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Sunday, March 16, 2014

आज जाति वर्चस्व का जो आलम है, उसका तार्किक परिणाम ही हिन्दू राष्ट्र है

आज जाति वर्चस्व का जो आलम है, उसका तार्किक परिणाम ही हिन्दू राष्ट्र है

आज जाति वर्चस्व का जो आलम है, उसका तार्किक परिणाम ही हिन्दू राष्ट्र है


तिलिस्म तोड़े बिना दिशाएं गायब ही रहेंगी और इस रात की सुबह असम्भव है

सामाजिक यथार्थ की दृष्टि के बिना व्यवस्था के खिलाफ हर लड़ाई विचलन के लिये अभिशप्त है

लेकिन पता नहीं बिरसा के आदिवासी दर्शन से लोगों को इतनी चिढ़ क्यों है?…. भारतीय संसद में अंबेडकर के समर्थन में आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा के मूलनिवासी होने का दावा हम न जाति विमर्श में न वर्ग संवाद में समझ सकते हैं।

पलाश विश्वास

आदिवासियों का साम्राज्यवाद के विरुद्धसामंतवाद के विरुद्ध महासंग्राम हमारे इतिहास के सबसे उज्ज्वल अध्याय हैं, जिनसे न जुड़ पाने की वजह से मुक्त बाजार में हम आज इतने असहाय हैं।

भारतीय संसद में अंबेडकर के समर्थन में आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा के मूलनिवासी होने का दावा हम न जाति विमर्श में न वर्ग संवाद में समझ सकते हैं।

मुक्त बाजार के परिदृश्य में पूँजी समर्थक विचारधारा, संगठन, समाज और संसdकृति का ही विकास सम्भव है।अबाध आवारा पूँजी के हितों के माफिक है हिन्दुत्व का यह पुनरुत्थान। जबकि इसके मुकाबले सिरे से विचारधाराएं और आन्दोलन अदृश्य है। बंगाल में वाम अवसान के बाद ही केसरिया ताज महल की नींव बनने लगी है। जबकि हिन्दू महासभा की राजनीति का गढ़ अखण्ड बंगाल था। भारतीय जनसंघ की स्थापना भी बंगाल के श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही की थी। लेकिन वाम विचारधारा और आन्दोलन की वजह से बंगाल की जमीन पर 1977 से लेकर ममता बनर्जी के उत्थान के दरम्यान हिन्दुत्व की खेती नहीं हो सकी। विचारधारा का मुकाबला विचारधारा से ही सम्भव है। संगठन का मुकाबला संगठन से ही सम्भव है। राज्यतन्त्र की समझ के बिना सामाजिक यथार्थ की दृष्टि से रचनाकर्म करना असम्भव है तो इतिहासबोध से लैस वैज्ञानिक दृष्टिकोण आधारित सौंदर्यबोध के बिना किसी भी तरह का मूल्यांकन नाजायज है। राज्यतन्त्र की समझ के बिना, सामाजिक यथार्थकी दृष्टि के बिना व्यवस्था के खिलाफ हर लड़ाई विचलन के लिये अभिशप्त है। व्यक्ति को न विचारधारा के खिलाफ और न संगठन के खिलाफ कोई हथियार बनाया जा सकता है। आदिक्रांति के जनक स्पार्टकस और गौतम बुद्ध भी संस्थागत संगठन और आन्दोलन के जरिये गुलामी के तन्त्र को तोड़ने में कामयाब हुए, व्यक्तिगत करिश्मे की वजह से नहीं।

तन्त्र के खिलाफ सुनियोजित संगठनात्मक संस्थागत जनान्दोलन की जमीन तैयार किये बिना किसी मसीहा की जादू की छड़ी या करिश्माई मंत्र से व्यवस्था परिवर्तन की दिशा का निर्माण नहीं कर सकते। तिलिस्म जो बन गया है, उसे तोड़े बिना दिशाएं गायब ही रहेंगी और इस रात की सुबह असम्भव है।

जिस मण्डल क्रांति के गर्भ से कमण्डल का जन्म हुआ, उसमें पिछड़ी जातियों के लिये आरक्षण की कोई व्यवस्था ही नहीं थी। मण्डल के तहत आरक्षण पिछड़े वर्गों के लिये है। पिछड़े वर्गं में अल्पसंख्यक और सवर्ण दोनों शामिल हैं। लेकिन राजनीति ने अदर बैकवर्ड कम्युनिटीज को अदर बैकवर्ड कास्ट बनाकर देश में हिन्दुत्व का पुनरूत्थान रच दिया। इसी तरह अंबेडकर की लड़ाई अस्पृश्यता के विरुद्ध थी। सामाजिक न्याय और समता के लिये उनकी लड़ाई थी। लेकिन वे अपने को वर्किंग क्लास का नेता कहते थे। अपने समूचे लेखन में उन्होंने सिर्फ जाति उन्मूलन की बात की है, जाति पहचान की बात कभी नहीं की। उन्होंने शिड्युल्ड कास्ट एसोसिएशन के जरिये कांग्रेस और मुस्लिम लीग की राजनीति से इतर मूक बहुसंख्य जनता को अलग पहचान दी लेकिन वे तब भी डिप्रेस्ड क्लास की ही बात कर रहे थे। अंबेडकर का सारा जीवन जाति के अंत के लक्ष्य को समर्पित था। जब उन्हें हिन्दू धर्म में ऐसा असम्भव लगा तो उन्होंने धर्मान्तरण के लिये जाति व्यवस्था के हिन्दुत्व को तिलांजलि दे दी।

But the world owes much to rebels who would dare to argue in the face of the pontiff and insist that he is not infallible.

-Babasaheb Ambedkar

In the fight for Swaraj you fight with the whole nation on your side…[but to annihilate the caste], you have to fight against the whole nation—and that too, your own. But it is more important than Swaraj. There is no use having Swaraj, if you cannot defend it. More important than the question of defending Swaraj is the question of defending the Hindus under the Swaraj. In my opinion, it is only when Hindu Society becomes a casteless society that it can hope to have strength enough to defend itself. Without such internal strength, Swaraj for Hindus may turn out to be only a step towards slavery. Good-bye, and good wishes for your success.

-B.R. Ambedkar

अंबेडकर के इस वक्तव्य में साफ जाहिर है कि अगर भारत में स्वराज कायम करना है तो जाति विहीन हिन्दू समाज की स्थापना के बिना ऐसा असम्भव है।

आज जाति वर्चस्व का जो आलम है, उसका तार्किक परिणाम ही हिन्दू राष्ट्र है। भारत राष्ट्र इस अमोघ नियति का शिकार इसलिये हो रहा है क्योंकि 15 अगस्त, 1947 से भारतीय राजनीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर कदम जाति को मजबूत बनाता रहा है।

विडम्बना तो यह है हजारों साल से जो जाति बहिष्कृत समुदायों को गुलाम बनाये रखने में कामयाब है, उस गुलामी का सिलसिला तोड़ने के लिये अपने आवारा मसीहा संप्रदाय की अगुवाई में आजादी के ख्वाहिश में अंबेडकर के नाम उसी जाति को अपना वजूद मानकर सामाजिक न्याय और समता का अभियान चला रहे हैं लोग।

मुंबई में आज हरिचांद ठाकुर का जन्मोत्सव मनाया जा रहा है, जो नील विद्रोह के नेता थे और जाति अस्मिताके बिना वर्चस्ववादी ब्राह्मण धर्म को तोड़ने के लिये जिन्होंने मतुआ आन्दोलन को जन्म दिया। उनका मुख्य नारा भूमि सुधार था, जो आदिवासी और किसान विद्रोहों की विरासत के ही मुताबिक था। हरिचांद ठाकुर की लड़ाई अस्मिता की लड़ाई नहीं थी और न महात्मा ज्योतिबा फूले की। वे राजनीति नहीं कर रहे थे और न सत्ता समीकरण के मुताबिक मौसम बेमौसम रंग बदलने वाले गिरगिट थे वे। हरिचांद ठाकुर और ज्यतिबा फूले दोनों बहुसंख्य जनता के सशक्तिकरण के लिये शिक्षा आन्दोलन चला रहे थे।

संजोग से बंगाल में जो प्रगतिशील आन्दोलन नवजागरण मार्फत शुरु हुआ, वह भी ईश्वरचंद्र विद्यासागर के शिक्षा आन्दोलन से प्रारंभ हुआ। औपनिवेशिक शासन और सामंतवाद से लड़ने के लिये अस्मिता राजनीति के बजाय भारतीय जन गण के लगभग अपढ़ और पढ़े लिखे भी, पुरखों ने अस्मिताओं की बजाय कमजोर तबकों, पिछड़ों,अस्पृश्यों के सशक्तिकरण का आन्दोलन चलाया।

अय्यंकाली का केरल में कृषि समाज को एकजुट करके चलाया गया कृषि हड़ताल की तो दूसरी कोई नजीर भी नहीं है। चुआड़ विद्रोह के बारे में लिखा बहुत कम उपलब्ध है। इस पर गौरीपद चटर्जी की एक महत्वपूर्ण पुस्तकमिदनापुरःफोररनर्स आफ इंडियाज फ्रीडम स्ट्रगल है।हमने नंदीग्राम सिंगुर जनविद्रोह के दौरान 2007 में कुछ दस्तावेज डेनिश नार्वे डच आर्काइव से निकालकर अपने ब्लागों पर कुछ लेख लिखे थे। तब जिस प्लेटफार्म में ब्लागिंग हती थी, वह अब हैं ही नहीं, वे दस्तावेज हासिल नहीं कर सकते। नये सिरे से खोज करनी होगी। लेकिन आप चाहे तो इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें। इसका लिंक इस प्रकार हैः -

http://books.google.co.in/books?id=75-a8FSPmvQC&pg=PA6&lpg=PA6&dq=First+Chuar+Rebellion+(1767.)&source=bl&ots=rEFYEp4Gz5&sig=ALlEcA2uUT823OsrvqBqAgohVng&hl=en&sa=X&ei=QwQiU6bqJ4aYrgfG8IDIDg&ved=0CCgQ6AEwAA#v=onepage&q=First%20Chuar%20Rebellion%20(1767.)&f=false

चुआड़ विद्रोह शामिल लोग सभी जातियों और धर्मों के भारतीयराजे रजवाड़े महाराष्ट्र से लेकर पूर्वी बंगाल, असम, मध्य भारत, आंध्र बिहार, झारखण्ड और ओड़ीशा तक ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ लड़ रहे थे। खासकर बंगाल, ओड़ीशा, झारखण्ड और बिहार में तो चुआड़ विद्रोह ने ईस्टइंडिया कंपनी की नाक में दम कर दिया था।

इन बागियों को चोर चूहाड़ अपराधी बताकर और उनके विद्रोह को चुआड़ यानी चूहाड़ विद्रोह बताकर बेररहमी से दबाया गया। बागियों के थोक दरों पर सूली पर चढ़ा दिया गया। फांसी पर लटकाया गया। लेकिन भारतीय इतिहास में इस विद्रोह की कोई चर्चा ही नहीं है।

Warren Hastings failed to quell the Chuar uprisings. The district administrator to Bankura wrote in his diary in 1787 that the Chuar revolt was so widespread and fierce that temporarily, the Company's rule had vanished from the district of Bankura. Finally in 1799 the Governor General, Wellesley crushed these uprisings by a pincer attack. An area near Salboni in Midnapore district, in whose mango grove many rebels were hung from trees by the British, is still known by local villagers as "the heath of the hanging upland", Phansi Dangar Math. Some years later under the leadership of Jagabandhu the paymaster or Bakshi (of the infantry of the Puri Raja), there was the well-known widespread Paik or retainer uprising in Orissa. In 1793 the Governor General Cornwallis initiated in the entire Presidency of Bengal a new form of Permanent Settlement of revenue to loyal landlords. This led to misfortunes for the toiling peasantry: in time they would protest against this as well.

आदिवासी विद्रोहों को आदरणीया महाश्वेता देवी ने कथा साहित्य का विषय बना दिया। उनका अरण्येर अधिकारउपन्यास कम दस्तावेज ज्यादा है। वरना हिंदी और बांग्ला और दूसरी भारतीय भाषाओं के लोग बिरसा मुंडा के बारे में वैसे ही अनजान होते जितने सिधो कान्हों, टांट्या भील, तीतूमीर के बारे में।

 हमारा जो मुख्य मुद्दा है वह यह है कि आजादी के बाद तक तेभागा और खाद्य आन्दोलन और यहां तक कि नक्सलबाड़ी जनविद्रोह में जो समूचा कृषि समाज संघठित प्रतिरोध संघर्ष में एकताबद्ध रहा,वह पराधीन भारत में किसानों और आदिवासियों का सम्मिलित कृषि समाज रहा है,जिसमें शूद्रों और अछूतों और मुसलमानों की नेतृत्वकारी विरासत थी,उसे हम कहां छोड़ आये।  वह दरअसल छूटा नहीं, अस्मिता जाति पहचान वर्ग विमर्श के घटाटोप में बिखरता चला गया और हमें इसका होश ही नहीं रहा। सरेराह चलते चलते धोती लंगोट उतर गयी, हमें पता ही न चला। आज हिन्दुत्व पुनरुत्थान के इस मुक्तबाजारी जायनवादी समय में हमें अगर मुकाबले में कहीं खड़ा होना है, तो अपनी उस गौरवशाली विरासत में प्रतिरोध की जमीन खोजनी होगी। चूहों की मातबरी में कम से कम परिवर्तन या क्रांति असम्भव है, इस बुनियादी तथ्य को दिमाग में तौल लें और फिर मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य और उसके मद्देनजर अपनी भूमिका तय करें, तभी हम कुछ कर सकते हैं। 

आम लोगों को सत्ता, राजनीति, राष्ट्र, समाज और अर्थव्यव्स्था में हो रहे बदलाव के बारे में सही सही सूचना ही नहीं हो पाती। इसलिये वे भाव वादी तरीके से सोच रहे होते हैं।

जाति पहचान के जरिये सशक्तीकरण के फायदे पाने वाली जातियों के नाम गिना दीजिये तो बाकी छह हजार जातियों की जाति अंधता का औचित्य पानी की तरह सरल हो जायेगा।

हमारे हिसाब से तो भ्रष्टाचार की जड़ है यह जाति व्यवस्था और उसकी विशुद्धता का सिद्धांत। वर्णवर्चस्वी इंतजामात में भ्रष्टाचार का कारखाना है और वंशवादी वायरल से बचता नहीं कोई छोटा या बड़ा। जाति और विवाह के जटिल प्रबंधकीय खर्च के लिये ही बेहिसाब अकूत संपत्ति अर्जित करने की जरुरत होती है।

बंगाल में 35 साल के वाम शासन से और जो हुआ हो, उससे इतना तो जरूर हुआ है कि वैवाहिक संबंधों में जाति धर्म या भाषा का टंटा खत्म है और दहेज न होने की वजह से सार्वजनिक जीवन में तमाम समस्याओं और आर्थिक बदहाली के बावजूद लोग तनावरहित आनंद में हैं।

जहां जाति का बवंडर ज्यादा है, वहां अंधाधुंध कमाने की गरज बाकायदा कन्यादायी पिता की असहाय मजबूरी है। उत्तर भारतीय परिवार और समाज में ज्यादा घना इस जाति घनघटाओं की वजह से ही हैं।

जाति राजनीति की वजह से आप प्लेटो में परोसे जाने वाले मुर्ग मुसल्लम को रहमोकरम पर हैं।

आप जाति उन्मूलन कर दीजिये। विवाह सम्बंधों को खुल्ला कर दीजिये, भ्रष्टाचार की सामाजिक जड़ें खत्म हो जायेंगी।

आदरणीय एके पंकज ने जो सवाल किया है, उसके जवाब में हमारे प्रगतिशील पाखण्ड का भंडा फूट जाता है और बदलाव मुहिम की कलई भी खुल जाती है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि हम बिरसा को सुनते हुए भगत सिंह से मिलने लगते हैं और भगत सिंह के बाद अगली मुलाकात चे से होती है, फिर उत्सुकता से भगत सिंह और चे दोनों बिरसा के उलगुलान की कहानी सुनकर एक ही साथ बोल पड़ते हैं 'इंकलाब-जिंदाबाद!' इसी के साथ अम्बेडकर भी सॉलिडारिटी में आ खड़े होते हैं, लेकिन पता नहीं बिरसा के आदिवासी दर्शन से लोगों को इतनी चिढ़ क्यों है?

आपके पास इस यक्ष प्रश्न का कोई जवाब हो तो जरूर दें। डरें नहीं, गलत जवाब पर आपका सर नहीं फूटने वाला है क्योंकि राजा विक्रमादित्य के साथ ही वेताल का भी अवसान हो गया है।

आदरणीय हिमांशु कुमार जी ने जो लिखा है, एकदम सही लिखा है।

आज़ाद भारत में सोनी सोरी, अपर्णा मरांडीदयामनी बारला, आरती मांझी ही क्यों जेल में डाली जा रही हैं।

आखिर आदिवासी औरतें ही भारतीय राष्ट्र की शत्रु क्यों मानी जा रही हैं? ये कैसा समाज है, ये कैसा विकास है, ये कैसी राजनीति है? दिक्कत की बात यह है कि कमोबश यह सब हमें स्वीकार भी है।

About The Author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। "अमेरिका से सावधान "उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।

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