तो अब हो जायेगा भूमि सुधार?
हकीकत यह है कि देश में उत्तरआधुनिक उपभोक्ता संस्कृति और पूंजी के वर्चस्व के बावजूद सत्ता वर्ग आज भी सामंती है और ज्यादातर जमीन पर उसीका कब्जा है। उत्पादन प्रणाली ध्वस्त हो गयी, पर उत्पादन संबंधों का सामंती ढांचा आज भी जस का तस है। जातियों में बंटे समाज में राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व इन्हीं सामंती ढांचे के मुताबिक हैं, जो भारत के ज्ञात इतिहास में कभी बदला नहीं है। पूंजी वर्चस्व और सामंती समाज की दोहरी चुनौती का मुकाबला करते हुए एक कारपोरेट सरकार भूमि सुधार कार्यक्रम कैसे लागू करती है, जिसे कायदे से बंगाल में पैंतीस साल राज करने के बावजूद, तेभागा आंदोलनकी गौरवशाली विरासत के बावजूद वामपंथी तक नहीं लागू कर पाये, यह देखना सचमुच दिलचस्प है। जो किसान सत्याग्रह अश्वमेध यज्ञ रोकने की दिशा में सही पहल हो सकता था, भाजपाई सलवाजुड़ुम समर्थक एक मुख्यमंत्री के समर्थन के बाद अचानक समझौते में निष्णात हो गयी, हो गयी, इससे तो यह तेलंगना और श्रीकाकुलम, ढिमरी ब्लाक किसान विद्रोह की याद ताजा हो रही है।
एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
आर्थिक सुधारों की ओर सरकार द्वारा और कदम उठाने की उम्मीद से बाजार में भरोसा जागा।। डारेक्ट कैश यूरिया सब्सिडी पर फैसले के बाद देश की रेटिंग घटने का खतरा कम हुआ, जिससे बाजार उछले।सेंसेक्स 174 अंक चढ़कर 18805 और निफ्टी 56 अंक चढ़कर 5708 पर बंद हुए। दिग्गजों से ज्यादा तेजी छोटे और मझौले शेयरों ने दिखाई। निफ्टी मिडकैप 2 फीसदी और बीएसई स्मॉलकैप करीब 1 फीसदी चढ़े। एक और समझौता संपन्न हो गया।जनसत्याग्रही दिल्ली की तरफ बढ़ने के बजाय आगरा से ही लौट जाएंगे। जल, जंगल और जमीन के मुद्दे पर करीब 50 हजार आदिवासियों और किसानों के दिल्ली की तरफ बढ़ रहे ये कदम आज आगरा में थम गए। ग्वालियर से दिल्ली के लिए चला सत्याग्रह मार्च केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश के साथ समझौते के बाद स्थगित कर दिया गया है। क्या इस समझौते से देश में भूमि सुधार लागू हो जायेगा?सरकार ने कहा है कि जल्द ही भूमिसुधार के लिए टास्क फोर्स का गठन किया जाएगा।केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री की ओर से आंदोलन के नेता राजगोपाल पीवी के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किया। इसके तहत छह महीने में राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति बनाएगी। इसके तहत देश के हर भूमिहीन गरीब नागरिक को आवास लायक दस डिसमिल जमीन उपलब्ध करवाई जाएगी। साथ ही भूमि अधिग्रहण और विवाद से निपटने के लिए खास तौर पर लैंड ट्रिब्यूनल और फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाएगा। क्या राज्यों की सहमति है? क्या कारपोरेट लाबिइंग के खिलाफ जाकर केंद्र सरकार भूमि अधिग्रहण कानून बनायेगा? क्या भूमि अधिग्रहण कानून बदल जाने से भूमि सुधार लागू हो जायेगा? विकास के लिए विस्थापन रुक जायेगा? क्या संविधान की पांचवीं और छठीं अनुसूची को लागू किये बिना जल जंगल जमीन के हक हकूक मिल जायेंगे?धूसरे चरण के आर्थिक सुधार और विदेशी पूंजी के वर्चस्व, सरकार की आर्थिक नीतियों के बावजूद भूमि सुधार संभव है?ये सारे सवाल अभी अनुत्तरित है। भूमि और संसाधनों का समता और सामाजिक न्याय के सिद्धांत के आधार पर बंटवारा करने के लिए क्या कारपोरेट सरकार तैयार है?
इसी के मध्य उत्तर प्रदेश के कैमूर जिले के आदिवासी बहुल अधौरा प्रखंड में राष्ट्रीय वन जन श्रम जीवी मंच के द्वारा दो दिवसीय वनाधिकार सम्मेलन का आयोजन किया जायेगा। सम्मेलन में बिहार, यूपी, झारखंड के वनवासी शिरकत करेगे। सम्मेलन के माध्यम से वनाधिकार कानून को लागू करने के साथ वनवासियों को जल जंगल जमीन पर अधिकार दिये जाने की वर्तमान सरकार से मांग की जायेगी। यह बातें बुधवार को मंच की संगठन सचिव रोमा ने प्रेसवार्ता के दौरान कही। उन्होंने कहा कि वनाधिकार के लिए संसद द्वारा 2006 में कानून पारित किया गया। लेकिन बिहार में इस कानून को लागू करने की प्रक्रिया अभी तक शुरू नहीं की गयी है। जिसके चलते अभी वन विभाग की मनमानी एवं जमीदारी कैमूर के वनों में बदस्तूर जारी है। उन्होंने कहा कि इस कानून के बारे में राज्य सरकार ने किसी भी प्रकार का गंभीर कदम नहीं उठाया है। उन्होंने कहा कि वनाधिकार कानून को केन्द्र सरकार को इस लिए पारित करना पड़ा ताकि जंगलों से माओवादी गतिविधियों को समाप्त किया जाये। इस कानून के लागू नहीं होने से देश के अधिकांश वनों में वन विभाग द्वारा वनाश्रित समुदाय का उत्पीड़न किया जा रहा है। वनाधिकार कानून लागू होने के संबंध में कहा कि इस कानून से आदिवासी एवं वनाश्रित समुदाय को उनकी भूमि एवं जंगलों के समुदायिक अधिकारों का मालिकाना हक मिलेगा। उन्होंने कहा कि अधौरा के वनवासियों व जंगलों के समुचित विकास के लिए डीएम से भी मिलकर वनाधिकार कानून के संबंध में विचार किया। इस मौके पर राष्ट्रीय सलाहकार संजय गर्ग, महासचिव अशोक चौधरी, सचिव शांती भट्टाचार्या उपस्थित थी।
रमेश ने कहा, अगर हम मसौदा नीति पेश करने में विफल रहते हैं तो राजगोपाल को अपना आंदोलन फिर शुरू करने का पूरा अधिकार है। केंद्र सरकार लगातार इन सत्याग्रहियों को मनाने की कोशिश कर रही थी।ग्वालियर वार्ता टूटने के बाद समझौते का दूसरा चरण राजधानी दिल्ली में तब शुरू हुआ, जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद पहल की। उन्होंने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश को इसका दायित्व सौंपा और समझौता कराने तक वार्ता जारी रखने को कहा। इसका जिक्र सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में जयराम ने किया था। समझौते से पहले इन सत्याग्रहियों को समर्थन देने गुरुवार को एमपी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पत्नी साधना सिंह और महिला बाल विकास मंत्री रंजना बघेल के साथ आगरा पहुंचे और उनके साथ पदयात्रा में भी शामिल हुए।इस मौके पर मुख्यमंत्री ने कहा कि एमपी में गरीब भूमिहीन जहां काबिज हैं उन्हें उस जगह का पट्टा दे दिया जाएगा चाहे वह सरकारी जगह हो या गैर सरकारी। उन्होंने केन्द्र सरकार से जल्द से जल्द राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति लाने की मांग करते हुए कहा है कि राज्य सरकार भी इसे पूरी तरह से लागू करेगी।
सत्याग्रह की अगुवाई कर रहे नेता राज गोपाल ने आगरा में ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश के समक्ष इसकी घोषणा की और समझौता पत्र दिखाते हुए कहा यदि छह माह के भीतर समझौते पर अमल नहीं किया गया तो फिर से दिल्ली कूच किया जाएगा।
समझौते के वक्त मंच पर प्रख्यात गांधीवादी एन सुब्बाराव, जलपुरुष राजेंद्र सिंह, बंधुआ मुक्ति मोर्चा के संयोजक स्वामी अग्निवेश, बिहार विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी, पूर्व सांसद संतोष भारती, समाजसेवी डॉ. देव हरडे, ज्योति बहन और बाल विजय भी मौजूद थे।
समझौते के तहत ग्रामीण विकास मंत्रालय तुरंत राज्यों से बातचीत शुरू करेगा और अगले चार छह माह में भूमि सुधार नीति का एक मसौदा तैयार कर लेगा जिसे सार्वजनिक बहस के लिये पेश किया जाएगा और उसके बाद इसे जल्दी ही अंतिम रूप दे दिया जाएगा।राज्य सरकारों के विचार जानने के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय अगले दो माह में विस्तृत परामर्श जारी करेगा ताकि वे दलितों एवं आदिवासियों के अधिकारों से संबन्धित कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन पर ध्यान केन्द्रित कर सकें। समझौते में कहा गया है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय परामशरें के जरिये राज्य सरकारों को समझाने का प्रयास करने के साथ ही इस बात के लिए उनका समर्थन करेगा कि वह हाशिये पर रहने वाले विशिष्ट श्रेणी के वंचित एवं भूमिहीन किसानों को भूमि की पहुंच मुहैया कराने के लिए समयबद्ध कार्यक्रम शुरू करें। अनुसूचित क्षेत्र में वन अधिकार कानून (एफआरए) पंचायत विस्तार प्रभावी रूप से लागू करने के लिए सरकार राज्यों और संबंधित विभाग एवं मंत्रालयों के साथ विस्तृत सलाह मशविरा करने को सहमत हुई।
बंगाल में वामपंथी सरकार ने बाकायदा भूमि सुधार कार्यक्रम लागू किया था। ज्योति बसु की सरकार को बर्खास्त करने वाले बंगाल के पूर्व राज्यपाल स्वर्गीय धर्मवीर जैसे लोग भूमि सुधार कार्यक्रम को ही बंगाल में वामपंथियों के जनाधार की नींव मानते रहे हैं। पर किसानों, भूमिहीनों और आदिवासियों को इस कार्यक्रम से अगर जल जंगल जमीन के हक हकूक मिल गये होते, तो नक्सलवादी माओवादी आंदोलन की गुंजाइश ही नहीं बनती। कहा जाता है कि भूमि सुधार कार्यक्रम की चुनौती की अभिज्ञता के मद्देनजर इस कार्यभार को टालने के लिए ही बंगाल के माकपाई केंद्र सरकार में शामिल होने का हमेशा विरोध करते रहे हैं। हकीकत यह है कि देश में उत्तरआधुनिक उपभोक्ता संस्कृति और पूंजी के वर्चस्व के बावजूद सत्ता वर्ग आज भी सामंती है और ज्यादातर जमीन पर उसीका कब्जा है। उत्पादन प्रणाली ध्वस्त हो गयी, पर उत्पादन संबंधों का सामंती ढांचा आज भी जस का तस है। जातियों में बंटे समाज में राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व इन्हीं सामंती ढांचे के मुताबिक हैं, जो भारत के ज्ञात इतिहास में कभी बदला नहीं है। पूंजी वर्चस्व और सामंती समाज की दोहरी चुनौती का मुकाबला करते हुए एक कारपोरेट सरकार भूमि सुधार कार्यक्रम कैसे लागू करती है, जिसे कायदे से बंगाल में पैंतीस साल राज करने के बावजूद, तेभागा आंदोलनकी गौरवशाली विरासत के बावजूद वामपंथी तक नहीं लागू कर पाये, यह देखना सचमुच दिलचस्प है। जो किसान सत्याग्रह अश्वमेध यज्ञ रोकने की दिशा में सही पहल हो सकता था, भाजपाई सलवाजुड़ुम समर्थक एक मुख्यमंत्री के समर्थन के बाद अचानक समझौते में निष्णात हो गयी, हो गयी, इससे तो यह तेलंगना और श्रीकाकुलम, ढिमरी ब्लाक किसान विद्रोह की याद ताजा हो रही है।
जल, जंगल और जमीन पर अधिकार की मांग को लेकर गांधी जयंती के दिन ग्वालियर से शुरू हुई जन सत्याग्रह पदयात्रा को बीच रास्ते में ही मंजिल मिल गई। 40 हजार से अधिक भूमिहीनों का नेतृत्व कर रहे राजगोपाल पीवी ने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की ओर से प्रस्तुत समझौते को स्वीकार करते हुए गुरुवार को उस पर हस्ताक्षर कर दिए। केंद्र सरकार ने सत्याग्रहियों की सभी दस मांगें मान ली हैं। राजगोपाल ने पदयात्रा स्थगित करने की घोषणा करते हुए कहा कि यदि छह महीने में करार पर अमल न हुआ तो आगरा से ही दिल्ली कूच होगा। केंद्र सरकार समझौता कर भूमिहीन आदिवासियों को मनाने में भले ही सफल हो गई हो, लेकिन अब उसकी राह और कठिन हो गई है। राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति तैयार करने पर सहमति तो बन गई है, लेकिन जमीन संबंधी मसलों को सुलझाने के लिए राज्यों को ही आगे आना होगा। समझौता-पत्र में दर्ज मांगों में ज्यादातर का ताल्लुक राज्यों से है, जिन्हें पूरा कर पाना अकेले केंद्र के बस की बात नहीं है। जो काम केंद्र सरकार अब तक नहीं कर पाई, उसे अगले छह महीने में पूरा करना होगा।आगरा के समझौता-पत्र में सभी 10 मांगों को पूरा करने के लिए समयबद्ध कार्यक्रम निश्चित किया गया है। इसी निर्धारित समय में केंद्र सरकार राज्यों को मनाएगी भी। गैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और उनकी सरकारें भला केंद्र की मंशा कैसे पूरा होने देंगी? इससे आने वाले दिनों में राजनीतिक रार के बढ़ने के आसार हैं। हालांकि भाजपा शासित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक दिन पहले ही भूमिहीन आदिवासी और अनुसूचित जाति के लोगों की मांगों को पूरा करने के लिए तमाम वायदे कर चुके हैं। समझौते के मुताबिक अधिकतर मांगों पर राज्यों को ही काम करना है। एकता परिषद के नेता पीवी राजगोपाल का स्पष्ट कहना है कि केंद्र सरकार इन मांगों के लिए राज्यों पर दबाव बनाए। इसके लिए राज्य के मुख्यमंत्री, राजस्व मंत्री और उनके आला अफसरों के साथ विचार-विमर्श करे।
आगरा समझौते के मुख्य बिंदु:-
-राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति का छह माह में मसौदा तैयार होगा।
-भूमि सुधार संबंधी कार्यदल का केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री की अध्यक्षता में गठन। 17 अक्टूबर को होगी विशेष बैठक।
-कृषि एवं आवासीय भूमि के वैधानिक अधिकार : हर भूमिहीन को कृषि और रहने के लिए भूमि की गारंटी होगी।
-वास भूमि : इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत रहने के लिए लगभग 4350 वर्ग फुट जमीन।
-गरीबों, सीमांत किसानों और भूमिहीनों के लिए भूमि उपलब्धता और भूमि अधिकारों में बढ़ोतरी।
-भूमि के मामलों में न्याय के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन।
-पंचायत अधिनियम का प्रभावी कार्यान्वयन।
-वन अधिकार अधिनियम 2006 का प्रभावी कार्यान्वयन।
-वन तथा राजस्व सीमा विवाद : वन एवं राजस्व विभागों के संयुक्त दल का गठन।
-सामुदायिक संसाधनों का सर्वेक्षण एवं नियंत्रण
सफर सत्याग्रह का
-वर्ष 2006 : 500 सत्याग्रहियों की दिल्ली तक पदयात्रा।
-वर्ष 2007 : 25 हजार सत्याग्रहियों की दिल्ली तक पदयात्रा।
-वर्ष 2010 : 12500 सत्याग्रहियों का संसद के बाहर तीन दिन धरना।
-वर्ष 2011 : देश में 80 हजार किमी यात्रा कर जागरूकता अभियान।
-वर्ष 2012 : चालीस हजार सत्याग्रहियों के साथ ग्वालियर से दिल्ली कूच। आगरा में समझौता।
व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई के नायक जयप्रकाश नारायण की जयंती पर आगरा के सीओडी मैदान में 26 प्रांतों के भूमिहीनों के सामने केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश और कांग्रेस सांसद राज बब्बर ने सभी मांगें मानने की घोषणा की। इनमें हर भूमिहीन को घर और खेती की जमीन के अधिकार की बात शामिल है। दस्तखत होते ही वातावरण में 'जय जगत' के नारे गूंजने शुरू हो गए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हस्तक्षेप के बाद वार्ता सफल हुई।
गुरुवार दोपहर लगभग 12.15 बजे जयराम रमेश मसौदा लेकर आगरा पहुंचे। उसके बाद गांधीवादी नेता व एकता परिषद के अध्यक्ष राजगोपाल पीवी ने समझौते के सभी दस बिंदुओं की जानकारी मंच से दी। सत्याग्रहियों ने समझौते को स्वीकार करके 'हां' की आवाज बुलंद की, तब राजगोपाल व जयराम रमेश ने मसौदे पर हस्ताक्षर किए।
राजगोपाल ने कहा कि झंडा लहराकर जीत का जश्न मना लें, क्योंकि यह आसानी से नहीं मिली। आंदोलन की सफलता के पीछे गरीबों के भूखे रहने, नंगे पैर चलने, खुले आसमान के नीचे सोने की शक्ति है। यह कमजोरी नहीं, बल्कि वह ताकत है, जो देश की तस्वीर बदलेगी। जयराम रमेश ने कहा कि आज ऐतिहासिक दिन है। हम ग्वालियर में ही समझौता करना चाहते थे, लेकिन कुछ कारणों से नहीं हो सका। यह हस्ताक्षर तो छोटा सा मुकाम है। अब आगे बहुत काम करना है। समझौते के तहत जो कार्य दल बनाया गया है, उसकी पहली बैठक 17 अक्टूबर को होगी, जिसमें रोडमैप तैयार होगा। अब आगे आंदोलन की जरूरत नहीं पड़ेगी। जयराम यह कहने से नहीं चूके कि राजगोपाल ने सिर्फ केंद्र सरकार को निशाना बनाया, जबकि संविधान के अनुसार भूमि सुधार का जिम्मा राज्य सरकारों का है। राजगोपाल राज्यों पर भी दबाव बनाएं।
मौजूदा नियम व कानूनों को धता बताकर बड़ी संख्या में आदिवासियों की जमीनों पर गैर आदिवासियों के कब्जे को हटाकर उन्हें उनका हक दिलाना एक बड़ी समस्या है। अनुसूचित जातियों और आदिवासियों को आवंटित जमीनों का हस्तांतरण करना भी राज्यों के अधिकार क्षेत्र का मसला है। उद्योगों को लीज अथवा अन्य विकास परियोजनाओं के लिए अधिग्रहीत जमीनों का बड़ा हिस्सा सालों-साल से उपयोग नहीं हो रहा है। खाली पड़ी इन जमीनों को दोबारा भूमिहीनों में वितरित करना होगा और आदिवासी और अनुसूचित जाति के लोगों की परती और असिंचित भूमि को मनरेगा के माध्यम के उपजाऊ बनाने पर जोर देना होगा।
Thursday, October 11, 2012
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