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Friday, July 31, 2015

साभार आउटलुकः डीएनए प्रोफाइलिंग विधेयक: निशाने पर निजता

साभार आउटलुकः डीएनए प्रोफाइलिंग विधेयक: निशाने पर निजता


भारत के नागरिकों को निजता का अधिकार है या नहीं? क्या यह मौलिक अधिकार है?  ये सवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने देश की सर्वोच्च अदालत में पूछ कर एक सिरहन-सी पैदा की है। चिंता और अधिक इसलिए भी है क्योंकि ये सवाल ऐसे समय पूछा गया जब देश की संसद में डीएनए  प्रोफाइलिंग बिल पेश होने को है और सर्वोच्च न्यायालय में आधार कार्ड और आधार परियोजना पर बहस चल रही है। क्या संकेत यह है कि नागरिक की निजता का जबर्दस्त उल्लंघन करने की तैयारी है?

कम से कम मानसून सत्र में पेश होने वाले डीएनए प्रोफाइलिंग विधेयक के प्रावधान तो इसी ओर इशारा कर रहे हैं। इस विधेयक के मसौदे में जिंदा लोगों के शरीर से जांच के लिए नमूने लेने का प्रावधान किया गया है। नए कानून में व्यक्ति के शरीर से इनटिमेट बॉडी सैंपल (शरीर के गुप्तांगों के नमूने) लेने की तैयारी चल रही है। इसमें  गुप्तांग, कूल्हे, स्त्री के स्तनों के नमूने लेने की तैयारी हो रही है। गुप्तांगों का बाहरी परीक्षण के अलावा प्यूबिक हैयर्स से सैंपल्स लेने का भी अधिकार जांच एजेंसियों को दिया जा रहा है। विधेयक में शरीर से न केवल नमूने लिए जाएंगे बल्कि उस हिस्से की फोटो या वीडियो रिकॉर्डिंग करने की भी छूट होगी। यानी एक व्यक्ति के शरीर का सारा ब्यौरा, उसका डीएनए प्रोफाइल राज्य के पास होगा। अभी तो कहा जा रहा है कि सार्वजनिक नहीं किया जाएगा, लेकिन इस आश्वासन पर खुद ही वैज्ञानिक तैयार नहीं है। वैज्ञानिक दिनेश अब्रॉल का कहना है कि यह सीधे-सीधे नागरिकों की निजता पर हमला है और बड़ी कंपनियों के लिए भारतीय शरीर को प्रयोग के लिए गिनी पिग बनाने की खूली छूट है। इसका इस्तेमाल किसी जाति-किसी वर्ग, किसी समुदाय के खिलाफ किया जा सकता है। ऐसी कोई कानून किसी भी आजाद देश के नागरिक को गवारा नहीं हो सकता।

इन तमाम प्रावधानों के सामने आने से जबर्दस्त हंगामा मचा हुआ है। डीएनए प्रोफालिंग विधेयक के बारे में सîाा खेमे से जो सूचनाएं मिल रही हैं, उनके मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे मौजूदा मानसून सत्र में ही पारित कराने के लिए पूरा जोर लगाए हुए हैं। डीएनए प्रोफाइलिंग और डाटा मूल्यांकन क्षेत्र से जुड़े एक वरिष्ठ टेक्नोक्रेट ने बताया कि अगर यह विधेयक आ जाता है तो इससे न सिर्फ डीएनए प्रोफाइलिंग करने वाली कंपनियों का कारोबार हजारों गुना बढ़ेगा बल्कि करोड़ों लोगों के डीएनए प्रोफाइल भी मिलेंगे, जो उच्चतर के शोध में भी काम आ सकते हैं।

ऐसी आशंकाएं लंबे समय से जाहिर भी की जा रही है।

इस बिल के मसौदे दस्तावेज में एक और बेहद चिंताजन पहलू भी है और वह यह कि इसका इस्तेमाल सिर्फ आपराधिक मामलों के निपटारे में ही नहीं बल्कि दीवानी मामलों में किया जाएगा। मिसाल के तौर पर सेरोगेसी, मातृत्व या पितृत्व, अंग प्रत्यारोपण, इमिग्रेशन और व्यक्ति की शिनाक्चत आदि में भी डीएनए प्रोफाइलिंग के इस्तेमाल की बात कही गई है। और तो और डीएनए प्रोफाइल के जरिए जमा की गई जानकारी का प्रयोग जंनसंख्या को नियंत्रित करने के प्रयासों में भी किया जाएगा। इसे लेकर पहले अल्पसंख्यक समुदायों, आदिवासियों और दलितों में गहरी आशंकाएं हैं। इस तरह से जुटाई गई जानकारी को इन तमाम तबकों को निशाने पर लेने, उन्हें सामाजिक रूप से अपमानित करने और नियंत्रित करने में किया जा सकता है।

जहां तक अपराधियों को नियंत्रित करने, उनका ट्रैक रखने और उनसे संबंधित सारी जानकारियों को एक जगह जमा करने ताकि वह प्लासिट सर्जरी आदि कराकर भी बच न पाए-ये सब इस प्रस्तावित विधेयक का मुख्य लक्ष्य बताया जा रहा। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह फोरेंसिक प्रक्रिया केवल सजायाफ्ता के लिए ही नहीं बल्कि विचाराधीन कैदियों पर भी अपनाई जाएगी। 

ये मसौदा बिल गई आपत्त‌ियों को सिरे से नजरंदाज करके संसद की दहलीज तक पहुंचा है। इस विधेयक के लिए जो उच्च स्तरीय समीक्षा कमेटी बनाई गई थी, जिसने लंबी अवधि तक सघन चर्चा हुई, उसके दो सदस्यों ने इन तमाम प्रावधानों की जमकर आपत्त‌ि जताई थी। लेकिन उन्हें हैरानी है कि उनकी आपत्त‌ियों को मसौदे में कोई जगह नहीं मिली और न ही उनका उल्लेख किया गया। इस समिति के जिन दो सदस्यों ने निजता का हनन करने वाले इन प्रावधानों को हटाने की मांग की थी, वे है अंतर्राष्टीय कानूनविद उषा रमानाथन और सेंटर फॉर इंटरनेट एंड सोसाइटी के निदेशक सुनील अब्राहम।

इस पूरे मसले पर उषा रमानाथन ने आउटलुक से बातचीत के दौरान बताया कि यह विधेयक बेहद खतरनाक है। यह नागरिकों की निजता का खुलेआम उल्लंघन करते हुए राज्य और जांच एजेंसियों को व्यक्ति के जीवन ही नहीं, बल्कि शरीर पर भी अतिक्रमण करने की अपार छूट देता है। यह तानाशाही को बढ़ावा देने वाला है और कहीं से भी वैज्ञानिक नहीं है। खासतौर से आज के दौर में जब जानकारियां कहीं भी सुरक्षित नहीं रहती, तब व्यक्तियों की निजी जिंदगी से जुड़ी जानकारियों का क्या इस्तेमाल हो सकता है, इसका किसी को अंदाजा नहीं है। ऐसे में डीएएन डाटा बैंक बनाना कितना खतरनाक हो सकता है, इस बारे में समाज को सोचना चाहिए।

एक तरफ केंद्र इस बिल को संसद में पेश करने की जुगत बैठा रहा है, वहीं ठीक उसी समय आधार कार्ड की वैधानिकता और उसे अनिवार्य किए जाने के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे मामले की सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष में कहा कि नागरिकों को निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। अदालत में सरकार ने निजता के अधिकार पर सवाल उठाकर दो तरफा मार की। एक तो उसने आधार की वैधानिकता पर चल रही सुनवाई को बिल्कुल दूसरी तरफ मोड़ने की कोशिश की, वहीं यह आभास देने की भी कोशिश की कि यह अधिकार कभी भी छीना जा सकता है। इस बारे में वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर का कहना है कि एक तरफ जहां आधार पर सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि किसी को भी आधार कार्ड न होने की वजह से किसी भी लाभ या हक से वंचित नहीं किया जा सकता है, ऐसे में केंद्र सरकार तमाम योजनाओं को खुलेआम जोडक़र अदालत के आदेश की अवमानना कह रही है। उषा रमानथन कहती है कि दरअसल, सरकार की कोशिश है कि आधार के आधार को इतना फैला दिया जाए कि कल वे अदालत में कहें कि अब इतने अधिक लोग इससे जुड़ गए हैं, कि इसे खारिज नहीं किया जा सकता।

आधार को किस तरह से तमाम बुनियादी योजनाओं, सुविधाओं के लिए बाध्यकारी बना दिया गया है और किस तरह से इसके जरिए भी नागरिकों की सारी जानकारी को जमा किया जा रहा है, अगर इसकी पड़ताल हो तो दूसरी ही तस्वीर सामने आएगा।  देश की राजधानी दिल्ली में भी मतदाता पहचान पत्र बनवाने के लिए आधार कार्ड की मांग हो रही है और इसके बिना मना किया जा रहा है। अधिकारी न तो पासपोर्ट कार्ड और न ही ड्राइविंग लाइसेंस को पहचान पत्र मानने को तैयार हैं। यानी सीधे-सीधे लोगों को आधार की ओर ढकेला जा रहा है। और, जब आधार की वैधानिकता पर चर्चा होती है तो सरकारी वकील (एटॉर्नी जनरल) इस अंदाज में  दलील देते हैं कि नागरिकों की निजता सरकार के लिए कोई मायने नहीं रखती।

ये सारा परिदृश्य निजता के हनन के राज के आगमन की तुरही बजाता दिखा रहा है। वह भी ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों की यात्राओं पर हो रहे खर्चे बेहद गोपनीय विषय बने हुए हैं।

 

डीएनए प्रोफाइलिंग विधेयक के खतरे

व्यक्ति के शरीर से इनटिमेट बॉडी सैंपल (शरीर के गुप्तांगों के नमूने) लेने का प्रावधान।

 

-शरीर से न केवल नमूने लिए जाएंगे बल्कि उस हिस्से की फोटो या वीडियो रिकॉर्डिंग करने की भी छूट होगी

 

-इसका इस्तेमाल सिर्फ आपराधिक मामलों के निपटारे में ही नहीं बल्कि दीवानी मामलों में होगा।

 

-इसका प्रयोग जंनसंख्या को नियंत्रित करने के प्रयासों में भी किया जाएगा

 

 

 

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दोनों ही मरहूम देश की उस कौम से आते थे जिससे भारतीय राज्य लगातार अपनी देश भक्ति साबित करने को कहता है।

दोनों ही मरहूम देश की उस कौम से आते थे जिससे
भारतीय राज्य लगातार अपनी देश भक्ति साबित करने
को कहता है। वह कौम जिसके सदस्य चाह के भी अपने मन
की बात नहीं कह सकते। इस उत्पीडि़त कौम का एक सदस्य
भारतीय राज्य का हिस्सा बनकर वह नमूना बन गया
जिसके माध्यम से वह पूरी कौम को ललकारता है कि तुम
भी ऐसे ही पालतू बनो। दूसरा भारतीय राज्य से टकराकर
वह नमूना बन गया जिसके माध्यम से यह संदेश दिया जाता
है कि टकराने का अंजाम मौत होगा। यह अजीब है कि एक
पूरी कौम को पालतू बनने और मौत को गले लगाने के बीच
चुनाव का मौका दिया जाय पर भगवा रंग में रंग चुका
भारतीय राज्य ऐसा ही कर रहा है।


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Tathagata Roy on Twitter “Intelligence shd keep a tab on all (expt relatives & close friends) who assembled bfr Yakub Memon's corpse. Many are potential terrorists”

Retweeted Supriya Sharma (@sharmasupriya):

This guy is the governor of a state. https://t.co/qYqU6qfCbd

"Intelligence shd keep a tab on all (expt relatives & close friends) who assembled bfr Yakub Memon's corpse. Many are potential terrorists"

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प्रेमचंद होते तो खिन्न, लेकिन संघर्षरत होते… – अशोक कुमार पांडेय


प्रेमचंद होते तो खिन्न, लेकिन संघर्षरत होते… – अशोक कुमार पांडेय

Premchandप्रेमचंद जिस समय लिख रहे थे वह औपनिवेशिक शासन का समय था. वह शासन जो अपने व्यापारिक हितों की पूर्ति के लिए ही स्थापित हुआ था और जिसे इस देश को कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता बनाना था. कृषि व्यवस्था को छिन्न भिन्न किया गया और अठारहवीं सदी राजकीय संरक्षण में ज़मीन की लूट खसोट की सबसे भयानक घटनाओं की प्रत्यक्षदर्शी बनी.

लेकिन इसी के बरअक्स आज़ादी की लड़ाई के साथ पलता वह स्वप्न भी था कि अपना राज जब आयेगा तो यह दुःख दूर होगा, आखिरी आदमी तक पहुंचेगी मुस्कान और एक बराबरी वाले सर्वकल्याणकारी समाज की स्थापना होगी. उनका किसान इसी अत्याचार की मार झेलता और इस स्वप्न को जीता किसान था. एक तरफ अत्याचारी शासन तो दूसरी तरफ अपने ही समाज का वह बर्बर ढाँचा जो उसे जाति की अमानवीय श्रेणियों में बांटकर निष्ठुर कर्मकांडों और क्रूर परम्पराओं की जंज़ीरों में ऐसा कसे हुए था कि एक एक साँस लेनी मुश्किल थी. इन हालात कि एक पैदाइश था हल्कू जो पूस की रात किसानी से जान छूटने से संतोष पाता है और मज़दूरी करने का तय करता है तो एक पैदाइश वे घीसू माधव भी थे जिन्होंने हाड़ तोड़ मेहनत के फल के बारे में ठीक ठीक जान लिया था और उन परम्पराओं के मासूम फ़ायदे उठाना सीख लिया था.

तो प्रेमचंद ने लिखते हुए एक तरफ इस किसान के दुःख दर्द और सामजिक-आर्थिक विडम्बनाओं को एकदम सीधे सीधे दर्ज किया तो दूसरी तरफ उस समय की राजनीतिक सामजिक जीवन की साम्प्रदायिकता, जाति प्रथा, आर्थिक विषमता आदि को भी कहानियों में ही नहीं बल्कि अपने लेखों में भी दर्ज किया और साथ ही अपनी प्रतिबद्धता भी साफ़ की. यह उनकी सफलता है कि वे आज भी प्रासंगिक हैं, लेकिन हमारे समाज और राजनीति की विफलता है.

kafan-hindi-novel-400x400-imadf82cu3zkfp4fआज अगर वह होते तो ज़ाहिर तौर पर उस समय से अधिक उद्विग्न होते कि मुसीबतें तो नए नए रूपों में सामने उपस्थित हैं लेकिन स्वप्न सारे खंडित. दूर तक निगाह में कोई नवनिर्माण का दृश्य नहीं दीखता. आजादी के बाद जो उम्मीद थी "अपने" शासकों से उसका शतांश भी पूरा नहीं हुआ. नब्बे का दशक शासकीय नीतियों के लगातार पूंजीपतियों के पक्ष में झुकते जाने और इसके साथ साथ साम्प्रदायिकता के उभार का दशक था और यह प्रक्रिया सत्ताओं के परिवर्तनों के बावजूद अब तक ज़ारी है. वह होते तो खिन्न होते पर संघर्षरत होते. आज भी बिगाड़ के डर से ईमान की बात कहने से नहीं रुकते.

वह नहीं हैं..और हम हैं. खुद को उनकी परम्परा का कहने वाले. ज़रा झाँक ले अपने मन में और पूछें कहीं सच में बिगाड़ के डर बेईमानी तो नहीं करने लगे हैं हम?

10294388_1515439282028186_5696327034129165554_nअशोक कुमार पांडेय

इस टिप्पणी के लेखक, दखल प्रकाशन के ज़रिए जनवादी और चेतनामूलक साहित्य का प्रचार-प्रसार करने में लगे हैं। अशोक कुमार पांडेय के दो कविता संकलन प्रलय में लय कितना समेत, मार्क्स पर एक सामयिक दृष्टि की किताब और निबंधों का संकलन प्रकाशित हो चुका है। विभिन्न पत्रिकाओं का सम्पादन और अतिथि सम्पादन किया है। 

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कमलेश्वर जी और गायत्री भाभी की बहुत सी यादें

कमलेश्वर जी के साथ कमा करने का एक मौका हमें मिला था।वे हमारे पसंदीदा कहानीकार और संपादक दोनों थे।नई दिल्ली से जब दैनिक जागरण निकला था,तब हम मेरठ जागरण में ङुआ करते थे।

कमलेश्वर जी ने मुझे दिल्ली के लिए चुना था और उनके साथ लगने के लिए मुझे नरेंद्र मोहन जी या धीरेंद्र मोहन जी से परमिशन चाहिए था क्योंकि हम जागरण में ही थे।

वह परमिशन नहीं मिला तो हमने जागरण चोड़कर बरली अमर उजाला ज्वाइन किया।वहां भी टिक न सकें तो जनसत्ता आकर थम गये।

कमलेश्वर जी ने मेरी कोई कहानी सारिका में नहीं छापी क्योंकि हमारी कोई रकहानी समांतर खांचे में फिट नहीं बैठती थी।दिनमान के संपादक रघुवीर सहाय थे,जहां हम लोग लिखते थे छात्र जीवन से जो दुबारा दुबार खूब लिखवाते थे।

कमलेश्वर जी से सारिका और दिनमान के संपादकीय में जो हमारे मित्र थे,उनकी वजह से बातचीत का रिश्ता था लेकिन उससे बड़ा रिस्ता ता ,बहुत कामयाब होने के बावजूद वे जनसरोकारों से जुड़े हुए थे।

यह पत्र कथा बिंब के संपादक माधवजी को लंदन से तेजेंद्र शरमा ने लिखा है और इससे पता चलला है कि कमलेस्वर जी के बाद अब गायत्र भाभी भी चल बसींं।
हो सकता है कि आपको पहले खबर हो गयी हो।
फिरभी हिंदी दुनिया में फिल्म ,टेलीविजन,पत्रकारिता और साहित्य में हमारे नेता के गुजरने के बाद उनकी पत्नी का चले जाना बड़ी खबर बनती है।इसलिए इस खबर को साझा कर रहा हूं।
पलाश विश्वास

प्रिय भाई माधव

 

आदरणीय गायत्री भाभी के निधन का दुखद समाचार मुझे लन्दन में प्रदीप वर्मा के माध्यम से मिल गया था। आपका फ़ोन नम्बर नहीं मिल पा रहा था, इसलिये आपसे संवेदना प्रकट नहीं कर पाया।

 

कमलेश्वर जी और गायत्री भाभी की बहुत सी यादें मेरे हृदय में सुरक्षित हैं।

 

गायत्री भाभी की आत्मा की शान्ति की प्रार्थना करते हुए...


 

तेजेन्द्र शर्मा

लन्दन

00-44-7400313433

 

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प्रेमचंद का गांव भी वाराणसी में है, पीएम जी… – रवीश कुमार, प्राइम टाइम और लमही


प्रेमचंद का गांव भी वाराणसी में है, पीएम जी… – रवीश कुमार, प्राइम टाइम और लमही

विसगतियां इतिहास को रेखांकित भी करती हैं, उसे गढ़ती भी हैं और उसकी अहमियत को भी समझाती हैं। विसंगतियां समझाती हैं कि जो हमारे पास बचा है, उसमें इतिहास का क्या योगदान है, उसको इतिहास ने कैसे बनाया और बिगाड़ा है, उसको कितना और कैसे सही करना है…विसंगतियां बताती हैं कि इतिहास ने जितना अन्याय हमारे साथ किया है, हमने भी उसके साथ उतना ही अन्याय किया है और कई बार उससे भी ज़्यादा…
ये 29 अप्रैल 2014 को एनडीटीवी इंडिया पर रवीश कुमार की प्राइम टाइम रिपोर्ट का एपीसोड है, जिसमें वह लोकसभा चुनाव के दौरान मुंशी प्रेमचंद के गांव का दौरा कर रहे हैं, और देश-काल-परिस्थिति के अलग-अलग कालखंडों के साथ प्रेमचंद के एक ऐसे दीवाने को भी देख रहे हैं…जो उनकी बात करता है…निर्मला की बात करता है…गोदान की बात करता है…नमक का दारोगा की बात करता है…हामिद की बात करता है…और फिर हमारे समय में चारों ओर घूम रहे, इन कहानियों के असली किरदारों को देख कर रो पड़ता है…मिलिए प्रेमचंद से…उनके गांव लमही से…आंसू पोंछते दुबे जी से…और शुक्रिया कहिए हमारे समय की रोशनियों में से एक रवीश कुमार को…

 

 

 

स्रोत – साभार एनडीटीवी इंडिया का यूट्यूब चैनल और वेबसाइट –

http://khabar.ndtv.com/video/show/prime-time/319251

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हर किसी के लिए अब फांसी का फंदा तैयार वरना वफादार खुद को साबित कर दें हुकूमत हर किसी को कुछ भी बनाने लगी है मजबूर हैं हम इतने कि अपने रब के सिवाय किसी को किसी पर भरोसा नहीं हर वक्त खतरे के साये में हैं हम,मौत हर दिशा पर घात लगाये बैठी कैसी कयामत है कि किसी को किसी पर यकीन नहीं हवाओं में शक के कांटे चुभ रहे हैं बहुत कोई यकीन नहीं कि पानियों में आखिर है क्या रेगिस्तान में बाढ़ें आने लगी हैं इन दिनों अब डीएनए कार्ड भी देशभक्ति का कोई सबूत नहीं है।बाकायदा संवैधानिक पदों से भी राष्ट्रद्रोह का फतवा जारी होने लगा है। अब हिंदुस्तान भी अमेरिका होने लगा है। पलाश विश्वास


हर किसी के लिए अब फांसी का फंदा तैयार
वरना वफादार खुद को साबित कर दें
हुकूमत हर किसी को कुछ भी बनाने लगी है
मजबूर हैं हम इतने कि अपने रब के सिवाय किसी को किसी पर भरोसा नहीं
हर वक्त खतरे के साये में हैं हम,मौत हर दिशा पर घात लगाये बैठी
कैसी कयामत है कि किसी को किसी पर यकीन नहीं
हवाओं में शक के कांटे चुभ रहे हैं बहुत
कोई यकीन नहीं कि पानियों में आखिर है क्या
रेगिस्तान में बाढ़ें आने लगी हैं इन दिनों
अब डीएनए कार्ड भी देशभक्ति का कोई सबूत नहीं है।बाकायदा संवैधानिक पदों से भी राष्ट्रद्रोह का फतवा जारी होने लगा है।

अब हिंदुस्तान भी अमेरिका होने लगा है।

पलाश विश्वास
दशभर में मूसलाधार हादसों का वक्त है यह।कोलकाता समेत पूरे बंगाल से लेकर राजस्थान और महाराष्ट्र तक जलजला है।

फिर पूरा मुल्क दहशतजदा है और हर आदमी और औरत शक के दायरे में है।

फांसी जिसकी हो गयी है,वह रिहा हो गया है,बाकी लोग अपनी रिहाई के लिए क्या क्या सबूत दें,हुकूमत यह तय नहीं कर पायी है।

क्योंकि अब डीएनए कार्ड भी देशभक्ति का कोई सबूत नहीं है।

बाकायदा संवैधानिक पदों से भी राष्ट्रद्रोह का फतवा जारी होने लगा है।

अब हिंदुस्तान भी अमेरिका होने लगा है।

आतंक के खिलाफ युद्ध भी अब महाभारत है और पूरा मुल्क कुरुक्षेत्र हैं जहां कोई ईश्वर चीख चीखकर कह रहा है,सबको मार डालो।
सबको मार डालो।
कोई बच नहीं पाये।
सारे मरे हुए हैं।
मरे हुए को मारने का  पाप नहीं होता।
अपराध भी नहीं होता।

जैसे भोपाल गैसत्रासदी नियतिबद्ध है और पूर्व जनम का फल है इसीलिए नरकयंत्रणा गैसपीड़ितों के लिए अनुदान वरदान है।

दुनियाभर के सिख पांडवों के कुछ नहीं लगते तो आपरेशन ब्लू स्टार भी जायज है और इस खातिर किसी को कटघरे में खड़ा करे की जुर्रत जो करें वह राष्ट्रद्रोही है।

इस लिहाज से सिखों का कत्लेाम भी जायज है क्योंक सिख अब हिदू भी नहीं हैं।न्याय की गुहार सिखों की वह भी नाजायज है।

कश्मीर घाटी में हिंदू नहीं है तो उसपर तमाम जुल्मोसितम न कानून के दायरे में हैं और न न्याय के दायरे में है.वह सेना के हवाले हैं।

इसीतरह,इसी दलील से आदिवासी चूंकि हिंदू नहीं हैं,सलवाजुड़ुम के किलाफ हर बात राष्ट्रद्रोह है।पूर्वोत्तर भी इसीलिए सेना के हवाले है।
दंगों में जो मारे जाते हैं ,यह उनका कर्मफल का असर है।वर्ग वर्ण जाति वर्चस्व भी किस्मत का मामला है।जनमजात किस्सा है।जनमजात हिस्सा है।किस्मत कौन बदल सकै हैं।

गुजरात का नरसंहार नरसंहार इस लिए नहीं है क्योंकि जिनका कत्लेआम हुआ वे गैरहिंदू थे और उनका वध हिंदूराष्ट्र के लिए वैदिकी हिंसा का पाठ है जो अनिवार्य भी है और वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति।इसी लिए उस नरसंहार के हत्यारों को क्लीन चिट है।


ईश्वर के वे ही चीखें हवाओं में गूंज रही हैं वे ही चीखें पानियों की लहरें हैं।बाकी तमाम चीखें न पैदा हो रही हैं और न उसकी कोई इजाजत है।

चोरी छिपे किसी चीख का हो गया जन्म तो राष्ट्र की सारी सैन्यशक्ति पूरी मुश्तैद के साथ जमींदोज कर देती हैं वे तमाम चीखें।

चीखों का दफनाने का तंत्र ही हमारा लोकतंत्र है।
यही हमारा राज्यतंत्र है।
यही कुल तंत्र मंत्र यंत्र है।

भरत किस तरह इराक और अफगानिस्तान या लीबिया की तरह किसी गैरमुल्क को अमेरिकी तर्ज पर तहस नहस कर पायेगा,हम नहीं जानते,लेकिन यह हिंदू राष्ट्र राष्ट्र के ताने बाने को तबाह कर रहा है,इसमें अब शक की कोई गुंजाइश नहीं है।

हम तुरंत राष्ट्रद्रोही करार दिये जायेंगे, अगर हम यह कह दें कि भारत न कभी राष्ट्र था और न भारत आज कोई राष्ट्र है।

हम तुरंत राष्ट्रद्रोही करार दिये जायेंगे, अगर हम यह कह दें कि  भारत हजारों सालों से रियासतों का जमावड़ा था जो आज भी वहीं रियासतों का जमावड़ा बना हुआ है और सारी सियासत उन्हीं रियासतों को बहाल रखने की है।

उन्हीं रियासतों के हुक्मरान अब भी हम पर राज कर रहे हैं और हम वे ही प्रजाजन हैं जो नागरिक नहीं हो सकते तो जाहिर है कि नागरिकों के हक हकूक भी रियासतों के प्रजाजनों को मिल नहीं सकते।यही कानून है।यही न्याय है।मुक्त बाजार भी वही।

हम रियासतों का जमावड़ा न होते तो हम मुकम्मल वतन के बारे में सोच रहे होते और वतन के हर हिस्से से उतना ही प्यार करते जितना कि अपनी अपनी रियासतों से।

हमारा वतन टुकडा़ टुकड़ा है।किसी टुकड़े का दर्द किसी टुकड़े को महसूस होता नही है इसीलिए।बंटवारे का दर्द बी नहीं है कोई।

हम तुरंत राष्ट्रद्रोही करार दिये जायेंगे, अगर हम यह कह दें कि  कोई सूबा भी मुकम्मल कोई सूबा नहीं हैं।
हर सूबे के अंदर रियासतें हैं जतो जमींदारियां भी हैं।

हम तुरंत राष्ट्रद्रोही करार दिये जायेंगे, अगर हम यह कह दें कि मुकम्मल वतन की क्याकहें ,हम तो किसी मुकममल सूबे की बात भी नहीं कर सकते कि सूबे के अंदर अनेक सूबे हैं और सूबेदार भी अनेक हैं।

सिपाहसाालर कोई एक कहीं नहीं हैं और मनसबदार तो थोक हैं।जमींदार बहाल तबीयत हैं तो उनके कारिंदे किसी बाघ से आदमखोर कम नहीं है।

प्रेमचंद की 135वीं सालगिरह है आज और उनकी लिखी देखी दुनिया के दुःख दर्द का किस्सा तनिको बदला नहीं है भले ही जमाना बदल गया हो और हुकूमत भी बदली बदली सी दीखती रही हो हर चुनाव के बाद।कुछ भी नहीं बदला है लेकिन कोई दूसरा प्रेमचंद के पासंग बराबर हुआ नहीं है अभीतक।

कल रात बहुत घूमकर घर लौटे हम रात के करीब पौने चार बजे।रास्ते में सुमीत को घर उतारा।उसने अपने घर के दो घरों बाद उस धोबी की दुकान को भी दिखाया,जिसने कपड़े लौटाने के लिए आधार,पैन या वोटर कार्ड के जेराक्स मांगे।

जिस मुल्क में शक का दायरा फांसी के फंदे की तरह वजूद को खाने लगे,उस मुल्क में कायनात को भी तबाही में तब्दील हो जाना है।
कयामत यही है कि हर तीसरा शख्स शक के दायरे में है।

हालात अजब गजब हैं कि हर किसी के लिए फांसी का फंदा तैयार।
वरना वफादार खुद को साबित कर दें।

हुकूमत हर किसी को कुछ भी बनाने लगी है।

मजबूर हैं हम इतने कि अपने रब के सिवाय किसी को किसी पर भरोसा नहीं।

हर वक्त खतरे के साये में हैं हम,मौत हर दिशा पर घात लगाये बैठी।
कैसी कयामत है कि किसी को किसी पर यकीन नहीं।
हवाओं में शक के कांटे चुभ रहे हैं बहुत।

कोई यकीन नहीं कि पानियों में आखिर है क्या।
रेगिस्तान में बाढ़ें आने लगी हैं इन दिनों।

राम चंद्र गुहा हम जहां तक जानते हैं,कोई राजनेता नहीं हैं।उनसे निरपेक्ष कोई इतिहासकार फिलवक्त देश मेंकोई दूसरा है कि नहीं,मुझ जाहिल को मालूम नहीं है।

अपने मित्र आनंद तेलतुबंड़े की ताजा किताब का प्लैप लिखने के लिए हमने उनसे आवेदन किया तो वे तुरंत तैयार हो गये और आनंद ने उन्हें तुरंत पांडुलिपि मेल से भेज दिया है।

इसपर उनका जवाब आया कि वे बूढ़े हो गये हैं और प्रिंट के सिवाय परदे पर कुछ भी पढ़ना उनके लिए मुश्किल है।फिर उन्हें प्रिंट भेजा गया।

किस्सा यू है अब कि किसी एक नागरिक को फांसी हो गयी।सर्वोच्च अदालत के भोर साढ़े चार बजे दिये आखिरी फैसले के बाद उसे फांसी दे दी गयी।लाश उसके परिवार के सुपुर्द कर दी गयी।

कानून ने कानून के मुताबिक काम किया और न्याय जैसे होता रहा है,हूबहू न्याय उसी तरह हो गया।

तथागत राय सिर्फ राजनेता नहीं हैं।
सिर्फ गवर्नर भी नहीं हैं तथागत राय।
बांग्ला की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका देश में यशस्वी संपादक सागरमय घोष के जमाने में मुख्य आलेख उनके तमाम छपते रहे हैं।उनके बजरंगी हो जाने की हमें कोई खबर न थी हालांकि वे बंगाल भाजपा के अध्यक्ष भी रहे हैं और लगातार हिंदू हितों की बात भी करते रहे हैं।

उन तथागत राय को देश के वाणिज्यिक महानगर में एक जनाजे में शामिल चेहरों के आतंकवादी होने का शक है और बाकायदा त्रिपुरा के गवर्नर होने की हैसियत से उनने ट्वीट भी कर दिया कि उस जनाजे में शामिल तमाम लोगों की निगरानी होनी चाहिए।उनमें से अनेक आतंकी हो सकते हैं।वे इस पर अब भी बहाल हैं।

इस पर बूढ़े रामचंद्र ने उस ट्वीट के जवाब में लिख दिया कि राजनेता और सरकारेंं बकवास के लिए मशहूर हैं लेकिन कोई गवर्नर ऐसी बात करें तो यह बहुत खतरनाक है।

हमें अभी मालूम नहीं है कि रामचंद्र गुहा को पाकिस्तान चले जाने या मुसलमान होने का फतवा जारी हुआ है नहीं।

संघ बिरादरी में से जिन जिनसे हमारी बातचीत संभव होती रही है,हम कई दिनों से उनसे यही बहस कर रहे हैं कि किसी को फांसी दे देने से आतंक के खिलाफ युद्ध जीता नहीं जाता।

हम उनसे कह रहे ते कि जिस न्यापालिका ने किसी नागरिक को मोत की सजा बहाल रखी है ,उसी अदालक ते पूर्व न्यायाधीश उसी सजाेमौत के खिलाफ अपील कर रहे हैं,तो आप उन्हें राष्ट्रद्रोही साबित करने लगे हैं तो आप ही इसका खुलासा कर दें कि जिस न्यायपलिका के कल तक अंग रहे जस्टिस सावंत,जस्टिस काटजू जैसे तमाम न्यायाधीश अगर राष्ट्रद्रोही हैं,तो अब तक जो न्याय हुआ है,उसपर नागरिकों का भरोसा कितना होना चाहिए।

फिर न्यायप्रणाली के अंग रहे लोग अगर राष्ट्रद्रोही हैं,तो फिर राष्ट्रभक्त संघ परिवार से जुड़े जो लोग नहीं हैं ,उनमें से कौन कौन देश भक्त हैं और कौन कौन देशद्रोही हैं।

जाहिर है कि संघपरिवार से जुड़े लोगों की राष्ट्रभक्ति पर सवालिया निशान लगाने वालों को इस मुल्क में रहने की कोई इजाजत तो मिलेगी नहीं।

हम लोग जो खास भी नहीं हैं और वे लोग जो आम हैं खालिस और खासतौर पर जो विशुद्ध हिंदू नहीं है या सिरे से गैरहिंदू हैं उनकी देशभक्ति साबित करने की कोई गुंजाइश तो है नहीं।

अब एक गवर्नर के इस फतवे के बाद एक आम आदमी ,सुमीत के धोबी के उस शक के मिजाज से समझिये कयामत से फासला।

मामला बस इतना है कि हुकूमत तो बहुत बड़ी चीज है ,रोजमर्रे की जिंदगी में आम लोगों की नजर में शक के दायरे से बाहर निकलने के लिए आधार,वोटर,पैन,राशन कार्ड के अलावा देशभक्ति का कोई कार्ड या डीएनए कार्ड के साथ असंदिग्ध कोई कार्ड बनाने का ठेका फिर किस निजी कंपनी को दिया जाना है।किसका हो गया छेका,समझें।

देख लीजिये,उनने दुनियाभर को झांसे में लेकर आतंक के खिलाफ युद्ध जीतने के लिए सरेआम सद्दाम हुसैन का कैसे अंत किया है।

जिस मीडिया के भरोसे हमारे दिलोदिमाग हैं,उसका जनम न्यूयार्क के ट्वीन टावर गिराये जाने के हादसे में हुआ और भारत में भी लोगों ने देखा कि कैसे किसी खास नागरिक को नही,बल्कि पूरे के पूरे मुल्क को सजाएमौत दे दी गयी।

इराक ईरान लीबिया के बाद लातिन अमेरिका,एशिया,अफ्रीका और यूरोप में भी करोडों लोग अबतक आतंक के खात्मे के लिए मौत के घाट उतार दिये गये हैं।

फिरभी खुद अमेरिका में वह आतंक फिर फिर लौट रहा है।बाकी दुनिया की बात तो रहने दें।सारा भारत युद्धस्थल इसीलिए।

उस तंत्र की बात कोई नहीं करता है जहां आतंक के कारखाने थोक भाव से लगते हैं।जहां आतंकवादी बनाये जाते हैं।

सारे लोग इस सिलसिले में खामोश हैं।
वह तंत्र लेकिन पल चिन पल छिन मजबूत होता जा रहा है।

अब 3 अगस्त को हिंदू महासभा मुसलमान मुक्त हिंदुस्तान की मुहिम चालू करने जा रहा है और आरएसएस ने खुल्ला ऐलान कर दिया है कि 2021 तक विधर्मियों से मुक्त होगा भारत।

अब समझ लीजिये कि इस ऐलाने जंग का अंजाम फिर क्या होने वाला है।कहां कहां दहशत का दायरा बढ़ने वाला है।

इस दरम्यान या तो सारे विधर्मियों की घर वापसी हो जानी चाहिए,नहीं हुई तो वह विकल्प क्या है,जिसके तहत भारत विधर्मी मुक्त होगा,इसका भी खुलासा कर दें हुकूमत तो कुछ खुलासा हो। क्योंकि गैरहिंदुओं का सफाया जिस आरएसएस का कार्यक्रम है खुल्लमखुल्ला है,उसीकी हुकूमत है।राजधानी नागपुर है।

उस अवधि तक जो न बनेंगे हिंदू तो क्या उन्हें किसी नये ग्रह उपग्रह या नक्षत्र में भेजने का कोई वैदिकी विज्ञान है,हमें चूंकि मालूम नहीं है।या किस योग बल से फिर आवाम की अदला बदली होगी।

हम इतना ही जानते हैं कि बाजार जितना मुक्त है ग्लोबल,पूंजी जितान अबाध है,सरहदें उतनी मुक्त कहीं नहीं है।
न सरहदों पर आावागमन अबाध है।

क्या हिंदुस्तान के गैरहिंदुओं के लिए किसी नोमैंस लैंड पर कोई उनका होमलैंड बनाने की तरकीब किसी साइंटिस्ट ने ईजाद की है या स्टीफन हाकिंग से कोई ऐसा समझौता भी हुआ है कि किसी और दुनिया का पता चले तो वहीं बसा दिये जायेंगे हिदुस्तान में अवांछित गैर हिंदू लोग।



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