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Tuesday, January 7, 2014

कि जिन्दा रहने के लिए काफ़ी नहीं बस साँस लेते रहना राजनीति और मुक्त बाजार दोनों के तकनीक सर्वस्व हो जाने पर दरअसल आम आदमी का कोई वजूद है ही नहीं और हर वह शख्स जो आम आदमी की टोपी लगाये बदलाव के ख्वाब बेच रहा है ,वह दरअसल खासमखास आदमी या औरत या तृतीय लिंग है।

कि जिन्दा रहने के लिए काफ़ी नहीं बस साँस लेते रहना


राजनीति और मुक्त बाजार दोनों के तकनीक सर्वस्व हो जाने पर दरअसल आम आदमी का कोई वजूद है ही नहीं और हर वह शख्स जो आम आदमी की टोपी लगाये बदलाव के ख्वाब बेच रहा है ,वह दरअसल खासमखास आदमी या औरत या तृतीय लिंग है।


पलाश विश्वास
Aaj Tak
इस बाजार का एक ही नियम. छूट चाहिए, तो कपड़े उतार कर आइए. सिर्फ अंडरगारमेंट्स में. और इस छूट का फायदा उठाने के लिए क्या आदमी क्या औरत सबकी लाइन लग गई...देखें तस्वीरें और जानें इस अजीबोगरीब सेल के बारे में
http://aajtak.intoday.in/story/shoppers-strip-down-to-their-undies-for-sales-offer-at-clothing-store-1-751535.html
shoppers strip down to their undies for sales offer at clothing store: ख़बरें: आज तक
aajtak.intoday.in
सेल यानी कि छूट किसे पसंद नहीं? जाहिर सी बात है कि सेल सभी को पसंद है और सेल का मौसम आते ही मॉल्‍स या दुकानों पर लोगों की भीड़ इस तरह जुटती है जैसे कि सामान मुफ्त में बंट रहा हो. लेकिन यहां पर हम आपको जिस सेल के बारे में बता रहे हैं वो जरा हटकर है.
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आज का संवाद

कारपोरेट सोशल इंजीनियरिंग और जाति विमर्श के घटाटोप के मध्य तकनीक में बदलती राजनीति जो आम आदमी की तबाही की तरकीब भी है।



Satya Narayan shared a link.

10 hours ago

किश्तों में मरते चले जाने से बचना है

तो याद रखना होगा हमेशा

कि जिन्दा रहने के लिए काफ़ी नहीं बस साँस लेते रहना,

कि एक प्रज्ज्वल धैर्य ही ले जायेगा हमें

एक जाज्वल्यमान सुख की ओर।

http://ahwanmag.com/archives/674

धीमी मौत - पाब्लो नेरूदा

ahwanmag.com

जो बन जाते हैं आदत के गुलाम, चलते रहे हैं हर रोज़ उन्हीं राहों पर, बदलती नहीं जिनकी कभी रफ्तार जो अपने कपड़ों के रंग बदलने का जोखिम नहीं उठाते, और बात नहीं करते अनजान लोगों से, वे मरते हैं धीम...



After AAP, APP Will Shake up Politics

Parties launch innovative smartphone applications to woo urban middle class voters

VARUNI KHOSLA & RAVI TEJA SHARMA NEW DELHI



   The elections are fought across different platforms, and one of the key battlegrounds this time seems to be the smartphone, with political outfits — from top rivals BJP and Congress to exciting startup Aam Aadmi Party — vying to launch apps to woo the urban middleclass. While the main challenger BJP launched an app called 'India272+' on January 1, the AAP is revamping its smartphone app to accelerate its bid to grow across the country. The ruling Congress party plans to launch two apps to engage its cadres and win over the urban youth. Experts say that besides helping parties to prove they are tech savvy, mobile apps will be used to enroll volunteers, create a platform for workers to share their thoughts and provide news updates about party. "Parties have to talk the language of the new generation and use as many ways as possible to reach out. The more plural the better," social scientist Shiv Vishwanathan said. He said having a mobile phone app makes parties seem more up-to-date and if one party does it, everyone else will do it. India is estimated to have nearly 51 million smartphone users. While the number represents less than 10% of the country's electorate, a good number of the estimated 150-million first-time voters this year would be tech savvy. And, anyway, with the rapid growth of smartphone usage in India — it has grown some 89% since 2012 — it's a medium political parties cannot afford to miss out on in the long run. The BJP's 'India272+' has already been downloaded more than 10,000 times on the Android platform.









इकोनोमिक टाइम्स


कल रात हमने माडिया के आधार अभियान पर देश के सबसे पुराने सबसे बड़े हिंदी अखबार का एक पेज पोस्ट किया था।कल भी हमने डिजिटल बाटोमेट्रिक रोबोटिक निगरानी के तंत्र लिख चुके हैं।


देवयानी खोपड़ागड़े पर भारत अमेरिकी राजनयिक युद्ध पर लिखते हुए हमने देवयानी के निकटसंबंधी और अपने परम मित्र मराठी अखबार महानायक के संपादक सह रिपब्लिकन पार्टी अध्यक्ष सुनील खोपड़ागड़े के इस प्रकरण पर चलाये जा रहे आंदोलन की भी आलोचना में निर्मता बरतने से हमने परहेज नहीं की है। जबकि महाराष्ट्र में महानायक की अपनी बहुत बड़ी भूमिका है और बहुजन राजनीति को ,खासकर रिपब्लिकन जनता को एकजुट करने की कोशिश सुनील ईमानदारी से कर रहे हैं।


हमें बेहद अफसोस है कि हम कम से कम इस मुद्दे को सबसे बड़ा मुद्दा नहीं मानते।देवयानी के साथ जो हुआ ,जाहिर है गलत हुआ।लेकिन भारत सरकार ने देवयानी के मामले को तो मुद्दा बना लिया लोकिन इसकी आड़ में खुफिया निगरानी को वैधता देने की हर संभव कोशिश वह कर रही है।


हमारे मीडिया विशेषज्ञ मित्र जगदीश्वर चतुर्वेदी फेसबुक पर सबसे सक्रिय प्राणी हैं।वे उत्तरआधुनिक पाठ के विशेषज्ञ भी हैं और मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र को सिरे सेखारिज करने वाले भी हैं।उन्होंने बिना आधार प्रश्न को संबोधित किये चुनाव आयोग के गुगल से हुए समझौते के विरोध के लिए फेसबुक पर अपील कर दी।


इसके जवाब में हमने उनसे आग्रह किया कि वे विस्तार से इस निगरानी ड्रोन आधार प्रिज्म तंत्र पर लिखें,लेकिन उन्होंने लगता है ,मुझ जैसे मामूली मीडियाकर पत्रकार के निवेदन पर गौर करना उचित नहीं समझा।


आज सुबह मेल बाक्स खोला तो आधारविरोधी अभियान के महायोद्धा गोपाल कृष्ण जी का मेल आया देखा।उन्होंने इस सिलसिले में कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज भेजे हैं।जो इस संवाद में आपके विचारार्थ पेश किया जायेगा।लेकिन पहले आज के संवाद का खुलासा जरुरी है।


गुडगांव और उत्तराखंड के सिडकुल इलाके में मजदूर आंदोलन चलाने वाले एकदम युवाजनों की युवाटीम ने पिछले साल अपनी ओर से बाबासाहेब भीमराव के जाति उन्मूलन के एजंडा और अंबेडकरी आंदोलन के पुनर्मूल्यांकन का बीड़ा उठाया।


उन्होंने जो गोष्ठी इस सिलसिले में की,उसमें बाबासाहेब अंबेडकर के समूचे रचनासंसार को डिजिटल में उपलब्ध कराने वाले और भारत में सूचना तकनीक उद्योग की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले हमारे आदरणीय मित्र आनंद तेलतुंबड़े जी  और दिल्ली के तुलसीराम जी जैसे लोग थे।


इस पर जो रपट आयी,उसमें तेवर सिरे से अंबेडकर कोखारिज करने की थी।हम चूंकि गोष्ठी में थे नहीं,और हमें मालूम ही न था कि वहां क्या विचार विमर्श हुआ,हमने रपट के दृष्टिकोण और भाषा पर गहरा और तीखा एतराज जताया।इसपर हस्तक्षेप में अभिनव सिन्हा और हमारे बीच बहुत तीखी और लंबी बहस चली।बाद में उन्होंने गोष्ठी के आधारपत्र और वीडियो को सार्वजनिक किया तो तब  बामसेफ के सक्रिय कार्यकर्ता बतौर हमारे लिए उस बहस से अलग हटने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचा।


आनंद जी ने भी अपनी ओर से स्पष्टीकरण जारी किया और उस पर अभिनव और उनकी टीम की कड़ी प्रतिक्रिया आयी।इस पर हमारे मित्र रियाजुल हक ने भी हाशिये पर प्रतिक्रिया दी।


डायवर्सिटी मिशन के आदरणीय एच एल दुसाध ने इस टीम की अवधारणाओं  के खिलाफ एक लंबी प्रश्नश्रृंखला भी चलायी,जिसे बाद में उन्होंने पुस्तक की शक्ल भी दे दी। इसके बाद एकदिन लखनऊ से दुसाध जी का फोन आया और वे बहुत भावुक होकर बोले कि जानते हैं कि अभिनव तो कात्यायनी का बेटा है और महज 26 साल का है।


हमारे लिए कात्यायनी जी क्या हैं, यह हम अभिनव को समजा नहीं सकते।लेकिन राहुल फाउंडेशन के कामकाज से हम लोग लंबे अरसे से परिचित हैं।उनसे जुड़े विवादों से हम दुःखी भी हुए,लेकिन इस टीम के प्रति हमारे समर्थन में आजतक कभी कोई कमी नहीं रही।


इसी टीम के मुकुल जी रुद्रपुर में न केवल सिडकुल में मजदूर आंदोलन के प्रभारी है,बल्कि वे बसंतीपुर में हमारे परिवार में भी शामिल हैं।पिताजी दिवंगत पुलिन बाबू की स्मृति में निकल रही पत्रिका धरोहर के वे अन्यतम संपादक हैं।


जाहिर है कि इन बातों के भाववादी पक्ष से वस्तुवादी वैज्ञानिक दृष्टिकोण का संबंध नहीं है। लेकिन जब हम मनुष्य और प्रकृति की बात कर रहे होते हैं,तो एक स्थाईभाव संवेदनाओं का भी होता है,जिसके इर्ज गिर्द सामाजिक संवेदनाएं बनती हैं।


मसलन जन्मजात हिमालयी जनता के बीच होने की वजह से सामाजिक यथार्थ,मनुष्यता और प्रकृति व पर्यावरण के मुद्दे हमारे लिए बहुजन राजनीति में भी सर्वोच्च प्राथमिकता के हैं,जो दूसरों के लिए शायद नही होंगे।


इधर मौजूदा भारतीय व वैश्विक संदर्भों में अभिनव और उनके दूसरे साथियों ने बहुत बेहतरीन विश्लेषण पेश किये हैं और उनके इस किये पर हमें गर्व भी है।जो हम शायद करने में असमर्थ हैं,वह काम भी वे लोग कुशलता से कर पा रहे हैं।


पहले से आनंद जी और हम दोनों अंबेडकर के जाति उन्मूलन के एजंडे पर बहस फोकस करना चाहते थे।क्योंकि भारतीय यथार्थ को संबोधित करने का यही एकमात्र राजमार्ग है।


देश भर में कश्मीर से कन्याकुमारी तक  हमारे तमाम हजारों  साथी तहे दिल से और लंबे समय से तृणमूल स्तर पर बहुजन समाज में अपनी निरंतर सक्रियता से महसूस करते हैं कि अंबेडकर,बहुजन,मूलनिवासी,महात्मा ज्योतिबा फूले,संत रविदास,गाडगे महाराज,शिवाजी,बिरसा मुंडा,रानी दुर्गावती,टांट्या भील,सिधो कान्हा,जयपाल सिंह मुंडा, बशेश्वर, मतुआ, दलित, रिपब्लिकन, शोषित, पिछड़ा, अति पिछड़ा, पसमंदा, बामसेफ, कांशीराम से जुड़े संज्ञा,सर्वनाम और विशेषण का हमेसा सत्ता ने वोट बैंक बतौर इस्तेमाल किया है।


यही नहीं,इनकी आड़ में इतनी दुकानें,शापिंग माल सज गये हैं,इतने दूल्हों की बाराते निकल पड़ी हैं,इतने निरंकुश मसीहा और उनके पुजारी पैदा हो गये हैं कि अस्मिताओं में कैद विचार,इतिहास,विरासत और आंदोलन को नये संदर्भ और प्रसंग में जस का तस देखना और उसीतरह चलना जड़ता के अलावा कुछ नहीं है।


नयी वैश्विक व्यवस्था के मुकाबले,भारतीय सत्तावर्ग के मुकाबले और अत्याधुनिक कारपोरेट कायाकल्प के मुकाबले,उत्तरआधुनिक विमर्श और तकनीक के मुकाबले,प्रबंधकीय दक्षता की कारपोरेट राजनीति के मुकाबले,युद्धतांत्रिक पारमाणविक उत्पादनविरोधी प्रकृतिविरोधी मनुष्यताविरोधी जायनवादी धर्मोन्मादी अर्थव्यवस्था के मुकाबले हमें अपनी विरासत से वहीं चीजें लेनी चाहिए जो इस विध्वंसक राज्यतंत्र में बुनियादी परिवर्तन संभव कर सकें।


हम मानते हैं कि इसके लिए इतिहास,विरासत और विचारधारा की भी निर्मम चीरपाड़ जरुरी है।यह कार्यभार बहुत आसान भी नहीं है।आग की दरिया में डूबकर ही हम लोग मंजिल तक पहुंच सकते हैं,तयहै।आह्वान टीम ने पहल की है,इसके लिए हम लोग उनका आभार मानते हैं।


हमारी युवा प्रतिबद्ध जुझारु आह्वाण बिगुल टीम ने भी एकदम सही रास्ता अख्तियार किया है। वे अपनी भाषा में अंबेडकर को सिरे से खारिज कर रहे हैं, लेकिन भारतीय यथार्त को संबोधित करने के लिए वे भी जाति उन्मूलन के एजंडा पर बहस केंद्रित करते हैं तो जिस व्यक्ति की आलोचना आप कर रहे हैं,वह अगर सिरे से अप्रासंगिक हैं तो उनके किसी एजंडे के मूल्यांकन की नये सिरे से कोई जरुरत ही क्या है,यह समझने की बात है।


हमारी बहुजन राजनीति व बहुजन सांस्कृतिक आंदोलन से अलगाव की मुख्य वजह वहां न्यूनतम लोकतंत्र की गैरमौजूदगी है।निरंकुश तानाशाही और संवादहीनता का घनघोर अंधकार में लापता चीखें हैं।


जिन्होंने अमेरिका से सावधान का कोई भी अंस पढ़ा होगा तो उन्हें भी मालूम होगा कि वह उपन्यास भी हमने बहुपक्षीय संवाद बतौर इंटरएक्टिव लिखा है और उसे संवाद बतौर करीब एक दशक तक जारी रखने के बाद राष्ट्र का चरित्र,अर्थव्यवस्था की बुनियाद और सामाजिक संरचना में हुए तमाम परिवर्तनों के मद्देनजर उसको जस का तस पुस्तक रुप में प्रकाशित करने के बड़े से बड़े प्रस्ताव को हमने ठुकराया है।


चूंकि अब संवाद के संदर्भ और प्रसंग सिरे से बदल गये हैं तो तब लिखे रचे संवाद को उसी रुप में पुनः प्रस्तुत करने का कोई औचित्य ही नहीं है।हमने उस उपन्यास को स्वेच्छा से तिलांजलि दे दी है।


यह लिखने का आशय यह है कि पिछले दो दशको में भारतीय यतार्थ में इतने ज्यादा और इतने जटिल परिवर्तन हुए हैं कि दस साल पहले जिन संदर्भों और प्रसंगों में हम संवाद कर रहे थे,वह अब पूरी तरह बदले हुए हैं।


इसी परिप्रेक्ष्य में सिर्फ अंबेडकरी आंदोलन ही नहीं,साम्यवादी और गैरसाम्यवादी आंदोलनों का भी नये सिरे से मूल्यांकन होना बेहद जरुरी है।


लेकिन मैं एकतरफा प्रवचन,एकल संवाद और एकाधिकारवादी अहं और वर्चस्व के भी विरुद्ध हूं क्योंकि ये फासीवाद,नाजीवाद,जायनवाद के राजमार्ग हैं,जहां समर्थ को ही कहने सुनने का हक हकूक है,असमर्थ को नहीं।हम अपने लेखन में भी संवाद पर निर्भर है और कोशिश करते हैं कि यह संवाद एकपक्षीय न होकर बहुपक्षीय हो।


अब फेसबुक की सुविधा हो जाने पर कोई भी संवाद अंतिम रुप लेने से पहले हम कोशिश करते हैं कि इसकी एक एक पंक्ति आप तक पहुंचे और आप उस पर अपनी सहमति असहमति व्यक्त करें ताकि संवाद मुकम्मल हो।


हम मित्रों की इजाजत के साथ फेसबुकिया पोस्ट और मंतव्यों,बहसों को,सोशल नेटवर्किंग में उपलब्ध सामग्री को समाहित करके किसी भी मुद्दे को एक मुकम्मल मल्टी मीडिया मल्टी लिंगुवल चेहरा देने की कोशिश करते हैं कि कहीं तो कोई दरवाजा,कहीं तो कोई खिड़की खुले चकाचौंधियाते बहुमंजिली सीमेंट के इस तिलस्मी अंधकार के यातनाशिविर के।


हमें खुशी है कि आह्वान टीम इतिहास के साथ साथ समसामयिक इतिहास को भी खंगालने का काम बखूब कर रही है।


इतिहास का मजा यह है कि एक बार इतिहास बन जाने के बाद आप व्याख्या चाहे कुछ करें ऐतिहासिक पात्रों की भूमिकाएं लाख कोशिश करके भी बदल नहीं सकते।


इतिहासबोध का तकाजा यही है कि हम इतिहास का सम्मान करना भी सीखें जैसे हम अपने अपढ़, हाड़ मांस के बने अग्रजों और पुरखों का सम्मान करते हैं,उनको खारिज करते हुए भी और उनसे असहमत होते हुए भी।


सबक यही है कि ऐतिहासिक भूलों को हम दोहरायें नहीं और उन भूलों की रोशऩी में नया रास्ता बनाकर उसपर चलें।भारत विभाजन से पहले की बात क्या करें, दस साल पहले भी हम जो सोच रहे थे,जो कर रहे थे,उसके मायने बदल गये हैं।


ग्लोबीकरण में सामाजिक यथार्थ के तार अब तेजी से तकनीक के विकास के साथ जुड़ गये हैं।हम लोग भी लगभग पिछले दश साल से मीडिया के बाजार में बेदखल हो जाने के बाद और घटनाक्रम के अत्यंत तेज होते जाने से तत्काल मुद्दों को गिरदा स्टाइल में संबोधित करने के लिहाज से आम जनता के बीच जो कह रहे हैं,वहीं नेट पर दोहरा रहे हैं,ताकि वह देशभर में संप्रेषित हों।


वंचित तबकों को नेट से अंततः बहिस्कृत किया नहीं जा सकता और तेजी से यहां उनकी तादाद करोड़ों में बढ़ रही है।जाहिर है कि जब तक नेट  पर संवाद महज सत्तावर्ग तक सीमाबद्ध था,तबतक इसके दुरुपयोग की चिंता किसी को नहीं थी।


अब सबसे बड़ा खतरा यह है कि इस मल्टी मीडिया मल्टी लिंगुवल माद्यम के जरिये उन तक भी राजकाज,नीति निर्धारण और अर्थतंत्र के बीजमंत्र   शोषित शासित और वंचित तबके तक रिस रिस कर पहुंचने लगे हैं,यह व्यवस्था कभी भी विस्फोटक स्थिति बना सकती है।


इसलिए हर देश की सत्ता अभिव्यक्ति की इस आखिरी खिड़की को भी बंद करने की पुरजोर कोशिश कर रही है।इसीलिए प्रिज्म का यह विश्वव्यापी आयोजन है कि दूसरा असांज या स्नोडन वैश्विक व्यवस्था की चूलें महज सूचनाओं के खुलासे से हिला न दें।


इसीलिए असंवैधानिक आधार के जरिये हमारी दसों उंगलियों और आंखों की पुतलियों को कैद करने के बाद के बाद अब गुगुल के जरिये नागरिकों के सारे निजी गोपनीय तथ्य अमेरिकी आकाओं के हवाले करने का यह चाकचौबंद इंतजाम।


इसके विपरीत तकनीक के माध्यम से  पूरा राजकाज और राजनीति चलाने में किसी को परहेज नहीं है।  खासतौर पर प्रबंधकीयदक्षता समृद्ध कारपोरेट राजनीति के प्राणपखेरु इसी तकनीक में है।


नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी,ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल,प्रधानमंत्रित्व के चारों कारपोरेट विकल्प की पूरी राजनीति प्रबंधकीय दक्षता के तकनीकी महायुद्ध के जी वन रा वन में तब्दील है। कांग्रेस ,भाजपा और आप की ओर से मोबाइल ऐप्पस जारी किये जा रहे हैं।


इसी सिलसिले में ध्यान देने योग्य बात यह है कि तकनीक का विकास विज्ञान के विकास से भी तेज है।वैज्ञानिक सिद्दांतो की बुनियाद प्राचीन है लेकिन तकनीक रोज बदलती है।


अब क्लाउड तकनीक की तरह क्लाउड पालिटिक्स का यह जमाना है।य़ानी सुविधा मुताबिक जरुरी साफ्टवेयर से काम लो और फिर उसे फेंक दो।


यानी आम आदमी का पूरा इस्तेमाल करते हुए गन्ने की तरह चूसकर उसे फेंक दो।नयी तकनीक नया गन्ना उठा लो।


उदारीकरण ग्लोबीकरण और निजीकरण के मूल में तकनीक है तो मुक्त बाजार की नींव भी वही तकनीक।


राजनीति और मुक्त बाजार दोनों के तकनीक सर्वस्व हो जाने पर दरअसल आम आदमी का कोई वजूद है ही नहीं और हर वह शख्स जो आम आदमी की टोपी लगाये बदलाव के ख्वाब बेच रहा है ,वह दरअसल खासमखास आदमी या औरत या तृतीय लिंग है।


आह्वान टीम के युवा साथियों को बधाई कि वे इस तकनीक ब्लिट्ज में भी बहस के केंद्र में फिर बाबासाहेब अंबेडकर और उत्तरआधुनिक बाजार में खारिज हो चुके विचार और इतिहास को फोकस पर ला रहे हैं,जिसे मुक्त बाजार ने खारिज करके फेंक दिया है और यह उपभोक्ता समाज मुड़कर भी नहीं देख रहा है।


हम जानते हैं कि यह टीम काम कर रही है।लेकिन इस टीम को यह भी सोचना होगा कि जहां जहां वे काम कर रहे हैं, वे तमाम जगहें मिलकर देश का भूगोल नहीं बनातीं।


बाकी भूगोल में तमाम दूसरे लोग भी उनका जैसा महत्वपूर्ण काम पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता से कर रहे हैं।जैसे वे अपने दृष्टिकोण में सही हो सकते हैं तो दूसरे जनपक्षधर साथी जो देशभर में अलग अलग द्वीपों में काम कर रहे हैं, वे भी अपनी अपनी अभिज्ञता,दृष्टि और सीमा के तहत उतने ही सही हो सकते हैं।


यह भी सोचने की जरुरत है कि ये तमाम लोग अगर एकजुट हो जाये तब भी कुछ बदलने वाला नहीं है। जबकि बाजार और तकनीक के शिकार इस तेजी से बन रहे डिजिटल बायोमेट्रिक रोबोटिक देश के तमाम रिमोट नियंत्रित नागरिकों की मनुष्यता को हम पुनर्जीवित करके उनके तमाम इंद्रियों को राज्ययंत्र में बुनियादी परिवर्तन के लिए सक्रिय न कर लें।


आज सुबह भी हमारी आनंद तेलतुंबड़े से लंबी बात हुई है। हम दोनों के अलावा देश भर में हजारों सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता चाहते हैं कि आपसी संवाद के जरिये कोई तो दिशा बनें ,जिस ओर एक सात मजबूती से चलते हुए हम कम से कम हालात बदलने की पहल तो करें।


कम से कम वे तमाम लोग जो बदलाव चाहते हैं ,वे किसी मूर्ति के पुजारी नहीं है।लेकिन हम न विचार को खारिज करते हैं, न वैज्ञानिक दृष्टिकोण और न इतिहास और विरासत को।हम इन चीजों के सही समन्वय के पक्षधर हैं।


मेरे मित्रों,रचनाकारों,पत्रकारों,कलाकारों और और और कारों,मेरा विनम्र निवेदन है कि मेरी दृष्टि में किसी भी कालजयी रचना के मुकाबले में देश जोड़ने वाले सार्तक लोकतांत्रिक संवाद की भूमिका ज्यादा बड़ी है।मेरी दृष्टि से किसी रचना की भी कुल मिलाकर वही भूमिका है जो समाज और देश में संवाद की जमीन तैयार करती है।


अब सीधे पेश हैं गोपाल कृष्ण जी का मेलः


Please find attached few relevant documents and few Hindi stories that will be be helpful in the campaign against biometric aadhaar. We need to seek boycott and civil -disobedience of biometric identification initiatives of govt and non-govt players to safeguard democratic rights of the present and future generations. The biometric database will mean end of political rights as well.   



You may also want to read…

Why biometric identification of citizens must be resisted? Part I

Biometric identification is modern day enslavement -Part II

Biometric profiling, including DNA, is dehumanising -Part III

Marketing and advertising blitzkrieg of biometric techies and supporters -Part IV

History of technologies reveals it is their owners who are true beneficiaries -Part V

UID's promise of service delivery to poor hides IT, biometrics industry profits –Part VI

Technologies and technology companies are beyond regulation? -Part VII

Surveillance through biometrics-based Aadhaar –Part VIII

Narendra Modi biometrically profiled. What about Congress leaders?-Part IX

Aadhaar: Why opposition ruled states are playing partner for biometric UID? -Part X

Is Nandan Nilekani acting as an agent of non-state actors? –Part XI

Aadhaar and UPA govt's obsession for private sector benefits–Part XII

Are Indians being used as guinea pigs of biometric technology companies? -Part XIV

Aadhaar: Is the biometric data of human body immortal and ageless? Part XV

Aadhaar: The propaganda of transnational vested interests –Part XVI

Aadhaar: Pakistan handed over, India giving database on a platter– Part XVII

Engineered row in US-India relations, an attention diversion tactics of big brothers?—Part XVIII

Aadhaar: UIDAI and the 'fifth column' of Napoleon—Part XIX

Aadhaar: Turning citizens into subjects through social control technology companies –Part XX


Why Kejriwal govt in Delhi should abandon biometric Aadhaar?—Part XXI



thanks & regards

Gopal Krishna

Mb: 09818089660

E-mail:gopalkrishna1715@gmail.com

6 Attachments

SC Order September 23, 2013.docx

SC Order November 26, 2013.docx

PSC Report December 2011.pdf

Approach Paper on Legilsation for Privacy DoPT.pdf

Chandigarh High Court Order CWP No.569 of 2013 - showfile.php.pdf

CASH DECEPTION COVER STORY.pdf

AAP Has Done What CPM Wanted to Do

NEW MOVES: CPM says the party also engages in caste politics but relates caste with class



   The Aam Aadmi Party (AAP) has been able to successfully tap into the working classes, shouldn't your party have been able to do so? What do you think about their emergence?

It would be right to say that AAP started off as a middle class phenomenon, especially on the anticorruption movement plank. They have taken up other issues of working people in Delhi, that is what has given them the mass influence. But it is a party which hasn't still evolved a clear cut programme and policy perspective. Right now it means all things to all people, so we have to wait and see how exactly they shape it. We are getting individual views of their leaders occasionally. One says neither Left nor Right applies to Indian conditions, another says he doesn't believe in ideology. Yet a common refrain is that they reject all parties across the spectrum. But since now they want to be on the national stage, they will have to come up with a programme and a set of policies which they feel will help tackle the country's problems.

What about the feeling that Left seems to have lost out in this situation?

In a place like Delhi where traditionally the Left has not been a significant force, they (AAP) have appealed and got the support of a section of working people. The industrial working class in the city is now a minor force. I don't think, however, that where the Left is strong and has organisational backing, the AAP will have the same appeal.

Is the party's revolutionary communist programme a hindrance in the politics of mass movement?

We have been grappling with the problem of how to relate to the middle class particularly after the era of liberalisation. The Left has faced this problem particularly in the last two decades or so. So it is more about how we connect with the middle class on issues that are important to them. The interesting point about AAP has been that they have been able to attract the middle classes to politics in a metropolitan city like Delhi. It hasn't happened before and is a novel phenomenon.

The CPI(M) has had a long tradition of austerity in public, so how come the AAP seems to have hijacked that narrative too.

Its not a question of austerity, it's a question of a party which works and identifies with the people. We expect our leaders to live as the common people do or at least practice the lifestyle of the common people. In that sense the communist party has always stood out. That hasn't changed.

There have however, been serious allegations made by a former party members in a recent editorial in a newspaper about action been taken against leaders who spoke out against corrupt practices in the party.

The action taken against these leaders was not because they spoke out against corruption but because of other acts of indiscipline. And however high the leader is we have the same standards in our party, so whether it is a member of the Politburo or a branch of the party we have a discipline which is applicable to all. The instances cited of action taken against senior leaders don't stem from the fact that they spoke out against corruption.

Why has the CPI(M) not been engaged with caste politics, since it definitely affects your prospects in the Hindi belt.

Its again incorrect to say we don't engage with caste, it is a reality in India and if your are a political party you have to deal with it. What we do, given our Marxist approach, is to relate caste and class, and then work out our attitude to it. For example if you are building up a movement on the condition of agricultural workers in India, you cannot but relate it to the question of Dalits and their social oppression, since a bulk of these workers are Dalits. If you are taking up the cause of a vast masses of agricultural peasentry, you have to deal with backward classes. Where we have succeeded in doing that we have grown, in others, especially in Hindi speaking regions, we haven't succeeded. We are not avoiding it, since that will take us nowhere.

In the current siatuation, where do you see a non- Congress, non-BJP formation ending up?

We are working towards a loose co-ordination of such parties. In the course of the next three weeks this will crystallise since some alliance will be announced in some states between these parties. But mostly it will happen after the polls. As of now AAP has an ekla chalo re policy, but after the elections, all non-Congress non-BJP parties will have to mull on a situation how a secular government can be formed, and even AAP will have to respond to that.

Some Muslim leaders have said that the Congress is appealing to secular votes by making a bogey out of Narendra Modi, what do you think?

The reality is that Gujarat has been a laboratory for the Hindutva experiment for a long time and we have seen the consequences of it. So I don't think that Modi is being made a bogey to engender a fear factor. Many of these Muslims leaders are known to further their interests rather than the broad masses of the Muslim community. I think that by and large, the minorities in this country are especially concerned about the secular fabric of our society and state being threatened if there is someone like Modi coming to power. The discontent against the Congress however is bound to be a big factor in these elections, the question is as against the Congress, are we in a position to present a coherent secular alternative?

Coming to West Bengal, has there been any progress in terms of recovering your position in that state?

What we are seeing in West Bengal is a concerted effort to suppress democratic rights and norms. This has been the experience in panchayat and municipal elections. Crimes against women have gone up, it is unprecedented, 89 farmers have committed suicide. There is growing disillusionment among the people. The main issue is whether the opposition will be able to contest the elections in a peaceful and fair manner. If that happens the Left front will get greater support.

PM has said that his finest hour as PM was his pushing through of the Indo-US civil nuclear agreement. Has that re-inforced the bitterness of the party on what happened.

I am not surprised that the PM made this statement. Frankly, it seems to be his only achievement as PM in the last 10 years. We are not bitter about the parting, but we are bitter about the fact that such an agreement could be made with the US despite a clear commitment in the Common Minimum Programme against a strategic alliance with the US. The deal was just one step in cementing such a strategic alliance.








Q&A

PRAKASH KARAT

CPM GENERAL SECRATERY


इकोनोमिक टाइम्स

Abhinav Sinha shared a link via University Community For Democracy And Equality.

about an hour ago


University Community for Democracy and Equality: Protest demonstration against the unjust...

ucde-mu.blogspot.com

Satya Narayan

7 hours ago

कात्‍यायनी की कविता 'वे नहीं सोचते'


उनके घरों में रेतघड़ियाँ रखी हैं


जिनमें रेत का गिरना


बन्द हो चुका है


और समय उनके लिए रुक गया है।


तब तक वे कुछ पुराने हिसाब


चुकता करेंगे


मुहम्मद गोरी और गजनवी से लेकर


बाबर-औरंगज़ेब तक का।


तब तक वे लौटाने की कोशिश करेंगे


स्वर्ग-सा अतीत,


लाने की कोशिश करेंगे


स्वतन्त्र प्रतियोगिता का स्वर्णिम युग।


पर क्यों नहीं सोच पाते कि


ध्वंस करे भीषण भले ही कुछ समय के लिए,


गढ़ता नहीं है कभी भी इतिहास को उन्माद!


क्यों नहीं सोचते वे कि


कई-कई दिनों तक


अलेक्जेण्ड्रिया के पुस्तकालय के जलते रहने के बाद भी,


नालन्दा और तक्षशिला के महाध्वंस


और दजला नदी में


फूली हुई पुस्तकों का पुल बन जाने


के बाद भी


इतिहास-बोध का वजूद नहीं मिटा,


विज्ञान जला नहीं ब्रूनो के साथ,


झुका नहीं गैलीलियो के माफीनामे के साथ,


गीत मरे नहीं


नात्सी यातना-शिविरों में भी।


आखि़र वे क्यों नहीं सोच पाते कि


विपर्यय तो हुए हैं पहले भी बार-बार


पर वे नहीं बन सके हैं कभी-भी


इतिहास के नियम।


वे सोच नहीं सकते


शायद


इस नहीं सोचने पर ही


टिका हुआ है

उनका वजूद!


Economic and Political Weekly

Yesterday

"From the experience of Jairam Ramesh and Jayanthi Natarajan it would appear that the reward for any minister of environment and forests who follows the mandate given to him/her is dismissal from his/her job..."


Were they removed for reportedly doing their job right?

EPW edit: http://www.epw.in/editorials/crass-decision.html

Economic and Political Weekly

Yesterday

The Edward Snowden revelations on pervasive and dragnet surveillance over the internet by the US National Security Agency (and other allied security agencies) - coupled with the nature of control the US exerts over the internet and telecommunications the world over - make it imperative that there is a new international framework to govern the internet.


http://www.epw.in/commentary/evolving-new-internet-governance-paradigm.html

Economic and Political Weekly

Yesterday

"For the estimated 70 million disabled people in India, the government's failure to table the Rights of Persons with Disabilities Bill in Parliament in the winter session was another act of cruel neglect..."


Read how the government let down 70 million disabled people yet again:

http://www.epw.in/editorials/disabled-lack-political-will.html

Economic and Political Weekly

Yesterday

How the #selfie has replaced the self-portrait and taken the world by storm:


Economic and Political Weekly Postscript:http://www.epw.in/postscript/i-me-my-selfie.html

Economic and Political Weekly

Yesterday

What is the historical context of caste and class struggles as well as the anti-feudal struggle in Bihar? How does this connect atrocities like Bathani Tola and Laxmanpur Bathe?


Economic and Political Weekly commentary:

http://www.epw.in/perspectives/politics-massacres-and-resistance.html

Economic and Political Weekly

Yesterday

If you haven't read it already, do read the independent fact finding committee's report on the Muzaffarnagar riots. The full report is available in Economic and Political Weekly web exclusives:


http://www.epw.in/web-exclusives/fact-finding-report-independent-inquiry-muzaffarnagar-"riots".html


Economic and Political Weekly

Yesterday

The Khobragade affair has jolted the Indian foreign administration as well as alerted those who thought that caste and class weren't important factor in this event.


Here are two perspectives on the issue:

1) Editorial: http://www.epw.in/editorials/avoidable-mess.html


2) Margin Speak: http://www.epw.in/margin-speak/humiliation-class-matters-too.html


Economic and Political Weekly

Yesterday

"How bad climate impacts will be beyond the mid-century depends crucially on the world urgently shifting to a development trajectory that is clean, sustainable, and equitable, a notion of equity that includes space for the poor, for future generations and other species."


Read about the alarming report of IPCC on global warming:http://www.epw.in/commentary/ipccs-summary-policymakers.html

Economic and Political Weekly

January 4

The food security issue was not the only one of importance at the Bali ministerial meeting of the World Trade Organisation. What are the crucial decisions that were taken at the meet?


A report and analysis of the run-up to the meet and what happened at the Indonesian resort island:http://www.epw.in/commentary/what-happened-bali-wto-meet-and-why.html

Economic and Political Weekly

January 4

All the dalits actively protesting against the humiliation of Devyani Khobragade through email and social media campaigns would not have even heard of Soni Sori, let alone what the Chhattisgarh police did to her. But isn't Sori a member of their class, the class of the exploited?


Anand Teltumbde writes in EPW: http://www.epw.in/margin-speak/humiliation-class-matters-too.html

  • Ratnakar Ahire The littrate middle class is now acted like a uppercaste as they demand there rights not the duties towards theire community.So many Sori cases happened in this society but this Upper middle class from dalit's is not want to interfare its only because...See More

  • Like · Reply · 3 · January 4 at 5:39pm via mobile

  • Arumugam Selvasharma Mr. Anand Teltumbde Not only dalits people frm other community also expressed their solidarity towards soni.You should have written this article against the Corporate Hindutuva Indian gvnnnt rather than accusing dalits!!!

  • Like · Reply · 2 · January 4 at 3:43pm via mobile

Economic and Political Weekly

January 4

Is the subsequent dismissal of Jairam Ramesh and Jayanthi Natarajan from the environment ministry a sign of the government's apathy towards the environment?


Economic and Political Weekly editorial:http://www.epw.in/editorials/crass-decision.html


Economic and Political Weekly

January 4

"Nothing regarding the arrest of Devyani Khobragade, then deputy consul general at India's New York consulate, and the reaction to it inspires confidence about public affairs in the United States and in India. If the manner in which she was arrested and subjected to various indignities – handcuffing, strip searches, body cavity searches – could have been avoided considering her position and the nature of her alleged "crime", the reactions to this incident have also been strident, betraying a sense of misplaced nationalism on the part of the Indian political establishment..."


EPW edit on the Khobragade affair: http://www.epw.in/editorials/crass-decision.html

  • Ruchira Bali the political establishment of our countryy,.. is really doing nothing except for begging the US counterparts to look into the matter.. SHAME.. on our part too that we are taking such activities like VISA FRAUD to go to USA or elsewhere

  • Like · Reply · 3 · January 4 at 12:54pm

  • Abhinaw Singh lol...i could not find a word "Devyani" in the news link mentioned above.

  • Like · Reply · January 4 at 12:57pm



Himanshu Kumar

हमें 'कश्मीर' चाहिए 'कश्मीरी लोग' नहीं चाहिए ,


बस्तर चाहिए आदिवासी नहीं चाहिए ,


हमें दरअसल धरती की दौलत चाहिए उस पर रहने वाले लोग हमें दुश्मन दीखते हैं .


अंग्रेजों को भी भारत की दौलत प्यारी थी भारतीयों को वो मारते थे .


इसे ही साम्राज्य वाद कहते हैं .


इसी को तो बदलना है


एक ऐसी दुनिया बनानी है जिसमे धरती से ज़्यादा इंसानों की कीमत होगी


इसी लिए भाई भगत सिंह ने था


साम्राज्यवाद मुर्दाबाद


इन्कलाब जिंदाबाद

Like ·  · Share · 7 hours ago near Delhi ·

Rajiv Lochan Sah

क्या यह नैनीतालवासियों के लिये शर्मनाक नहीं ? क्या जो दो-चार लोग पहल लेंगे, वे यों ही गुंडों के target बने रहेंगे ? कितना आसान होता है केजरीवाल की जै जै कार करना और कितना मुश्किल अपने पड़ोस में हो रहे गलत काम को रोकना ? हिन्दुस्तानियों का दोहरा चरित्र कभी नहीं जायेगा।

Nainital Bachao Abhiyan

NBA द्वारा मुख्य सचिव से अनुरोध पर नियम विरुद्ध कार्यों की जांच हेतु गठित समिति ने कल शनिवार से अवैध निर्माणों की जांच शुरू की,प्रशासनिक अधिकारीयों के सामने ही...See More

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  • Rajiv Nayan Bahuguna, चन्द्रशेखर करगेती and 36 others like this.

  • View 2 more comments

  • Vipin Joshi हां नैनीताल तो ऐसा नही था। लेकिन जहा जहा होटल व्यवसाय और पर्यटन कि धूम है वह भू माफिया संस्कृति का विस्तार तो होगा ही। यही एक धंदा है जिसमे खूब मुनाफा है। राज्य के मुखिया भी इस धंदे को अच्छा मानते हैं , यानि जमीनो कि खरीद फरोख्त। फिर नैनीताल तो नैनीताल ठहरा। अब तो कौसानी , रानीखेत , ओली समेत सारे उत्तराखंड में यह होने लगा है।

  • 8 hours ago · Like · 2

  • Pradeep Chandra Pant Why do we say them Neta? Do they have enough followings?

  • 8 hours ago · Like

  • B.c. Gunwant same

  • 8 hours ago · Like

  • सैनिक शिरोमणी मनोज ध्यानी आप कि कथनी में सतयता का भाव और विचार है...Let's learn 1st the CHARITY begins at HOME...

  • 6 hours ago · Like

जनज्वार डॉटकॉम

बंगाल की मुख्यमंत्री प्लाईबुड के मकान में रहती हैं, त्रिपुरा के मुख्यमंत्री टीन के मकान में. ममता निजी गाड़ी से जनता के बीच काम करती हैं, बिना कोई खास सुरक्षा के तामझाम के. यही हाल मानिक सरकार का भी है. पर उन्होंने इतना आम आदमी वाला राग नहीं अलापा जितना 'आप' अलाप रहे हैं. 'आप' काम करें व्यवस्था परिवर्तन करें, जो वादा आपने किया था थोड़ा निभाइए. आम आदमी की रट कम लगाइए...http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-00-20/25-politics/4671-agale-neetish-mulayam-to-nahi-kejrival-for-janjwar-by-anurag-anant

Like ·  · Share · 9 minutes ago ·

Bhaskar Upreti

जन-इतिहास: उत्तराखंड का मिनी बंगाल

उधम सिंह नगर का शक्तिफार्म इलाका अचानक तब चर्चा में आया जब पिछले विधान सभा चुनाव में किरण मंडल भाजपा विधायक के रूप में सामने आये. त्रिशंकु जनमत के चलते कांग्रेस के बहादुरों ने मंडल साहब पर नज़र फेरी और उन्हें गुप्त स्थान में ले जाकर कुछ सौदा और कुछ वादे पूरे करने का भरोसा दिया. मंडल चूँकि विशुद्ध रूप से बांगला भाषी मतों से चुनकर आये थे, सो उन्हें ये बारगेनिंग फायदे की लगी. गुप्त स्थान से बाहर आकर उन्होंने सीट से रिजाइन दिया और यह सीट 'पेराशूट सीएम्' विजय बहुगुणा के निर्वाचित होने के लिए खाली हो गयी.

बहुगुणा यहाँ से भारी मतों से विजयी हुए. जोश में उन्होंने खुद को 'मूलतः बंगाली' तक बताया. बंगाली समाज को कांग्रेस पर इसलिए अधिक भरोसा हुआ क्यूंकि भाजपा हाल ही तक उन्हें 'बंगाली घुसपैठिये' कहकर पुकारती थी. खैर किरण मंडल साब अभी कुमाऊं मंडल विकास निगम के अद्ध्यक्ष हैं. उधर हाई कोर्ट ने बंगालियों को भूमि पर स्थायी मालिकाना की मांग को ठुकरा दिया है. लोग इस बात से निराश भी बहुत हैं, लेकिन उन्हें ख़ुशी इस बात की है कि पहली बार बांगला समुदाय को इतनी अहमियत मिल रही है और खुद मुख्यमंत्री उनके नुमाइंदे हैं. विधान सभा में इससे पूर्व दिनेशपुर सीट से प्रेमानंद महाजन को दो बार अवसर मिल चुका है, लेकिन उनकी छवि बंगाली नेता की नहीं बनी और न ही उनके पक्ष में सभी बंगाली मत ध्रुवीकृत हुए.

बहरहाल अपन लोग की टीम पिछले माह जब शक्ति फार्म के रतनपुर-४ पहुंचे तो वहां बांग्ला भाषा, संस्कृति, इतिहास और लोकगान का पक्का इंतजाम था. हमने तो बांग्ला भाषी गुरुजनों से इत्ती सी दरख्वास्त की थी कि हमें इस समाज को समझना है, कैसे होगा ? तो उत्साही गुरुजनों ने हमारी समझ दुरुस्त करने के लिए यहाँ रवींद्र संगीत, नजरूल संगीत, बाउल, महिषासुर वध..आदि का लम्बा चौड़ा इंतजाम कर रखा था. हम ऐसे समर्पित गुरुजनों के हमेशा आभारी रहेंगे. दुर्गा मंदिर के विशाल प्रांगन में हुए इस जलसे में ७०० से अधिक बांग्ला जन, विभिन्न बैंकों में अधिकारी पांच बंगाली सज्जन, १५ से अधिक शिक्षक मौजूद थे. बांगला संघर्ष में तृणमूल शामिल रहे और अब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के बड़े अधिकारी शंकर चक्रवर्ती ऐसे कार्यक्रम की बात सुनकर दिल्ली से एक लम्बा सा दस्तावेज लेकर आ गए, जो पूरे समुदाय के बीच में पढ़ा गया.

यह अद्भुत क्षण था..एक समाज को एक तरह से रंगीन पर्दे पर सीकुएल में देखने से भी बढ़िया..यात्रा चालू आहे..

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  • You, Salman Rizvi, Vijay Bahuguna and 7 others like this.

  • Anupam Trivedi Shaktifarm 80's mein 'Mehtosh Kand' ka vazah se bi news mein raha tha

  • about an hour ago · Like · 1

  • VK Joshi बात बहुत पुरानी है, तब ना शक्तिफार्म था और ना ही उधमसिंह नगर. तब वहाँ हुआ करता था घना जंगल और एक छोटा सा कस्बा किच्छा. जंगल ऐसा था कि दिन दहाड़े बाघ सड़क पर मिल जाना या, जंगली हाथियों के लिए गाड़ी रोक कर उनको निकल जाने देना आम घटना होती थी. घने जंगल के साथ इस क्षेत्र में था भयंकर मलेरिया. मच्छर ऐसे कि मौक़ा पायें तो आदमी को उठा लाएं. किच्छा से थोड़ा अंदर था सरकारी तराई स्टेट फार्म-जिसके इंचार्ज थे कर्नल सांडू. उनकी विदेशी पत्नी बुशशर्ट और पैंट पहन कर जीप में पूरे क्षेत्र में फर्राटा भरा करती थीं. जब शरणार्थी विभाजन के बाद भारी संख्या में आये तब भारत सरकार ने इस क्षेत्र के वन साफ़ करके उनको यहाँ बसना आरंभ किया. इन लोगों की मेहनत और लगन शीघ्र ही रंग लायी और तीन साल में ही काफी भाग की काया पलट हो चुकी थी. तभी एक बड़ा जत्था आया पूर्वी पाकिस्तान से आये शरणार्थियों का. सरकार ने निश्चय किया इनको यहाँ बसाने का. शायद यह भूल थी-क्योंकि उनके वहाँ बस्ते ही मार काट शुरू हो गयी. पंजाबियों की पकी पकाई फसल काट ले जाना उनकी आदत थी. पर कालंतर में सब ठीक ही हो गया और आज जिस स्वरूप में आप यह क्षेत्र देख रहे हैं वह इन्ही शरणार्थियों (पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान से आये) की देन है. मेरा बचपन इन्हीं लोगों के बीच बीता है और बहुत कुछ देखा है मैने वहाँ पर.

  • 43 minutes ago · Like · 1

  • VK Joshi भास्कर जी आज वहाँ की बात सुनकर बहुत सी यादें ताजा हो गयी-इसलिए यह सब लिख बैठा. अतिक्रमण के लिए क्षमा.

  • 42 minutes ago · Like · 1

  • Bhaskar Upreti आप चाहें तो यहाँ और भी लिख दें..यह जरूरी है..स्मृति ही इतिहास की बुनियाद है. कल क्या था और क्यों हुआ वह कल की बात थी, लेकिन आज के दिन 'बंगाली समुदाय' उत्तराखंड का अंग है, अभिन्न अंग. शिकायत तो की जा सकती है, करनी भी चाहिए कि पहाड़ में आपदा, भूकंप और भू-...See More

  • 21 minutes ago · Like

  • Palash Biswas आभार

  • a few seconds ago · Like

जनज्वार डॉटकॉम

लोकसभा चुनाव से पूर्व मुस्लिम वोटरों की नाराजगी और गुस्सा कम करने के लिए तथा राहुल गांधी की गिरती छवि को संभालने के लिए सियासत किसी भी हद तक जाने को तैयार है. अगर कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के इरादे विशुद्ध राजनीतिक और वोट बैंक की राजनीति के इर्द-गिर्द मंडरा रहे हैं, तो ये प्रवृत्ति घातक है...http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-06-02/69-discourse/4669-dange-par-congresi-siyasat-for-janjwar-by-ashish-vashishth

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जनज्वार डॉटकॉम

मीडिया के समक्ष मनमोहन सिंह का अवतरण देश को संतुष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि हाईकमान के निर्देश पर तीसरी बार प्रधानमंत्री का पद न संभालने की घोषणा करने, राहुल का रास्ता सुगम बनाने और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर हमला बोलने के लिए हुआ था. निःसंदेह वे इस खेल में सफल रहे...http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-06-02/69-discourse/4670-manmohan-ko-itihas-yad-karega-bataur-kathputali-pradhanmantri-for-janjwar-by-arvind-jaitilak

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Reyazul Haque shared his album: How the world's 'largest democracy' treats its minorities.

ये है 'राहत' शिविरों का वह 'सुख', जिसके लिए हजारों मुसलमान-उत्तर प्रदेश सरकार के मुताबिक-लोग अपना घर बार, काम-काज, आजीविका और रिश्ते-नातेदारों को छोड़ कर खेल-खलिहानों में पड़े हुए हैं. शून्य के आसपास का तापमान बर्दाश्त करते, साड़ियों, बोरों, चादरों और पॉलिथीन के शिविरों में बर्फीली हवाएं झेलते हुए.


अगर सरकार का दावा सही है (जो असल में सही नहीं है), तब भी अंदाजा लगाइए कि उनकी अपने घरों और गांवों में पहले की जिंदगी कैसी रही होगी कि उसके मुकाबले वे अब 'राहत' महसूस कर रहे हैं.

Some Images from Muzaffarnagar/Shamli 'relief' camps.

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Uday Prakash with Avinash Das

''हाये लीडर दुरंगी न कम गुम हुए ,

बीच धारा अगम थी, गुड़मगुम हुए!

बोली बरसात में इंक़लाबी दुल्हन

'ले के छाता हमारा, बलम गुम हुए !"

-- शमशेर, 'राजनीतिक करवटें', १९४८.

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Satya Narayan

पिछले 15-20 वर्षों में घरेलू काम में लगे असंगठित मज़दूरों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, जो पूँजी की मार से देश के अलग-अलग हिस्सों से उजड़कर दिल्ली, गुड़गाँव, नोएडा, बेंगलोर, चेन्नई, मुम्बई, बड़ौदा जैसे महानगरों में आकर काम की तलाश करते हैं। ये मज़दूर बर्तन धोना, खाना बनाना, सफ़ाई करना, माली का काम, घरों में बिजली और प्लम्बर का काम, घरों के सुरक्षा गार्ड, ड्राइवर, बच्चों की देख-रेख जैसे अनेक काम करते हैं, और बड़ी मुश्क़िल से किसी तरह अपनी और परिवार की गुज़र-बसर करते हैं। इन कामों में ज़्यादातर बच्चे भी अपने माता या पिता के काम में हाथ बँटाते हैं। बड़ी संख्या में शहरों में लाकर बेचे गये अनेक बच्चे भी इस तरह के कामों में बँधुआ मज़दूरों की तरह खट रहे हैं।

http://www.mazdoorbigul.net/naked-exploitation-of-domestic-workers

घरेलू मज़दूरों के निरंकुश शोषण पर एक नज़र - मज़दूर बिगुल

mazdoorbigul.net

सम्पन्न व्यक्तियों के घरों में होने वाले किसी भी अपराध के लिए सबसे पहले घरेलू नौकरों या वहाँ काम करने वाले मज़दूरों पर ही शक़ किया जाता है। पुलिस भी उन्हें ही सबसे पहले पकड़ती है और अपराध क़बूलवाने के लिए पुलिस की बर्बर पिटाई से घरेलू मज़दूरों की मौत के अनगिनत उदाहरण हैं। मालिक भी बेख़ौफ़ अपना हक़ स...

Like ·  · Share · about an hour ago ·

Seema Mustafa

The hysterical anchors and experts are right for once. A referendum to remove AFSPA and the Army from Kashmir is not needed. As the consensus is absolute... Every single man, woman, child wants AFSPA to be revoked and the Army to be withdrawn. Sad that Prashant Bhushan had to back off in the face of Media generated hysteria... He should have stood his ground and insisted that this is the only way forward!

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  • Gopikanta Ghosh and 145 others like this.

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  • Showkat Kreeri this is his clarification (press release): I said that there is considerable alienation among the people of Kashmir which is primarily because of the human rights excesses by the security forces in Kashmir and the impunity from prosecution given to them by the Armed Forces Special Powers Act. I had said impunity of APSPA should be removed in order to win the hearts of the people of Kashmir.

  • 2 hours ago via mobile · Like

  • Showkat Kreeri i don't see him backing off

  • 2 hours ago via mobile · Like

  • Sunny Kashmir We'll there is nothing wrong in debate.....but bashing India and Indians always is the way forward... Kashmirs.... rather we should look ourselves where we stand.. ...what has happened to hurriyat....other separatists...and other......

  • And for referendum or plebiscite.. there r conditions...... pl read UN resolution.....

  • 2 hours ago via mobile · Like

  • Sahil Maqbool Our CM believes that consensus is not necessary, only the will of Govt. works, so for as the Kashmir is concern...

  • about an hour ago · Like


Himanshu Kumar
संक्षेप में आफ्सा कानून यही है न कि कुछ इलाकों में सेना के सिपाहियों के किसी भी ज़ुल्म के खिलाफ एक भारतीय नागरिक अदालत में शिकायत नहीं कर सकता ?

अजीब बात है क्या आपको अपनी अदालतों पर भरोसा नहीं है या अपने नागरिकों पर भरोसा नहीं है . क्या आप अपनी जनता को सेना का दुश्मन समझते हैं . और क्या आप अपनी सेना को देश की जनता के ही खिलाफ लडवा रहे हैं ?

सेना तो जनता की ही है तो जनता जब चाहे किसी सिपाही को अदालत में तलब कर सकती है .

ये सेना के ज़ालिम सिपाही को बचाने वाले कौन से लोग हैं जो सत्ता में बैठ गए हैं ?

ये जनता का दुश्मन कौन है ? इन्हें पहचान लो .

एक आजाद मुल्क में ऐसी जनविरोधी बात बोलने वाले चिदम्बरम और मोदी जैसे देशद्रोहियों को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दो .
Like ·  · Share · 5 hours ago near Delhi ·

Umesh Tiwari
देश को क्या फ़र्क पड़ता है कि शरद पवार चुनावी राजनीति छोड़ नामांकन से राज्य सभा जाएँ या इंद्रसभा में, पार्टियाँ अपने प्रवक्ता बदल दें या प्रधानमंत्री के उम्मीदवार, फ़र्क इस बात से पड़ता है कि चीनी और प्याज़ को गोदाम में छुपाया गया और आम आदमी को जीने के लाले पड़ गए। फ़र्क पड़ता है जब महँगाई से लड़ने को खुदरा में FDI लाने की वकालत की जाती है।
हमारे नेताओं के साथ-साथ मीडिया का भी जनता से तलाक हो चुका है, किरीट सोमैया और प्रेसेनजित बोस, संजय झा विचारक हो गये...गाँधी, जिसकी नीतियों की इकाई 'आदमी' था, उसको भूल कर भारत उधार के विचारों पर बहस करता है।
Like ·  · Share · 5 hours ago ·
  • Kripal Bisht and 9 others like this.
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  • Devendra Singh Sahi kaha Umesh Tiwari ji...av av NDTV pe dekha, suna (halla itna karte hain real me sunai to kuch deta nahi Hehehe) in mahapurson ko.visay tha ramdev je ke vichar Tax ko lekar. ..aaj kal to media me fashion ban gaya hai muddon pe bahas karwane ka...aaj tak result ni aaya kisi v bahas ka...
  • 4 hours ago via mobile · Like · 1
  • Palash Biswas बहुत अच्छा हुआ भारतीयकृषि के स‌ाथ भारतीयजनपद कोठिकाने लगाने के बाद अब महामहिम देश को बख्स देना तय कर चुके हैं।
  • a few seconds ago · Like
Mulnibasi Samiti Sundarban added a new photo.
Unlike ·  · Share · 24 · 6 hours ago ·
Jagadishwar Chaturvedi
जस्टिस गागुली इस्तीफा दे चुके हैं ,अब देखना है कि पीडिता उनके खिलाफ एफआईआर कब करती है ?मीडिया ने बिना एफआईआर के गांगुली प्रकरण पर जितना समय दिया है वह विरल घटना है,अभी तक पुलिस सक्रियता या आपराधिक मामला आरंभ क्यों नहीं हुआ ?
Like ·  · Share · 7 hours ago near Calcutta ·
  • 8 people like this.
  • Anand Dubey Jab FIR hi nahin hai to fir isteefa kaisa? Yah kanoon kisi ki bhi gardan kaat sakta hai Ganguly jaise achche Judge ki bhi ise jaana hi hoga. Koi kisi din Raul Baba par bhi yah aroop laga degi tab to jayega hi, pahle chala jaaye to achcha hai.
  • 6 hours ago · Like
Bhaskar Upreti
विभाजन के समय और बाद में पूर्वी पाकिस्तान के बांग्ला देश हो जाने पर लाखों की संख्या में बांग्लाभाषी उत्तराखंड की तराई उधम सिंह नगर आये. बसाये गए. आश्चर्य की बात है कि इतिहास लेखन में बंगालियों का दबदबा होने के बावजूद इन बंगालियों का आज तक कोई इतिहास नहीं है. पिछले माह दिनेशपुर में बुजुर्ग और अनुभवी बांग्लाभाषियों से इतिहास का जिक्र शुरू हुआ तो सुनने और सुनाने वाले दोनों की आखें नम हो आयीं.
Like ·  · Share · 11 hours ago ·
Jagadishwar Chaturvedi
भला जब्त की भी कोई इन्तिहा है,
कहाँ तक तबिअत को अपनी संभाले।अज़ीज़ लखनवी।
Like ·  · Share · 5 hours ago near Calcutta ·
Satya Narayan with Surjit Gag and 28 others
आह्वान का फासीवाद विरोधी विशेषांक

साथियों
इतिहास गवाह है कि बुर्जुआ मानवतावादी अपीलों और धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने से साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का मुकाबला न तो किया जा सका है और न ही किया जा सकता है। फ़ासीवादी ताकतों और फ़ासीवाद की असलियत को बेपर्द करके जनता के बीच लाना होगा और जनता की फौलादी एकजुटता कायम करनी होगी। इसी काम को आगे बढाने की कड़ी में फासीवाद के ऊपर कुछ जरूरी लेख इस अंक में दिए जा रहे हैं। सभी इंसाफपसन्‍द साथियों से अपील है कि इस अंक की ज्‍यादा से ज्‍यादा प्रतियां अपने जरूरी सम्‍पर्कों तक पहूँचाएं। पत्रिका का प्रिण्‍ट संस्‍करण मंगवाने के लिए नीचे दिए गये फोन न. पर सम्‍पर्क करें। जल्‍द ही ये लेख वेबसाइट पर भी अपलोड किये जायेंगे। आप अपने दोस्‍तों का ईमेल आइडी भी हमें मैसेज कर सकतें हैं या कमेंट में डाल सकते हैं ताकि उन्‍हे भी ये अंक भेजा जा सके।

सम्‍पर्क
सम्पादकीय कार्यालय: बी-100, मुकुन्द विहार, करावल नगर, दिल्ली, फ़ोन: 011-6462392

वेबसाइट http://ahwanmag.com/

लेख सुची

देश में नये फासीवादी उभार की तैयारी
भारतीय राज्यसत्ता का निरंकुश एवं जनविरोधी चरित्र पूँजीवादी संकट का लक्षण है
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की असली जन्मकुण्डली
चार राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे और भावी फासीवादी उभार की आहटें
'आप' के उभार के मायने
नरेन्द्र मोदी, यानी झूठ बोलने की मशीन!
रुपये के मूल्य में गिरावट के निहितार्थ
अमृतानन्दमयी के कुत्तों, आधुनिक धर्मगुरुओं और विघटित-विरूपित मानवीय चेतना वाले उनके भक्तों के बारे में चलते-चलाते कुछ बातें---
क्यों ज़रूरी है रूढ़िवादी कर्मकाण्डों और अन्धविश्वासी मान्यताओं के विरुद्ध समझौताहीन संघर्ष?
ख़बरदार जो सच कहा!
जर्मनी में फ़ासीवाद का उभार और भारत के लिए कुछ ज़रूरी सबक़
इटली में फ़ासीवाद के उदय से हमारे लिए अहम सबक
फ़ासीवाद का मुक़ाबला कैसे करें?
जाति प्रश्न और अम्बेडकर के विचारों पर एक अहम बहस
खुद पर फिदा मार्क्सवादियों और छप्र अम्बेडकरवादियों के नाम - आनन्द तेलतुम्बडे
आनन्द तेलतुम्बडे को जवाबः स्व-उद्घोषित शिक्षकों और उपदेशकों के नाम - अभिनव सिन्हा
कहानी / ज़ख़्म - असग़र वजाहत
लघुकथाएँ / सियाह हाशिये - सआदत हसन 'मंटो'
कविताएँ / नागार्जुन, कात्यायनी
Like ·  · Share · December 27, 2013 at 10:35pm ·
Ashutosh Kumar
ये चिदंबरम ने कहा था कि सरकार अफ्प्सा हटा लेने को राजी है , लेकिन सेना की इजाजत नहीं है . देश में किसी हिस्से में अफ्प्सा लगाने के लिए अगर जनता की राय नहीं ली जा सकती , चुनी हुयी सरकार की राय नहीं मानी जा सकती , अगर सेना की राय ही सर्वोपरि है तो यह लोकतांत्रिक देश है या सैनिक शासन ? क्या इतने बड़े देश में एक प्रशांत भूषन को छोड़ कर और किसी के दिमाग में यह सवाल नहीं उठता ?
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  • Virendra Yadav, Mohan Shrotriya, Girija Pathak and 141 others like this.
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  • राजन सिँह ऐसे संवेदनशील मसलों पर जनमत का कोई मतलब नहीं।कल को कश्मीर की हालत फिर से बिगड़ जाए तो क्या सेना भेजने से पहले जनमत कराया जाएगा?
  • 5 hours ago via mobile · Like · 1
  • Deepak Kumar Patel Sir kashmir ek eesa mamla h jo nehru se vi nhi suljha.m manta hu ki kashmir k logo ko vi dikkat hoty h lekin kya ham pakistan ki harkatoo ko kargil ur aatanki hamlo jaise ghatnayee bhul jaye kya.kl k liye ydi kashmir m fir se hamle ho gye to kya vahaa ki janta ko pareshani nhi hogy.ur vese vi jb hamlaa hoga to kya ham us samay vi senaa ki aane k liyee janmat sangrah karaana hoga.
  • 5 hours ago via mobile · Like · 1
  • Baba Abir Das सेना हटा कर वहां लेखकों की फौज तैनात कर दी जाए .
  • 3 hours ago · Like · 2
  • Arun Singh सेना हटा कर वहां लेखकों की फौज तैनात कर दी जाए ..........
  • 3 hours ago · Like · 1
Afroz Alam Sahil
As the stories of human rights and civil rights violations, and numerous crimes are keep on coming from riots hit Muzaffarnagar through media, BeyondHeadlines patron INSAAN International Foundation (New Delhi) wrote to numerous authorities to take a serious note of the situation. After visiting riots hit areas, our team enquired about education of children, and cases of human rights violations. Then two different letters were sent to concerned authorities for immediate action. Below are those letters reproduced for our readers...http://beyondheadlines.in/2014/01/voicing-concerns-of-riots-victims-beyondheadlines-writes-to-authorities/
Like ·  · Share · 2 hours ago near New Delhi ·
Shabnam Hashmi
In the latest round of vindictive actions against human rights defender Teesta Setalvad secretary of Citizen's for Justice and Peace the Gujarat police Crime Branch has registered a false FIR on malicious grounds of cheating etc. This time the vindictiveness of the Gujarat police has extended to also implicating two Survivors Salimbhai Sandhi who lost five family members including his son Mohammed and Firoz Gulzar Pathan who also lost four from his family in the vicious atta...Continue Reading
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  • Gaurav Sharma Madam Shabnam Hashmi modi ke development ki jhalak mujhe youtube par nahi dekhni wo sara desh dekh chuka hai. Agar sach me ye sab ek fraud hai to kyu koi including congress govt of india aaj tak modi ka sach bahar nahi la sake or kyu usse kisi case me fasa nahi sake? Kya modi ne saari duniya ko khareed rakha hai? Agar aisa bhi kar rakha hai to bhi hats off to mr. Modi
  • 3 hours ago via mobile · Like
  • Rizvi Amir Abbas Syed
  • 3 hours ago · Like · 4
  • Tariq Ahmed Gaurav Sharna tum kuch chand "Namone"hi aisi baat kar sakte hain , shayed tumhen yaad hoga, Advani bhee bada top banne chala tha ek waqt me, ye Modi to uske aage kuch bhee nahin, Aaj dekh lo Advani ki kya halat hai, uski party hi use kitno izzat deti y...See More
  • 3 hours ago · Edited · Like · 1
  • Tahir Chaudhary Kolsawala sachchi baat 1 hi hai koi bhi insaan ho chahe woh gaurav sharma ho ya tahir chaudhary ho, agar kisi ko innocent aadmi ko jan se marna, kisi gareeb ka ghar jala dena , kisi bachchi ka rape karna , kisi budhe aadmi like ahsaan jaafri ko qatal kardena gal...See More
  • 2 hours ago · Like
Pushya Mitra
योगेंद्र यादव बड़े सुलझे हुए व्यक्ति हैं, मगर जिस तरह वे अरविंद को हीरो साबित करने की कोशिश कर रहे हैं वह ठीक नहीं. अगर राजनीति बदलनी है तो व्यक्तिवादी राजनीति को भी बदलना होगा. ब्रांड के सहारे नैया पार करने की राजनीतिक कोशिशें भी बदलनी होगी. इसका निकृष्ट रूप तब और नजर आता है जब राजनाथ रैलियों में कहते हैं कि उम्मीदवार को मत देखिये मोदी को देखिये. जनता मोदी, राहुल या केजरीवाल को क्यों देखे. वह हर चीज देखेगी. नेता, उम्मीदवार, घोषणापत्र, ट्रैक रिकार्ड... कम से कम आप से तो ऐसी उम्मीद नहीं है.
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Dilip Khan
ऐसा मुमकिन नहीं है कि कोई 24 घंटे जाति और धर्म की तलवार लिए घूमता रहे। हर समय आपकी जातीय और धार्मिक अस्मिता (Identity) पर्स की तरह जेब में नहीं पड़ी होती। दूसरी जाति, दूसरे धर्म के लोगों के साथ आपने खाना खाया है और आपके कई दोस्त 'दूसरी' कैटेगरी से आते हैं तो इससे ये साबित नहीं होता कि आपके भीतर जातिवादी-सांप्रदायिक तत्व नहीं है। क्रिटिकल मामलों पर आपकी प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि आप असल में हैं क्या? सांप्रदायिक हिंसा के वक़्त आपके भीतर अगर उबाल आने लगता है और अचानक जनेऊ निकाल लेते हैं तो आपकी 'दूसरे दोस्त' वाली थ्येरी का क्या मैं मुरब्बा डालूंगा?
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Bhaskar Upreti
अखबार
(पहल पत्रिका में प्रकाशित डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र का एक गीत)

अपराधों के जिला बुलेटिन
हुए सभी अखबार
सत्यकथाएँ पढ़ते-सुनते
देश हुआ बीमार।

पत्रकार की कलमें अब
फौलादी कहाँ रहीं
अलख जगानेवाली आज
मुनादी कहाँ रही?
मात कर रहे टीवी चैनल
अब मछली बाजार।

फिल्मों से, किरकिट से,
नेताओं से हैं आबाद
ताँगेवाले लिख लेते हैं
अब इनके संवाद
सच से क्या ये अंधे
कर पाएँगे आँखें चार?

मिशन नहीं गन्दा पेशा यह
करता मालामाल
झटके से गुजरी लड़की को
फिर-फिर करें हलाल
सौ-सौ अपराधों पर भारी
इनका अत्याचार।
त्याग-तपस्या करने पर
गुमनामी पाओगे
एक करो अपराध
सुर्खियों में छा जाओगे
सूनापन कट जाएगा
बंगला होगा गुलजार।

पैसे की, सत्ता की
जो दीवानी पीढ़ी है
उसे पता है, कहाँ लगी
संसद की सीढ़ी है
और अपाहिज जनता
उसको मान रही अवतार।

*नोट- डॉ. मिश्र बड़े ही छपासू हैं. मैं उन्हें व्यक्तिगत और वे मुझे व्यक्तिगत रूप से जानते हैं. कविता में प्रयोग हुए दो रूपक 'मछली बाज़ार और 'तांगे वाला' का प्रयोग उनकी सवर्ण मानसिकता को दर्शाता है, जो है भी पंडित जी में. लेकिन उन्होंने अख़बार वालों पर लिखने का साहस किया यह काबिले तारीफ हैं. और गीतकार तो तो वे सुरीले हैं ही, दुनिया जानती है.
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  • Rajesh Utsahi भास्‍कर भाई, कविता के नीचे दी गई टिप्‍पणी से मेरी भी सहमति है...पर यह स्‍पष्‍ट नहीं हुआ कि टिप्‍पणी किसकी है आपकी..या पहल संपादक की।
  • 9 hours ago · Like
  • Bhaskar Upreti अरे सरजी जे टुच्ची टिप्पणी अपन की ही है. पंडित जी बनारस के हैं जरूर, लेकिन देहरादून में अपने पास में ही रहते हैं. ओएनजीसी की नौकरी के बाद यहीं अटक गए. देहरादून में होने वाला 'विरासत' कार्यकम भी उन पर निर्भर करता है. बाकी टैम वे मौरीसस, जापान या जर्मनी में रहते हैं हिंदीभाषियों के बीच.
  • 6 hours ago · Like
Uday Prakash
यह एक अनोखा संयोग फिर से है, जिसकी उतनी चर्चा अखबारों और टीवी चैनलों में भले न हो, लेकिन जुकरबर्ग की आभासी दुनिया में इन दिनों खूब है.
यह अनोखा आकस्मिक संयोग है सन १९४७ और सन २०१४ के कैलेंडरों का बिल्कुल एक जैसा होना. वैसा ही जैसे फोटोकापी या स्कैन्ड इमेज़ में हुआ करता है. यानी यह कि अगर १९४७ में ६ जनवरी की तारीख़ सोमवार के खाते में दर्ज थी, तो आज २०१४ में भी वही है.
अब हमारे इतिहास में १९४७ का साल हमारे देश की आज़ादी के साथ जुड़ा है. वही साल जब ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की दो सौ साल की गुलामी से हिंदुस्तान स्वतंत्र हुआ था और इंगलैंड के शासकों ने सत्ता देसी शासकों को सौंप दी थी. पंद्रह अगस्त की आधीरात का शून्यकाल, यानी ठीक बारह बजे, इसी दिल्ली में सत्ता का यह ऐतिहासिक हस्तांतरण हुआ था.
अब ६७ साल बाद फिर १९४७ की तारीखें २०१४ की उन्हीं तारीखों और दिनों के पंचांग में किसी प्रतिबिंब की तरह झलक रही हैं.
क्या इस बार भी कोई 'सत्ता-हस्तांतरण' होगा ?
क्या किसी किस्म की 'आज़ादी' की आहट कहीं से मिल रही है ?
(यह एक बड़ा दिलचस्प काम होगा अगर कोई 'नेट-नागरिक' हर रोज़ १९४७ की तारीखों को २०१४ की तारीखों के सामने खड़ा कर के देखे. अतीत का अनुवाद भविष्य कैसे, किस तरह किया करता है, इसकी एक रोमांचक झांकी ऐसे में दिखाई देगी.)
पर दुविधा और असमंजस भी ठीक इसी जगह अपनी आंखें मल रहे हैं और सिर खुजलाते दीख रहे हैं.
ऐसा इसलिए क्योंकि इतिहास के बदलाव के बारे में दो बिल्कुल भिन्न सिद्धांत विद्वानों ने हमें विरासत में दिये हैं. एक तो टायनबी का सिद्धांत था कि इतिहास हमेशा वृत्ताकार होता है. गोल-गोल एक ही धुरी के चारों ओर परिक्रमा करता हुआ और अपने-आप को दुहराता हुआ. और दूसरा सिद्धांत कार्ल मार्क्स के दर्शन का था कि इतिहास हमेशा प्रगति करता है, अगर वह वृत्ताकार होता भी है तो वह तेल की घानी में, आंख में पट्टी बांधे किसी बैल की तरह, किसी एक खूंटेसे बंधा हुआ, एक ही जगह चक्कर नहीं लगाता रहता, बल्कि किसी स्प्रिंग की तरह, अपने घुमाव में भी, अपनी पिछली जगह से आगे बढ़ जाता है.
लेकिन मार्क्स ने एक ऐसी टिप्पणी भी की थी, जो अब खासे लोकप्रिय मुहावरे में तब्दील हो चुकी है. वह यह कि इतिहास जब स्वयं को दुहराता है, तो अतीत की त्रासदी वर्तमान की 'कामेडी' बन जाया कर जाती है.
यानी इतिहास का मूल चरित्र विदूषक का होता है. गंभीरताओं को निरंतर हास्य में बदलता हुआ. अतीत के सब नहीं तो अधिकांश 'महानों' को हमेशा के लिए किसी 'मसखरे' में तब्दील करता हुआ.
अब यह तो समय ही बताएगा कि २०१४ की तारीखें १९४७ का गंभीर, 'लिटरल' अनुवाद हैं, यानी उसी पुराने 'पाठ' का एक बिल्कुल नया 'पाठ' या यह अतीत का कोई 'प्रहसन' है.
लेखक तो आम जनता की तरह सब कुछ देखता ही रहता है, किसी दर्शक की तरह. रंगमंच पर जो नाटक चल रहा है, उसके अंतिम दृश्य से ही यह पता चलेगा कि यह कोई 'ग्रीक त्रासदी' थी या तेनाली राम या बीरबल का कोई प्रसंग ?
जो भी हो, दोस्तो, यह सब कुछ है बहुत रोमांचक !
अब देखिये, आखीर में हमारे चेहरों पर हंसी आती है या आंखों में आंसू !!
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Delegation of NCW would visit Madhyamgram (West Bengal) along with women's organizations. #Madhyamgram

New Delhi. A joint delegation of women's organisations along with the family members of the 16-year-old girl, who was gang raped and murdered in #Madhyamgram, North 24 Parganas, West Bengal met with the Chairperson of National Commission for Women (NCW) in the Capital today.
A statement of the family members was registered at the Commission and the Chairperson responded to the compliant positively. Jagmati Sangwan, General Secretary of All India Democratic Women's Association(AIDWA) told that she ( Mamta Sharma- Chairperson of NCW ) assured immediate intervention in the matter to provide support to the family and take steps for relief/ rehabilitation both short and long term, stiff action against all perpetrators would be sought, a delegation of #NCW would visit West Bengal along with women's organizations to take cognizance of the situation there and NCW will do all that's possible within its powers to ensure that justice is done.

Women's organizations gave a memorandum, which is as follows-

                                                                                    7th Jan.2014
To,
The Chairperson,
NCW
4, Deen Dayal Upadhyaya Marg,
New Delhi – 110 001
                             Memorandum on Madhyamgram Case, West Bengal
Dear Ms. Mamta ji,                            
We, the members of a poor family who migrated from Bihar to W. Bengal in search of a better future, have suffered grievously from the gang rape, and subsequent murder of our 16 year old daughter, inMadhyamgram, North 24 Parganas. We have been denied justice by the callous and negligent attitude of the W. Bengal government and the state administration, which did not take immediate action against the perpetrators of the crime. Two months later, the same miscreants, some of whom are known to be close to the ruling party in the state, abducted her and burnt her to death, as punishment for having dared to lodge a complaint against them.
Initially, when leaders of women's organizations, and other concerned citizens raised their voices in protest and went to meet our daughter, they were driven out by armed hooligans who were surrounding the house. It was only due to public outrage that the police arrested six of the accused persons and arranged for vigilance at the girl's residence to protect her and her family. But the treats continued so we had to flee from #Madhyamgram to a rented room near Dumdum Airport to escape the constant threats that we faced. However the associates of the criminals discovered our meagre shelters.
The charge sheet was filed on 16 December in the court on Dec. 23 the criminals stormed into the room in our absence, abused and threatened our daughter, and set fire on her causing 90% burns. While initially the police tried to cover up the case by saying that it was the outcome of a quarrel between landlord and tenant, two persons named in the FIR were eventually arrested and remanded in jail custody. My daughter was then taken to R.G.Kar Hospital where there is no burn unit and in spite of agitations to shift her to the burn unit at SSKM Hospital, the Superintendent refused; she was only shifted to the ICU much later, as a result of the agitations.
After fighting for her life for eight days, our daughter died on 31 December, without receiving even a single gesture of sympathy or concern from the Government. There were spontaneous rallies and road-blocks by the local citizens, demanding appropriate action. The police who had been so negligent about the security of the girl while she was living, suddenly became pro-active after her death and hijacked her body without our consent,  took her to the cremation-ground and tried to cremate her. They exerted pressure on us, but we did not yield, and on the morning of 1 January, 2014, they were forced to hand over the body, after which we performed the last rites.
Madam, our great loss and our suffering can never be compensated. But we are entitled to justice. We urge the NCW to take steps to ensure that legal measures are enforced. The brutal behaviour displayed on the part of the police and the administration creates grave doubts as to whether the culprits will be punished as per the law. We also fear for our own safety in this case.
Hence, we demand your good self to intervene and ensure the following:
  1. An impartial enquiry should be carried out to identify all the persons involved in the crime and they should be brought to justice.
  2. Speedy and time-bound trial of the case,
  3. All the guilty including the co-conspirators who participated in the assault and intimidating the family should be strictly punished and punishment to the policemen who were hand-in-glove with the criminals. The health officers in R G Kar Medical College hospital should also be punished.
  4. Safety and support to the family members and compensation should be given to the victim's family for the rehabilitation and for the harm and injury done to them.
With thanks,
Yours faithfully,      
Sd/-
Rama Shankar Jha
(Father)                                              
Endorsed by:
   Jagmati Sangwan           Dr. Gargi Chakraborty Beena Jain    Sudha Sundararaman
(General Secretary, AIDWA)           (NFIW)           (AIWC)      (Vice President, AIDWA)
Padmini        Vimal Thorat             Dr. Zakia                    Leila Passah
(JWP)              (AIDMAM)             (MWF)                        (YWCA)
 Sehba Farooqui                    Dr. Rita Wahi          Nilanju and Madhu   
(Delhi, JMS)                           (GOS)                         (JAGORI)
                               

महान कोल खदान को रद्द करने की माँग

ऊर्जा मंत्रालय के कड़े विरोध के वावजूद इस्सार-हिंडालको को गलत तरीके से कोल खदान आबंटित किया गया- ग्रीनपीस

अविनाश कुमार चंचल
7, जनवरी 2014। कोल खदानों के आबंटन घोटाले पर जिस तरह सीबीआई के संदेह खड़ा किया है उसमें आदित्य बिड़ला ग्रुप के हिंडालको को महान कोल खदान आबंटन में भी धांधली नजर आ रही है। नए तथ्य के सामने आने के बाद ग्रीनपीस इंडिया ने महान कोल खदान को तत्काल रद्द करने की माँग की है। ग्रीनपीस इंडिया ने सरकार से यह भी माँग की है कि इस आबंटन मेंएस्सार ऊर्जा और मध्य प्रदेश सरकार की भूमिका की भी जाँच होनी चाहिए।
ग्रीनपीस का कहना है कि कोल आंबटन में किसी तरह की पारदर्शिता नहीं बरती गयी है। ऊर्जा मंत्रालय ने सीबीआई को बताया है कि उसने हिंडालको को महान कोयला खदान आबंटित करने की सिफारिश नहीं की थी। इसी तरह, शुरू में एस्सार ऊर्जा को कोल खदान आबंटित किये जाने की माँग मध्य प्रदेश सरकार और स्क्रीनिंग कमिटी ने भी खारिज कर दी थी। लेकिन बाद में दोनों ने अपने निर्णय को बिना किसी कारण के पलट दिया।
इससे पहले भी सीबीआई ने आदित्य बिड़ला ग्रुप के अध्यक्ष पर जालसाजी, धोखाधड़ी और वित्तीय गलतबयानी करके तालबिरा कोल खदान हासिल करने का आरोप लगाया था। ग्रीनपीस ने कहा है कि इस खुलासे से इस शक को बल मिलता है कि वर्ष 2004 से 2009 के बीच जितने भी कोल खदान आबंटित हुये थे उसमें कुछ न कुछ गड़बड़ियाँ जरूर हुयी थी।
ग्रीनपीस की कंपैनर अरुंधति मुतु ने कहा, "महान कोल खदान के आबंटन की जांच में एस्सार ऊर्जा को भी शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि मध्य प्रदेश सरकार ने एस्सार और हिंडालको को एक मार्च 2005 को हुयी बैठक में कोल खदान आबंटन का विरोध किया था लेकिन तीन सप्ताह के भीतर 23 मार्च 2005 में उसने अपने फैसले को पलट कर हिंडालको को नहीं बल्कि एस्सार को कोल खदान आबंटित करने की अनुशंसा कोयला मंत्रालय से कर दिया।"
अरुंधति मुतु ने इस आबंटन पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुये पूछा कि यह कैसे हुआ कि, "ऊर्जा मंत्रालय ने इसी अनुशंसा को स्क्रीनिंग कमिटी को भेज दिया। स्क्रीनिंग कमिटी ने एक मार्च 2005 की बैठक में एस्सार को कोल खदान आबंटित करने से मना कर दिया था, लेकिन इस बार बिना किसी स्पष्टीकरण के एस्सार और हिंडालको को 2006 में कोल खदान आबंटित कर दिया।
अरुंधति मुतु ने सरकार से महान कोल खदान के आबंटन की जाँच करने की माँग की है और कहा कि जब तक जाँच पूरी न हो जाय तब तक वहाँ सभी तरह के काम पर रोक देने चाहिए।
महान कोल खदान की खुदाई महान कोल लिमिटेड द्वारा की जा रही है जो एस्सार ऊर्जा और हिंडालको का संयुक्त उपक्रम है। वहाँ पर स्थानीय नागरिकों द्वारा इसका पुरजोर विरोध किया जा रहा है क्योंकि उनके जल, जंगल, जमीन के अधिकार को मानने से इंकार किया जा रहा है।
दरअसल एस्सार और हिंडालको, दोनों ने मिलकर मार्च 2005 में 27वीं स्क्रीनिंग कमिटी में महान कोल ब्लॉक के आबंटन के लिए प्रयास किया था, जिसका मध्य प्रदेश सरकार ने विरोध किया था (यह मिनट्स में शामिल है )। ठीक इसके तीन हप्ते बाद मध्य प्रदेश सरकार ने पलटी खायी और कोयला मंत्रालय को एस्सार को शामिल किये जाने की वकालत कर दी (यह चिठ्ठी में शामिल है)। एस्सार को क्यों कोल खदान आबंटित किया जाय, इसका जिक्र मिनट्स में कहीं नहीं है। फिर भी, 3 जुन 2006 की स्क्रीनिंग कमिटी की 29वीं बैठक में उन दोनों कंपनियों को महान कोल खदान आबंटित कर दिया गया।
ग्रीनपीस शुरू से ही महान कोल खदान के आबंटन का विरोध करता रहा है। ग्रीनपीस की कंपैनर अरुंधति मुतु ने सरकार से माँग की है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता है तब तक विवादास्पद समय में आबंटित किये गये सभी कोल खदानों पर चल रहे काम पर प्रतिबंध लगा दिया जाये।

फाइल फोटो

दंगों की भयावहता में वृद्धि, चुनाव नज़दीक हैं न!

क्या सांप्रदायिक हिंसा 2013

(भाग-1)

इरफान इंजीनियर

केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे और आईबी के निदेशक सैय्यद आसिफ इब्राहिम ने हाल में आयोजित राज्यों के पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन को सम्बोधित करते हुये इस तरह की प्रक्रिया अपनाने पर जोर दिया जिससे साम्प्रदायिक दंगों को शुरू होने से पहले ही रोका जा सके। दुःख की बात यह है कि पुलिस अक्सर दंगे भड़कने का पूर्वानुमान लगाने में असफल रहती है और इस सम्बंध में संकेतों को नजरअंदाज करती है। साम्प्रदायिक हिंसा की दृष्टि से वर्ष 2013, उसके पिछले साल से और खराब गुजरा। राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में गृह मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, सन् 2013 में देश के विभिन्न भागों में हुयी साम्प्रदायिक हिंसा में 107 लोग मारे गये, जिनमें 66 मुसलमान थे और 41 हिन्दू। वर्ष में साम्प्रदायिक हिंसा की कुल 479 घटनाएं हुयीं, जिनमें 107 मौतों के अलावा 1697 लोग घायल हुये, जिनमें से 794 हिन्दू थे, 703 मुसलमान और 200 पुलिसकर्मी। बिहार में साम्प्रदायिक गड़बड़ी की 40 घटनाएं हुयीं और अन्य 25 मौकों पर साम्प्रदायिक तनाव उपजा। बिहार में 9 मौतें हुयीं। मृतकों में से 5 हिन्दू थे और 4 मुसलमान, जबकि घायलों में 123 हिन्दू थे, 66 मुसलमान और 19 पुलिसकर्मी।

गुजरात में साम्प्रदायिक हिंसा की कुल 64 वारदातों में 6 मौतें (3 मुसलमान व 3 हिन्दू) हुयीं और 147 लोग घायल हुये (85 हिन्दू, 57 मुसलमान व 5 पुलिसकर्मी)। पिछले साल राज्य में 5 मौतें हुयीं थीं और 500 व्यक्ति घायल हुये थे। घटनाओं की संख्या की दृष्टि से गुजरात, उत्तरप्रदेश के बाद दूसरे नम्बर पर है परंतु बिहार में मृतकों की संख्या गुजरात से अधिक है।

उत्तरप्रदेश में साम्प्रदायिक हिंसा में सबसे ज्यादा मौतें हुयीं। अक्टूबर 2013 तक वहां 62 लोग मारे जा चुके थे। दिनांक 18 अक्टूबर के इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार मुजफ्फरनगर दंगों में 62 लोग मारे गये जिनमें से 46 मुसलमान थे और 16 हिन्दू।

सन् 2012 में देश में साम्प्रदायिक हिंसा की 640 घटनाएं हुयीं थीं जिनमें 93 व्यक्ति-48 मुसलमान, 44 हिन्दू और एक पुलिसकर्मी-मारे गये थे और 2067 व्यक्ति घायल हुये थे, जिनमें 1010 हिन्दू थे, 787 मुसलमान, 222 पुलिसकर्मी और 48 अन्य। यद्यपि 2013 में साम्प्रादायिक हिंसा की घटनाओं में 2012 की तुलना में कमी आई तथापि इन घटनाओं में मौतों की संख्या 93 से बढ़कर 107 हो गई। सन् 2012 में भी उत्तरप्रदेश में सबसे अधिक 117 घटनाएं हुयीं थीं जिनमें 39 लोग मारे गये थे। इनमें से 20 हिन्दू थे और 19 मुसलमान।

सन् 2013 में दंगों की भयावहता में वृद्धि का एक कारण लोकसभा चुनावों का नजदीक आना है। इसके लिये मतदाताओं को जातिगत और सांप्रदायिक आधारों पर ध्रुवीकृत किया जा रहा है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने अपने विश्वासपात्र सिपहसालार अमित शाह को उत्तरप्रदेश राज्य का प्रभारी नियुक्त किया है। अमित शाह उस स्थल पर पहुँचे जहाँ कभीबाबरी मस्जिद हुआ करती थी और रामजन्मभूमि मंदिर के निर्माण के लिये प्रार्थना की। इसके बाद संघ परिवार ने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के लिये अयोध्या में 84 कोसी परिक्रमा का आयोजन किया। ज्ञातव्य है कि इस तरह की यात्रा की कोई परम्परा नहीं थी। संघ परिवार ने मुसलमान लड़कों और हिन्दू लड़कियों के बीच प्रेम को 'लव जिहाद' की संज्ञा दी।

'बांग्लादेश से गैरकानूनी घुसपैठ' को एक बड़ा मुद्दा बनाया गया और असम, दिल्ली, मुंबई व अन्य राज्यों में रहने वाले बांग्लाभाषी मुसलमानों को 'अवैध घुसपैठिया' घोषित कर दिया गया। ऑल असम स्टूडेन्टस यूनियन के अतिरिक्त बोडोलैण्ड के बोडो नेता भी अब अपने उन पड़ोसियों को अवैध घुसपैठिये बता रहे हैं जो उनके मोहल्लों में पीढ़ियों से रह रहे हैं। गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा और कुछ हद तक महाराष्ट्र में गौवध निषेध अभियान चलाये गये। इस अभियान के अन्तर्गत पुलिस के सहयोग से संघ परिवार के स्वनियुक्त धर्मरक्षक ऐसी गाडि़यों को रोकते हैं जिनमें मवेशियों को ढोया जा रहा हो। अगर वाहन का मालिक या ड्रायवर मुसलमान हो तो उनसे भारी रिश्वत की माँग की जाती है। अगर वे रिश्वत नहीं देते तो पुलिस को बुलाकर उनका वाहन और मवेशियों को इस आधार पर जब्त करा दिया जाता है कि वे गायों को वध के लिये बेचने ले जा रहे थे। अक्सर मुसलमान मालिक या ड्रायवर की जमकर पिटाई भी की जाती है। इन नए मुद्दों के इस्तेमाल का अर्थ यह नहीं है कि संघ परिवार ने अपने पुराने मुद्दे त्याग दिये हैं। जो दुष्प्रचार संघ परिवार वर्षों से करता आ रहा है वह 2013 में भी जारी रहा। इसमें शामिल है 'सभी मुसलमान आतंकवादी होते हैं', 'मुसलमान पाकिस्तान के प्रति वफादार होते हैं', 'बहुपत्नि प्रथा के कारण मुस्लिम आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है और जल्दी ही वे देश में बहुसंख्यक बन जाएंगे' आदि। इन मुद्दों पर अनवरत दुष्प्रचार और इनके जरिए समर्थन जुटाने की कोशिशों के कारण ही साम्प्रदायिक दंगों में मृतकों की संख्या में इजाफा हुआ। सन् 2012 की तुलना में सन् 2013 में दंगायी तुलनात्मक दृष्टि से अधिक खतरनाक हथियारों से लैस थे और दंगों की योजना भी बेहतर ढंग से बनायी गयी थी। संघ परिवार की दंगों में संलिप्तता इस तथ्य से जाहिर है कि बिहार में आरजेडी-भाजपा गठबंधन टूटने के चार हफ्तों के भीतर साम्प्रदायिक हिंसा की 17 घटनाएं हुयीं। छःह सप्ताह बाद यह आँकड़ा 24 पर पहुँच गया।

सन् 2013 में संघ परिवार ने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिये बड़े स्तर पर हिंसा तो करवाई ही, लम्बे समय तक चलने वाली छुटपुट हिंसा का इस्तेमाल भी किया। जहाँ मुजफ्फरनगर और किश्तवार, बड़े पैमाने पर किन्तु सीमित समय के लिये दंगे करवाने के उदाहरण हैं वहीं मध्यप्रदेश और गुजरात सहित कई अन्य राज्यों में हिंसा की आग को धीमे-धीमे सुलगाये रखा गया। अफवाहों के अलावा दंगाईयों को इकट्ठा करने के लिये सोशल मीडिया का भी जमकर इस्तेमाल हुआ। भाजपा विधायक संगीत सोम को एक नकली एमएमएस प्रसारित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इस एसएमएस को मुजफ्फरनगर और उसके आसपास के इलाकों में इस दावे के साथ प्रसारित किया गया कि उसमें दिखाए गये दृश्य सचिन और गौरव नामक दो हिन्दू लड़कों की मुसलमानों द्वारा पिटाई के हैं। इन दोनों लड़कों की बाद में मृत्यु हो गयी। जो वीडियो क्लिप इस्तेमाल की गयी, दरअसल, वह पाकिस्तान में हुयी किसी घटना की थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि वीडियो क्लिप ने जाट महापंचायत में भारी भीड़ इकट्ठा करने में मदद की। मुजफ्फरनगर में हुयी क्रूर हिंसा और महिलाओं का शीलभंग करने की बड़े पैमाने पर कोशिशों के लिये भी यह एमएमएस काफी हद तक जिम्मेदार था। एक महिला के शव के दो टुकड़े कर दिये गये और एक 10 वर्ष के बच्चे का सिर फोड़ दिया गया। जिन 53 शवों का शवपरीक्षण किया गया उनमें से 13 को इस बुरी तरह से मारा गया था कि उन्हें पहचानना बहुत मुश्किल था।

मुजफ्फरनगर घटना का एक चिंताजनक पहलू यह है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का वाईरस ग्रामीण क्षेत्रों में भी फैल गया है। इस इलाके के जाट और मुसलमान-जिनमें से अधिकांश पिछड़ी जातियों के हैं, की एक ही संस्कृति है और वे एक ही बोली बोलते हैं। वे सदियों से मिलजुल कर रह रहे हैं और उन्होंने सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में कंधे से कंधा मिलाकर हिस्सेदारी की थी। लव जिहाद के दुष्प्रचार और 'बहू-बेटी बचाओ अभियान' के जरिए जाटों-जो अपनी महिलाओं पर बहुत कड़ा नियंत्रण रखते हैं-को यह विश्वास दिला दिया गया कि उनकी बहू-बेटियों को आदमखोर मुसलमानों से खतरा है। इन दंगों का चार जिलों के ग्रामीण इलाकों में फैल जाना चिंताजनक है। अपने घरों से बेघर कर दिये गये मुसलमान अब भी अपने गांव वापस नहीं जा पाए हैं।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में सन् 2013 में साम्प्रदायिक हिंसा की 64 घटनाएं हुयीं जिनमें 11 लोग मारे गये और 271 घायल हुये। मृतकों में से 11 अल्पसंख्यक समुदाय से थे। घायलों में 101 हिन्दू थे, 106 मुसलमान और 64 पुलिसकर्मी।

सन् 2013 में राज्य में साम्प्रदायिक हिंसा की शुरूआत धुले से हुयी। एक मुसलमान ऑटो ड्रायवर की शहर के केन्द्र में स्थित माधवपुर में एक रेस्टोरेंट के मालिक किशोर वाघ से 30 रूपए के बिल को लेकर विवाद हुआ। वाघ ने ऑटो ड्रायवर के चेहरे पर करछुल से वार किया। ड्रायवर जल्दी ही करीब एक दर्जन युवकों के साथ वापस पहुंचा। इस बीच रेस्टोरेंट में भी लोग इकट्ठा हो गये थे। मुस्लिम दंगाईयों ने पास में स्थित पुलिस चौकी का फर्नीचर और दस्तावेज बाहर निकाले और सड़क पर रखकर उनमें आग लगा दी। इसके बाद बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी वहां पहुंचे और उन्होंने हिंसक भीड़ पर गोलियां चलाईं। गोलीचालन में छह मुसलमान मारे गये और 229 घायल हुये। घटना में 113 पुलिसकर्मियों को भी चोटे आईं।

यह घटना 6 जनवरी 2013 की है। बाद में महाराष्ट्र पुलिस द्वारा घटना की जांच में यह पाया गया कि पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया था और सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया। इसके बाद, 8 फरवरी को 6 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया गया जिनमें से दो को इस आधार पर निलंबित कर दिया गया कि उन्होंने इलाके में लूटपाट की।

दिनांक 5 फरवरी 2013 को बुलढ़ाना जिले के लोमार कस्बे में साम्प्रदायिक तनाव उत्पन्न हुआ। बहुसंख्यक समुदाय का एक सदस्य अस्पताल में इलाज के दौरान मर गया। पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया। भारी पुलिस बल की तैनाती और तलाशी अभियान के कारण दंगे फैल नहीं सके।

जलगांव जिले की रावेर तहसील के सौदा गांव में 13 जून को दो समुदायों की भीड़ के बीच हिंसा के बाद कर्फ्यू लगाया गया। इस हिंसा में कई मकानों और दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया। सात लोग घायल हुये और बीस को गिरफ्तार किया गया।

मुंबई के अगरीपाड़ा इलाके में 18 अगस्त को साम्प्रदायिक झड़प हुयी। शिवसैनिक एक मुस्लिम दुकानदार से गणेशोत्सव के लिये एक खास राशि चंदे के रूप में मांग रहे थे। व्यापारी ने कहा कि उसका धंधा बहुत अच्छा नहीं चल रहा है और वह उतनी राशि देने में असमर्थ है। इसके बाद हिंसा भड़क उठी। स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश में दो पुलिसकर्मी घायल हुये।

राजस्थान

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के मुस्लिम बहुल सावा गांव में 28 जून को एक सड़क दुर्घटना के बाद हिंसा भड़क उठी। एक व्यक्ति को डंपर द्वारा कुचल दिये जाने के बाद गुस्साई भीड़ ने डंपर में आग लगा दी और मुआवजे की मांग की। खदान मालिकों ने अपने गुंडों की फौज गांव भेजी, जिसने कई दुकानों में आग लगा दी। कुल मिलाकर 34 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से गांव के सरपंच सहित 22 अल्पसंख्यक समुदाय के थे और 12 बहुसंख्यक समुदाय के। पुलिस के गोलीचालन में एक व्यक्ति घायल हुआ।

प्रदेश के टोंक शहर में 11 जुलाई को जिस समय मुसलमान छावनी जामा मस्जिद में मगरिब की नमाज अदा कर रहे थे, उसी समय निकट के कीर हिन्दू इलाके से एक बारात मस्जिद के सामने से गुजरी। बारात में तेज आवाज में बज रहा डीजे शामिल था। जब बारात कुछ ज्यादा ही देर तक मस्जिद के दरवाजे के सामने रूकी रही तब कुछ लोगों ने यह अनुरोध किया कि वहां डीजे न बजाया जाये। इसके बाद गर्मागर्मी हुयी और दोनों तरफ से पत्थरबाजी शुरू हो गयी। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित किया। इसके अगले दिन 12 जुलाई को जब मुसलमान उसी मस्जिद में जुमे की नमाज अदा करने इकट्ठा हुये तब वहां भारी पुलिस बल तैनात था। नमाज खत्म होने के बाद लोग शांतिपूर्वक मस्जिद से बाहर निकलने लगे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सब कुछ शांतिपूर्वक हो रहा था और स्थिति नियंत्रण में थी। लोग अपने घरों की ओर जा रहे थे। तभी अचानक, बिना किसी कारण के, लगभग 150 पुलिसकर्मी बगल में स्थित मदरसे से मस्जिद के पिछले दरवाजे को तोड़कर अंदर घुस आये और वहां इकट्ठा लोगों पर अश्रु गैस के गोले छोड़ने लगे। एक गोला नासिर नाम के युवक के चेहरे पर लगा और उसकी वहीं मौत हो गई। एक अन्य व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया। उसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया और बुजुर्गों सहित सभी लोगों की जमकर पिटाई की। लगभग 80 लोग घायल हुये और दो की मृत्यु हो गयी।

(मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

(अगले अंक में जारी)

About The Author

इरफान इंजीनियर, लेखक इंस्टीट्यूट फॉर स्टडीज़ एण्ड कंफ्लिक्ट रिसॉल्यूशन (Institute for Peace Studies & Conflict Resolution) के निदेशक हैं

केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. एम.एम. पल्‍लम राजू अल्‍पसंख्‍यकों की शिक्षा से सम्‍बद्ध राष्‍ट्रीय निगरानी समिति की वार्षिक बैठक में बोलते हुये

नई दिल्ली। यूपीए सरकार अल्‍पसंख्‍यकों के शैक्षिक विकास सम्बंधी कई योजनाएँ लेकर आने वाली है। केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. एम.एम. पल्‍लम राजू ने अल्‍पसंख्‍यकों की शिक्षा से सम्‍बद्ध राष्‍ट्रीय निगरानी समिति की वार्षिक बैठक में बोलते हुये कहा कि 12वीं पंचवर्षीय योजना अवधि के लिये अल्‍पसंख्‍यकों के शैक्षिक विकास सम्बंधी कई योजनाएँ प्रस्‍तावित हैं। इन योजनाओं में कौशल विकास से जुड़ी 'हुनर' नामक योजना के अन्तर्गत 978 करोड़ रूपये की लागत से 9.20 लाख अल्‍पसंख्‍यक बालिकाओं को लाभांवित करने का विचार है। वयस्‍क शिक्षा कार्यक्रम के अन्तर्गत 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग के एक करोड़ मुस्लिम वयस्‍कों के लिए मौलाना आजाद तालीम-ए-बालिगान नामक एक नई योजना तैयार की जा रही है। इस पर 12वीं योजना में 600 करोड़ रूपये का खर्च प्रस्‍तावित है।

श्री राजू ने बताया कि शैक्षिक रूप से पिछड़े मुस्लिम बहुल कस्‍बों और जिलों में कस्‍तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों, बालिका/महिला छात्रावास, ड्रिग्री कॉलेज और पॉलीटेक्निक शिक्षा संस्‍थानों को मिलाकर शैक्षिक केन्द्र स्‍थापित करने की एक अन्‍य नई योजना भी शुरू करने पर विचार किया जा रहा है।

मानव संसाधन विकास मंत्री ने बताया कि पिछले सात-आठ वर्षों में अल्‍पसंख्‍यकों में शिक्षा को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयासों के परिणाम स्‍वरूप प्राथमिक स्‍कूलों में 2012-13 में मुस्लिम छात्रों की संख्‍या देश में मुस्लिम जनसंख्‍या के अनुपात की तुलना में अधिक हो गयी है। 12वीं पंचवर्षीय योजना में हम 378 नए जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्‍थापना करने जा रहे हैं। इनमें से 196 विद्यालय अल्‍पसंख्‍यक बहुल जिलों में स्‍थापित किये जायेंगे। उन्‍होंने कहा कि मदरसों में गुणवत्‍तापूर्ण शिक्षा की योजना के अन्तर्गत 2009-10 में 1979 मदरसे कवर किये गये थे जबकि 2012-13 में 9905 मदरसे कवर किये गये।

MARGIN SPEAK


Humiliation: Class Matters Too


Anand Teltumbde


All the dalits actively protesting


against the humiliation of


Devyani Khobragade through


email and social media


campaigns would not have even


heard of Soni Sori, let alone what


the Chhattisgarh police did to her.


But isn't Sori a member of their


class, the class of the exploited?


Anand Teltumbde (tanandraj@gmail.com) is a


writer and civil rights activist with the


Committee for the Protection of Democratic


Rights, Mumbai.


10 JANUARY 11, 2014 vol xlIX no 2 EPW Economic & Political Weekly


Three weeks have gone by since


Devyani Khobragade, Deputy


Consul General (DCG) for political,


economic, commercial and women's


affairs, was arrested and humiliated in


New York on 12 December 2013. But the


uproar in the media is yet to subside.


This is surely not the fi rst time that the US


autho rities humiliated Indian note-

worthies, even our ex-president A P J Abdul


Kalam, but the public outrage and angry


reaction of the government over this epi-

sode has been unprecedented. As any


sensible person could guess, the only


factor that explains the din is the times


in which it took place. Yes, this is election


time! The results of the recent elections


in four states have bolstered the confi dence


of the Bharatiya Janata Party (BJP),


causing grave anxieties to the ruling


Congress Party. The opportunities pre-

sented by the great post-election coalition


game have also activated all the other


parties to seek to maximise their prospects.


This episode served them all to exhibit


their jingoism. There has been another


aside to the episode. Devyani happens


to be a dalit, the daughter of ex-Indian


Administrative Service offi cer, and in that


identity, she perfectly represents the vocal


dalit middle class. Right or wrong, taking


cudgels on her behalf serves two important


electioneering objectives, viz, appealing


to the masses by invoking patriotic


sentiments and appealing to dalits, by


showing concern for their honour.


Devyani happens to be the daughter of


my long-standing friend; personally, I


would sympathise with her. But the epi-

sode threw up many important issues in


public and so I cannot be blinded by per-

sonal feelings. The main thrust of the


argument in her favour is that she was


humiliated by being handcuffed, allegedly


strip-searched, and made to stay with


ordinary criminals for nearly four hours


before she was released on bail against


the bond of $250,000. In the "socialist


democratic republic" called India, we are


conditioned to see institutions treating


individuals differentially, depending on


one's social rank, and hence we cannot


stomach the idea of equality before the


law. This is not to say that the US has


completely shunned racial profi ling.


But, in comparison, its law enforcement


machinery treats people equally and


operates uninfl uenced by any pressure.


Of course, in the post-second world war


period, the US has been the biggest


imperialist bully, exploiting people the


world over, even killing those whom


Washington considers its enemy, this with


impunity. But the Indian ruling-class


parties and the government, which are


now displaying their defi ance in this epi-

sode, have never uttered even a word


against its exploitative role. On the con-

trary, they have always bent over back-

wards to curry Washington's favour. This


episode reeks of many such duplicities


and doublespeak behind the jingoistic


noises for Devyani.


Messy Affair


As it happens with any outpour in the


media, the facts become fi rst victim of


interpretations and opinions. The case


relates to the employment of one Sangeeta


Richard, a Malayali-Christian lady from


Delhi by Devyani as a nanny-cum-domestic


servant in November 2012. She got her an


A-3 US visa on the basis of a false declara-

tion of her salary as $4,500 per month so


as to meet the visa requirement. While


Devyani's side accuses Sangeeta of falsi-


fi cation, it could not be without her


knowledge as the A-3 visa itself is based on


a diplomat's proposal of taking a domestic


servant. Moreover, it has come into the


public domain that Indian diplomats


have followed this "standard template"


for securing A-3 visas for their domestic


servants. Sangeeta was actually paid $537


per month by Devyani, which works out


to $3.31 per hour as against the stipu-

lated minimum wage of $9.75 per hour.


Sangeeta happily worked for Devyani,


but on 23 June she suddenly went missing.


Devyani got a call from Sangeeta's lawyer


on 1 July making certain unreasonable


demands on behalf of Sangeeta. A


complaint of cheating was then fi led with


the Delhi Police against Sangeeta on behalf


of Devyani the next day. In the course of


the next six months Sangeeta's passport


was revoked, she was restrained by the


Delhi High Court from taking legal action


against Devyani outside India. An arrest


warrant was issued against her by the


metropolitan magistrate. Devyani and


the Indian authorities then followed up


with the US authorities but received no


response. Mysteriously, Sangeeta's hus-

band and children then fl ew to the US


just two days prior to Devyani's arrest.


Whatever may be the crime of Sangeeta,


the core charges of lying in the visa form


and paying less than the minimum wage


against Devyani must not be disputed.


What is disputed is the ill treatment


meted out to Devyani by the US Marshals.


She was arrested by the State Depart-

ment's diplomatic security bureau and


handed over to the US Marshals Service.


The US Marshals handcuffed and strip-

searched her, according to their "standard


arrestee intake procedures". The entire


complaint about ill treatment ignores


this fact and imagines that Devyani was


entitled to a better deal than what she


received. The tacit assumption behind


this is her stature as DCG. But the facts


reveal that a DCG does not have diplo-

matic immunity; Devyani did have con-

sular immunity but this was confi ned to


her consular duties only. Another argu-

ment raised against the alleged maltreat-

ment is that the crime was not serious


enough to deserve handcuffi ng or strip-


searches. True, this may not be so in India


but we are speaking about US law, which,


apart from the normal procedure to


handcuff and search, considers it serious


enough to provide for a sentence of 15


years (10 years for visa fraud and fi ve


years for making a false declaration).


Lastly, it is also insinuated that what


Devyani followed was a standard tem-

plate used by the Indian diplomatic staff.


This points to the necessity of a change


in government policy but how can it be


the argument for condoning the crime?


Defi ance Drama


The Indian government's reaction to the


episode has been amusing. While the


Indian embassy had been warned in


Economic & Political Weekly EPW JANUARY 11, 2014 vol xlIX no 2 11


September that there were suspicions


the diplomat has been violating the min-

imum wage law and that action could be


imminent (as US assistant secretary of


state Nisha Desai Biswal disclosed to a


paper), it failed to take corrective steps.


It persisted with the mistaken assumption


that Devyani had diplomatic immunity.


Under the 1963 Vienna Convention on


Consular Relations, consular offi cials could


be arrested for acts committed outside


of offi cial job functions. The government


woke up only after the matter precipi-

tated and transferred Devyani to the


country's Permanent Mission to the


United Nations, ensuring her complete


immunity from US prosecution. But


obviously, this would be short-lived pro-

tection as procedurally she would have


to apply for a fresh diplomatic card.


In an unprecedented show of defi ance,


the government took a slew of measures


withdrawing special privileges extended


to the US embassy in New Delhi. They


included removal of barricades erec-

ted as a safety measure outside the US


embassy, even asking the embassy staff


to hand over the passes issued to them


to access airport lounges, withdrawing


their import permits for liquor, and ask-

ing for the details of their employees.


All these measures might assuage the


sentiments of the gullible masses over-

charged with patriotism but do not


explain why the Indian government had


extended them unilaterally in the fi rst


place. Where was the honour or sover-

eignty of the country all these years


when it succumbed to every other pres-

sure from the US?


The least said about the politicians,


the better it would be! The rightist BJP,


during its own National Democratic Alli-

ance reign from 1999-2004 had pleaded


to include India into the Triad against


Terrorism comprising US-Israel-India, over-

turning decades of Indian foreign policy


that had favoured the Palestinian cause.


Its Yashwant Sinha wanted India to arrest


the embassy staff with same-sex partners


under Article 377. Mayawati did not


forget her patented caste card, accusing


the government of delay because Devyani


was a dalit. Many politicians, including


Meira Kumar, Sushilkumar Shinde,


Rahul Gandhi, not excluding Narendra


Modi, refused to meet the US Congres-

sional delegation that was visiting India


at that time. Did they not know that the


US presided over the post-war imperialist


system for the subjugation of nations and


their peoples? Did they not know that


the US maintains 1,000 military bases


overseas for the purpose? Never before


did these worthies utter a word against


the US. The show of defi ance in this case


is just meant for the electoral gallery.


Class Identity


The entire drama is focused on humilia-

tion, which is a curious term that tends


to undermine the objective exploitation


of the masses and valorises the subjec-

tive feeling of ignominy by an individual


of stature. With the rise of the dalit mid-

dle class this is becoming quite popular,


with some academics even theorising


about it as a key issue. It is amusing to


note that the perceived humiliation of a


foreign service offi cial provokes nation-

wide outrage and creates a foreign affairs


crisis for a country in which a vast


majority of people live ignominious lives.


Many examples come to mind but the case


of Soni Sori, a tribal schoolteacher in


Chhattisgarh, should be enough to bring


home the point. This lady, on mere sus-

picion of a Maoist link, was arrested,


stripped naked, allegedly raped and stones


were inserted into her vagina. She was


not allowed to attend the funeral of her


husband who died of police torture, not


even permitted to make arrangements


for her children who were rendered


parentless while she was still in custody.


Was that not humiliation? How many of


those demonstrators who shouted for


Devyani had felt disgusted by the manner


in which the police had treated Sori? I


bet all those dalits actively protesting


against humiliation of Devyani through


email and social media campaigns would


not know even her name. Does she not


belong to them?


Sangeeta Richard may well be a rogue


but she will surely be in jail, her family


devastated by this episode, and nothing


will happen to our dear Devyani! After


all, the latter is not a member of the class


of ordinary mortals. Her humiliation


therefore is more important than the


exploitation of millions of Soris!

economic and political weekly



Sunil Khobragade with Sanjay Khobragade and 29 others

आंबेडकरवादी समाजाचे विघटन होत आहे.आंबेडकरवादी समाज अधःपतित झाला आहे,आंबेडकरवादी समाज गुलाम,लाचार,स्वभिमानशून्य,विकाऊ झाला आहे आणि त्याला आंबेडकरवादी नेते जबाबदार आहेत अशी हाकाटी गेल्या अनेक वर्षापासून पिटली जात आहे. या अश्या विघटीत, गुलाम,लाचार,स्वभिमानशून्य,विकाऊ समाजाला तारण्याची जबादारी बाबासाहेबांनी केवळ आणि केवळ आपल्यावरच सोपविली आहे असा फार महान विचारवंत,बुद्धिवंत,नोकरशहा, अधिकारी,लेखक,पत्रकार,धम्माचार्य, धम्मसेवक ,कवी, नेते,कार्यकर्ते इत्यादी अनेकांचा विश्वास आहे.याच फार महान कर्तव्याला पार पाडण्यासाठी दलित पेन्थर,बामसेफ,एम्बस,बसप व त्याचे विविध गट,रीपब्लीकनांचे विविध गट अहोरात्र कष्ट उपसत आहेत.मात्र यापैकी कोणीही मात्र यापैकी कोणीही त्यांच्या दृष्टीने विघटीत, गुलाम,लाचार,स्वभिमानशून्य,विकाऊ असलेल्या समाजाला एका समान उद्दिष्टासाठी एकत्र आणून या समाजाची सुधारणा करू शकलेले नाहीत याची कारणे काय असावीत ? काय मुळातच या समाजात संघटीत होण्याची प्रवृत्ती नाही ? काय या समाजाला गुलामी,लाचारी,स्वभिमानशून्यता आवडते ?की,या समाजात सुधारणा घडवून आणण्यासाठी प्रयत्न करणाऱ्या विचारवंत,बुद्धिवंत,नोकरशहा, अधिकारी,लेखक,पत्रकार,धम्माचार्य, धम्मसेवक ,कवी, नेते,कार्यकर्ते यांच्या कार्य पद्धतीमध्ये दोष आहे? की समाजाने स्वीकारलेले नैतिक आणि वैचारिक तत्वज्ञान एकात्मतेला पोषक नाही ? फेबुवन्तानी यावर आपली मते प्रगट केली व नवीन मार्ग सुचविले तर त्या दृष्टीने प्रयत्न सुरु करता येतील.

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  • Eng Styanarayan Bhagat तत्व आणि तथ्य याची योग्य सांगड घालूनच निर्णय घ्यावे लगत असतत,

  • 31 minutes ago · Like

  • Sunil Khobragade Ashokaji aamhi parabhoot zalelo nahi

  • 30 minutes ago via mobile · Like · 2

  • Bhagwan Nagtilak प्रत्येकजण स्वतःला बाबासाहेबच समजतो. गल्लीबोळात पक्ष काढून राष्ट्रीय अध्यक्ष बनतो.आपल्याच माणसाला पाण्यात बघतो.त्याला पाडण्यासाठी दुसर्याच्या टोळीत जातो.बापाचा वापर निवडणूकी पुरताच करतो.धम्म आचरण नाही.आर्थीक ,ऊध्योग,रोजगार निर्मीती नाही तो समाज हजारो वर्षाने देखील काहिही करू शकत नाही.आपण निष्ठापूर्वक प्रयत्न करीत आहात त्यासाठी अभिनंदन! हार्दीक शुभेच्छा!

  • 27 minutes ago · Like · 2

  • Eng Styanarayan Bhagat blue &safron एकमेकांचे विरोधी रंग आहेत म्हणूनच बाबासाहेब आणि बुद्ध समजून घेणे वाटते तेवढे सोपे नहीं,

  • 19 minutes ago · Like · 1

Jagadishwar Chaturvedi

चलो ये तो सलीका है बुरे को मत बुरा कहिए / अज़ीज़ आज़ाद


चलो ये तो सलीका है बुरे को मत बुरा कहिए

मगर उनकी तो ये ज़िद है हमें तो अब ख़ुदा कहिए


सलीकेमन्द लोगों पे यूँ ओछे वार करना भी

सरासर बदतमीज़ी है इसे मत हौसला कहिए


तुम्हारे दम पै जीते हम तो यारों कब के मर जाते

अगर ज़िंदा हैं क़िस्मत से बुजुर्गों की दुआ कहिए


हमारा नाम शामिल है वतन के जाँनिसारों[1] में

मगर यूँ तंगनज़री[2] से हमें मत बेवफ़ा कहिए


तुम्हीं पे नाज था हमको वतन के मो'तबर[3] लोगों

चमन वीरान-सा क्यूँ है गुलों को क्या हुआ कहिए


किसी की जान ले लेना तो इनका शौक है 'आज़ाद'

जिसे तुम क़त्ल कहते हो उसे इनकी अदा कहिए

शब्दार्थ:

1.जान छिड़कने वाले

2.संकीर्ण-दृष्टि

3.प्रतिष्ठित

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Vidya Bhushan Rawat shared Gopal Rathi's photo.

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Uttam Sengupta

Private capitalists were not prevented from setting up steel plants in India by Nehru. Indeed Tata Steel had come up even before the turn of the century in 1900. But Indian capitalists in 1950 did not have the muscle to set up Durgapur, Rourkela, Bhilai and later Bokaro steel plants. It is fashionable now to criticise Nehruvian socialism but it needs to be remembered that he was the one who called industries the 'modern temples' and set the foundations of our core sector. Coal had been left to the private sector till 1971 and with disastrous consequences.

An American in India | Hoover Institution

hoover.org

On December 29, 2013, my wife and I boarded a United Airlines flight from New York to Mumbai for our first trip to India. We spent three days in Mumbai and one in Delhi. That short trip gave me a chance to observe a tiny sliver of a vast, diverse, and contradictory country. The startling contrast be...

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Jagadishwar Chaturvedi

आप पार्टी का साइड इफेक्ट देखें- यूपी -बिहार में भाजपा परेशान है ईमानदारों को टिकट देने के नाम पर । यदि बाहुबलियों को टिकट न दे तो तकरीबन 50मौजूदा सीटें सीधे हार जाने का खतरा है और बाकी सीटों पर भी इससे डिप्रेशन पैदा हो सकता है। सपा-बसपा ने अपराधियों के लिए दरवाजे खुले रखे हुए हैं ।यूपी में यदि ईमानदार और शरीफ को टिकट दिया तो भाजपा के अधिकांश उम्मीदवार 4-5 नम्बर जा सकते हैं और भाजपा यह कीमत देने को तैयार नहीं हैं ।

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Jagadishwar Chaturvedi

कल तक जो विदेशी पूंजी निवेशक और वित्तीय कंपनियां नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रुप में पेश कर रही थीं उन कंपनियों और उनके भविष्यवाणी करने वालों के पाजामे गीले पड़े हैं आप की धमाकेदार दिल्ली जीत और उन्मादी मीडिया कवरेज के कारण। होश गुम हैं विदेशी सटोरियों के। जय हो केजरीवाल !! दूधों नहाओ वोटों फलो!!

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Shamshad Elahee Shams

आज की रात यहाँ सबसे सर्द रात है, -३५ से -४० तापमान रहेगा. मौसम विभाग कनैडा ने चेतावनी दी है कि मात्र पांच मिनट के भीतर शरीर का कोई भी नंगा हिस्सा हवाओं के सीधे संपर्क में आते ही जम जायेगा... अभी सर्दियों की शुरुआत ही है

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The Economic Times

Yesterday

Last week's missive from Congress leader Rahul Gandhi, to states ruled by his party, allowing farmers to sell their produce of fruits and vegetables to anyone they want —and not necessarily route it through mandis— will not be transformative for Indian farmers on its own. Read here to know more http://ow.ly/siEZv

The Economic Times

14 hours ago

Investment experts say markets can correct more then 10% if the BJP falls short of a majority and a credible coalition does not take shape quickly. Indian markets can correct by 10% on the day of election result, if contrary to popular perception, a weak coalition or a third front emerges at the Centre. http://ow.ly/sksaF

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The Economic Times

6 hours ago

Priyanka Gandhi attends meet with Rahul, creates fluttershttp://ow.ly/sl1Kp

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यूपीए सरकार लायेगी अल्पसंख्‍यकों की शिक्षा सम्‍बंधी कई योजनाएं


About The Author

अविनाश कुमार चंचल, युवा पत्रकार व एक्टिविस्ट हैं, हस्तक्षेप टीम का हिस्सा हैं।
·
Udit Raj shared Udit Raj's photo.
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The Economic Times

4 hours ago

India's battle to protect basmati rice name faces a hurdle in Madhya Pradesh http://ow.ly/skEYp


Abhinav Sinha shared a link via Amrit Pal.

January 5

सितम्‍बर-दिसम्‍बर 2013

ahwanmag.com

भारतीय राज्यसत्ता का निरंकुश एवं जनविरोधी चरित्र पूँजीवादी संकट का लक्षण है

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Abhinav Sinha shared a link via Amrit Pal.

January 5


'आप' के उभार के मायने

ahwanmag.com

'आप' पूरी पूँजीवादी व्यवस्था को कभी कठघरे में खड़ा नहीं करती। केजरीवाल ने एक कारपोरेट घराने के 'काम करने के तरीकों' पर सवाल उठाना शुरू किया था, लेकिन इस मुद्दे पर जल्द ही वह चुप्पी साध गये। बाकी कार...

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Abhinav Sinha shared Samar Ldh's album.

January 5

क्रांतिकारी गीत-संगीत सभा (8 photos)

दोस्तों, आज लुधियाना की एक मज़दूर बस्ती में कारखाना मज़दूर यूनियन ने संस्कृत सभा अयोजित की | जिसमें क्रांतिकारी सांस्कृतक मंच `दस्तक` ने क्रन्तिकारी गीतों की पेशकारी की और बाद में मजदूरों के ऊपर बनी दस्तावेज फिल्म `मौत और मायूसी के कारखानें`देखायी गई |

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Anita Bharti

निमंत्रण ! निमंत्रण ! निमंत्रण !


प्रिय साथी,

सादर नमस्कार।

हमें आपको यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि दिल्ली के वंचित तबके के कुछ शिक्षित, प्रतिबद्ध, मेहनती तथा सामाजिक न्याय और समानता पसंद युवाओं ने मिलकर एक सामाजिक संगठन "रिपब्लिकन थॉट एंड एक्शन ग्रुप" बनाया है। हमारे इस सामाजिक ग्रुप के युवाओं ने आपस में मिलकर समाजिक व बौद्धिक कार्य करने के लिए दिल्ली के गांव-देहात, स्लम तथा खासकर वंचित वर्ग के लोगों में काम करने का निश्चय किया है। इस काम को संगठित तथा सही दृष्टिकोण से करने के लिए आपकी सहभागिता तथा सहयोग बहुत जरुरी है। हम जानते है कि आप भी अपने अपने प्रयासों से लगातार सामाजिक कार्य कर रहे है। आपके इन सामाजिक कार्यों को देखते हुए आपसे सादर अनुरोध है कि आप 12 जनवरी को आयोजित सभा में जरुर आये। इस सभा पर हम सब "दिल्ली में बदलती सामाजिक आर्थिक राजनैतिक सांस्कृतिक परिस्थितियां और हम" विषय पर चर्चा भी करेगे।


इस सभा में आपके आने से एक तो हमारा हौसला बढेगा तो दूसरी ओर आपके जुड़ने से समाज में काम करने की हमारी ताकत भी दुगनी हो जायेगी।


कार्यक्रम का विवरण-

विषय- दिल्ली में बदलती सामाजिक आर्थिक राजनैतिक सांस्कृतिक परिस्थितियां और हम

समय- 2 से 5 पांच बजे तक

स्थान- जवाहर लाल नेहरु नेशनल यूथ सेंटर ,219, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग,आई.टी.ओ. दिल्ली-2


तिथि तथा दिन. 12.1.1014 ( रविवार)

समय : दोपहर 01:30 से 05:.30बजे.


आयोजक,

रिपब्लिकन थॉट एंड एक्शन ग्रुप.

सम्पर्क सूत्र : republicantag@gmail.com.

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Vidya Bhushan Rawat

When Kejriwal and his 'revolutionaries' seek decentralisation and devolution of power for elsewhere and want 'referendum' for every fictitious thing they create, what is wrong in Prashant Bhushan's argument that let there be referendum on Army's role in Kashmir but may be AAP does not like this argument as people like Kejriwal, Kumar Biswas and others would like referendum on Kashmir in Karol Bagh like the other political friends. Shameful that a senior member can not convince his party on a view which is very important. Kashmir has become fodder for our 'nationalist' without asking the people of Kashmir as what they want. Is it democracy ? It political answer to a problem ? Creating a frenzy in the name of Kashmir is the best work for our hate mongers and Prashant Bhushan's statement is bound to 'flower' those in the Sangh Parivar though we defend his right to say so and he must stand with it. Problem is not with AAP but Prashant Bhushan's understanding of AAP as the party remain den of communal caste mindset and just because they have obtained power in Delhi does not wash their acts of past which are well recorded on issues of caste, reservation and communalism.

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  • Ashok Dusadh, Mohan Shrotriya, Ashutosh Kumar and 21 others like this.

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  • Azfer Hasnain Still kejriwal hasn't said anything about communalism.. Modi,rss and so on..

  • 7 hours ago via mobile · Like · 1

  • Md Shahil Shaikh very good analysis...........kumar vishwas's past relation with RSS is well known now.......I heard Kejriwal's father was also RSS member........let's wait for some more time........hopefully things will start getting more clear as far as AAP is concerned..........

  • 5 hours ago via mobile · Like · 1

  • Angeli Alvares Power eventually brings in compromises. However better to have YOUNG ENERGETIC people on the job than senile TIRED old men and women. One truly cannot multi task after age 65...this is a scientific fact and handling a huge country like ours requires MULTI TASKING. I'm sure you will agree to that.

  • 3 hours ago · Like · 1

Dilip C Mandal

लंगोटवाद यानी 'सादगी के पाखंड' की भारत के भोले-भाले लोगों के बीच बहुत महिमा है. लोग यह भी भूल जाते हैं कि यहां करोड़ों लोगों की जिंदगी किसी लंगोट वाले की वजह से नहीं, एक ऐसे आदमी की वजह से बदली है जो कोट-टाई पहनता था.

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  • Virendra Yadav, Ajit Rai, Satyendra Murli and 109 others like this.

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  • View 14 more comments

  • Sanjay Kotiyal सच तो ये है कि सच भारत में लंगोटवाद में भी उतना है जितना सादगी वाले पाखण्ड में और भोली भाली जनता में Dilip C Mandal जी । कोट पेंट वाला भी सच है । इस देश में सच ही सच है और सही में है । उत्तरदायी बुद्धिमान और गैर जिम्मेदार मूर्ख होने के चयन की सुविधा बराबर रही है । आज के हाल के आधार पर । आप समझ रहे होंगे मेरा मतलब संभवतः।

  • about an hour ago via mobile · Like

  • Jamshed Qamar Siddiqui Dilip C Mandal - वो कोट पैंट वाला व्यक्ति भी लंगोट वाले के आगे सर झुकाता था! फेसबुक से थोड़ी देर के लिये लॉगआउट कर 'पूना पैक्ट' पढ़ियेगा

  • about an hour ago via mobile · Like

  • Jamshed Qamar Siddiqui Dilip C Mandal - वो कोट पैंट वाला व्यक्ति भी लंगोट वाले के आगे सर झुकाता था! फेसबुक से थोड़ी देर के लिये लॉगआउट कर 'पूना पैक्ट' पढ़ियेगा

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  • Jamshed Qamar Siddiqui Dilip C Mandal - वो कोट पैंट वाला व्यक्ति भी लंगोट वाले के आगे सर झुकाता था! फेसबुक से थोड़ी देर के लिये लॉगआउट कर 'पूना पैक्ट' पढ़ियेगा

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Himanshu Kumar

आज मलकपुर राहत शिविर गया था . प्रशासन अब इन पीड़ितों को यहाँ से भगाने पर आमादा है .


मैंने बस्तर में आदिवासियों के गाँव को सरकारी पुलिस द्वारा जलाये जाते हुए देखा है . मैंने दलितों की बस्तियां जलती हुई देखी हैं .


लेकिन उत्तर प्रदेश में जो हो रहा है वो एक लोकतान्त्रिक सभ्य समाज में पूरी तरह नामंजूर होना चाहिए था .


पहले से ही साम्प्रदायिक हिंसा में अपना घर बार लुटा चुके कमज़ोर लोगों पर फिर से सरकारी दमन .


हद है क्रूरता की . और हमारा लोकतांतिक समाज चुपचाप देख रहा है बस .


लेकिन याद रखना हर ज़ुल्म एक भयानक एतिहासिक घटना की बुनियाद बनता है . ऐसे ही ज़ुल्म इतिहास और भूगोल बदल देते हैं .

Muzaffar Nagar riots victims being forcefully displaced again by government this time

youtube.com

Muzaffar Nagar riots victims being forcefully displaced again by government this time

Like ·  · Share · January 5 at 10:24pm ·

Reyazul Haque via Subrat Kumar Sahu

What else Arvind Kejriwal has to offer other than 'Bharat Mata ki Jai' and 'Vande Mataram'?! I am not at all surprised at this! AAP has given enough hints to take India into an advanced stage of Fascism!

Arvind Kejriwal opposes referendum on Army in Kashmir - The Times of India

timesofindia.indiatimes.com

Delhi CM Arvind Kejriwal said there was "no question" of having a referendum on keeping the Army in J&K but the feeling of the locals must be respected.

Like ·  · Share · 58 minutes ago ·

Virendra Yadav

दृश्य सचमुच दिलचस्प और उम्मीदों भरा है .मोदी खेमा बेचैन और घबडाया हुआ है .मोदी ,राजनाथ सिंह और अरुण जेटली उस रामदेव के पैर छू रहे हैं ,जो खुद ही कानून की कड़ी गिरफ्त में है .यानि एक डूबने वाला दुसरे डूबने वाले का सहारा बनने को विवश है. ...'आआप' राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर दुविधाग्रस्त है लेकिन फिर भी मोदी का खेल बिगड़ गया है इतना तय है ..अब 'आआप ' के इस जनतंत्र का क्या किया जाये कि अरविन्द केजरीवाल खाप के मुद्दे पर जवाब देने से कतरा जाते हैं .प्रशांत भूषण कश्मीर के मुद्दे पर जनता की राय की तरफदारी करते हैं लेकिन केजरीवाल उसे उनकी व्यक्तिगत राय कहकर पार्टी का पीछा छुड़ा लेते हैं .योगेन्द्र यादव आरक्षण के पक्ष में बयान देते हैं तो मनीष सिसोदिया आरक्षण के विरोध में खड़े नज़र आते हैं ...लेकिन इस सब के बावजूद यदि भाजपा हैरान और परेशान है तो कौन कहेगा कि दृश्य उम्मीदों भरा नहीं है ?

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Sudha Raje

देश के लिये जरूरत पङेगी तो हम घास के बिछौने पर सोयेंगे और ज्वार बाजरा चटनी रोटी खाकर भी ।

ऐसा जासूसी और सुरक्षा संगठन बनायेंगे कि एक चिङिया भी इज़ाजत के बगैर सीमा पार करके देश में ना आ सके न कोई एक साँप गिरगिट तक यहाँ से सीमा पार इज़ाजत और जानकारी के बिना जा सके ।

देश के लिये न कोई उसूल ना कोई ईमान ना कोई हद ।

एक ही सत्य एक ही ईमान वतन मुल्क़ देश राष्ट्र और

एक राजनेता यदि मैं हू तो साम दाम दंड भेद कूटनीति राजनीति राजनय और सारी शक्तियाँ बल बुद्धि कौशल साहित्य कला तकनूक विज्ञान विपणन वाणिज्य और खेल मेल सब ।


एक ही मकसद मेरा देश आगे बढ़े अखंड हो और संप्रभु हो और कोई भी कभी भी मेरे देश को किसी भी तरह नीचा ना झुका सके ।

क़शमीर से कन्याकुमारी और इंदिरा पॉईन्ट तक ।

अरुणाचल से कच्छ रण और अंडमान निकोबार तक भारत मेरा है मेरा ईमान मेरा देश ।

देश का नेतृत्व सँभालने के बाद मेरा मेरा हर कदम एकमात्र कर्त्तव्य है देश ।

चाहे युद्ध हो या शान्ति मेरा देश ही मेरा मकसद है तब जब मैं नेता हूँ ।

इसके लिये कुछ भी त्याज्य कृत्य कर्य है

कोई अलगाव और कोई विखंडन मेरा सबसे पहला शत्रु है जब देश की बात है मैं सिर्फ भारतीय हूँ ।

©®सुधा राजे

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  • Sudha Raje and 29 others like this.

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  • Ramesh Singh heart touching comments

  • 7 hours ago · Like · 1

  • Sudhakar Singh Aap ki har soch har bhartiy ki soch ho jati to fir................

  • 6 hours ago · Like · 1

  • Punit Tripathi Well said.......

  • 5 hours ago via mobile · Like · 1

  • Sudha Raje जरूरी होने पर हर नागरिक के मौलिक अधिकारों को मुल्तवी किया जाना संभव है देश के संविधान में प्रावधान है और अगर मैं नेताशिखर हूँ तो जब जब जितनी बार देश के वास्ते जरूरी है लोगों के अधिकतम या न्यूनतम नागरिक सांपत्तिक और भ्रमण आदि के हक़ देश हित में मुल्तवी ...See More

  • 4 hours ago via mobile · Like · 1

agadishwar Chaturvedi

जवाब दो कामरेड / शमशाद इलाही अंसारी


कामरेड ! याद है तुम्हे

तुम हमें गिनाते थे

समाजवादी देशों की बढ़ती हुई गिनती


जिसे बताते हुए

चमक उठती थी तुम्हारी आँखें

तप जाता था

तुम्हारा लहजा

जोश भरे लफ़्ज़ों की आँच में


मुझे याद है तुम्हारी उद्‌घोषणा

"पूँजीवाद मर रहा है"।


कामरेड ! याद है तुम्हे

तुम मुझे दिया करते थे

रूस में छपी, मोटी-मोटी किताबें

जिनके पहले सफ़े पर लिखा रहता था

"दुनिया के मज़दूरों एक हो"


रूस घूम कर आए

पार्टी के सब बडे़ नेतागण

अपनी प्रेस-कान्फ़्रेस में

करते थे शब्द- व्यायाम

लिखते थे यात्रा-संस्मरण।


कहते थे कि रूस में

एक नये मानव का जन्म हो गया है।


तुम यह कैसे नहीं समझ पाए

कि तुम्हारे द्वंदवाद को ठेंगा दिखाते हुये

वे अजर-आर्मिनियाई ही क्यों रहे?


तुम्हे यह कैसे दिखायी नहीं पडा़ कामरेड!

कि यह कथित नव-मानव ही

सत्तर साल के बाद भी,

लेनिन की मूर्ती उखाड़ फ़ेंकेगा


वह लिख देगा

मास्को में लगी मार्क्स की मू्र्तियों पर

"दुनिया के मज़दूरों, मुझे माफ़ कर दो"


तुम्ही तो

हंगरी, चेकोस्लोवाकिया

और अफ़ग़ानिस्तान में

लहु-लुहान रूसी फ़ौजी दख़ल-अंदाज़ी को

जाएज़ बताते थे।


लेकिन, इस जन- उबाल ने

मेरी आँखों से अब

तुम्हारी कहानियों की

पट्टियाँ उखा़ड़ दी हैं।


तुम भी तो यहाँ बंगाल में

पिछ्ले चौदह सालों में

क्या दे पाये हो आवाम को?


अब मैं तुम्हारी हर हरकत और लफ़्फ़ाज़ी पर

कडी़ निगाह रखूंगा।

अपनी पैनी दृष्टि से

देखूंगा तुम्हारे आर-पार।


अब तुम पहले की भाँति

प्रश्न करने वालों को

सी०आई०ए० का एजेंट नहीं कह सकते।


इस नव-मानव से जन्मे

प्रश्नों का उत्तर

तुम्हे खोजना होगा कामरेड !


रचनाकाल : 25.09.1991 ।

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गंगा सहाय मीणा

BBC द्वारा चुने गए 2013 के दलित-आदिवासी साहित्‍य में हमारी पुस्‍तक 'आदिवासी साहित्‍य विमर्श' भी शामिल की गई है. आप सभी साथियों का बहुत शुक्रिया. सहयोगी लेखकों को हार्दिक बधाई..http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/01/140104_hindi_dalit_women_literature_rns.shtml

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जनज्वार डॉटकॉम

अब सरकार अपनी नाक बचाने के लिए हेलीकॉप्टर सौदा रद्द करे या कंपनियों को काली सूची में डाले, उसकी छवि सुधरने वाली नहीं है. हां, इस फैसले से भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की रफ्तार जरूर थमेगी. सैन्य उपकरण बनाने वाली अन्य वैश्विक कंपनियां भारत से अनुबंध करने से पहले दस बार सोचेंगी...http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-06-02/69-discourse/4668-dalali-kee-bhent-chadha-helicopter-sauda-for-janjwar-by-arvind-jaitilak

Like ·  · Share · 8 hours ago ·

Sudha Raje

Sudha Raje

बोलने का हक़??? देश के खिलाफ और

स्त्री के सम्मान के खिलाफ

किसी को नही

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Jagadishwar Chaturvedi

तुम तीनों आज कम पीना या और मँगाना / पवन करण


तुम तीनों आज कम पीना या और मँगाना

मेरे लिए, बहुत दिनों से पी नहीं मैने

आज मैं छककर पिऊँगा, लुढ़कने तक


तुम्हें क्या लगता है वे जो कहते हैं

उनके पास जो भी है सब मेरा दिया हुआ है


वे सच कहते हैं, नहीं, वे झूठ बोलते हैं

मैंने उन्हें कुछ नहीं दिया, किसी ईश्वर के पास

कुछ है ही नहीं, तो वो देगा कहां से

जिसे वे मेरा दिया कहते हैं, वो सब

तो उन्होंने तुमसे छीना है, तुम्हारी जिंदगी से

तुम्हारी ज़िंदगी उन्होंने ही चुराई है,

जब मैंने ही उन्हें दिया है तो उसमें

उनकी क्या ग़लती, अब तुम भी मांगों

बैठे रहो हाथ जोडे़, मिलना कुछ नहीं,


मैं खुद तुम्हारे आगे हाथ पसारे बैठा हूँ

घंटों वे भले ही बैठे रहते हों मेरे आगे,

मुझे दिखाई दे तब न, बजाते रहें घंटियाँ

मुझे कुछ सुनाई तो देता नहीं,

जब सांसे हीं नहीं चलतीं मेरीं, कैसी भी

बत्तियाँ जला लें, पहना लें मुझे कैसे भी

फूलों की माला क्या फ़र्क पड़ता है मुझे

अब छप्पन भोग, मैं पत्थर क्या खाऊँगा,

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गंगा सहाय मीणा

आम आदमी पार्टी विभिन्‍न विचारधाराओं से ताल्‍लुक रखने वाले लोगों का गठजोड़ है, जो भ्रष्‍टाचार के एकमात्र एजेण्‍डे पर साथ आए हैं. दिल्‍ली में गठजोड़ चल गया लेकिन हमारा अनुमान है कि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर यह नहीं चल पाएगा. कश्‍मीर पर कब तक चुप रहेंगे? कुमार विश्‍वास के स्‍त्री-विरोधी, सामंती मंचीय वक्‍तव्‍यों पर कब तक चुप रहेंगे? जाति और आरक्षण पर कब तक चुप रहेंगे? सांप्रदायिकता पर कब तक चुप रहेंगे? आर्म्‍ड फोर्सेज स्‍पेशल पॉवर एक्‍ट पर कब तक चुप रहेंगे? एनजीओ के भ्रष्‍टाचार पर कब तक चुप रहेंगे? देसी बनियों की लूट पर कब तक चुप रहेंगे? अब तो बोलना ही होगा. अपना रुख स्‍पष्‍ट करो 'आप'.

Like ·  · 8 hours ago near New Delhi ·

  • Jayantibhai Manani, 'प्रेम सिँह मीणा', Bhartiya Samanvaya Sangthan Lakshayand 90 others like this.

  • 2 shares

  • View 13 more comments

  • Ram Bahor Sahu bahut thik hi kaha sir ji

  • 7 hours ago · Like

  • Jayantibhai Manani -

  • आम आदम पार्टी का मतलब ही जनरल केटेगरी का आदमी, जो ओबीसी, एससी और एसटी की खास केटेगरी के नहीं है. केजरीवाल क्यों ख़ास आदमी पार्टी बनायेंगे? भाजपा और कोंग्रेस भी आम आदमी पार्टिया ही है. खास आदमी पार्टियो में हम डीएमके, अन्ना डीएमके, सपा, बसपा, जेडीयू, आरजेडी, अपना दल और राजापा जैसी पार्टियो को गिना सकते है.

  • मित्रो, आप क्या कहेंगे?

  • 7 hours ago · Like · 4

  • Abhishek Jain desi baniyo ne tumhara kya loot liya prof. sahib

  • 6 hours ago · Like

  • कमलाकांत यादव आदरणीय मीणा सर ,क्या अलग विचार वाले लोगों का साथ रहना हानिकारक है ? क्या इतना समय उन्हे भारतीय लोकतन्त्र में मिल चुका है कि उनकी सफलता या असफलता का मूल्यांकन किया जाये ? या किसी भी व्यक्ति को हम (व्यक्ति विशेष ) इस लिए निंदा का पात्र बनाएँ क्योंकि वो हमारे हिसाब से नहीं चल रहा है ?

  • 5 hours ago · Like · 2

Sudha Raje

Sudha Raje

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर एक

न्यूजमेकर कुछ भी बोल सकता है??? कुछ

भी???

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Jagadishwar Chaturvedi

चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया / कुँअर बेचैन


चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया

पत्थर को बुत की शक्ल में लाने का शुक्रिया


जागा रहा तो मैंने नए काम कर लिए

ऐ नींद आज तेरे न आने का शुक्रिया


सूखा पुराना ज़ख्म नए को जगह मिली

स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया


आतीं न तुम तो क्यों मैं बनाता ये सीढ़ियाँ

दीवारों, मेरी राह में आने का शुक्रिया


आँसू-सा माँ की गोद में आकर सिमट गया

नज़रों से अपनी मुझको गिराने का शुक्रिया


अब यह हुआ कि दुनिया ही लगती है मुझको घर

यूँ मेरे घर में आग लगाने का शुक्रिया


ग़म मिलते हैं तो और निखरती है शायरी

यह बात है तो सारे ज़माने का शुक्रिया


अब मुझको आ गए हैं मनाने के सब हुनर

यूँ मुझसे `कुँअर' रूठ के जाने का शुक्रिया

Like ·  · Share · 5 hours ago near Calcutta ·

Jagadishwar Chaturvedi

तू एक बार मेरे इश्क से रु-ब-रु हो जा / शमशाद इलाही अंसारी


तू एक बार मेरे इश्क से रु-ब-रु हो जा,

फ़िर ये साँस चले चले, ना चले ना सही|


तू है अगर मुझमें और मुझसे बाहर सब जगह,

फ़िर ये मेरा सर झुके झुके, ना झुके ना सही|


पीता रहूँ शराब तेरे नाम की मैं उम्र भर,

ये सिलसिला अब रुके रुके, ना रुके ना सही|


तेरी हर साँस मेरी रुह पर कर्ज़ है हमदम,

कोई इस बोझ में दबे दबे, ना दबे ना सही|


मेरी दीवानगी मेरे इश्क का सबब है "शम्स"

ये दुनिया मुझ पर हँसे हँसे, ना हँसे ना सही|

Like ·  · Share · 3 hours ago near Calcutta ·

Dilip C Mandal

भ्रष्टाचार के कारण जो लुट गए, बर्बाद हो गए, उन्हें अरविंद केजरीवाल ने शासन में आने के बाद सबसे पहले राहत दी है. फौरन कैबिनेट की बैठक बुलाई, फैसला किया और ऐलान सुना दिया. इसे कहते हैं "आखिरी आदमी" के साथ न्याय करना.....बाकी लोग अभी कतार में हैं. http://www.financialexpress.com/news/arvind-kejriwals-aam-aadmi-party-govt-simplifies-vat-filing-system-in-delhi/1214138?SocialMedia

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  • Ajit Rai, Satyendra Murli, Musafir D. Baitha and 29 others like this.

  • Vinod Kumar Bhasker AAP ka hath banio ke sath

  • 3 hours ago · Like · 4

  • Lakhvir Mall brahmn + bania = aam admi party (purana formula hai)

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  • Anil Yadav आम आदमी पार्टी!

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  • बहुजन कि आवाज अहसान फरामोष आप पार्टी कि चमचा राखी बीडला भूल गई क्या वो जिस मंगोल पुरी सीट से चुनाव जिती हे वो SC के लिये आरक्षित थी इसलिये. ये आरक्षण नही होता तो उसे केजरीवाल का कुत्ता भी नही पुचता. बाबासाहाब आंबेडकर जी ना होते तो इसे केजरीवाल घर मे झाडू पोचा करणे रखता.

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Jagadishwar Chaturvedi

देखो प्रिय जब मैं घर आऊँ तुम मुझे वो पान खिलाना / शमशाद इलाही अंसारी


देखो प्रिय, जब मैं घर आऊँ, तुम मुझे वो पान खिलाना

प्रेम की गुलकंद हो जिसमें, छिपा हो सुगंध का ख़ज़ाना।


निकल आएँ पर मेरे उड़ता फ़िरुँ मैं दसों दिशाओं में

सातों लोकों में गाता रहूँ मैं तेरे प्रेम का नया तराना।


सारे रसों का स्वाद हो, तेरा स्वाद हो उसमें सर्वोपरि

जो मै कहूँ तू वो ही करे, चले न तेरा कोई बहाना।


सखी तेरे वक्ष पर प्रेम की हो घन-घन वर्षा

फिसले तू मेरे संग, हो न कोई बैर का फ़साना।


रोप दूँ बीज तुझमें तू है धरती मेरे प्रेम की

जब खिले कोई कमल तब तू मेरा गीत सुनाना।


हर्ष के उमड़ते सागर तुझे चूमा करें रात-दिन

"शम्स"की दुआ है ये तू न उसे अब रुलाना।

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Jagadishwar Chaturvedi

मोदी से लेकर केजरीवाल तक सभी अंधलोकवाद (पापुलिज्म) के सहारे "लोक" को हाँकना चाहते हैं। इससे तंत्र के पंक्चर होने के चांस बढ़ गए हैं ।

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