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Monday, March 3, 2014

जिनके प्राणभंवर ईवीएममध्ये बसै, उनन से काहे को बदलाव की आस कीजै? दो दलीय अमेरिका परस्त कारपोरेट बंदोबस्त अस्मिताओं का महाश्मशान!

जिनके प्राणभंवर ईवीएममध्ये बसै, उनन से काहे को बदलाव की आस कीजै?


दो दलीय अमेरिका परस्त कारपोरेट बंदोबस्त अस्मिताओं का महाश्मशान!


पलाश विश्वास

सुधा राजे ने लिखा है


तुम्हें ज़िंदग़ी बदलने के लिये पूँजी जमीन

और कर्मचारी चाहिये

मुझे समाज बदलने के लिये केवल अपने पर

हमले से सुरक्षा और हर दिन मेरे हिस्से

मेरा अपना कुछ समय और उस समय को मेरी अपनी मरज़ी से खर्च

करने की मोहलत ।

मोहन क्षोत्रिय ने लिखा है

जैसे चूमती हैं बहनें

अपने भाई को गाल पर

वैसे ही चूमा था #राहुल को

#बोंति ने...


पर मारी गई वह

उसके पति ने जला दिया उसे !


क्या कहेंगे इस सज़ा को

और सज़ा देने वाले के वहशीपन को?


सत्ता का चुंबन बेहद आत्मघाती होता है।राहुल गांधी के गाल को चूमकर मारी गयी इस युवती ने दामोदर वैली परियोजना के उद्घाटन के मौके पर नेहरु को माला पहनाने वाली आदिवासी की नरक यंत्रणा बन गयी जिंदगी की याद दिला रही है।


अस्मिता के मुर्ग मुसल्लम के प्लेट बदल जाने से बहुत हाहाकार ,त्राहि त्राहि है।राष्ट्र,समाज के बदलते चरित्र और अर्तव्यवस्था की नब्ज से अनजान उत्पादन प्रणाली और श्रम संबंधों से बेदखल मुक्त बाजार के नागरिकों के लिए यह दिशाभ्रम का भयंकर माहौल है।


लेकिन कारपोरेटराज के दो दलीय एकात्म बंदोबस्त में यह बेहद सामान्य सी बात है।


भारतीय राजनीति की धुरियां मात्र दो हैं।कांग्रेस और भाजपा। लेकिन अमेरिका के डेमोक्रेट और रिपब्लिकन की तरह या ब्रिटेन की कंजरनवेटिव और लेबर पार्टियों के तरह कांग्रेस और भाजपा में विचारधारा और चरित्र के स्तर पर कोई अंतर नहीं है।


आर्थिक नीतियों और राजकाज,नीति निर्धारण में कोई बुनियादी अंतर नहीं है।संसदीय समन्वय और समरसता में जनविरोधी अश्वमेध में दोनों एकाकार है।


दरअसल हम लोग लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र का छद्म ही जी रहे हैं।लोकतांत्रिकता और संवाद लोक गणराज्य और उसकी नागरिकता का चरित्र है और इस मायने में हम सारे भारतीय जन सिरे से चरित्रहीन हैं।


परिवार,निजी संबंधों,समाज,राजनीति और राष्ट्रव्यवस्था में सारा कुछ एकपक्षीय है सांस्कृतिक विविधता और वैचित्र्य के बावजूद।हम चरित्र से मूर्ति पूजक बुतपरस्त लोग हैं।


हम राजनीति करते हैं तो दूल्हे के आगे पीछे बंदर करतब करते रहते हैं।

साहित्य,कला और संस्कृति में सोंदर्यबोध का निर्मायक तत्व व्यक्तिवाद है,वंशवाद है,नस्लवाद है,जाति वर्चस्व है।


हमारा इतिहास बोध व्यक्ति केंद्रित सन तारीख सीमाबद्ध है।जन गण के इतिहास में हमारी कोई दिलचस्पी है ही नहीं।


हमारी आर्थिक समझ शेयर सूचकांक, आयकर दरों और लाभ हानि का अंकगणित है।उत्पादन प्रणाली और अर्थव्यवस्था की संरचना को लेकर हम सोचते ही नहीं।


हमारे बदलाव के ख्वाब भी देव देवी केंद्रित है।

दरअसल हम देव देवियों के ईश्वरत्व के लिए आपस में लड़ते लहूलुहान होते आत्मघाती खूंकार जानवरों की जमाते हैं,जिनपर संजोग से मनुष्य की खालें चढ़ गयी हैं।


लेकिन दरअसल हम में मनुष्य का चरित्र है हीं नहीं।होता तो अमानुषों का अनुयायी होकर हम स्वयं को अमानुष साबित करने की भरसक कोशिश नहीं कर रहे होते।





हमारी एकमात्र सशक्त अभिव्यक्ति अस्मिता केंद्रित सापेक्षिक व्यक्तिवाद है,जिसका स्थाई भाव धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद है।


रंग बिरंगे धर्मोन्माद,चुनाव घोषमापत्रों,परस्परविरोधी बयानों के घटाटोप को सिरे पर रख दे तो सब कुछ एक पक्षीय है।


दूसरा पक्ष जो बहुसंख्य बहिस्कृत आम जनता का है,वे सिरे से गायब हैं।


सारे लोग जाहिर है कि सत्ता पक्ष के रथी महारथी हैं और बाकी लोग पैदलसेनाएं,पार्टीबद्ध लोग चाहे कहीं हों वे अमेरिकी कारपोरेट साम्राज्यवादी सामंती वर्णवर्चस्वी नस्ली हितों के मुताबिक ही हैं।


इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि राम विलास पासवान धर्मनिरपेक्षता का अवतार बन गये तो फिर हिंदुत्व में उनका कायाकल्प हो गया।


इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि ययाति की तरह अनंत सत्तासुख के लिए रामराज उदित राज बनने के बाद फिर पुनर्मूषिकः भव मानिंद रामराज हो गये।


हमारा सरोकार कौन कहां गया,इससे कतई नहीं है।


ृजो भी जहां गया,या जा रहा है,सत्तापक्ष में सत्ता की भागेदारी में गया है।


हमारे मित्र एचेल दुसाध एकमात्र व्यक्ति हैं,जिन्होंने संजय पासवान मार्फत घोषित संघी आरक्षण समापन एजंडा के खिलाफ बोले हैं।


हस्तक्षेप में उनका लिखा लंबा आलेख हमने ध्यान से पढ़ा है। वे बेहद अच्छा लिखते हैं।उनके डायवर्सिटी सिद्धांतों से हम सहमत भी हैं।हम भी अवसरों और संसाधनों के न्याय पूर्ण बंटवारे के बिना सामाजिक न्याय और समता असंभव मानते हैं।


लेकिन अभिनव सिन्हा की परिभाषा के मुताबिक मुझे दुसाध जी के संवेदनाविस्फोट को भाववादी कहने में कोई परहेज नहीं है।


माफ करेंगे दुसाध जी।हम वस्तुवादी तरीके से चीजों,परिस्थियों और समय की चीरफाड़ के बजाय वर्चस्ववादी आइकानिक समाज और अर्थव्यवस्था में चर्चित चेहरों को केंद्रित विमर्श में अपना दिमाग जाया कर रहे हैं।


इसे ऐसे समझे कि भारतीयरंग बिरंगे सेलिब्रेटी समाज में सहाराश्री कृष्मावतार है और सुप्रीम कोर्ट से निवेशकों के साथ धोखाधड़ी के मामले में सहाराश्री की गिरफ्तारी के बाद उन सारे लोगों के आर्थिक हित और सुख सुविधाओं में व्यवधान आया है।ये सारे लोग सहाराश्री के पक्ष में कानून के राज के खिलाफ लामबंद हैं।


वैसा ही राजनीति में हो रहा है ,हमारे देवमंडल के सारे देव देवी अवतार के हित खतरे में हैं राजनीतिक अनिश्चयता के कारण तो उनका पक्षांतर उनके अस्तित्व के लिए जायज हैं।


वे आज तक जो कर रहे हैं,वहीं कर रहे हैं।


हमारे हिसाब से दुसाध जी,आगामी लोकसभा चुनावों में तो क्या मौजूदा राज्य तंत्र में किसी भी चुनाव में बहुजनों की कोई भूमिका नहीं हो सकती।


मसलन अखंड बंगाल बंगाल और पूर्वी बंगाल के अलावा समूचे पूर्वोत्तर समेत असम,बिहार और झारखंड,ओडीशा का संयुक्त प्रांत था।जहां ईस्ट इंडिया कंपनी के सासन काल से ही लगातार साम्राज्यवाद विरोधी विद्रोह और किसान आंदोलन होते रहे हैं।


आज आप जिस बहुजन समाज की बात करते हैं,वह उस बंगाल में बेहद ठोस आकार में था।आदिवासी,दलित,पिछड़े और मुसलमान जल जंगल जमीन की लड़ाई में एकाकार थे और सत्ता वर्ग के खिलाफ लड़ रहे थे।


सन्यासी विद्रोह और नील विद्रोह के समय से इस बहुजन सामज की मुख्य मांग भुमि सुधार की थी।


बाद में हरि गुरुचांद मतुआ आंदोलन से लेकर महाराष्ट्र के ज्योतिबा फूले और अय्यंकाली के आंदोलन का जो स्वरुप बना उसका मुख्य चरित्र इस बहुजन समाज का जगरण और सशक्तीकरण का था।


आजादी से पहले बंगाल में जो दलित मुस्लिम गठबंधन बना ,वह दरअसल प्रजाजनों का जमींदारों के खिलाफ एका था और इसकी नींव मजबूत उत्पादन और श्रम संबंध थे न कि अस्मिता,पहचान और जाति संप्रदाय का चुनावी रसायन।


इसके विपरीत बंगाल में अब रज्जाक मोल्ला और नजरुल इस्लाम का जो दलित मुस्लिम गठबंधन आकार ले रहा है,वह मायावती की सोशल इंजीनियरिंग,लालू यादव और मुलायम के जाति अंकगणित की ही पुनरावृत्ति है।जिसमें न अर्थ व्यवस्था की अभिव्यक्ति है और कहीं समाज है और न सत्तावर्ग के साम्राज्यवादी, सामंती,बाजारु नस्लवादी हितों के खिलाफ विद्रोह की जुर्रत और न राज्यतंत्र को बदलकर शोषणविहीन जातिविहीन वर्गविहीन समता सामाजिक न्याय आधारित समाज की स्थापना की कोई परिकल्पना है।


आपको याद दिला दें कि अंबेडकरी आंदोलन और अंबेडकर की प्रासंगिकता, खासतौर पर उनके जाति उन्मूलन के एजंडे पर अभिनव सिन्हा और उनकी टीम की पहल पर हस्तक्षेप के जरिये पहले भी एक लंबी बहस हो चुकी है।


कायदे से यह उस बहस की दूसरी किश्त है। हम अभिनव के अनेक दलीलों के साथ असहम थे और हैं। लेकिन उन्होंने एक अनिवार्य पहल की है,जिसके लिए हम उनके आभारी हैं।


हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता जाति उन्मूलन की है न कि बदलते हुए कारपोरेट राज्यतंत्र के जनादेश निर्माण की जनसंहारी प्रस्तुति।


हम मौजदूा चुनावी कुरुक्षेत्र में धर्म निरपेक्ष और सांप्रदायिकता का पक्ष विपक्ष नहीं मानते।यह तो डुप्लीकेट का राजनीतिक वर्जन है।


पक्ष में जो है ,वही तो विपक्ष में है।


धर्मनिरपेक्षता का चेहरा राम विलास पासवान है तो बहुजन अस्मिता उदित राज है।


दोनों पक्ष कारपोरेट हितों के माफिक हैं।


दोनो पक्ष सांप्रदायिक हैं।


घनघोर सांप्रदायिक।


दोनों पक्ष जनसंहारी हैं।


दोनों पक्ष अमेरिका परस्त हैं।


दोनो पक्ष धर्मोन्मादी हैं।


दोनों पक्ष उत्पादकों और श्रमिकों के खिलाफ हैं और बाजार के हक में हैं।


दोनों पक्ष परमाणु ऊर्जा के पैरोकार हैं।


दोनों पक्ष निजीकरण पीपीपी माडल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अबाध पूंजी प्रवाह विनिवेश निजीकरण बेदखली विस्थापन कारपोरेट विकास के पक्ष में हैं।


इसीलिए जनसंहारी अश्वमेध केघोड़ों की अंधी दौड़ 1991 के बाद से अब तक रुकी ही नहीं है और न किसी जनादेश से रुकने वाली है।


अल्पमत सरकारों और जाती हुई सरकारों की नीतियां रंगबिरंगी सरकारें और बदलती हुई संसद बार बार सर्वदलीय सहमति से लागू करती है।


इसलिए इस राजनीतिक कारोबार से हमारा क्या लेना देना है,इसको समझ लीजिये।


कोई भूख,बेरोजगारी,कुपोषण, स्त्री बाल अधिकारों,नागरिक व मानवाधिकारों, पर्यावरण,अशिक्षा जैसे मुद्दों पर,भूमि सुधार पर ,जल जंगल जमीन के हक हकूक पर,कृषि संकट पर,उतापादन प्रणाली पर,श्रमिकों की दशा पर,बंधुआ मजदूरी पर, नस्ली भोदभाव के तहत  बहिस्कृत समुदायों और अस्पृश्यभूगोल के खिलाप जारी निरंतर युद्ध और राष्य्र के सैन्यीकरण कारपोरेटीकरण के खिलाफ चुनाव तो लड़ ही न रहा है।


हमारी बला से कोई जीते या कोई हारे।


इसी सिलसिले में आदरणीय राम पुनियानी का जाति उन्मूलन एजंडे पर ताजा लेक हस्तक्षेप और अन्यत्र भी लग चुका है। जाति विमर्श पर समयांतर का पूरा एक अंक निकल चुका है।आनंद तेलतुंबड़े का आलेख वहां पहला लेख है।


जाति के विरुद्ध हर आदमी है।हर औरत है।फिरभी जाति का अंत नहीं है। रक्तबीज की तरह जाति का अभिशाप भारतीय समाज,राष्ट्र,राजकाज.समूची व्यवस्था, मनुष्यता और प्रकृति को संक्रमित है। तो हमें उन बुनियादी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना होगा जिस वजह से जाति है।


इस बहस से मलाईदार तबके को सबसे ज्यादा खतरा है।वह यह बहस शुरु ही होने नहीं देता।


भारतीय बहुजन समाज औपनिवेशिक शासन के खिलाफ निरंतर क्लांतिहीन युद्ध में शामिल होता रहा है और उसने सत्ता वर्ग से समझौता कभी कभी नहीं किया है।इतिहास की वस्तुगत व्याख्या में इसके साक्ष्य सिलसिलेवार हैं।


लेकिन वही बहुजन समाज आज खंड विखंड क्यों है


क्यों जातियां और अस्मिताएं एक दूसरे कि खिलाफ लामबंद हैं

क्यों संवाद के सारे दरवाजे बंद हैं

क्यों किसी को कोई दस्तक सुनायी ही नहीं पड़ती

क्यों बहुजन समाज सत्ता वर्ग का अंग बना हुआ है

क्यों सत्ता जूठन की लड़ाई में कुकुरों की तरह लड़ रहे हैं ब्रांडेड बहुजने देवदेवी,तमाम अस्मिताों के क्षत्रप।


ये आत्मालोचना का संवेदनशील समय है।

यक्षप्रश्नों का संधिक्षण है।


हमें सोचना होगा कि अंबेडकर को ईश्वर बनाकर हम उनकी विचारधारा और आंदोलन को कहां छोड़ आये हैं


हमें अंबेडकर की प्रासंगिकता पर भी निर्मम तरीके से संवाद करना होगा।


संविधान में वे कौन से तत्व हैं,जनके अंतर्विरोधों की वजह से सत्ता वर्ग को संविधान और कानून की हत्या की निरंकुश छूट मिल जाती है,इस पर भी वस्तुनिष्ठ ढंग से सोचना होगा।


अगर वास्तव मे कोई शुद्ध अशुद्ध स्थल हैं ही नहीं,शुद्ध अशुद्ध रक्त है ही नहीं,पवित्र अपवित्र चीजें हैं ही नहीं, तो हमें वक्त की नजाकत के मुताबिक अंबेडकर,उनके जाति उन्मूलन के एजंडे और उनके मसविदे पर बने भारतीय संविधान पर भी आलोचनात्मक विवेचना करने से किसने रोका है।


अंध भक्ति आत्महत्या समान है।


अस्मिता और अस्मिता भाषा के ऊपर उठकर मनुष्यता और प्रकृति के पक्ष में खड़े हो जाये हम तभी जनपक्षधर हो सकते हैं,अन्यथा नहीं।


हमने हस्तक्षेप पर ही निवेदन किया था कि आनंद तेलतुंबड़े जाति उन्मूलन पर अपना पक्ष बतायें।उन्होंने अंग्रेजी में निजीकरण उदारीकरण ग्लोबीकरण के राज में बेमतलब हो गये आरक्षण के खेल को खोलते हुए नोट भेजा है और साफ साफ बताया है कि जाति व्यवस्था को बनाये रखकर जाति वर्चस्व को बनाये रखने में ही आरक्षण की राजनीति है जबकि जमीन पर आरक्षण का कोई वजूद है ही नहीं।


हम आपको वह नोट भेज रहे हैं।जब इसका हिंदी अनुवाद हो जायेगा तो वह भी लगा देंगे।


गौर करें कि इससे पहले हमने लिखा हैः

नरेंद्र मोदी ने कहा है कि देश में कानून बहुत ज्यादा हैं और ऐसा लगता है कि सरकार व्यापारियों को चोर समझती है। उन्होंने हर हफ्ते एक कानून बदल देने का वायदा किया है।कानून बदलने को अब रह ही क्या गया है,यह समझने वाली बात है।मुक्त बाजार के हक में सन 1991 से अल्पमत सरकारे जनादेश की धज्जियां उड़ाते हुए लोकगणराज्य और संविधान की हत्या के मकसद से तमाम कानून बदल बिगाड़ चुके हैं।मोदी दरअसल जो कहना चाहते हैं,उसका तात्पर्य यही है कि हिंदू राष्ट्र के मुताबिक देश का संवैधानिक ढांचा ही तोड़ दिया जायेगा।


मसलन डा.अमर्त्य सेन के सुर  से सुर मिलाकर तमाम बहुजन चिंतक बुद्धिजीवी की आस्था मुक्त बाजार और कारपोरेट राज में है। लेकन ये तमाम लोग अपना अंतिम लक्ष्य सामाजिक न्याय बताते अघाते नही है। कारपोरेट राज के मौसम के मुताबिक ऐसे तमाम मुर्ग मुसल्लम सत्ता प्लेट में सज जाते हैं।जबकि बाबासाहेब अंबेडकर ने जो संवैधानिक प्रावधान किये, वे सारे के सारे मुक्त बाजार के खिलाफ है।वे संसाधनों के राष्ट्रीयकरण की बात करते थे,जबकि मुक्त बाजार एकतरफा निजीकरण है। वे निःशुल्क शिक्षा के प्रावधान कर गये लेकिन उदारीकृत अमेरिकी मुक्त बाजार में देश अब नालेज इकोनामी है। संविधान की पांचवीं छठीं अनुसूचियों के तमाम प्रावधान जल जंगल जमीन के हक हूक के पक्ष में हैं, जो लागू ही नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया कि जमीन जिसकी संसाधन उसीका,लेकिन सुप्रीम कोर्ट की अवमानना  करते हुए अविराम बेदखली का सलवा जुड़ुम जारी है। स्वायत्तता भारतीय संविधान के संघीय ढांचे का बुनियादी सिद्धांत है ,जबकि कश्मीर और समूचे पूर्वोत्तर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के तहत बाबासाहेब के अवसान के बाद 1958 से लगातार भारतीय नागरिकों के खिलाफ आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा की पवित्र अंध राष्ट्रवादी चुनौतियों के तहत युद्ध जारी है।


अंबेडकर अनुयायी सर्वदलीय सहमति से इस अंबेडकर हत्या में निरंतर शामिल रहे हैं। अब कौन दुकानदार कहां अपनी दुकान चलायेगा,इससे बहुजनों की किस्मत नहीं बदलने वाली है।लेकिन बहुजन ऐसे ही दुकानदार के मार्फत धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की पैदल सेनाएं हैं।


मोदी व्यापारियों के हक हकूक में कानून बदलने का वादा कर रहे हैं और उसी सांस में व्यापारियों को वैश्विक चुनौतियों का समना करने के लिए भी तैयार कर रहे हैं।असली पेंच दरअसल यही है। कारोबार और उद्योघ में अबाध एकाधिकारवादी कालाधन वर्चस्व और विदेशी आवारा पूंजी प्रवाह तैयार करने का यह चुनाव घोषणापत्र अदृश्य है।


हमारे युवा साथी अभिषेक श्रीवास्तव ने अमेरिकी सर्वेक्षणों और आंकड़ों की पोल खोल दी है।हम उसकी पुनरावृत्ति नहीं करना चाहते। लेकिन जैसा कि हम लगातार लिखते रहे हैं कि भारत अमेरिकी परमाणु संधि का कार्यान्वयन न कर पाने की वजह अमेरिका अपने पुरातन कारपोरेट कारिंदोंं की सेवा समाप्त करने पर तुला है।अमेरिका को शिकायत है कि इस संधि के मुताबिक तमाम आर्थिक क्षेत्रों में अमेरिकी बाजार अभी खुला नहीं है और न ही अमेरिकी युद्धक अर्थव्यवस्था संकट से उबर सकी है।


इसके अलावा खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर अमेरिकी जोर है,जिसका विरोध करने की वजह से कारपोरेट मीडिया आप के सफाये के चाकचौबंद इंतजाम में लगा है।खुदरा बाजार में एफडीआई को हरी झंडी का पक्का इंतजाम किये बिना मोदी को अमेरिकी समर्थन मिलना असंभव है।अब समझ लीजिये कि छोटी और मंझोली पूंजी, खुदरा कारोबार में शामिल तमाम वर्गों के लोगों का हाल वही होने वाला है जो देश के किसानों,मजदूरों और अस्पृश्य नस्लों और समुदायों का हुआ है,जो उत्पादन प्रणाली,उत्पादन संबंधों और श्रम संबंधों का हुआ है।


तमाम दलित व पिछड़े मसीहा,आत्मसम्मान के झंडेवरदार डूबते जहाज छोड़कर भागते चूहो की तरह केशरिया बनकर कहीं भी छलांग लगाने को तैयार हैं।कहा जा रहा है कि दस साल से जो काम कांग्रेस ने पूरा न किया, वह नमोमय भारत में जादू की छड़ी घुमाने से पूरा हो जायेगा।बंगाल के बारासात से विश्वविख्यात जादूगर जूनियर को टिकट  दिया गया है और शायद उनका जादू अब बहुजनों के काम आये।


इसी बीच संजय पासवान के मार्फत भाजपा ने हिंदुत्व ध्रूवीकरण के मकसद से आर्थिक आरक्षण का शगूफा भी छोड़ दिया है लेकिन किसी प्रजाति के बहुजन की कोई आपत्ति इस सिलसिले में दर्ज हुई हो ऐसी हमें खबर है नहीं।आपको हो तो हमें दुरुस्त करें।



इसी बीच कोलकाता जनसत्ता के संपादक शंभूनाथ शुक्ल ने खुलासा किया हैः


एक वामपंथी संपादक ने मुझसे कहा कि गरीब तो ब्राह्मण ही होता है। हम सदियों से यही पढ़ते आए हैं कि एक गरीब ब्राह्मण था। हम गरीब तो हैं ही साथ में अब लतियाए भी जा रहे हैं। उन दिनों दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत में लोग जातियों में बटे हुए थे बजाय यह सोचे कि ओबीसी को आरक्षण देने का मतलब अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण है न कि अन्य पिछड़ी जातियों को। मंडल आयोग ने अपनी अनुशंसा में लिखा था कि वे वर्ग और जातियां इस आरक्षण की हकदार हैं जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से अपेक्षाकृत पिछड़ गई हैं। मगर खुद पिछड़ी जातियों ने यह सच्चाई छिपा ली और इसे पिछड़ा बनाम अगड़ा बनाकर अपनी पुश्तैनी लड़ाई का हिसाब बराबर करने की कोशिश की। यह अलग बात है कि इस मंडल आयोग ने तमाम ब्राह्मण और ठाकुर व बनिया कही जाने वाली जातियों को भी आरक्षण का फायदा दिया था। पर जरा सी नासमझी और मीडिया, कांग्रेस और भाजपा तथा वामपंथियों व खुद सत्तारूढ़ जनता दल के वीपी सिंह विरोधी और अति उत्साही नेताओं, मंत्रियों द्वारा भड़काए जाने के कारण उस राजीव गोस्वामी ने भी मंडल की सिफारिशें मान लिए जाने के विरोध में आत्मदाह करने का प्रयास किया जो ब्राह्मणों की आरक्षित जाति में से था। और बाद में उसे इसका लाभ भी मिला।


यह खुलासा बेहद मह्त्वपूर्ण है।


अब हमें 1991 में मनमोहन अवतार से पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर सरकारों के दौरान हुई राजनीति का सिलसिलेवार विश्लेषण करना होगा कि कैसे वीपी सिंह मंडल ब्रहास्त्र का इस्तेमाल करते हुए अपने राजनीति खेल को नियंत्रित नहीं रख सकें।

हमने 1990 के मध्यावधि चुनावों के दौरान बरेली में दो बार वीपी से लंबी बातचीत की जो तब दैनिक अमरउजाला में छपा भी। लेकिन वीपी इसे मिशन ही बताते रहे। जबकि आनंद तेलतुंबड़े ने जाति अस्मिता को राजनीतिक औजार बनाने का टर्रनिंग प्वायंट मानते हैं इसे।तबसे आत्मघाती अस्मिता राजनीति बेलगाम है और तभी से मुक्त बाजार का शुभारंभ हो गया। जब लंदन में वीपी अपना इलाज करा रहे थे, तब भी मंडल प्रसंग में आनंद तेलतुंबड़े की उनसे खुली बात हुई थी।बेहतर हो कि आनंद यह किस्सा खुद खोलें।



हम इस मुद्दे पर आगे विस्तार से चर्चा करेंगे।


फिलहाल यह समझ लें कि संघपरिवार ने सवर्णों के पिछड़े समुदायों को आरक्षम भी मंजूर नहीं किया और पूरे देश को खूनी युद्धस्तल में बदलने के लिए कमंडल शुरु किया।


आनंद से आज हमारी इस सिलसिले में विस्तार से बात हुई तो उन्होंने बताया कि अनुसूचित जातियों के अलावा जाति आधारित आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है।ओबीसी का मतलब अन्य पिछड़ी जातिया नहीं, अदर बैकवर्ड कम्युनिटीज है,यानी अन्य पिछड़ा वर्ग।


पिछड़े वर्गों के हितों के विरुद्ध इतनी भयानक राजनीतिक खेल करने वाला संघ परिवार बहुजनों और देस के बहुसंख्य जनगण के हितों के मुताबिक अब क्या क्या करता है,देखना बाकी है।


मुक्त बाजार को स्वर्ण काल मानने और ग्लोबकरण  को मुक्ति की राह बताने वालों के विपरीत आनंद तेलतुंबड़े का कहना है कि बाजार में खरीददारी की शक्ति के बजाय गर्भावस्था से ही बहुजनों के बच्चों की निःशुल्क क्वालिटी शिक्षा का इंतजाम हो जाये तो बहुजनों के उत्तान क लिए और कुछ नहीं चाहिए।


हमारे डायवर्सिटी मित्र तमाम समस्याओं के समाधान के लिए संसाधनों और अवसरों का अंबेडकरी सिद्धांत के मुताबिक न्यायपूर्ण बंटवारे को अनिवार्य मानते हैं। हम उनसे सहमत है।संजोग से दुसाध एकमात्र बहुजन बुद्धिजीवी है जिन्होंने आर्थिक आरक्षण के संघी एजंडे को दुर्भाग्यपूर्ण माना है।


हम लेकिन कारपोरेट राज और मुक्त बाजार दोनों के खिलाप जाति उन्मूलन के एजंडे के प्रस्थानबिंदू मान रहे हैं।


अनेक साथी बिना मतामत दिये फेसबुक और नाना माध्यम से इस बहस को बेमतब बताते हुए गाली गलौज पर उतारु हैं।हम उनके आभारी हैं और मानते हैं कि गाली गलौज उनकी अभिव्यक्ति का कारगर माध्यम हो सकता है।


हमें तो उन लोगों पर तरस आता है जो सन्नाटा बुनते रहने के विशेषज्ञ है।


कवि मदन कश्यप के शब्दों में यह दूर तक चुप्पी सबसे ज्यादा खतरनाक है।ख्वाबों की मौत से भी ज्यादा खतरनाक।


Dear Palash,


I have written this note as desired by you on the issue of reservations as the tool to preserve castes;


Note

Keeping alive the caste goose that lay golden eggs for the ruling classes

Anand Teltumbde

During the colonial days, the first expression of the resentment of the Untouchables was against their exclusion from social processes. Barring Jotiba Phule, who conceived their cause beyond untouchability and included them within his 'shudra-atishudra' as a class that was exploited by 'shetjis and bhatjis', all other social reformers just focused on this visible symptom of untouchability and not the disease of caste per se. Post-Lucknow Pact, the Congress acutely felt the need to keep the Untouchables within its fold as Hindus lest they lost their political share to Muslims. They, therefore, began working on the issue of untouchability. With the persistent efforts of Babasaheb Ambedkar, particularly his forceful arguments in the Round Table Conferences in 1931-32, the separate and special status of the Untouchables was recognized in the Government of India Act 1935 as 'Scheduled Castes'. A massive exercise was carried all over India to identify castes on the basis of a criterion of untouchability for preparing this schedule before 1937 elections in order to implement the provisions contained in the Act. The provisions were in the political form, originally as reservation with separate electorates and thereafter, as modified in the Poona Pact, reservations in joint electorates. There were preferment provisions also in the Act which mandated the state to take care of their interests. Accordingly, capable people from among the Scheduled Castes were given jobs in the government sector. When Dr Ambedkar became the member of the viceroy's executive council in 1942 as labour member, this preferment policy was converted into quota system by an executive order.

The important point to note here is that the evolution of the reservation system up to this point was conceptually correct. The reservation as an exception to the general rule was extended to the exceptional people (nobody could have any dispute over the Untouchables being a very exceptional lot in the world). But after the transfer of power, during the writing of the Constitution, this exceptional provision was proliferated so as to preserve the prevailing communal and caste divisions in the society, lest they disappear under the force of ensuing changes in political economy. First, the same set of provisions as were created for the Untouchables were extended to the Tribals by creating a separate schedule for them. There was an alternative to combine the schedules or extend the existing schedule for the Untouchables to include the Tribes. By doing so, the caste factor could have been diffused because although Tribals were backward, they did not suffer the social stigma of untouchability as the Untouchables did. If the purpose of these schedules were exactly same, there separation did not make sense except for keeping the untouchable castes as a distinct category alive. Merging the Untouchables and the Tribes would have at the minimum diluted the caste stigma. This separation maintained the identity of the Untouchables as separate people. The utility of this separation is illustrated by many communities demanding their inclusion in Scheduled Tribes but not in the Scheduled castes. That would fetch them all the benefits without the social stigma of being inferior. None would like to be Scheduled Castes, however!

There was another problem with the schedule for Tribes, which was the fluid criterion used for scheduling the communities as tribals. Unlike the Untouchables, who were categorized into the schedule on a concrete criterion of untouchability, there could not be such criterion for Tribals or for that matter, any other people. The problem has manifested into inclusion of certain wrong communities into the schedule which appear to have monopolized most benefits planned for the Tribes. Every state will demonstrate that just one or two communities which otherwise are as advanced as even the upper castes, monopolizing the benefits just by an accident of being included in the schedule for tribes.

The bigger mischief was played under Article 340 of the Indian Constitution, which made it obligatory for the government to promote the welfare of the OBCs. The Article said:

"The president may by order appoint a commission, consisting of such persons as he thinks, fit to investigate the conditions of socially and educationally backward classes within the territory of India and the difficulties under which they labour and to make recommendations as to the steps that should be taken by the union or any state to remove such difficulties and as to improve 'their condition and as to the grants that should be made, and the order appointing such commission shall define the procedure to be followed by the commission. ... A commission so appointed shall investigate the matters referred to them and present to the president a report setting out the facts as found by them and making such recommendations as they think proper."

To defend the Constitution, one may argue that the phrase used in the Article is "socially and educationally backward classes" and not 'castes'. As a matter of fact, except in reference to the Untouchables, the Constitution does not use 'caste' anywhere. But everybody knew what was meant by the 'class' in the Article. It would only be mapped by the castes. This article would constitute arsenal of the ruling classes, which could be opened at the opportune time. There were far more pressing mandates of the Constitution to the ruling classes. One such mandate and only one in that demanding its fulfillment within a specified time period of a decade, was regarding provision of the free and compulsory education to all children up to the age of fourteen years. They ignored it but almost immediately followed the Article 340 to institute a Kalelkar Commission on 29 January 1953 to identify the 'backward classes'. Naturally, in reference to their social backwardness, the castes would come into picture. They did come and such castes were identified by the commission which were 'educationally' backward and were underrepresented in the government service as well as in the field of trade, commerce and industry.

The Kalelkar commission submitted its report on 30 March 1955, identifying 2,399 backward castes or communities as backward and of them 837 as the 'most backward'. It inter alia recommended undertaking caste-wise enumeration of population in the census of 1961 and reservation of 70 per cent seats in all technical and professional institutions for qualified students of backward classes. Perhaps, the opportune time had not yet come and therefore the report was rejected by the Central government on the ground that it had not applied any objective tests for identifying the Backward Class.

By the next decade, the changes in political economy induced by the calibrated land reforms and Green revolution, which would create a class of rich farmers out of the populous Shudra castes, wielding the baton of Brahmanism from the upper castes in vast rural India. These changes catalyzed regional parties and made electoral politics (based on the first-past-the-post type elections, where a small group of votes also make or unmake the outcome) increasingly competitive. The rise of the backward castes and their regional parties slowly spread through local self governments to states, culminating into defeat of the Congress party in 1977 by the Janata party, which was motley mixture of all these elements. Janata party government established the second backward classes commission on on 1 January 1979, which came to be known as the Mandal Commission with a mandate to "identify the socially or educationally backward." The commission identified "other backward class", on eleven criteria, but necessarily in terms of castes or religious communities comprising 54% of the total population (excluding SCs and STs), belonging to 3,743 different castes and communities. The report of the commission was submitted in December 1980 making several recommendations. A decade after the commission gave its report, V.P. Singh, the Prime Minister at the time decided to open up this can of castes in 1989 in his political game plan. It immediately resulted in the nationwide inferno against 'reservations', which until then were confined to the SCs and STs and were reluctantly but largely reconciled. The inferno created comic waves. Although the reservations were meant for the BCs, on the ground they came to beat the SCs, who foolishly rushed to defend 'reservations'. Ultimately, reservations for OBCs were implemented in government services in 1993 and in higher educational institutes in 2008. Reservations came in their true prowess as weapons in the hands of the political parties who began using them with impunity in their political calculus.

Any sane person can easily see that in a backward country like India, where arguably more than 80% population (by government reckoning 22.5% SCs and STs +54% BCs, which makes 76.5%. Add to it another 5 % of the poor of the excluded castes, all of them not being the upper castes, the tally goes up to 80.5%) can be summarily termed backward, the criterion of backwardness cannot be used for the exceptional measures such as reservation. It is not to say that there are no people other than the Untouchables who are not poorer or backward than them. They indeed are. And the state bears definite responsibility towards them. It has policy instruments to do such things and not reservations alone that are two edged swords that need to be cautiously used. For example, such a policy measure was indicated in the Constitution itself. It was about providing free, compulsory, and quality education to all children through neighourhood schools up to the age of some mature age. (The Constitution had prescribed free and compulsory education up to the age of 14 years and did not elaborate in so many terms). I feel, if the government had taken up this single issue in proper spirit and implemented this provision; there would not have been even the need of reservations. If the government is really concerned with the backwardness of the people, it would have internalized the need to ensure that every child that comes out on earth does not inherit the disability of their parents. Any woman that conceives a child would be provided quality health care and proper diet by the state. She would deliver the child in a healthy atmosphere and the child after the birth would be provided with proper diet and provisions for its healthy growth, followed by quality education. All children if they got the same education only through the neighourhood schools, would have healthy socialization and similar opportunity to realize their potential. Instead of indulging in a plethora of so called welfare schemes the government should have prioritized this programme. But it summarily ignored it. Instead, when the circumstances compelled it to do something in this regard, it changed the original mandate of the Constitution itself and enacted the 'Right to Education' Act, which has only legitimized the multilayered education system that evolved in the country under benign gaze of the government. It admits the quality of education as per the socio-economic standing of the parents, something akin to what Manu prescribed. Here also it has mischievously unleashed the weapon of reservation to fool the lower castes and classes.

One should clearly see the underneath orientation of the ruling classes in this brief history that they would never let the goose of caste die! It is the testimony to the bankruptcy of the Dalit politics on the other hand that such issues do not even remotely concern it. Rather, paradoxically, with the spread of education and 'Ambedkarism' among them, increasingly fewer among them believe that castes could really be annihilated.      

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Its translation may ignite debate.

Regards



दलित उत्पीड़न के ख़िलाफ़ प्रस्ताव

आज के दो दशक पहले उदारीकरण की अनुदार संरचना में धकेले जा रहे भारत की सुहानी तस्वीर एकध्रुवीय वैश्वीकरण के समर्थकों ने पेश की थी। सम्मोहन की उस अवस्था में लगा था कि इस संरचना में षामिल होने भर से देश की तमाम समस्याएं हल जो जाएंगी। सामाजिक प्रश्नों के संदर्भ में भी यह उम्मीद तारी हुई थी। लेकिन पिछले एक दशक में ही घटी घटनाओं को ध्यान में रखें तो पता चलेगा कि भारतीय समाज की वीभत्स सचाई, जातिवादी मनोरचना एक स्तर पर पहले से अधिक क्रूर, हिंसक और हमलावर हुई है। हाल फि़लहाल में दलितों पर हुए हिंसक हमलों की सूची बनायी जाये तो स्थिति की भयावहता का अंदाज़ा हो जाता है। वर्ष 2005 में हरियाणा के गोहाना क़स्बे में वाल्मीकि बस्ती पर हमला करके लगभग सत्तर घर लूटे और जलाये गये। यहीं 2007 में सालवन में दलितों के 300 घर आग के हवाले कर दिये गये। 2010 में हरियाणा के ही हिसार जि़ले के मिर्चपुर गांव में दलितों के दो दर्जन से अधिक घर जला दिये गये और बारहवीं कक्षा की प्रतिभाशाली छात्रा सुमन (पोलियोग्रस्त) को पिता (ताराचंद वाल्मीकि) समेत जला दिया गया। जनवरी 2012 में ओडिशा के बोलंगीर जि़ले के लाठोर क़स्बे में दलित बस्ती पर हमला करके चालीस मकानों को तबाह कर दिया गया। लूट के बाद उनमें आग लगा दी गयी। नवंबर 2012 में तमिलनाडु के धर्मपुरी जि़ले में दलित-बहुल नायकनकोट्टाई गांव में दलितों की तीन बस्तियों पर धावा बोला गया और चार सौ से अधिक मकानों को लूटने के बाद आग के हवाले कर दिया गया।

जनवादी लेखक संघ का यह राष्ट्रीय सम्मेलन ऐसेदलितविरोधी जातिवादी हिंसा की पुरज़ोर निंदा करता है और सरकार से इस संबंध में कड़ी कार्रवाई की मांग करता है। भारतीय संविधान और संसद द्वारा उनकी सुरक्षा, सबलीकरण और विकास के लिए जो भी क़दम उठाये गये हैं, उन्हें ख़त्म करने की जिस तरह से खुल कर वक़ालत की जा रही है, हम उसकी भी निंदा करते हैं।

प्रस्ताव: बजरंग बिहारी तिवारी अनुमोदन: संजीव कुमार

जनवादी लेखक संघ के आठवें राष्ट्रीय सम्मेलन (14-15 फरवरी, इलाहाबाद) में पारित प्रस्ताव



भीषणतम आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी से मिली लोकतंत्र को चुनौती

लोकसभा चुनाव-2014 में क्या हो बहुजन बुद्धिजीवियों की रणनीति!

बहरहाल आज जबकि आजाद भारत के शासकों द्वारा शक्ति के स्रोतों में विविधता की अनदेखी के कारण देश में लोकतंत्र के विस्फोटित होने लायक प्रचुर सामान जमा हो चुका है,तथा अगले लोकसभा चुनाव में उसमें कुछ और इजाफा होने जा रहा है,हम क्या करें कि सोलहवीं लोकसभा चुनाव से ही लोकतंत्र के सुदृढ़करण की प्रक्रिया तेज़ हो।

एच एल दुसाध

 सोलहवीं लोकसभा का चुनाव एक ऐसे समय में होने जा रहा है जब देश में व्याप्त भीषणतम विषमता के कारण हमारे लोकतंत्र पर गहरा संकट मंडरा रहा है।  विषमता का आलम यह है कि परम्परागत रूप से सुविधासंपन्न और और विशेषाधिकारयुक्त अत्यन्त अल्पसंख्यक तबके का जहाँ शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार , सांस्कृतिक-शैक्षणिक प्रत्येक क्षेत्र में 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा है, वहीं परम्परागत रूप से तमाम क्षेत्रों से ही वंचित बहुसंख्यक तबका,जिसकी आबादी 85 प्रतिशत है, 15-20 प्रतिशत अवसरों पर आज भी जीवन निर्वाह करने के लिए विवश है। ऐसी गैर-बराबरी विश्व में कहीं और नहीं है।  किसी भी डेमोक्रेटिक कंट्री में परम्परागत रूप से सुविधासंपन्न तथा वंचित तबकों के मध्य आर्थिक-राजनीतिक– सांस्कृतिक इत्यादि क्षेत्रों में अवसरों के बटवारे में भारत जैसी असमानता नहीं है।  इस असमानता ने देश को 'अतुल्य' और 'बहुजन'-भारत में बांटकर रख दिया है।  चमकते अतुल्य भारत में जहाँ तेज़ी से लखपतियों-करोड़पतियों की संख्या बढती जा रही है,वहीँ जो 84 करोड़ लोग 20 रूपये रोजाना पर गुजर-बसर करने के लिए मजबूर हैं, वे मुख्यतः बहुजन भारत के लोग हैं। उद्योग-व्यापार, धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्र से लगभग पूरी तरह बहिष्कृत बहुजनों के लिए रोजगार के नाम पर अवसर मुख्यतः असंगठित क्षेत्र में है,जहाँ न प्राविडेंट फंड,वार्षिक छुट्टी व चिकित्सा की सुविधा है और न ही रोजगार की सुरक्षा।

   भीषणतम आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी से मिली- लोकतंत्र को चुनौती   

अवसरों के असमान बंटवारे से उपजी आर्थिक और सामाजिक विषमता का जो स्वाभाविक परिणाम सामने आना चाहिए, वह सामने आ रहा है।  देश के लगभग 200 जिले माओवाद की चपेट में आ चुके हैं।  लाल गलियारा बढ़ता जा रहा है और दांतेवाड़ा जैसे कांड राष्ट्र को डराने लगे हैं।  इस बीच माओवादियों ने एलान का दिया है कि वे 2050 तक बन्दूक के बल पर लोकतंत्र के मंदिर पर कब्ज़ा जमा लेंगे।  इसमें कोई शक नहीं कि विषमता की खाई यदि इसी तरह बढ़ती रही तो कल आदिवासियों की भांति ही अवसरों से वंचित दूसरे तबके भी माओवाद की धारा से जुड़ जायेंगे, फिर तो माओवादी अपने मंसूबों को पूरा करने में जरुर सफल हो जायेंगे और यदि यह अप्रिय सत्य सामने आता है तो हमारे लोकतंत्र का जनाजा ही निकल जायेगा।  ऐसी स्थित सामने न आये ,इसके लिए डॉ.आंबेडकर ने संविधान सौंपने के पूर्व 25 नवम्बर,1949 को राष्ट्र को सतर्क करते हुए एक अतिमूल्यवान सुझाव दिया था।

           बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर की चेतावनी

 उन्होंने कहा था- '26 जनवरी 1950 को हमलोग एक विपरीत जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं।  राजनीति के क्षेत्र में हमलोग समानता का भोग करेंगे किन्तु सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में मिलेगी असमानता।  राजनीति के क्षेत्र में हमलोग एक नागरिक को एक वोट एवं प्रत्येक वोट के लिए एक ही मूल्य की नीति को स्वीकृति देने जा रहे हैं।  हम लोगों को निकटतम समय के मध्य इस विपरीतता को दूर कर लेना होगा,अन्यथा यह असंगति कायम रही तो विषमता से पीड़ित जनता इस राजनैतिक गणतंत्र की व्यवस्था को विस्फोटित कर सकती है। '

   हमारे महान राजनेता-लोकतंत्र-प्रेमी या लोकतंत्र-विरोधी !

 ऐसी चेतावनी देने वाले बाबा साहेब ने भी शायद कल्पना नही किया होगा कि भारतीय लोकतंत्र की उम्र छह दशक पूरी होते-होते विषमता से पीड़ित लोगों का एक तबका उसे विस्फोटित करने पर आमादा हो जायेगा।  लेकिन यह स्थिति सामने आ रही तो इसलिए कि आजाद भारत के हमारे शासकों ने संविधान निर्माता की सावधानवाणी की पूरी तरह अनदेखी कर दिया।  वे स्वभावतः लोकतंत्र विरोधी थे।  अगर लोकतंत्र प्रेमी होते तो केंद्र से लेकर राज्यों तक में काबिज हर सरकारों की कर्मसूचियाँ मुख्यतः आर्थिक और सामजिक विषमता के खात्मे पर केन्द्रित होतीं।  तब आर्थिक और सामाजिक विषमता का वह भयावह मंजर कतई हमारे सामने नहीं होता जिसके कारण हमारा लोकतंत्र विस्फोटित होने की ओर अग्रसर है।  इस लिहाज से पंडित नेहरु, इंदिरा गांधी, राजीव गाँधी, नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, जय प्रकाश नारायण, ज्योति बसु जैसे महानायकों की भूमिका का आकलन करने पर निराशा और निराशा के सिवाय और कुछ नहीं मिलता।  अगर इन्होंने डॉ.आंबेडकर की चेतावनी को ध्यान में रखकर आर्थिक और सामाजिक विषमता के त्वरित गति से ख़त्म होने लायक नीतियाँ अख्तियार की होतीं, क्या 10-15 प्रतिशत परम्परागत सुवुधाभोगी वर्ग का शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, शैक्षणिक–सांस्कृतिक क्षेत्रों पर 80-85 प्रतिशत वर्चस्व स्थापित होता और क्या देश अतुल्य और बहुजन भारत में विभाजित होता?

राजनीति के हमारे महानायकों ने 'गरीबी-हटाओ', 'लोकतंत्र बचाओ', 'भ्रष्टाचार हटाओ',  'राम मंदिर बनाओ' इत्यादि जैसे आकर्षक नारे देकर महज शानदार तरीके से सत्ता दखल किया किन्तु उस राज-सत्ता का इस्तेमाल लोकतंत्र की सलामती की दिशा में बुनियादी काम करने में नहीं किया।  इनके आभामंडल के सामने भारत में मानव-जाति की सबसे बड़ी समस्या-आर्थिक और सामजिक विषमता-पूरी तरह उपेक्षित रही।  इस देश की वर्णवादी मीडिया और बुद्धिजीवियों को इनकी बड़ी-बड़ी जीतों में लोकतंत्र की जीत दिखाई पड़ी।  दरअसल इस देश के बुद्धिजीवियों के लिए इतना ही काफी रहा है कि पड़ोस के देशों की भांति भारत में सत्ता परिवर्तन बुलेट, नहीं बैलेट से होता रहा है।  सिर्फ इसी बिला पर भारत के लोकतंत्र पर गर्व करनेवालों बुद्धिजीवियों की कमी नहीं रही।  अतः महज वोट के रास्ते सत्ता परिवर्तन से संतुष्ट बुद्धिजीवियों ने प्रकारांतर में लोकतंत्र के विस्फोटित होने लायक सामान स्तूपीकृत कर रहे राजनेताओं को डॉ.आंबेडकर की सतर्कतावाणी याद दिलाने की जहमत ही नहीं उठाया।  मजे की बात यह है कि आजाद भारत की राजनीति के कथित महानायक आज भी लोगों के ह्रदय सिंहासन पर विराजमान हैं; आज भी उनके अनुसरणकारी उनके नाम पर वोटरों को रिझाने का प्रयास कर रहे हैं।  बहरहाल हमारे राष्ट्र नायकों से कहां चूक हो गयी जिससे विश्व में सर्वाधिक विषमता का साम्राज्य भारत में व्याप्त हुआ और जिसके कारण ही विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र आज विस्फोटित होने की और अग्रसर है?

आर्थिक-सामाजिक विषमता की उत्पत्ति के पीछे- शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता की अनदेखी  

एक तो ऐसा हो सकता है कि गांधीवादी-राष्ट्रवादी और मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़े हमारे तमाम राष्ट्र नायक ही समग्र वर्ग की चेतना से समृद्ध न होने के कारण ऐसी नीतियां ही बनाये जिससे परम्परागत सुविधासंपन्न तबके का वर्चस्व अटूट रहे।  दूसरी यह कि उन्होंने आर्थिक और सामाजिक –विषमता की उत्पत्ति के कारणों को ठीक से जाना नहीं, इसलिए निवारण का सम्यक उपाय न कर सके।  प्रबल सम्भावना यही दिखती है कि उन्होंने ठीक से उपलब्धि ही नहीं किया कि सदियों से ही सारी दुनिया में आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी,जोकि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या है,की सृष्टि शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक और धार्मिक) में सामाजिक(social) और लैंगिक(gender) विविधता (diversity)के असमान प्रतिबिम्बन के कारण होती रही है।  अर्थात लोगों के विभन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य आर्थिक,राजनीतिक और धार्मिक-शक्ति का असमान बंटवारा कराकर ही सारी दुनिया के शासक विषमता की स्थित पैदा करते रहे हैं।  इसकी सत्योपलब्धि कर ही अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड इत्यादि जैसे लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व देश ने अपने-अपने देशों में शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, फिल्म-टीवी-मीडिया इत्यादि हर क्षेत्र ही सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन की नीति पर काम किया और मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या से पार पाया।  किन्तु उपरोक्त देशों से लोकतंत्र का प्राइमरी पाठ पढने सहित कला-संस्कृति-फैशन-टेक्नोलॉजी इत्यादी सब कुछ ही उधार लेने वाले हमारे शासकों ने उनकी विविधता नीति से पूरी तरह परहेज़ किया।  किन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए था क्योंकि आजाद भारत के शासकों से भी विदेशियों की तरह 'डाइवर्सिटी नीति' अख्तियार करने की प्रत्याशा थी,ऐसा कई इतिहासकारों का मानना है।

आजाद भारत को अपने शासकों से विविधता के सम्मान की प्रत्याशा थी

 ऐसे इतिहासकारों के अनुसार – '1947 में देश ने अपने आर्थिक पिछड़ेपन, भयंकर गरीबी, करीब-करीब निरक्षरता, व्यापक तौर पर फैली महामारी, भीषण सामाजिक विषमता और अन्याय के उपनिवेशवादी विरासत से उबरने के लिए अपनी लम्बी यात्रा की शुरुआत की थी।  15 अगस्त पहला पड़ाव था, यह उपनिवेशिक राजनीतिक नियंत्रण में पहला विराम था:शताब्दियों के पिछड़ेपन को अब समाप्त किया जाना था, स्वतंत्रता संघर्ष के वादों को पूरा किया जाना था और जनता की आशाओं पर खरा उतरना था।  भारतीय राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना, राष्ट्रीय राजसत्ता को सामाजिक रूपांतरण के उपकरण के रूप में विकसित एवं सुरक्षित रखना सबसे महत्वपूर्ण काम था।  यह महसूस किया जा रहा था कि भारतीय एकता को आंख मूंदकर मान नहीं लेना चाहिए।  इसे मजबूत करने के लिए यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत में अत्यधिक क्षेत्रीय,भाषाई,जातीय एवं धार्मिक विविधताएँ मौजूद हैं।  भारत की बहुतेरी अस्मिताओं को स्वीकार करते एवं जगह देते हुए तथा देश के विभिन्न भागों और लोगों के विभिन्न तबकों को भारतीय संघ में पर्याप्त स्थान देकर भारतीयता को और मजबूत किया जाना था।  '

  भारत में सामाजिक और लैंगिक विविधता का प्रतीकात्मक प्रतिबिम्बन

इतिहासकारों की उपरोक्त टिपण्णी बताती है कि हमारे शासकों को इस बात का इल्म जरुर था कि राजसत्ता का इस्तेमाल हर क्षेत्र में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन में करना है ।  यही कारण है उन्होंने किया भी,मगर प्रतीकात्मक।  जैसे हाल के वर्षो में हमने लोकतंत्र के मंदिर में अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री,महिला राष्ट्रपति,मुसलमान उप-राष्ट्रपति, दलित लोकसभा स्पीकर,आदिवासी डिप्टी स्पीकर के रूप सामाजिक और लैंगिक विवधता का शानदार नमूना देखा।  मगर यह नमूना सत्ता की सभी संस्थाओं,सप्लाई,डीलरशिप,ठेकों,पार्किंग-परिवहन,मिडिया –फिल्म-टीवी,शिक्षण संस्थाओं के प्रवेश-अध्यापन,पौरोहित्य इत्यादि में पेश नहीं किया गया।

 वोट खरीदने के लिए राहत और भीखनुमा घोषणाओं पर निर्भर-हमारे राजनीतिक दल

हमारे स्वाधीन भारत के शासक स्व-वर्णीय हित के हाथों विवश होकर या आर्थिक-सामाजिक विषमता की सृष्टि के कारणों से अनभिज्ञ रहने के कारण शक्ति के स्रोतों का लोगों के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य बंटवारे की सम्यक नीति न ग्रहण कर सके। उन्होंने आर्थिक-सामाजिक विषमता के लिए भागीदारीमूलक योजनाओं की जगह 'गरीबी-उन्मूलन'को प्राथमिकता देते हुए राहत और भीखनुमा योजनाओं पर काम किया जिसकी 80-85 प्रतिशत राशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रही। शासक दलों की शक्ति के स्रोतों के बंटवारा-विरोधी नीति के फलस्वरूप बहुसंख्यक समाज इतना अशक्त हुआ कि वह शक्ति के स्रोतों में अपनी हिस्सेदारी की बात भूलकर विषमता बढानेवाली राहत भीखनुमा घोषणाओं के पीछे अपना कीमती वोट लुटाने लगा। राजनीतिक दलों ने भी उसकी लाचारी को भांपते हुए लोकलुभावन घोषणायें करने में एक दूसरे से होड़ लगाना शुरू कर दिया।

भीखनुमा घोषणाओं के चलते मुद्दाविहीन रहा 15 वीं लोकसभा चुनाव

   इस बीच कई बार जिस तरह शासक दलों ने भीषण विषमता तथा अवसरों के असम बंटवारे को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की,उससे लगा अब आने वाले दिनों में राहत की जगह भागीदारीमूलक घोषणाओं के आधार पर वोट लेने का दौर शुरू होगा। किन्तु,पार्टियों द्वारा विषमता को लेकर गहरी चिंता व्यक्त किये जाने के बावजूद कोई फर्क नहीं पड़ा। मसलन 2009 में आयोजित 15 वीं लोकसभा चुनाव को लिया जाय। उक्त चुनाव से पहले भूमंडलीकरण के दौर में भारत का तेज़ विकास चर्चा का विषय बन गया था। तेज़ विकास को देखते हुए दुनिया के ढेरों अर्थशास्त्री भारत के विश्व आर्थिक महाशक्ति बनने के दावे करने लगे थे। लेकिन इस तेज़ विकास के साथ चर्चा विकास के असमान बंटवारे की भी कम नहीं थी। उन दिनों नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने बार-बार कहा था ,'गरीबी कम करने के लिए आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं है। । । मैं उनसे सहमत नहीं हूँ जो कहते हैं आर्थिक विकास के साथ गरीबी में कमी आई है। 'उनसे भी आगे बढ़कर कई मौकों पर राष्ट्र को चेताते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था –'जिस तेज़ी से विकास हो रहा है,उसके हिसाब से गरीबी कम नहीं हो रही है। अनुसूचित जाति,जनजाति और अल्पसंख्यकों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है। देश में जो विकास हुआ है उस पर नज़र डालने पर साफ दिखाई देता है कि गैर-बराबरी काफी बढ़ी है। 'यही नहीं गैर-बराबरी से चिंतित प्रधान मंत्री ने अर्थशास्त्रियों से सृजनशील सोच की मांग भी की थी ताकि आर्थिक-विषमता की चुनौती से जूझा जा सके। उन्ही दिनों रष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने विषमता की समस्या से चिंतित होकर बदलाव की एक नई क्रांति का आह्वान किया था। अतः प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा विगत वर्षों में आर्थिक विषमता की समस्या पर एकाधिक बार चिंता व्यक्त किये जाने के बाद उम्मीद थी कि 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के घोषणापत्र में आर्थिक गैर-बराबरी के खात्मे को अधिक से अधिक स्पेस तथा अनुसूचित जाति,जनजाति और अल्पसंख्यकों के लिए विकास में भागीदारी का सटीक सूत्र देखने को मिलेगा। पर,वैसा कुछ न कर कांग्रेस ने रिश्वत टाइप के लोकलुभावन वादे कर 15 वीं लोकसभा चुनाव को मुद्दाविहीन बना दिया,जिसका अनुसरण दूसरे दलों ने भी किया।

 इस प्रक्रिया में भाजपा ने कांग्रेस के तीन रूपये के मुकाबले दो रुपया किलो के हिसाब से 35 किलो चावल देने का वादा का डाला। फिल्म एक्टर चिरंजीवी की 'प्रजा राज्यम'पार्टी ने आन्ध्र प्रदेश के डेढ़ करोड़ गरीबों को मुफ्त चावल,तेल,और कुकिंग गैस देने की घोषणा कर डाला था। तेलगु देशम का वादा था कि चुनाव जीतने पर वह गरीबों के खाते में कुछ नगद जमा; करा देगी। उसने हर निर्धन की पत्नी को मासिक दो हज़ार ,फिर पन्द्रह सौ और सामान्य गरीब को एक हज़ार नकद देने का वादा किया था। दूसरे दल भी इस किस्म की घोषणायें करने में पीछे नहीं रहे। मतलब साफ़ है कि 15 वीं लोकसभा चुनाव में हमारे राजनैतिक दलों ने अपने घोषणापत्रों में सरकारी खजाने से अरबों रुपये वोटरों को रिश्वत के रूप में देने का एलान कर डाला था। चुनाव बाद जिस तरह कांग्रेस ने मनरेगा को अपनी जीत का कारण बताया,उससे लोकलुभावन घोषणाओं का चलन और बढ़ा।

      16वीं लोकसभा चुनाव पूर्व खतरनाक हालात

  बहरहाल 2014 के पूर्वार्द्ध में अनुष्ठित होने वाले लोकसभा चुनाव के पूर्व केंद्र की सत्ता दखल का सेमी-फाइनल माने-जाने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाओं में जिस तरह राहत और भीखनुमा घोषणाओं की होंड मची उसे देखते हुए दावे के साथ कहा जा सकता है कि 15 वीं लोकसभा की भांति 16 वीं लोकसभा चुनाव में भी मुफ्त में अनाज,रेडियो-टीवी-कंप्यूटर-कुकिंग गैस-साइकल,नकद राशि इत्यादि का प्रलोभन देकर वोट खरीदने का उपक्रम चलाया जायेगा। इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान अन्नाद्रमुक द्वारा जारी घोषणापत्र यह यकीन पुख्ता करता है कि सोलहवीं लोकसभा भी भागीदारी नहीं,भीखनुमा घोषणाओं पर केन्द्रित होने जा रहा है। इसमें वादों की झड़ी लगाते हुए कहा गया है कहा गया है कि अगर पार्टी केंद्र की अगली सरकार का हिस्सा हुई तो देश भर में लैपटॉप के साथ मुफ्त मिक्सर ग्राइंडर,पंखे,दुधारू गायें और बकरियां,साइकल,किताबें,छात्रों के नाम फिक्स डिपोजिट,सौर उर्जा प्रयुक्त घर और गरीब लड़कियों को चार ग्राम सोना। जाहिर है जयललिता ने गाय-बकरी से लेकर लैप-टॉप इत्यादि मुफ्त में देने का वादा जो वादा किया है उसका अनुसरण अन्य दल भी करेंगे। ऐसा करके राजनीतिक दल हमारे लोकतंत्र को विस्फोटित करने का कुछ और सामान जमा करेंगे। किन्तु सोलहवीं लोकसभा चुनाव पूर्व लोकतंत्र के विस्फोटित होने लायक कुछ और सामन स्तुपीकृत करने के साथ दो और ऐसी नई बातें हुईं हैं जिसने हमें अपना कुछ कर्तव्य स्थिर करने के लिए बाध्य कर दिया है।

     सवर्णवादी दलों का बाप "आप"

   हम अब तक इसी बात का रोना रो रहे थे कि देश सवर्णवादी दलों द्वारा शासित हो रहा रहा है। पहले कांग्रेस फिर भाजपा जैसी दूसरी सवर्णवादी पार्टी इस रेस में शामिल हो गयी। हम सब इन्ही दोनों को रोकने की रणनीति बनाने में व्यस्त थे कि आम आदमी पार्टी(आप) के रूप में तीसरी सवर्णवादी पार्टी वजूद में आ गयी। 'आप'एनजीओ से जुड़े सवर्णों का ऐसा दल है जो भ्रष्टाचार के खात्मे की आड़ में बहुजन प्रधान राजनीति पर पर सुपर कंट्रोल स्थापित करने का भयावह षड्यंत्र रच रहा है। इस एनजीओ गैंग का जनलोकपाल/लोकायुक्त दरअसल बहुजनों द्वारा निर्वाचित सांसदों/विधायकों पर गैर-निर्वाचित सवर्णों का नियंत्रण स्थापित करने का एक अचूक हथियार है। चूँकि मंडल-उत्तर काल में बहुजनों की जाति चेतना ने शक्ति के तमाम सोतों पर 80-85%कब्ज़ा रखने वाले सवर्णों को राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील कर दिया इसलिए जब एनजीओ गैंग ने बहुजन प्रधान राजनीति पर सुपर कंट्रोल स्थापित करने का षड्यंत्र किया,उसमें सवर्णों का कारपोरेट,मिडिया,फिल्म,खेल-कूद,गायन इत्यादि से जुड़ा सारा क्रीम तबका शामिल हो गया। भारी आश्चर्य का विषय की सवर्णवादी दलों का बाप 'आप' के साथ जुड़ने में बहुजन सामज के लोग भी होड़ लगाने लगे हैं।

आत्मसमर्पण बहुजनवादी दलों का

 कांग्रेस –भाजपा के बाद नए व सबसे खतरनाक सवर्णवादी दल आप से निपटने के रणनीति बनाने में व्यस्त थे कि बहुजन राजनीति में भूचाल आ गया। जिन लोगों ने हिंदुत्ववादी भाजपा को गाली देकर व सौ-सौ हाथ की दूरी बनाकर बहुजन नायक का ख़िताब अर्जित किया था उनलोगों में ही भाजपा में शामिल होने व उससे गठबंधन करने की होड़ लग गयी। भाजपा के समक्ष समर्पण करने वाले दलों के अतिरिक्त जो शेष बचे बहुजनवादी दल हैं,वे भी उद्भ्रांत व दिशाहीनता के शिकार हैं। इनमें कुछ तीसरे मोर्चे,जो अब तक भारतीय राजनीति में सपना ही रहा है,में अपनी सम्भावना तलाश रहे हैं तो कुछ ख़ामोशी अख्तियार किये हुए हालात का जायजा ले रहे हैं। एक ऐसे समय में जबकि हम बहुजनों की जातिचेतना के चलते भारतीय राजनीति पर मूलनिवासियों का वर्चस्व स्थापित होने का सपना देखने लगे थे,अधिकांश बहुजनवादी दलों का सवर्णवादी दलों के समक्ष आत्मसमर्पण स्वतंत्र बहुजन राजनीति की करुणतम स्थिति स्वतंत्र मूलनिवासी राजनीति के लिए विराट आघात है।

   बहरहाल बदले हालात में बहुजन बुद्धिजीवियों को सक्रिय भूमिका अदा करने के लिए सामने आना,आज एक ऐतिहासिक जरुरत बन गयी है। कारण,बदले राजनीतिक परिदृश्य में लगता है देश की राजनीति मंडल पूर्व युग में चली गई है,जब सारे एजेंडे सवर्णवादी तय करते थे। मंडल के बाद लोकतंत्र के सुदृढ़ीकरण व समतामूलक समाज के एजेंडे मुख्यतः बहुजन समाज के नेता तय करते थे,जिसका अनुसरण करने के लिए राजनीतिक रूप से लाचार सवर्ण समाज के नेता बाध्य रहते थे। किन्तु वर्तमान स्थिति में मैदान सवर्णवादी दलों के लिए पूरी तरह मुक्त हो गया है। अब सारा एजेंडा भाजपा,कांग्रेस और आप जैसे दल तय करेंगे,बहुजन नायक/नायिकाओं की स्थिति प्रायः मूक दर्शक जैसी रहेगी। यह हालात बेहद चिन्ताजनक है। कारण,जिन सवर्णों का भारतीय राजनीति पर नए सिरे से वर्चस्व स्थापित हुआ है,वे स्वभावतः लोकतंत्र विरोधी हैं।

  मित्रों,जिन लोगों ने हाल ही में केंद्र की अगली सत्ता के प्रबल दावेदार दल के समक्ष आत्मसमर्पण किया है,वे अतीत में समय-समय पर भारतीय राजनीति को आर्थिक और सामाजिक –विषमता के खात्मे एजेंडे पर खड़ा करने की उम्मीद जगाते रहे। किन्तु अब उनके सवर्णवादियों के संग जुड़ने से वह सम्भावना ख़त्म सी होती नज़र आ रही है। उनके खेमा बदल से ऐसा लगता है कि बदलाव की आवाज भारतभूमि पर दम तोड़ चुकी है। ऐसी स्थिति में राजनीति के एजेंडे को आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे पर केन्द्रित करने की ऐतिहासिक जिम्मेवारी अब बहुजन बुद्धजीवियों पर आ पड़ी है। उन्हें बतलाना होगा कि सामाजिक न्याय तथा बदलाव की आवाज भले ही मंद पड़ी गई है पर, मरी नहीं है।

        दो विकल्प हमारे सामने

मित्रों! यदि आप बहुजन राजनीति के इस संकट ग्रस्त हालात में सामाजिक न्याय तथा आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे की आवाज को बरकरार रखने में सक्रिय योगदान का मन बना रहे हैं तो मेरे ख्याल से हमारे सामने दो विकल्प हैं।

पहला!

चूँकि स्वाधीन स्वाधीन भारत के शासकों ने शक्ति के स्रोतों के न्यायोचित बंटवारे से परहेज कर ही विश्व में भीषणतम गैर-बराबरी का साम्राज्य भारत में कायम किया तथा शक्ति के स्रोतों का विभिन्न सामाजिक समूहों में न्यायोचित बंटवारे के जरिये ही फुले-शाहूजी-परियार-बाबासाहेब-जगदेव प्रसाद-कांशीराम इत्यादि के सपनों के समाज का निर्माण किया जा सकता है इसलिए हमें बहुजन नेतृत्व वाले किसी ऐसे दल के पीछे मजबूती से खड़ा होना होगा जो शक्ति के चप्पे-चप्पे को देश के चार प्रमुख सामाजिक समूहों के स्त्री-पुरुषों की संख्यानुपात में भागीदारी दिलाने की लड़ाई में उतरा हो,भले ही वह दल नया व छोटा ही क्यों न हो।

दूसरा!

यदि आप आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी के खात्मे के मुद्दे पर कार्यरत किसी बहुजनवादी दल के पीछे खड़े होकर बदलाव की आवाज को मुखर नहीं कर सकते तो कोई मोर्चा बनाकर नोटा(nota)के लिए संगठित अभियान चलायें। इसके लिए राजनीतिक दलों के समक्ष यह सन्देश पहुचाना होगा कि यदि वे अपने चुनावी घोषणापत्र को शक्ति के स्रोतों के भारत के चार प्रमुख सामाजिक समूह के स्त्री-पुरुषों की संख्यानुपात में बंटवारे केन्द्रित नहीं करते हैं तो हम बहुजन समाज को इवीएम में लगे 'नोटा' का बटन दबाने की अपील करेंगे। अर्थात बहुजन समाज का वोट सिर्फ उसी को मिलेगा जो 'जिसकी जीतनी संख्या भारी-उसकी उतनी भागीदारी' पर अपना चुनावी एजेंडा स्थिर करेगा।

बहुजन बुद्धिजीवियों को न सिर्फ विषमता के खात्मे की आवाज बुलंद रखने बल्कि बहुजन नेतृत्व के पाला बदल से हताश –निराश शक्तिहीन मूलनिवासियों में उम्मीद की नई किरण पैदा करने के लिए भी नई जिम्मेवारी को वरण करना, इतिहास की मांग बन गई है। मेरा दृढ विश्वास है आप इतिहास की मांग को नज़रंदाज़ नहीं करेंगे। आइये हम फुले-शाहूजी-पेरियार-सर छोटूराम-आंबेडकर-कांशीराम-जगदेव प्रसाद-ललई सिंह यादव के अनुयायी एक बौद्धिक मोर्चा बनाकर अपने इन नायकों के सपनों के भारत निर्माण में योगदान कर अपना जीवन सार्थक बनायें।

यदि आप इस निवेदन पर अपना आवश्यक कर्तव्य स्थिर करते हैं तो कृपया आगामी दो चार दिनों में मेरे निम्न इमेल और मोबाइल पर सूचना दें। ताकि इस पहल को आगे बढाया जा सके। मित्रों,आपसे यह भी आग्रह है की इस अपील को अधिक से अधिक लोगों तक फॉरवर्ड करें।

   (एच एल दुसाध, लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं )

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एच एल दुसाध, लेखक बहुजन चितक, स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के संयोजक हैं।


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