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Sunday, July 21, 2013

Jagadishwar Chaturvedi वेदव्यास भारत का पहला दलित लेखक है और आदिगुरू है।

 वेदव्यास भारत का पहला दलित लेखक है और आदिगुरू है।
आज गुरूपूर्णिमा है- 

हिन्दी में दलितलेखकों का एकदल है जो भारतीय परंपरा से अनभिज्ञ है,उनके लिए यह कथा प्रेरक का काम कर सकती है। वेदव्यास भारत का पहला दलित लेखक है और आदिगुरू है। यह पौराणिक कहानी है और इसमें मिलावट नहीं है। वेदव्यास को पहला दलितलेखक मानेंगे तो दलितसाहित्य में दलित लेखकों की उपेक्षा की पीड़ा शायद कुछ कम हो जाए। पढ़ें यह कहानी -
प्राचीन काल में सुधन्वा नाम के एक राजा थे। वे एक दिन आखेट के लिये वन गये। उनके जाने के बाद ही उनकी पत्नी रजस्वला हो गई। उसने इस समाचार को अपनी शिकारी पक्षी के माध्यम से राजा के पास भिजवाया। समाचार पाकर महाराज सुधन्वा ने एक दोने में अपना वीर्य निकाल कर पक्षी को दे दिया। पक्षी उस दोने को राजा की पत्नी के पास पहुँचाने आकाश में उड़ चला। मार्ग में उस शिकारी पक्षी को एक दूसरी शिकारी पक्षी मिल गया। दोनों पक्षियों में युद्ध होने लगा। युद्ध के दौरान वह दोना पक्षी के पंजे से छूट कर यमुना में जा गिरा। यमुना में ब्रह्मा के शाप से मछली बनी एक अप्सरा रहती थी। मछली रूपी अप्सरा दोने में बहते हुये वीर्य को निगल गई तथा उसके प्रभाव से वह गर्भवती हो गई। गर्भ पूर्ण होने पर एक निषाद ने उस मछली को अपने जाल में फँसा लिया। निषाद ने जब मछली को चीरा तो उसके पेट से एक बालक तथा एक बालिका निकली। निषाद उन शिशुओं को लेकर महाराज सुधन्वा के पास गया। महाराज सुधन्वा के पुत्र न होने के कारण उन्होंने बालक को अपने पास रख लिया जिसका नाम मत्स्यराज हुआ। बालिका निषाद के पास ही रह गई और उसका नाम मत्स्यगंधा रखा गया क्योंकि उसके अंगों से मछली की गंध निकलती थी। उस कन्या को सत्यवती के नाम से भी जाना जाता है। बड़ी होने पर वह नाव खेने का कार्य करने लगी एक बार पाराशर मुनि को उसकी नाव पर बैठ कर यमुना पार करना पड़ा। पाराशर मुनि सत्यवती रूप-सौन्दर्य पर आसक्त हो गये और बोले, "देवि! मैं तुम्हारे साथ सहवास करना चाहता हूँ।" सत्यवती ने कहा, "मुनिवर! आप ब्रह्मज्ञानी हैं और मैं निषाद कन्या। हमारा सहवास सम्भव नहीं है।" तब पाराशर मुनि बोले, "बालिके! तुम चिन्ता मत करो। प्रसूति होने पर भी तुम कुमारी ही रहोगी।" इतना कह कर उन्होंने अपने योगबल से चारों ओर घने कुहरे का जाल रच दिया और सत्यवती के साथ भोग किया। तत्पश्चात् उसे आशीर्वाद देते हुये कहा, तुम्हारे शरीर से जो मछली की गंध निकलती है वह सुगन्ध में परिवर्तित हो जायेगी।"

समय आने पर सत्यवती गर्भ से वेद वेदांगों में पारंगत एक पुत्र हुआ। जन्म होते ही वह बालक बड़ा हो गया और अपनी माता से बोला, "माता! तू जब कभी भी विपत्ति में मुझे स्मरण करेगी, मैं उपस्थित हो जाउँगा।" इतना कह कर वे तपस्या करने के लिये द्वैपायन द्वीप चले गये। द्वैपायन द्वीप में तपस्या करने तथा उनके शरीर का रंग काला होने के कारण उन्हे कृष्ण द्वैपायन कहा जाने लगा। आगे चल कर वेदों का भाष्य करने के कारण वे वेदव्यास के नाम से विख्यात हुए।

1 comment:

  1. झुठी कथाओं का सहारा लेकर आज के विज्ञान युग में अंधश्रध्‍दा फैलाना बहुत पातक है। तर्कहिन कथाओं का सहारा लेकर व्‍यास को गुरु कहना एक तो अज्ञानता हो सकती है या चालाखी ।
    लेखक महोदय पहले ये जान लें कि गुरु किसे कहा ?
    किसी कोई लेखक, शिक्षक या साहित्‍यकार कैसे हो सकता ?
    गुरू वह जो जीवन मूल्‍यों पुनर्निधारित कर विश्‍व के समस्‍त मानव को उनके जीनव उत्‍कर्ष के लिए मार्गदर्शन करता हो।
    इस सीधी सी परिभाषा में भी यदि परखें तो विश्‍व में सिवाय बुध्‍द के और कौन गुरू हो सकता है।
    सच्‍चाई यह है कि बुध्‍द ने 2500 वर्ष पूर्व अपना सम्‍यक ज्ञान प्रथमत: पांच परिव्राजको को इसी पुर्णिमा के दिन उदघाटित किया । बुध्‍द स्‍वयं को इश्‍वर, भगवान नही मानते थे। वे स्‍वयं को मोक्षदाता न कह कर मार्गदाता कहते थे। इसिलिए बुध्‍द को गुरू कहा गया। जिसने समस्‍त मानव जाती के लिए एक सम्‍यक जीवन मार्ग दिया । यह सब विश्‍व मे पहली बार हुआ था। इस अर्थ से बुध्‍द के लिए गरु पोर्णिमा मनाई जाती है। हिंदू धर्म में प्रत्‍येक व्‍यक्‍ती के लिए अलग से एक गुरु है। इन व्‍यक्‍तीगत गुरुओं को सम्‍मनित करने के लिए यह गुरू पोर्णिमा बिलकुल नही है। हिंदूओं ने इस गुरू पोर्णिमा के लिए अनेक व्‍यक्तियों के नाम सुझाने का प्रयास किया है। हालाकि बुध्‍द को नामशेष करने का ही वे प्रसाय कर रहे है। इसिलिए कभी व्‍यास तो कभी वाल्‍मीकी या फिर शंकराचार्य जैसे नामों का उल्‍लेख किया जाता रहा है।

    बुध्‍द भगवान नही थे इश्‍वर नही थे वे केवल मागदर्शक थे और इस अर्थ में वे गुरू थे और उसी के सम्‍मान में गुरु पोर्णिमा मनाई जाती है।


    शोक वानखडे
    9420467543

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