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Thursday, March 28, 2013

पांच दिवसीय चंडीगढ़ संगोष्‍ठी में जाति के उद्भव और विकास सम्‍बन्‍धी इतिहास लेखन पर एक विशेष पेपर था। उसको पढिये जाति और वर्ण के अन्‍तर्संबन्‍धों के बारे में समुचित जानकारी मिल जायेगी और शायद तब आप अनर्गल तोहमतें लगाना भी बन्‍द कर दें।

Anand Singh अशोक जी पांच दिवसीय चंडीगढ़ संगोष्‍ठी में जाति के उद्भव और विकास सम्‍बन्‍धी इतिहास लेखन पर एक विशेष पेपर था। उसको पढिये जाति और वर्ण के अन्‍तर्संबन्‍धों के बारे में समुचित जानकारी मिल जायेगी और शायद तब आप अनर्गल तोहमतें लगाना भी बन्‍द कर दें। http://arvindtrust.org/wp-content/uploads/2013/03/Historiography-of-Caste-Some-Critical-Observations.pdf


Palash Biswas · 572 followers
Wednesday at 9:16pm · 
  • ब्राह्मण/द्विज वर्ण है ,जाति नहीं ,सचमुच जातियां श्रम का विभाजन का स्वरूप है ,जिनका आर्थिक उत्पादन से ही कुछ लेना देना है ,परन्तु केवल शूद्र वर्ण में जातियां होती है ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य वर्ण में जातियाँ नहीं होती ,बल्कि गोत्र होता है और शूद्र गोत्र विहीन क्यों ? इस विषय पर उस गोष्ठी में कुछ नहीं कहा गया है ,न ही इस विषय पर चर्चा की गयी है की वर्ण के उत्पति का उद्गम क्या था और जातियों के यानी शूद्र के बिच क्रमागत विभेद के कोई सह्त्यिक और पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलता है तो क्यों ? 
    Ashok Dusadh 8:22pm Mar 27
    अब चंडीगढ़ में ''जाति -प्रश्न और मार्क्सवाद '' पर गोष्ठी हुई जिसका अंततः निष्कर्ष निकल गया वह इस प्रकार व्यक्त हुआ ....
    1) उत्पादन के साधन और श्रम -विश्लेषण से तय हुआ जाति व्यस्था सामंत व्यस्था की दें है ,अब पूंजीवाद इस जाति व्यस्था को जिन्दा रखे है .

    2) डॉ अम्बदेकर एक विफल चिन्तक थे ,उनके पास कोई परियोजना नहीं थी जिसे जाति व्यस्था ख़त्म हो .

    3) मार्क्सवाद को अब एक परियोजना तैयार करनी होगी ,जिससे जाती व्यस्था ख़त्म हो।

    तीनो स्थापनाओ में कोई जान नहीं है ,नहीं ये ब्राह्मण/द्विज 'मार्क्सवादी 'कोई क्रांतिकारी वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत कर पाए ,उन्हें ये तो पता नहीं है की ब्राह्मण/द्विज वर्ण है ,जाति नहीं ,सचमुच जातियां श्रम का विभाजन का स्वरूप है ,जिनका आर्थिक उत्पादन से ही कुछ लेना देना है ,परन्तु केवल शूद्र वर्ण में जातियां होती है ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य वर्ण में जातियाँ नहीं होती ,बल्कि गोत्र होता है और शूद्र गोत्र विहीन क्यों ? इस विषय पर उस गोष्ठी में कुछ नहीं कहा गया है ,न ही इस विषय पर चर्चा की गयी है की वर्ण के उत्पति का उद्गम क्या था और जातियों के यानी शूद्र के बिच क्रमागत विभेद के कोई सह्त्यिक और पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलता है तो क्यों ? और क्यों इन शूद्र जातियों के परस्पर आपस में जातिभेद पनप गया ,जाति व्यस्था पर वर्ण का शास्त्रीय वर्ण -विभेद का असर क्योंकर हुआ कोई विश्लेषण ये मार्क्सवादी नहीं प्रस्तुत कर पाए ?.डॉ आंबेडकर को बिना कारण और तर्क के विफल कहना उनके जातीय पूर्वाग्रह का नग्न पर्दर्शन क्यों न माना जाए ?.वे भविष्य कोई परियोजना बनाना चाहते है तो बनाये जिससे जाती व्यस्था ख़त्म हो जायेगी ,पहले वो परियोजन प्रस्तुत करे तब बहुजन से संवाद करे .
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    • Kalale Srinivasaranga Parthasarathy · 13 mutual friends
      aap kripaya Debiprasad ji ke "Lokaayatha" padhiye..aur ek kitab Jaati par A.P Sharma ki
    • Vijay Bahuguna पलाश जी, जाति व्यवस्था पर रामसरण शर्मा एवं डी .डी .कोसाम्बी का बहुत बेहतरीन कार्य है,शायद आपके सवालों का जवाब मिल जाये,उत्पादन के आदिम स्तर के वर्ग का दूसरा नाम ही जाति है,श्रम विभाजन के आधार पर ही जाति व्यवस्था टिकी है,श्रम से जो दूर रहा जातीय सोपान में अगड़ा कहलाया।
    • Ashok Dusadh बहुगुणा जी जाति और वर्ण का अंतर्संबंध पर कुछ कहिये ?
    • Anand Singh अशोक जी पांच दिवसीय चंडीगढ़ संगोष्‍ठी में जाति के उद्भव और विकास सम्‍बन्‍धी इतिहास लेखन पर एक विशेष पेपर था। उसको पढिये जाति और वर्ण के अन्‍तर्संबन्‍धों के बारे में समुचित जानकारी मिल जायेगी और शायद तब आप अनर्गल तोहमतें लगाना भी बन्‍द कर दें। http://arvindtrust.org/wp-content/uploads/2013/03/Historiography-of-Caste-Some-Critical-Observations.pdf
    • Ashok Dusadh बहुत बारीक़ तरीके से लेख में जाति /वर्ण को मिला दिया गया है और वर्ण को भी उत्पादन पद्धति का श्रम विभाजन से जोड़ दिया गया है ,इतिहासकारों के उद्धरण भी सेलेक्टिव है ,मेरा आरोप अनर्गल नहीं है इस पेपर में कहीं भी वर्ण की उद्भव का तार्किक विश्लेषण नहीं है न हीं इस इस बात का जवाब की इतिहास विभिन्न कालखंडो में तत्कालीन बहुसंख्यक शूद्र द्विज की सेवा करने के धार्मिक विश्वास को क्यों और कैसे आत्मसात कर जीवन के सारे उत्पादक कार्य जीवन जीने के न्यूनतम शर्तो पर करते रहे .बहुत सारी स्थापनाए इतनी छिछली है के भविष्य के कल -परसों में ही इस पेपर के शोधकर्ता को अपनी राय चेंज करने पर मजबूर होना पड़ेगा .विस्तृत लिख कर बताऊंगा फिर कभी .
    • Anand Singh आप इतनी general बात कर रहे हैं जिससे लगता है कि आपने पूरा पेपर पढ़ा ही नहीं है। श्रीमान थोड़ा धैर्य के साथ यह पेपर पढि़ये तो और फिर particular में बात कीजिये कि कहां पर जाति और वर्ण को यू्ं ही मिला दिया गया है और कहां पर सेलेक्टिव उद्धरण हैं। आप स्‍पष्‍ट कीजिये किन इतिहासकारों के उद्धरण इसमें छूटे हैं जिनसे हमें जाति प्रश्‍न को समझने में मदद मिलती है। मैं तो दावे के साथ कह रहा हूं कि इस पेपर में वर्ण के उद्भव की तर्कसंगत व्‍याख्‍या पृष्‍ठ 10 से 15 के बीच और विभिन्‍न कालखंडों और विभिन्‍न क्षेत्रों में शूद्रों की स्थिति में आये बदलावों की भौतिकवादी व्‍याख्‍या पृष्‍ठ 16 से 21 के बीच मौजूद है। यदि आप इससे असहमत हैं तो इसके लिए अपना तर्क प्रस्‍तुत करें। बिना पढ़े आलोचना करने की आपकी तत्‍परता से तो यही जान पड़ता है कि आप दलित बुद्धिजीवियों के सम्‍मुख अपनी वाहवाही बटोरने के लिए ही मार्क्‍सवादियों की कुछ सामान्‍य सी सतही आलोचना करके गदगद हो रहे हैं। यदि आप वाकई जाति प्रश्‍न के ख़ात्‍मे के बारे में संजीदा हैं तब तो आपको पढ़कर particular में आलोचना रखनी होगी।
    • Ashok Dusadh वैसे मैं आपके पेपर पर विस्तृत कहूँगा जैसे मैंने कहाँ ,आप तुरंत फेस बुक के कमेन्ट बॉक्स में सारी चीजें क्यों चाह रहे है ,आपने तो इत्मिनान से पांच दिवसीय कार्यक्रम आयोजित कर 56 पेज का रिपोर्ट तैयार किया .आब आप इस बात का भी खुलासा कर दीजिये की गलत बात मुझे 'दलित बुद्धिजीवी ' की वाह -वाही कैसे दिला सकती है .दूसरी बात अपने कमेन्ट में आपने रेखांकित कर ही दिया है बुद्धिजीवी -बुद्धिजीवी नहीं होता ,बल्कि या तो वह दलित होता है या ......?
    • Anand Singh ये तो मैंने आपकी ही उस अपील के सन्‍दर्भ में बात की थी जिसमें आपने यह कहा था कि दुसाध जी और विश्‍वास जी के अलावा और कोई भी मार्क्‍सवादियों का जवाब देने की हिम्‍मत नहीं कर रहा है। मेरी खुद की तो यह राय है कि बुद्धिजीवी की जो भी जाति हो उसके तर्क यदि सही हैं तो ग्रहण करना चाहिए। इसीलिए तो आपसे गुज़ारिश कर रहा हूं कि तर्कसंगत जवाब दें तो मुझे भी कुछ सीखने को मिलेगा। मार्क्‍सवादियों के बारे में general सी बात कह देने से तो कुछ भी नहीं साबित होता। जहां तक आपके विस्‍तृत जवाब की बात है तो हमें उसकी प्रतीक्षा रहेगी। परन्‍तु फेसबुक पर यदि आप इन पेपर्स के बारे में यदि कुछ टिप्‍पणी कर रहे हैं तो उनको तो आप सन्‍दर्भित करके बात कीजिये। एक तरफ आप बोलते हैं कि मैं पढ़कर विस्‍तृत आलोचना रखूंगा दूसरी तरफ बिना पढ़े तोहमतें लगाना शुरू कर देते हैं। इसीलिए मैं बार बार कह रहा हूं कि समय लेकर धैर्यपूर्वक पढि़ये और फिर सुसंगत आलोचना रखिये जिससे हमें भी जाति प्रश्‍न को समझने और उसके ख़ात्‍में के बारे में कोई नयी बात पता चले जो हमारे पेपर्स में नहीं है।
    • Vijay Bahuguna केवल शूद्र वर्ण में जातियां होती है ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य वर्ण में जातियाँ नहीं होती ,बल्कि गोत्र होता है और शूद्र गोत्र विहीन क्यों ?इस तथ्य को जरा विस्तार से बताएं,पलाश जी गोत्र प्रणाली तो बहुत से ट्राइब में भी देखने को मिलता है।द्विजों में भी जातियों का अस्तित्व है।
    • Ashok Dusadh कैसे 'मार्क्सवादी' है आप जो बात मैंने कही नहीं उसी को जबरदस्ती मेरे मुंह में ठूंस रहे है --मैंने मार्क्सवादियों के जवाब देने के लिए 'हिम्मत' की बात कभी नहीं की .दुसरे तरफ मैंने ये भी नहीं कहा की मैंने आपकी रिपोर्ट नहीं पढ़ी ..दोनों बातों के निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे आप ? तीसरी बात बहुत तरह की व्यस्तता होने की वजह से बहुत ज्यादा लिखना संभव नहीं हो पाता आपलोग की तरह जो फोकटिया के बुर्जुआ जीवनशैली में मार्क्सवादी क्रांति करते रहते है ,बस इस और इशारा था .
    • Satya Narayan " बहुत तरह की व्यस्तता होने की वजह से बहुत ज्यादा लिखना संभव नहीं हो पाता आपलोग की तरह जो फोकटिया के बुर्जुआ जीवनशैली में मार्क्सवादी क्रांति करते रहते है ,बस इस और इशारा था" जिन लोगों के बारे में आप ऐसी तोहमतें लगा रहे है वो तो मजदूर वर्ग में काम कर रहे है। आपके बारे में मै जानता नहीं इसलिए मैं ये तो नहीं कहुंगा कि आप आराम की जिंदगी जीते हुए ऐसी बातें कर रहे है। पर एक बात साफ है कि दुसरे लोग जिनके बारे में आप ये जानते तक नहीं है कि वो किन हालातों में ओर कहां काम कर रहे है, उनके बारे में आप ऐसी बातें करके अपने पूर्वाग्रहों को ही सामने ला रहे हैं।
    • Anand Singh यह बात सही है कि आपने हिम्‍मत शब्‍द का इस्‍तेमाल नहीं किया। परन्‍तु मुझे आपकी इस टिप्‍पणी का आशय यही लगा। ''इस पुरे विवाद के घटनाक्रम में बहुजन बुद्धिजीवी की सेल्फ डिफेन्स के चूप्पी बरतने वाला मैकेनिज्म आश्चर्यजनक ढंग से प्रकट हुआ ,केवल पलाश विश्वास /एच एल दुसाध को छोड़कर सब चुप है ,पता नहीं क्यों ?'' शब्‍दों से आहत होने की बजाय अन्‍तर्वस्‍तु पर बहस की जाये जो ज्‍यादा उचित होगा। दूसरी बात आप ही तो पिछले कुछ दिनों से यही कह रहे हैं कि पढ़कर विस्‍तृत आलोचना रखेंगे। तो इसका तो हम यही मतलब निकालेंगे न कि अभी तक आपने सभी लेख पढ़े नहीं हैं। पढ़ लिया है तो अच्‍छा है, नहीं पढ़ा है तो पढ़ लीजिये। और वीडियो भी उपलब्‍ध है, उनको भी देख लेंगे तो बहस ज्‍यादा सार्थक होगी।
    • Anand Singh ''केवल शूद्र वर्ण में जातियां होती है ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य वर्ण में जातियाँ नहीं होती'' - गलत। ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य में भी तमाम जातियां हैं। मिसाल के लिए महापात्र ब्राह्मण अछूत माने जाते रहे हैं क्‍योंकि वे अन्‍त्‍येष्टि संस्‍कार ही कराते हैं। उन ब्राह्मणों ने ज्‍़यादा तरक्‍की की जो पुरोहिती करने के अतिरिक्‍त भूस्‍वामी भी बने। ब्रह्म-क्षत्रिय जाति इसका प्रबल उदाहरण है। जो ब्राह्मण महज कर्मकांड और दानदक्षिणा में लगे रहे उनकी स्थिति सापेक्षत: खराब रही। क्षत्रियों की भी कई जातियां हैं जिनके वैविध्‍यपूर्ण स्रोत थे। मिसाल के लिए राजपूत जाति के शुरू से क्षत्रिय नहीं थी। इस जाति का निर्माण भारतीयकृत विदेशी तत्‍व, अन्‍य वर्णों से आने वाले सदस्‍य और देशज कबीलों के संलयन से हुआ। इसी तरह वैश्‍यों में भी उत्‍पादन और वितरण में अपनी अलग अलग स्थिति के अनुसार तमाम जातियां विकसित हुईं। हां यह बात कहना ज्‍़यादा उचित होगा कि शूद्रों में जातियों की संख्‍या कहीं ज्‍़यादा है। इसका कारण यह है कि उत्‍पादन में उनकी प्रत्‍यक्ष भूमिका की वजह से और उनकी बहुसंख्‍या की वजह से।
    • Ashok Dusadh मजदूर वर्ग में काम कर रहे है।---मजदूर वर्ग 'में ' काम कर रहे है , भाई मजदूर तो नहीं है न , वैसे मजदूर वर्ग 'में ' क्या काम कर रहे है ,भ्रम फैलाना की आंबेडकर साम्राज्यवादी पिट्ठू था ?
    • Satya Narayan जाकर काम करके देखो तो पता लगेगा
    • Ashok Dusadh ''ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य में भी तमाम जातियां हैं '' -यहीं पर आपकी जाति और वर्ण सम्बंधित समझ की पोल खुल गयी , कहाँ लिखा है की महापात्र ब्राह्मण और ब्राह्मण से नीच होता है , महापात्र को कहते है की हम सबसे ऊँचे ब्राह्मण है ,ब्राह्मण वर्ण में ऊँचता -नीचता का कोई शास्त्रीय प्रमाण नहीं है ,नहीं ही की ब्राह्मण ,वैश्य ,क्षत्रिय में कर्म -आधारित विभिन्न जातियां है ,जैसे शुद्रो में है ?जैसे कुम्हार मतलब -मिटटी का काम करनेवाला ,लोहार मतलब लोहा का काम करनेवाला ...आदि -इत्यादि ?
    • Anand Singh ''इस विषय पर चर्चा की गयी है की वर्ण के उत्पति का उद्गमव क्या था और जातियों के यानी शूद्र के बिच क्रमागत विभेद के कोई सह्त्यिक और पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलता है तो क्यों ? और क्यों इन शूद्र जातियों के परस्पर आपस में जातिभेद पनप गया ,जाति व्यस्था पर वर्ण का शास्त्रीय वर्ण -विभेद का असर क्योंकर हुआ कोई विश्लेषण ये मार्क्सवादी नहीं प्रस्तुत कर पाए ?'' गलत । आपकी ऐसी ही टिप्‍पणियों से हमे प्रतीत होता है कि आपने पेपर्स पूरे पढ़े नहीं हैं। सच तो यह है कि पेपर्स में वर्ण और जाति के उद्भव और विकास की सविस्‍तार चर्चा की गई और पांच दिनों में इस पर गरमागरम बहस भी हुई। कोई हमारी प्रस्‍थापनाओं से असहमत हो सकता है। परन्‍तु उसको तर्क तो देने ही होंगे और अपनी प्रस्‍थापना रखनी होगी कि उसके अनुसार जाति और वर्ण का उद्भभव कैसे हुआ।
    • Ashok Dusadh जी हाँ मैं आपलोग की प्रस्थापनाओ से असहमत हूँ ,क्योंकि वह वही प्रस्थापनाए है जो ब्राह्मणवाद की खाद पानी है ,बाकी थोडा सब्र रखिये कुतर्क का जवाब तर्क से दिया जाएगा .
    • Anand Singh क्‍या जाति के सन्‍दर्भ में हमारी समझ का एकमात्र ज़रिया शास्‍त्र हैं अथवा विभिन्‍न समूहों की वासत्‍विक भौतिक स्थिति और उत्‍पादन पद्धत्ति से उनका सन्‍बन्‍ध
    • Anand Singh अभी तक तो तर्क आया नहीं सिर्फ तोहमतें और गालियां ही सामने आयी हैं। चलिये तर्कों का भी इंतज़ार रहेगा।
    • Ashok Dusadh विभिन्न समूह क्यों बोल रहे है विभिन्न जाति और वर्ण क्यों नहीं ?!
    • Ashok Dusadh ,मेरा आरोप अनर्गल नहीं है इस पेपर में कहीं भी वर्ण की उद्भव का तार्किक विश्लेषण नहीं है न हीं इस इस बात का जवाब की इतिहास विभिन्न कालखंडो में तत्कालीन बहुसंख्यक शूद्र द्विज की सेवा करने के धार्मिक विश्वास को क्यों और कैसे आत्मसात कर जीवन के सारे उत्पादक कार्य जीवन जीने के न्यूनतम शर्तो पर करते रहे '' is tippni ko aap najarandaaj kar gaye ?
    • Anand Singh फिर आप अन्‍तर्वस्‍तु की बजाय शब्‍दों पर ही बहस कर रहे हैं। जाति और वर्ण को मैंने एक नाम दे दिया। चलिये जाति और वर्ण ही कह लीजिये और आगे की बात पर अपनी बात कहिये।
    • Anand Singh मैं तो दावे के साथ कह रहा हूं कि इस पेपर में वर्ण के उद्भव की तर्कसंगत व्‍याख्‍या पृष्‍ठ 10 से 15 के बीच और विभिन्‍न कालखंडों और विभिन्‍न क्षेत्रों में शूद्रों की स्थिति में आये बदलावों की भौतिकवादी व्‍याख्‍या पृष्‍ठ 16 से 21 के बीच मौजूद है। यदि आप इससे असहमत हैं तो इसके लिए अपना तर्क प्रस्‍तुत करें।
    • Ashok Dusadh आपका दावा ध्वस्त हो रहा है ,कुछ दिन और इन्तेजार कीजिये वह खंडहर नजर आएगा .
    • Anand Singh ''इतिहास विभिन्न कालखंडो में तत्कालीन बहुसंख्यक शूद्र द्विज की सेवा करने के धार्मिक विश्वास को क्यों और कैसे आत्मसात कर जीवन के सारे उत्पादक कार्य जीवन जीने के न्यूनतम शर्तो पर करते रहे'' यह तो सारी दुनिया के इतिहास में विभिन्‍न कालखंडों में देखने में आया है कि समाज में प्रभावी विचार शासक वर्ग के ही विचार होते हैं और शासित वर्गों में भी उसका असर रहता है। मिसाल के लिए मौजूदा पूंजीवादी व्‍यवसथा में भी तो शासक वर्गों के तमाम विचार आम मेहन‍तकश जनता में लोकप्रिय हैं। इसमें ऐसी कौन सी बात है जो आपको आश्‍चर्यजनक लगती है?
    • Ashok Dusadh fir aap gabada gaye !!
    • Anand Singh आप भरपूर समय लीजिये पर याद रहे कि तर्कसंगत दावों को महज़ खोखले दावों से नहीं बल्कि तर्क से ही खंडित किया जा सकता है।
    • Ashok Dusadh मैंने जो तर्क दिया उसका ही अभी तक तार्किक जवाब नहीं आया ,बाद में भी देखेंगे ?
    • Anand Singh आपने अभी तक कौन सा तर्क दिया महाशय। अभी तक तो आप सिर्फ समय की मांग ही कर रहे हैं। थोड़ा और specify कीजिये कि किस तर्क का तार्किक जवाब नहीं आया हैा
    • Ashok Dusadh आपको मेरा तर्क नहीं दिखेगा ,बेकार के मगजमारी कर रहे है आप और हम दो ध्रुव पर है आप आत्ममुग्ध रहे हमें चिंतन करने दे ,व्यर्थ के बकवाद से कोई फायदा नहीं .
    • Anand Singh अरे आप तो रूठ गये लग रहा है। मेरे द्वारा पूछे गये सवालों का जवाब तो आपको देना ही होगा जिस प्रकार आप मुझसे अपेक्षा करते हैं कि मैं आपके सवालों के जवाब दूं।
    • Satya Narayan चलिए आप चिंतन में लीन रहिये। जब आपका चिंतन पूरा हो जाये तो आप इस पेपर के जवाब में कुछ लिख दिजियेगा।
    • Ashok Dusadh आपने अभी तक सवाल ही नहीं पूछे ,पूर्वग्रह व्यक्त करना अलग बात है ,सवाल पूछना अलग .?
    • Anand Singh चलिये मैं फिर पूछता हूं 'थोड़ा और specify कीजिये कि किस तर्क का तार्किक जवाब नहीं आया हैा'
    • Satya Narayan चलिये सवालों को दुबारा से पूछ लेते हैं
      1 जाति व्‍यवस्‍था का उदभव कैसे हुआ
      2 जाति व्‍यवस्‍था को मिटाने के लिए क्‍या किया जाना चाहिए
      3 अंबेडकर का दर्शन जातियों को मिटाने में किस हद तक काम आ सकता है।

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