालीस करोड़ अब भी जीवित हैं,
भारत भूमि पर गला हुआ सूरज झरता है आज -
दिग-दिगन्त में उठ रही है आवाज़,
रक्त में सु़र्ख टटकी हुई लाली भर दो,
रात की गहरी टहनी से तोड़ लाओ खिली हुई सुबह 
उद्धत प्राणों के वेग से मुखर है आज मेरा यह देश,
मेरे उध्वस्त प्राणों में आया है आज दृढ़ता का निर्देश।
आज मज़दूर भाई देश भर में जान हथेली पर लिये
कारख़ाने-कारख़ाने में उठा रहे तान।
भूखा किसान आज हल के नुकीले फाल से 
निर्भय हो रचना करता है जंगी कविताएँ इस माटी के वक्ष पर।
आज दूर से ही आसन्न मुक्ति की ताक में है शिकारी,
इस देश का भण्डार जानता हूँ भर देगा नया यूक्रेन।
इसीलिए मेरे निरन्न देश में है आज उद्धत जिहाद,
टलमल हो रहे दुर्दिन थरथराती है जर्जर बुनियाद।
इसीलिए सुनता हूँ रक्त के स्रोतत में आहट
विक्षुब्ध टाइ़फून-मत्त चंचल धमनी की।
सुनता हूँ बार-बार विपन्न पृथ्वी की पुकार,
हमारी मज़बूत मुट्ठियाँ उत्तर दें उसे आज।
वापस हों मौत के परवाने द्वार से,
व्यर्थ हों दुरभिसन्धियाँ लगातार जवाबी मार से।

अनुवाद - नीलाभ

सुनिया बाई की मौत

सुनिया बाई की मौत



किसानों के खिलाफ एके-47 का प्रयोग 

यह घटनाएं मध्य प्रदेश सरकार के कल्याणकारी होने के नाकाब को हटाने के लिए नाकाफी हैं. मध्य प्रदेश में जबरन भूमि अधिकग्रहण और उससे जुड़े दमन की दास्तां का मामला यहीं नहीं थमता...


वरुण शैलेश

सुनिया बाई की मौत खबर नहीं बनी. पिछले नवंबर में इस पीड़ादायक घटना के दौरान प्रत्यक्ष विदेश निवेश की सीमा बढ़ाने, विकास दर को मजबूत करने और कसाब को फांसी देने के इर्द गिर्द सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष की राजनीति, यहां तक कि अखबारों, समाचार चैनलों की खबरें भी यहीं केंद्रित रहीं.

farmers-agitationकिसी बात के खबर होने के जो पैमाने गढ़े गये हैं, उसमें सुनिया बाई का नाम क्या इसीलिए शामिल नहीं हो पाया कि वे नागरिकों की जमीन छीने जाने के खिलाफ थीं. या कि सरकार उन्हें विकास की राह में रोड़ा मानती थी.

सुनिया बाई मध्य प्रदेश में कटनी जिले के बुजबुजा और डोकरिया गांव के किसानों के लिए संघर्ष कर रही थीं. मध्य प्रदेश सरकार से 24 नवंबर, 2009 को हुए समझौते के आधार पर वेलस्पन नाम की कंपनी इन गांवों में 1980मेगावाट क्षमता की ग्रीनफील्ड ताप विद्युत परियोजना लगाना चाहती है. सरकार इसके लिए दो हजार एकड़ जमीन देने के लिए राजी थी. जिसमें 1400 एकड़ जमीन का बंदोबस्त हो पाया है. इसमें 800 एकड़ सरकारी जमीन शामिल है. बाकी 600 एकड़ जमीन किसानों से अधिग्रहीत की जा रही है, जिसका किसान विरोध कर रहे हैं.

जमीन अधिग्रहण का विरोध करने की वजह से वे प्रशासन के निशानें पर आ गयीं. प्रशासन की प्रताड़ना से आजिज आकर सुनिया बाई ने खुदकुशी का रास्ता चुना. लेकिन पुलिस को सुनिया बाई की मौत से उपजा असंतोष कानून व्यवस्था के लिए खतरा का भूत नजर आ रहा था. घटना से क्षुब्ध प्रदर्शन कर रहे किसानों से पुलिस ने सुनिया बाई के शव को जबरन छीनकर अंतिम संस्कार कर दिया. दरअसल, गांव वाले जमीन अधिग्रहण को लेकर चल रहे आंदोलन के दौरान सुनिया बाई को धमकी देने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे थे.

लोकतांत्रिक देश में नागरिक सर्वोच्च होता है. जबकि भारत को दुनिया का सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में स्थापित किया जाता रहा है. मगर नौकरशाही की हनक रखने वाले सवालों के घेरे से बाहर हैं. जिनके लिए महिला किसान के शव का सम्मान करना उनकी खोखली धौंस के खिलाफ है. देश में किसानों विशेष तौर पर आदिवासियों के प्रति केंद्र समेत राज्य सरकारों के रुख की कहानियां कुछ और ही बयां कर रही हैं. तंत्र दिन-ब-दिन दमनकारी रुख अख्तियार करता जा रहा है. इसकी बानगी मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग की एक जांच रिपोर्ट भी पेश करती है.

रिपोर्ट बताती है कि राज्य के रायसेन जिले के बरेली में आंदोलन कर रहे किसानों के खिलाफ एके-47 और पिस्तौल का इस्तेमाल हुआ. साथ ही जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग की बात भी सामने आई. पिछले वर्ष सात मई को बरेली में किसान बारदाना को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे उसी दौरान हुई पुलिस की गोलीबारी का निशाना किसान हरि सिंह बने. आयोग ने इस मामले को लेकर जिला कलेक्टर मोहन लाल मीणा समेत विभिन्न अफसरों को तलब भी कर चुका है.

क्या यह घटनाएं मध्य प्रदेश सरकार के कल्याणकारी होने के नाकाब को हटाने के लिए नाकाफी हैं. मध्य प्रदेश में जबरन भूमि अधिकग्रहण और उससे जुड़े दमन की दास्तां का मामला यहीं नहीं थमता. राज्य के डिंडोरी जिले में भी तमाम सरकारी विभागों के लिए आदिवासी किसानों की जमीनें ली गईं. लेकिन उन्हें उचित मुआवजा तक नहीं मिला और वे अब पलायन को मजबूर हैं.

इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में भी काफी असंतोष का माहौल रहा. हालांकि कानून कहता है कि आदिवासियों को जमीन के बदले जमीन मिलनी चाहिए, लेकिन सरकारी स्तर पर इन शर्तों की अनदेखी की जा रही है. इन मामलों को लेकर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग भी नाराजगी जाहिर कर चुका है. आयोग के अध्यक्ष रामेश्वर उरांव ने राज्य के अनूपपुर और सिंगरौली जिले में नियमों को ताक पर रखकर आदिवासी किसानों की जमीन लेने पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चिट्ठी भी लिखी. उरांव ने पुर्नवास नीति 2002 का पालन न किए जाने और उचित मुआवजा नहीं दिए जाने पर नाराजगी जता चुके हैं.

सवालों के दायरे में सिर्फ मध्य प्रदेश ही क्यों, जबकि जबरन भूमि अधिग्रहण तो देश के दूसरे हिस्सों में भी चल रहे हैं. लेकिन बीते सात आठ महीनों में राज्य में किसानों के खिलाफ सरकारी रवैया जिस तरह से उभरकर सामने आया है वह इस सवाल के जवाब में काफी है.

कुछ महीने पहले ग्वालियर से दिल्ली के लिए कूच करने वाले सत्याग्रहियों में से एक आदिवासी किसान का कहना था कि 1947 में मिली यह आजादी उन्हें अपनी नहीं लगती. यह तकलीफ देशभर के आदिवासियों की अभिव्यक्ति है जो स्वतंत्रता के पहले और बाद में भी प्रायोजित सत्ता के निशाने पर हैं. इस स्थिति को समझने की जरूरत है. क्योंकि सुनिया बाई की मौत के बाद का पूरा घटनाक्रम कल्याणकारी राज्य का विज्ञापन करने वाली शासन प्रणाली की शुचिता पर सवाल खड़ा करता है.

लेकिन सवाल तो विकास दर की धीमी रफ्तार से चिंतित मीडिया के जनपक्षीय दावे पर भी उठाया जाना चाहिए जिसने सुनिया बाई की मौत को खबर के पैमाने से बाहर कर दिया.

varun-shaileshवरुण शैलेश युवा पत्रकार हैं.

हिंदूवादी श्रेष्ठता में सरोबार नंदी

हिंदूवादी श्रेष्ठता में सरोबार नंदी



आशीष नंदी ने वंचितों के खिलाफ बोलने का साहस इसलिए किया क्योंकि हम प्रवीण तोगड़िया जैसों को नहीं रोक पा रहे हैं. तोगड़िया का बयान 'प्रधानमंत्री बन जायें तो मुसलमानों का संवैधानिक हक एक झटके में छीन लेंगे' पर देश के शूद्र, तथाकथित बुद्धिजीवी, संविधान के रक्षक चुप्पी क्यों साधे रहे...

पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

इतिहास उठाकर देखें तो पायेंगे कि सौहार्द बिगाड़ने का काम भारत के तथाकथित बड़े कहलाने वाले लोगों ने ही किया है. बात चाहे पाकिस्तान के जनक मुहम्मद अली जिन्ना की हो या शूद्रों (दलित, आदिवासियों और पिछड़ों) के सेपरेट इलेक्ट्रोल के अधिकार को छीनने वाले गाँधी की, या फिर गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की, ये सभी एक ही जमात के हैं. आगे देखें तो अयोध्या-बाबरी विवाद को भड़काने वाले लालकृष्ण आडवाणी, कट्टर हिन्दुत्व के भरोसे अपनी रोटी सेकने वाले संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, उनके उत्पाद प्रवीण तोगड़िया, उमा भारती, विनय कटारिया, नरेन्द्र मोदी जैसे मुसलमान विरोधी भी उसी श्रेणी में हैं. शिव सेना के बाला साहेब ठाकरे, उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे और उनके गुंडे हों, या फिर हों कथित समाज विज्ञानी और प्रोफेसर आशीष नंदी, सभी उसी बड़े लोगों की परम्परा से ही आते हैं. स्त्री एवं शूद्र विरोधी ढोंगी संत आसाराम या हिंदुत्व के ठेकेदार संघ के मुखिया मोहन भागवत में तो आप बड़े लोगों की चरम अभिव्यक्ति पा सकते हैं.

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ये सब के सब इस देश के बहुसंख्यक लोगों (अर्थात शूद्रों), स्त्रियों और मुसलमानों को दूसरे, तीसरे और चौथे दर्जे का नागरिक मानते हैं. शूद्र, स्त्री एवं मुसलमानों को देश की कुल आबादी में से घटाने के बाद बचे शेष कुलीन मुनवादी लोग इस देश पर विगत हजारों सालों की भांति आगे भी हजारों सालों तक अपना अमानवीय राज कायम रखने के लिये तरह-तरह के पेंतरे चलते रहते हैं. जिसके लिये इन लोगों ने शूद्रों, स्त्रियों और मुसलमानों में से भी कुछ समाज-द्रोहियों को ललचाकर अपने मिला लिया है. जिन्हें दिखावटी तौर पर आगे रखकर ये सभी वर्गों के हितचिन्तक होने का ढोंग करते रहते हैं!

हिन्दुत्व के ये कथित संरक्षण अपनी संविधानेत्तर और कथित धार्मिक सत्ता और मनुवादी विचारधारा को हर कीमत पर कायम रखने के लिये अपनी खुद की गुण्डा-पुलिस रखते हैं. जो 14 फरवरी को वेलैटाइंस डे पर, मुम्बई से उत्तर भारतीयों को खदेड़ते समय, दलितों को मन्दिरों से लतियाते समय और स्त्रियों को धार्मिक आयोजनों पर बहिष्कृत करते हुए और छेड़ते समय अपना कमाल दिखाती रहती है.

बावजूद मनुवादी आशीष नंदी कहते हैं कि भ्रष्टाचार के जनक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोक सेवक हैं. आशीष नंदी को ये सब कहने का साहस इस कारण से हुआ कि कुछ ही दिन पूर्व प्रवीण तोगड़िया ने कहा कि यदि वह भारत का प्रधानमंत्री बन जाये तो मुसलमानों से सभी प्रकार के संवैधानिक हकों को एक झटके में छीन लेंगे. इस बयान पर देश के शूद्र, तथाकथित बुद्धिजीवी, संविधान के रक्षक चुप्पी साधे रहे. सभी जानते हैं कि देश के 90 फीसदी से अधिक मुसलमानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों के पूर्वजों के वंशज हिन्दुओं से धर्मपरिवर्तित होकर मुसलमान बने हैं, जो मनुवादियों के लिये आज भी शूद्र ही हैं.

शूद्रों को अजा, अजजा, ओबीसी और मुसलमानों के नाम पर मनुवादी लगातार गालियॉं देते रहते हैं और शूद्र चुपचाप सब कुछ सहते और सुनते रहते हैं. यही कारण है कि शूद्र विरोधी भारतीय न्यायपालिका के कुछ जजों ने ऐसे निर्णय दिये हैं, जिनके कारण इस देश के सामाजिक माहौल को बिगाड़ने का काम किया है. इन निर्णयों से इस देश का माहौल मनुवाद को मजबूत करने में सहायक का काम कर रहा है.

सभी जानते हैं कि शूद्रों को हजारों सालों तक भारत में मानव नहीं समझा गया. इसी वजह से उन्हें सरकारी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिये आरक्षण प्रदान किया गया. जिसे अमलीजामा पहनाने के लिये संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में साफ़ तौर पर प्रारम्भ से ही ये सुस्पष्ट व्यवस्था की गयी थी कि आरक्षण "नियुक्ति के समय" अर्थात् "नौकरी प्राप्त करते समय" और "पदों पर" अर्थात् "पदोन्नति के समय" दिया जायेगा.

लेकिन मनुवादी विचारधारा के पोषक जजों ने बार-बार, मनुवादियों और आरक्षणविरोधियों के पक्ष में और संसद की भावना के विपरीत व्याख्या की गयी, जिसे संसद ने अनेक बार ख़ारिज किया. ये सिलसिला अनवरत आज भी जारी है. इस प्रकार इस देश के सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और न्यायिक माहोल को बिगाड़ने में सबसे अधिक यदि किसी का योगदान है तो वे हैं शूद्र-विरोधी-मनुवादी तथाकथित बड़े-बुद्धिजीवी, राजनेता, धर्मनेता और जज.

purushottam-meena-nirankushपुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' राजस्थान में आदिवासी अधिकारों के लिए सक्रिय हैं. 

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भ्रष्टाचार का 'सवर्ण' समाजशास्त्री

आज़ाद करो … कॉमरेड डेविड रवेलो क्रेस्पो को

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शमशाद इलाही शम्स

 दक्षिण अमेरिकी देश कोलंबिया के कम्युनिस्ट नेता और मानवाधिकार कर्मी डेविड रवेलो क्रेस्पा को राष्ट्रपति जुआन मैनुअल सैंटोस की सरकार ने 14 सितम्बर 2010 से गिरफ्तार कर जेल में डाल रखा है। आनन् फानन में उन पर चलाये गए मुकदमे में हत्या के लिए उकसाने के अपराध लगा कर गत वर्ष उन्हें 18 वर्षो की सजा भी सुनाई जा चुकी है।इस मुकदमे में जिन दो लोगों को सरकारी गवाह बनाया गया वह अर्धसैन्य बल के सदस्य हैं जिनके अत्याचारों को खुद रवेलो ने उजागर किया था और वे जेल गए थे। प्रमुख गवाह मारियो जेम्स मेजिया को इस गवाही के बाद उसकी ४० वर्षो की सश्रम कारावास की सजा को घटा कर मात्र ८ वर्ष कर दिया गया है। सरकार ने इन मुकदमे के दौरान रेवेलो की तरफ से 30 तैयार गवाहों को कोर्ट में पेश ही नहीं होने दिया। जाहिर है सैंटोस सरकार डेविड रवेलो से मुक्ति पाना चाहती थी जिसके लिए उसने फर्जी मुकदमे का सहारा लेकर उन्हें जेल भेज दिया।

कोलंबिया में राजनीतिक दमन सबसे हिंसक है, आतंकवाद से लड़ने के नाम पर अनगिनत लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजना यहाँ एक साधारण घटना है। मौजूदा राष्ट्रपति के कार्यकाल में कैदियों की सख्यां में 30 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गयी है। यहाँ राजनैतिक कैदियों की संख्या 10 हजार से भी अधिक है। जेलों की स्थिति भयावह है जिसमे पीने के साफ़ पानी सहित, दवाईयाँ, बेहतर भोजन, सेनेटरी, रखरखाव आदि तक का अभाव है।

साढ़े चार करोड़ की आबादी वाले देश में प्राकृतिक संपदा प्रचुर मात्रा में है। तेल, कोयला, निकल, एमेरेल्ड जैसे खनिजों की खदानें यहाँ निजी क्षेत्र में भारी मुनाफ़ा कमाती हैं। स्थानीय लोगों की जमीन हथियाना यहाँ एक बड़ी समस्या बन चुका है जिससे करीब पचास लाख लोग बेघर हो चुके हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी 60 प्रतिशत से अधिक है जिनके 30 प्रतिशत से अधिक बच्चे भयंकर कुपोषण के शिकार हैं। जाहिर है इस समस्याओं पर आवाज उठाने का संघर्ष भी बहुत पुराना है। सरकारें और बड़े औद्योगिक घरानों के विरुद्ध क्रांतिकारी मुक्ति सेना कोलंबिया जिसे फार्क नाम से जाना जाता है। फार्क का सशस्त्र संघर्ष चार दशकों से भी पुराना है। मौजूदा सरकार अपनी पूर्ववर्ती सरकारों की भांति अमेरिका की सहायता से इस आन्दोलन

शमशाद इलाही "शम्स" यूं तो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के छोटे से कस्बे 'मवाना' में पैदा हुए 'शम्स' ने मेरठ कालिज मेरठ से दर्शनशास्त्र विषय में स्नातकोत्तर किया है। पी०एच०डी० के लिये पंजीकरण तो हुआ पर किन्ही कारणवश पूरी न हो सकी। उनका परिवार भारतीय गंगा-जमुनी सँस्कृति का साक्षात जीवंत उदाहरण है। छात्र जीवन से ही वाम विचारधारा से जुड़े तो यह सिलसिला आगे बढ़ता ही गया।

को कुचलने के लिए जी तोड़ कोशिशे करने के बाद भी उसे परास्त नहीं कर सकी। दुनिया के सबसे पुराने गुरिल्ला युद्ध को अमेरिका सहित कोलंबिया सरकार ने आतंकवादी घोषित किया है। इन पर काबू  पाने के लिए अमेरिका ने हाल में आठ अरब डालर की सैन्य सहायता दी है ताकि सरकार अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाए और अधिक हथियार खरीदे। जिस देश को भोजन, दवा और आवासीय सुविधाओं की आवश्यकता हो उसे अमेरिका अत्याधुनिक जासूसी के उपकरणों के साथ हथियार बेच रहा है। दुनिया भर में मानवाधिकार और जनतंत्र का ढोल पीटने वाला अमेरिका, कोलंबिया जैसे छोटे से देश में सात वायु सेना अड्डों पर नियंत्रण रखता है अमेरिकी कम्पनियां बड़े बड़े भू भागों पर कब्ज़े कर के औद्योगिक पैमाने पर खेती कर के केले पैदा कर रही हैं जिसे अमेरिकी अवाम खाता है।

2009 के अध्ययन के अनुसार कोलंबिया असमान आय के क्षेत्र में दक्षिणी अमेरिकी देशो में सर्वोच्च स्थान पर था। उपरोक्त राजनैतिक आर्थिक और सामाजिक अंतर्विरोधों के चलते देश की अमेरिका  परस्त सरकारों ने जो व्यापक दमन चक्र चलाया जिसके चलते 10000 से अधिक लोग अभी तक गायब हुए हैं अथवा मार दिए गए हैं। डेविड रवेलो ने पिछले 35 सालों में इन्ही मानवाधिकार उल्लंघनो के विरुद्ध लगातार संघर्ष किया है जिसके चलते उनकी ख्याति न केवल लातिन अमेरिका में बल्कि उत्तरी अमेरिका, यूरोप तक पहुँची है। यूरोप और अमेरिकी मानवाधिकारों एंव सयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संघ जैसे संगठनो ने डेविड रवेलो की रिहाई के लिए मांग की है। उत्तरी अमेरिका से नौ सदस्यों के एक दल ने कोलंबिया जाकर उनके परिवार के सदस्यों से भेंट की है जिन्हें लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। इसके अतिरिक्त दुनिया भर की कम्युनिस्ट पार्टियां उनकी रिहाई के लिए मांग कर रही हैं। इस सन्दर्भ में आप भी अपना विरोध शीघ्र दर्ज करायें, इस लिंक पर जाकर अपना प्रतिवेदन कोलंबिया के अटोर्नी जनरल को भेज सकते है :-

http://org2.democracyinaction.org/o/7315/p/dia/action/public/?action_KEY=12529 

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