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Sunday, November 17, 2013

ईश्वर को भारत रत्न और दिवंगत दलित लेखक ओम प्रकाश बाल्मीकि को घृणा अभिशाप मूर्तिपूजकों के देश में भगवान ने दिये विज्ञापन,विज्ञापनी चरमोत्कर्ष भारत रत्न इससे ज्यादा जरुरी सवाल है,जो हमारे आरटीआई कार्यकर्ताओं को अवश्य करने चाहिए,सचिन को भारत रत्न बनाने में किस कंपनी की कितनी कमाई हुई है। अउर का... तुम स्याले समझ रहे थे कि सहरुखवा चार दिन ले के टहल गया तो ध्यानचंद किसी को याद आ जाएगा. मने कुच्छौ... चक दे, बक दे. अरे पबलिक सेंटिमेंट देखो पगले. कुछ समझ नै आता है तुमको. उसको राज्यसभा लाए... अपर हाउस. परचार करेगा, ऐसा परचार भी किए. कर भी सकता है. नमक का कुछ तो मोल रखबै करेगा. खलियर हो गया है, कह रहा था कि 24 साल हो गया, अब क्या करेंगे... अरे ससुर हवन करेंगे हवन करेंगे. राजनीति यज्ञ है. आहुति देनी पड़ती है. एक गो तमगा, ऊ भी मरल ध्यानचंद पे दइ मारें. न फेडरेसन का पता, न खेल का. तुम बोलो बे, आखिरी बार हाकी कब खेले थे... अरे मारपीट तो करते रहे हो, खेले भी हो कभी कि जबरी कुछौ पेले रहोगे. बोलना है मतलब बोलना है. भांग में लगता है कोई मेन्डेक्स मिलाया है. विलियम-10 भी हो सकता है. स्याले, तब्बै आयं स

ईश्वर को भारत रत्न और दिवंगत

दलित लेखक ओम प्रकाश बाल्मीकि को घृणा अभिशाप

मूर्तिपूजकों के देश में भगवान ने दिये विज्ञापन,विज्ञापनी चरमोत्कर्ष भारत रत्न

इससे ज्यादा जरुरी सवाल है,जो हमारे आरटीआई कार्यकर्ताओं को अवश्य करने चाहिए,सचिन को भारत रत्न बनाने में किस कंपनी की कितनी कमाई हुई है।


अउर का... तुम स्याले समझ रहे थे कि सहरुखवा चार दिन ले के टहल गया तो ध्यानचंद किसी को याद आ जाएगा. मने कुच्छौ... चक दे, बक दे. अरे पबलिक सेंटिमेंट देखो पगले. कुछ समझ नै आता है तुमको. उसको राज्यसभा लाए... अपर हाउस. परचार करेगा, ऐसा परचार भी किए. कर भी सकता है. नमक का कुछ तो मोल रखबै करेगा. खलियर हो गया है, कह रहा था कि 24 साल हो गया, अब क्या करेंगे... अरे ससुर हवन करेंगे हवन करेंगे. राजनीति यज्ञ है. आहुति देनी पड़ती है. एक गो तमगा, ऊ भी मरल ध्यानचंद पे दइ मारें. न फेडरेसन का पता, न खेल का. तुम बोलो बे, आखिरी बार हाकी कब खेले थे... अरे मारपीट तो करते रहे हो, खेले भी हो कभी कि जबरी कुछौ पेले रहोगे. बोलना है मतलब बोलना है. भांग में लगता है कोई मेन्डेक्स मिलाया है. विलियम-10 भी हो सकता है. स्याले, तब्बै आयं सांय बकत हौ. सच्चिन सच्चिन सच्चिन. सच्ची कहते हैं. सही हाथ में सही माल, सही वक्त पे. चलो, पानी लइ आवौ. तखता के नीचे तांबा के लुटिया है. हां, उहै कइती. झोलिया सरौता भी लिए आओ.

उत्तराखंड:अद्याप अनेक बेपत्ता

जगातील सर्वांत उंच पुतळा गुजरातमध्ये उभारण्याच्या नरेंद्र मोदींची बरोबरी करण्यासाठी नितीश कुमार यांनी जगातील सर्वांत मोठे राममंदिर बिहारमध्ये उभारण्याचा चंग बांधला आहे.


सरकार ने हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को नजरअंदाज करते हुए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने वाले मक्त बाजार के अव्वल नंबर माडल मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की शनिवार को घोषणा कर दी।


पलाश विश्वास


कारपोरेट भारत सरकार ने लोकसभा चुनाव से ऐन पहले कारपोरेट उत्सव मध्य उत्पन सचिन महोत्सव को वोटों में तब्दील करने के लिए विश्व के सबसे महान क्रिकेट खिलाड़ी का सम्मान नहीं किया है भारत रत्न घोषित करके,बल्कि यह भारत रत्न सचिन

तेंदुलकर के साथ मजबूती के साथ खड़े रिलायंस समूह की मजबूत कारपोरेटलाबी का करिश्मा है।खेल उपलब्धि की बात है तो ध्यानचंद को भारत र्तन देने से साफ इंकार के बाद तुरतफुरत सचिन के 22 गज से रिटायर करते ही बारत रत्न की घोषणा दरअसल मुक्त बाजार और जनविरोधी आर्थिक सुधारों के अव्वल नंबर माडल का सम्मान है।विडंबना है कि विशुद्ध माडलिंग को देशभक्ति के साथ जोड़कर मूर्तिपूजा सरीखे अनुष्ठान में तब्दील कर दिया गया।


सचिनमयमीडिया समय में सोशल मीडिया न होता तो पता ही नहीं चलता हिंदी में दलित विमर्श के नायक व देश भर में विख्यात ओम प्रकाश बाल्मीकि का निधन हो गया।चचिन वंदनासे किसी को फुरसत ही नहीं है कि थोड़ी चर्चा एक अछूत लेखक की हो जाये या यह भी अस्पृश्यता का जीता जागता ताजा उदाहरण है,कहना बहुत मुश्किल है।


सरकार ने हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को नजरअंदाज करते हुए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने वाले मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की शनिवार को घोषणा कर दी।


सचिन ने मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में अपना 200वां और आखिरी टेस्ट खेलकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया। सचिन का विदाई मैच पूरा होने के कुछ घंटे बाद ही सरकार ने घोषणा कि सचिन को भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा।


सरकार ने सचिन को भारत रत्न देने की घोषणा करते हुए कहा- 'वे निस्संदेह एक अद्भुत क्रिकेटर हैं, जो अपनी शानदार उपलब्धियों से लिविंग लीजेड बन चुके हैं। सचिन ने दुनियाभर में करोड़ों प्रशंसकों को अपनी बल्लेबाजी से सम्मोहित किया है।'


सचिन को भारत रत्न देने के फैसले से खिलाड़ियों को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिलने का रास्ता साफ हो गया है। सरकार ने सचिन को भारत रत्न देने के लिए ही इस पुरस्कार के नियम में संशोधन किया था और इसमें यह बात शामिल की थी कि खिलाड़ियों को भी भारत रत्न दिया जाना चाहिए।


हालांकि केंद्रीय खेल मंत्रालय ने इस वर्ष अगस्त में सरकार को सिफारिश की थी कि हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न दिया जाए। केद्रीय खेलमंत्री जितेन्द्र सिंह ने संसद के मानसून सत्र में इस बात की जानकारी दी थी।


खेल मंत्रालय ने अपनी सिफारिश में कहा था कि वह स्वर्गीय ध्यानचंद को सचिन के ऊपर प्राथमिकता देते हुए उन्हें भारत रत्न देने के लिए सिफारिश कर रहा है।


खेल मंत्रालय ने उस समय अपनी सिफारिश में कहा था कि भारत रत्न के लिए एकमात्र पसंद ध्यानचंद ही हैं। मंत्रालय को प्रधानमंत्री कार्यालय को इस सर्वोच्च पुरस्कार के लिए सिर्फ एक नाम की सिफारिश करनी थी और उसने 3 बार के ओलंपिक स्वर्ण विजेता ध्यानचंद के नाम की सिफारिश करते हुए कहा था कि वही इस पुरस्कार के लिए एकमात्र पसंद हैं।


मंत्रालय ने कहा था- 'हमें भारत रत्न के लिए एक नाम देना था और हमने ध्यानचंद का नाम दिया है। सचिन के लिए हम गहरा सम्मान रखते हैं, लेकिन ध्यानचंद भारतीय खेलों के लीजेंड हैं इसलिए यह तर्कसंगत बनता है कि ध्यानचंद को ही भारत रत्न दिया जाए, क्योंकि उनके नाम पर अनेक ट्रॉफियां दी जाती हैं।'


हॉकी इंडिया ने भी इस वर्ष के शुरू में ध्यानचंद के नाम की भारत रत्न के लिए सिफारिश की थी। ध्यानचंद ने 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीते थे। उन्हें हॉकी की दुनिया का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी माना जाता है।


सरकार ने सचिन के लिए अपने दो नियमों में संशोधन कर डाले। पहला भारत रत्न के लिए खिलाड़ियों के वर्ग को शामिल किया जाना और दूसरा जीवित व्यक्ति पर डाक टिकट जारी करने के लिए नियमों का संशोधन।


सचिन पर वानखेड़े स्टेडियम में उनके 200वें टेस्ट के पहले दिन डाक टिकट जारी किया गया था। वे यह उपलब्धि हासिल करने वाले मदर टेरेसा के बाद दूसरे जीवित व्यक्ति बने थे। इस डाक टिकट जारी करने के 48 घंटे बाद सरकार ने सचिन को भारत रत्न देने का फैसला कर लिया।


एक बड़े लेखक और व्‍यक्ति को मेरा सलाम


नहीं रहे दलित चिंतक, नाटककार और गद्य के अप्रतिम रचनाकार ओमप्रकाश वाल्मिकी. आज सुबह देहरादून में उनका इंतकाल हो गया. हिंदी के कथाकार और उपन्यासकार ओमप्रकाश वाल्मीकि अपने लेखन में दलित विमर्श के शिखर रचनाकार हैं. अपनी आत्मकथा जूठन से देश दुनिया के लेखन जगत में चर्चा में आए वाल्मीकि ने हिंदी में दलित विमर्श को स्थापित करने में महती भूमिका निभाई.

Uday Prakash
अभी-अभी नागपुर से मराठी के चर्चित युवा कवि लोकनाथ यशवंत ने दुखद सूचना दी.
ओमप्रकाश वाल्मीकि अब नहीं रहे.

श्रद्धांजलि ! सलाम !!

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Arun Dev http://samalochan.blogspot.in/2013/11/blog-post_17.html

समालोचन: परिप्रेक्ष्य : ओम प्रकाश वाल्मीकि

samalochan.blogspot.com

13 minutes ago · Like · 1


Jai Prakash Kardam

कुछ देर पूर्व ही सूचना मिली है कि पिछले कई माह से केंसर की बीमारी से संघर्ष कर रहे प्रख्यात साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि जी ने आज सुबह देहरादून में अपने जीवन की अंतिम श्वांस ली है| हिंदी दलित साहित्य के लिए यह एक बड़ा आघात है| उनकी आत्मकथा 'जूठन' से हिंदी दलित साहित्य को जो पहचान मिली, उसके लिए वह सदैव याद किए जाएंगे| वास्तव में वह दलित साहित्य के पर्याय थे| कई दसकों से दलित साहित्य की यात्रा में हम सहभागी रहे हैं| उनका होना बहुत मायने रखता था| उनका न होना बहुत खलेगा| वरिष्ठ साथी ओमप्रकाश वाल्मीकि जी को हार्दिक श्रद्धांजलि|

Panini Anand
अउर का... तुम स्याले समझ रहे थे कि सहरुखवा चार दिन ले के टहल गया तो ध्यानचंद किसी को याद आ जाएगा. मने कुच्छौ... चक दे, बक दे. अरे पबलिक सेंटिमेंट देखो पगले. कुछ समझ नै आता है तुमको. उसको राज्यसभा लाए... अपर हाउस. परचार करेगा, ऐसा परचार भी किए. कर भी सकता है. नमक का कुछ तो मोल रखबै करेगा. खलियर हो गया है, कह रहा था कि 24 साल हो गया, अब क्या करेंगे... अरे ससुर हवन करेंगे हवन करेंगे. राजनीति यज्ञ है. आहुति देनी पड़ती है. एक गो तमगा, ऊ भी मरल ध्यानचंद पे दइ मारें. न फेडरेसन का पता, न खेल का. तुम बोलो बे, आखिरी बार हाकी कब खेले थे... अरे मारपीट तो करते रहे हो, खेले भी हो कभी कि जबरी कुछौ पेले रहोगे. बोलना है मतलब बोलना है. भांग में लगता है कोई मेन्डेक्स मिलाया है. विलियम-10 भी हो सकता है. स्याले, तब्बै आयं सांय बकत हौ. सच्चिन सच्चिन सच्चिन. सच्ची कहते हैं. सही हाथ में सही माल, सही वक्त पे. चलो, पानी लइ आवौ. तखता के नीचे तांबा के लुटिया है. हां, उहै कइती. झोलिया सरौता भी लिए आओ.

Like ·  · Share · 18 hours ago near New Delhi, Delhi ·


Afroz Alam Sahil
आज समझ में आया कि ध्यानचंद को भारत रत्न क्यूं नहीं मिला. उनके साथ राजीव शुक्ला जैसी महान राजनीतिक हस्ती नहीं थी, जिसके होते कुछ भी असंभव नहीं है. उनके साथ कोई मुकेश अंबानी जैसी ताक़त नहीं थी जो अपनी टीम के लिए ही सही, उनकी खरीद कर सकती. उनकी बोली उठा सकती… ध्यानचंद दादा किसी शरद पवार को भी नहीं जानते थे, जिसके हाथों की फिरकी महाराष्ट्र की चीनी मिलों से लेकर देश के खेत खलिहानों और खेल के मैदानों तक सबका नसीब तय कर देती.http://beyondheadlines.in/?p=19403

जानिए! ध्यानचंद को भारत रत्न क्यूं नहीं मिला? | Beyond Headlines : An attempt to 'report a cause...

beyondheadlines.in

जानिए! ध्यानचंद को भारत रत्न क्यूं नहीं मिला?Posted by: admin November 16, 2013in Lead, बियॉंडहेडलाइन्स हिन्दीLeave a commentAbhishek Upadhyay for BeyondHeadlinesआज समझ में आया कि ध्यानचंद को भारत रत्न क्यूं नहीं मिला. उनके साथ राजीव शुक्ला जैसी महान राजनीतिक हस्ती नहीं थी, जिसके होते कुछ भी असंभव न...

Share · 43 minutes ago near New Delhi, Delhi ·

Ashok Dusadh
गांधी जी किसी के लिए भारत रत्न नहीं है ? उन्हें भारत रत्न क्यों नहीं दिया गया आज तक ? एगो उनको भी दिया जाय ,हम मांग रहे है न आपको खाली सचिन कि पड़ी है !

गंगा सहाय मीणा
शुक्रिया हमारी प्रिय सरकार उस व्‍यक्ति को देश का सर्वोच्‍च सम्‍मान देने के लिए जिसने हम गंवारों को दूध/छाछ छोड़कर पेप्‍सी/कोला पीना सिखाया.

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कृपया बतायें कि जिन्हें देश राष्ट्रपिता कहता है,उन बापू ने किन किन कंपनियों के लिए विज्ञापन किये।


कृपया बतायें कि जिन बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर ने मूक भारत,बहिस्कृत भारत को अपने पांवों पर खड़ा होने के लिए भारतीय संविदान की रचना की,जाति उन्मूलन का एजंडा दिया,उनने किन कंपनियों के लिए विज्ञापन शूट किये।


कृपया बतायें कि हाकी के जादूकर ध्यानचंद,जिनने भारतीय हाकी को ओलंपिक स्वर्ण का खजाना बनाया,उनने किन कंपनियों को समर्पित की अपनी हाकी।


इस देश में पत्थर पूजने का रिवाज है।इस देश में सिनेमा के परदे से उतरकर लोग सीधे संसद में पहुंच जाते हैं बिना किसी जन सरोकार के।इस देश में धर्मस्थलों को लेकर गृहयुद्ध कभी थमता नहीं है। इस देश में तैंतीस करोड़ अलौकिक देवदेवियां हैं,इतने ही अवतार हैं और इससे कई गुणा उनके एजेंट।मूर्ति पूजकों के देश में जीते जी इंसानों को बगवान बनाकर कारोबार चलाना सबसे मुनाफेवाला कारोबार है,वह भी बिना पूंजी का।




कृपया बताये कि सचिन को भगवान बनाने के बाद भारत रत्न बनने से विकास दर में क्या इजाफा हुआ।


इससे ज्यादा जरुरी सवाल है,जो हमारे आरटीआई कार्यकर्ताओं को अवश्य करने चाहिए,सचिन को भारत रत्न बनाने में किस कंपनी की कितनी कमाई हुई है।


इसमें दो राय नहीं है कि सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट के सारे रिकार्ड ध्वस्त किये,लेकिन इससे बड़ा सच है कि उनकी आखिरी पारी पर हजारों करोड़ का सट्टा लगा और भारत को लूटने वाली कंपनियों ने उनकी विदाई को लाखो करोड़ का मार्केडिंग उत्सव बना डाला।देश प्रेम का तड़का डालने में बाजाक के दूसरे आइकनों और कारपोरेटदेशी विदेशी मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी।


मोठे राममंदिर बिहारमध्ये होणार

15 Nov, 2013, 1338 hrs IST

जगातील सर्वांत उंच पुतळा गुजरातमध्ये उभारण्याच्या नरेंद्र मोदींची बरोबरी करण्यासाठी नितीश कुमार यांनी जगातील सर्वांत मोठे राममंदिर बिहारमध्ये उभारण्याचा चंग बांधला आहे.


Samit Carr shared Devender Jatav's photo.

आज मन में बड़ा दुःख महसूस हो रहा है

जो"भारत रत्न"का सच्चा हक़दार था उसे

भारत रत्न न मिल सका । मेजर ध्यानचंद जी

जो हमारे राष्टीय खेल के महान खिलाडी थे

जिन्हें हाकी के जादूगर कहा जाता था । पर

अफ़सोस है इसके बाद भी वो हाँकी के जादूगर

ही कहलाये भारत रत्न से सम्मानित नहीं हो

पाए । क्या आप सबको लगता है कि सचिन से

पहले"भारत रत्न"मेजर ध्यानचंद जी को मिलना

चाहिए था ??"



कृपया बतायें आम भारतीय जन गण को मुक्त बाजार का उपभोक्ता बनाने के सिवाय, कांग्रेस के मनोनीत संसद सदस्य बनने के सिवाय भारतीय जनता के जीवन मरण के संघर्ष में क्रिकेट के भगवान कहां हैं।

उत्तराखंड:अद्याप अनेक बेपत्ता

17 Nov, 2013, 0120 hrs IST

केदारनाथमध्ये आलेल्या महाप्रलयानंतर अद्यापही या खोऱ्यामध्ये शेकडो मृतदेह पडून असल्याचा आरोप भारतीय जनता पक्षाने केला आहे. पाच महिन्यांचा कालावधी गेल्यानंतरही अद्याप या भागातील मृतदेह काढण्यात आले नसल्याचे उत्तराखंड विधानसभेतील विरोधी पक्षनेते अजय भट यांनी म्हटले आहे.


ভারতরত্ন পাচ্ছেন সচিন তেন্ডুলকর

|দেশের প্রথম ক্রীড়াবিদ হিসেবে ভারতরত্ন পেতে চলেছেন সচিন তেন্ডুলকর। শনিবার তাঁর অবসর গ্রহণের দিনই রাষ্ট্রপতি ভবন থেকে এ কথা জানানো হয়। এই প্রস্তাবিত সম্মান নিজের মা-কে উত্‍সর্গ করেছেন মাস্টার ব্লাস্টার।


ঈশ্বরের কান্না দেখে চোখে জল গোটা দেশের

17 Nov 2013, 09:29'ঈশ্বর' তো অনিঃশেষ শ্রদ্ধা-প্রসূত অভিধা মাত্র, কীর্তির ব্যাপ্তিতে মানুষের চূড়ান্ত লক্ষণরেখা অতিক্রান্ত বলেই তো তাঁকে 'ক্রিকেট-ঈশ্বর' বলে সম্বোধন৷

http://eisamay.indiatimes.com/


बहुजनों के विरुद्ध और उनकी आवाज उठाने वालों के विरुद्ध कितनी घृणा फैलायी जाती है,कैसे चलता है दुष्प्रचार अभियान उसका ताजा उदाहरण सचिन को भारत रत्न के मौके पर दलित लेखक ओम प्रकाश बाल्मीकि के देहांत पर यह निर्मम टिप्पणी है,


Deena Ghanghoriya
शूद्र लेखक "ॐ प्रकाश बाल्मीकी" आज मर गए , हिन्दू धर्म के खिलाफ बहुत जहर उगला, नरक मे भी जगह नहीं मिलेगी , राम नाम सत्य कहकर उनका जुलूस निकला जाएगा और हिन्दू शमशान गृह ने उनका दाह संस्कार हिन्दू रीति रिवाज से होगा । ऐसे लोगो की लाश कुत्तो और छील कोवे के काम आना चाहिए ।

H L Dusadh Dusadh
नहीं रहा हिंदी दलित साहित्य का पहला सुपर स्टार
मित्रों,कुछेक घंटे पूर्व एक अविश्वास्य एसएमएस डॉ सुनील कुमार 'सुमन' के तरफ से मिला जिसमे लिखा था ,'सुप्रसिद्ध दलित साहित्यकार ओम प्रकाश वाल्मीकि नहीं रहे.थोड़ी देर में वैसा ही एक और एसएमएस चर्चित दलित साहित्यकार शीलबोधि का मिला.इसकी पुष्टि के लिए जब शीलबोधि और सुमन जी को फोन लगाया तो वे स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं बता पाए .किन्तु थोड़ी देर बाद जब फेसबुक खोला,मानना पड़ा वाल्मीकि जी रहे.मित्रों,राजेन्द्र यादव के पीछे वाल्मीकि जी का जाना बहुजन साहित्य के लिए अत्यंत आघातजनक घटना है.मुझे यह कहने में कोई द्विधा नहीं कि राजेन्द्र जी के बाद हमने बहुजन साहित्य की दूसरी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा खो दी.वाल्मीकि जी स्वधीनोत्तर भारत के दलित साहित्य के पहले सुपर स्टार रहे.बांग्ला साहित्य से प्रभावित मुझ जैसे असाहित्यिक व्यक्ति के लिए हिंदी साहित्य भारी उपेक्षा का विषय रहा.किन्तु ओम प्रकाश वाल्मीकि की 'जूठन' ने अविस्मर्णीय प्रभाव छोड़ा.जूठन हिंदी पट्टी की पहली ऐसी रचना थी जिसे पढ़कर बार-बार मेरी पलकें भींगी.निश्चय ही बाद में प्रो.तुलसीराम की आत्मकथा ने विस्मित किया, किन्तु जूठन का भाव पक्ष सर्वाधिक मार्मिक लगा.उनके साहित्य में भाव और कला पक्ष का जो मेल रहा ,वह अद्भूत है .मुझे नहीं लगता आने वाले कुछ वर्षों तक कोई अन्य दलित साहित्यकार इस मामले में उन्हें चुनौती दे पायेगा.ऐसे बेमिसाल साहित्यकार को कोटि-कोटि नमन.

  1. Om Prakash Valmiki - Wikipedia, the free encyclopedia

  2. en.wikipedia.org/wiki/Om_Prakash_Valmiki

  3. Om Prakash Valmiki (ओमप्रकाश वाल्मीकि) was a Dalit writer and poet. well known for his autobiography, Joothan, considered a milestone in Dalit ...

  4. ओमप्रकाश वाल्मीकि / Om Prakash Valmiki | Pratilipi

  5. pratilipi.in/om-prakash-valmiki/

  6. Omprakash Valmiki, a leading Hindi Dalit writer and author of the celebrated autobiography Joothan (1997) has published three collection of poetry –

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  9. Joothan - A Hindi Book by - Om Prakash Valmiki - जूठन ...

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  12. Title: Joothan, Author: Om Prakash Valmiki, Hindi Title: जूठन, Hindi Author: ओमप्रकाश वाल्मीकि, Language: Hindi, Length: 160 Pages.

  13. Paccis cauka derh sau by Omprakash Valmiki, introduction and ...

  14. www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/.../paccis_cauka_derh_sau.htm

  15. by Omprakash Valmiki. Post-Independence short-story writing opened the way for Dalits (formerly known as "untouchables" or "Harijans") to write stories from ...

  16. Dalit Writing: Om Prakash Valmiki's Joothan A Dalit Autobiography

  17. dalitwriting.blogspot.com/2010/.../om-prakash-valmikis-joothan-dalit.ht...

  18. Jul 22, 2010 - Om Prakash Valmiki's JOOTHAN - A Dalit Autobiography Autobiography has been a favourite genre of Dalit writers. This is not surprising, ...

  19. Omprakash Valmiki | Tehelka.com

  20. www.tehelka.com/tag/omprakash-valmiki/

  21. Post Tagged with: "Omprakash Valmiki". Culture · Is That a Fish in Your Indian Ear? Is That a Fish in Your Indian Ear? by Nisha Susan. What would India be like ...

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  25. Om Prakash Valmiki reciting his poetry- (Part 1) - YouTube► 6:16► 6:16

  26. www.youtube.com/watch?v=pf0lkNpC9bE

  27. Apr 13, 2012 - Uploaded by Dina Nath

  28. Om Prakash Valmiki reciting his poetry- (Part 1) - YouTube / Subscribe 22 / Changes to YouTube ...

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साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि का देहरादून के एक अस्पताल में निधन हो गया। वे 67 साल के थे। ओमप्रकाश वाल्मीकि पिछले कुछ समय से पेट के कैंसर से पीड़ित थे और कुछ दिन पहले उन्हें भर्ती कराया गया था।


ओमप्रकाश वाल्मीकि(1950) का जन्म ग्राम बरला, जिला मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनका बचपन सामाजिक एवं आर्थिक कठिनाइयों में बीता। पढ़ाई के दौरान उन्हें अनेक आर्थिक, सामाजिक और मानसिक कष्ट झेलने पड़े। वाल्मीकि जी कुछ समय तक महाराष्ट्र में रहे। वहां वे दलित लेखकों के संपर्क में आए और उनकी प्रेरणा से डॉ. भीमराव अंबेडकर की रचनाओं का अध्ययन किया। इससे उनकी रचना-दृष्टि में बुनियादी परिवर्तन हुआ।


देहरादून स्थित आर्डिनेंस फॅक्टरी में एक अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। हिन्दी में दलित साहित्य के विकास में ओमप्रकाश वाल्मीकि की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने अपने लेखन में जातीय-अपमान और उत्पीड़न का जीवंत वर्णन किया और भारतीय समाज के कई अनछुए पहलुओं को पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया।


वे मानते थे कि दलित ही दलित की पीडा़ को बेहतर ढंग से समझ सकता है और वही उस अनुभव की प्रामाणिक अभिव्यक्ति कर सकता है। उन्होंने सृजनात्मक साहित्य के साथ-साथ आलोचनात्मक लेखन भी किया। उनकी भाषा सहज, तथ्यपरक और आवेगमय थी। उसमें व्यंग्य का गहरा पुट भी दिखता था। नाटकों के अभिनय और निर्देशन में भी उनकी रुचि थी।


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आत्मकथा 'जूठन' के कारण उन्हें हिन्दी साहित्य में पहचान और प्रतिष्ठा मिली। उन्हें सन् 1993 में डॉ. अंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार और सन् 1995 में परिवेश सम्मान से अलंकृत किया गया।


उनकी प्रमुख रचनाएं - सदियों का संताप (1989), बस्स, बहुत हो चुका (1997), अब और नहीं (2009) (तीनों कविता-संग्रह)। जूठन (1997, आत्मकथा), सलाम (2000)¸घुसपैठिए (2004) (दोनों कहानी-संग्रह), दलित साहित्य का सौंदर्य-शास्त्र (2001, आलोचना), सफ़ाई देवता (2009, वाल्मीकि समाज का इतिहास)।


जाहिर है कि यही घृणा सामाजिक वैषम्य मूर्तिपूजक मृत्यु उपत्यका में निरंतर जारी असुर महिषासुर वध के धर्म क्रम की नींव है और मानवताविरोधी प्रकृतिविरोधी पर्यावरण विरोधी युद्ध अपराधियों को,बाजार के महानायकों को राष्ट्रनेता बनाने की पूंजी है।


हम एक कारपोरेट घराने के राष्ट्रीय दैनिक में 22 साल से काम कर रहे हैं।शुरु के दिन से संस्करण निकालते रहे हैं। लेकिन बंगाल में सवर्ण वर्चस्व की वजह से उत्तर भारत की गाय पट्टी में मुख्य पदों पर रहने के बावजूद छह महीने तक लटकाये जाने के बाद उन महान प्रभाष जोशी, जिनके आश्वासन के भरोसे बिना नियुक्ति पत्र हम कोलकाता चले आये,उनने हमें सब एडीटर का बैक डेटेड नियुक्तिपत्र थमा दिया क्योंकि कोलकाता में सारी नियुक्ति सारस्वत ब्राह्मणी कसौटी के मुताबिक जोशी जी के एक विख्यात समाजवादी मित्र की सिफारिश से हुई आईएएश जैसी परीक्षा के बावजूद।मैं बिना सिफारिश कोलकाता पहुंचा था।मेरा कोई गाडफादर नहीं था।संपादकीय विभाग में उन समाजवादी गांधीवादी महान विचारक ने मुझसे मिलते ही प्रभाष जी से कहा कि ये तो बंगाली शरणार्थी हैं,हम इन लोगों को जानते हैं। ये अस्पृश्य नमोशूद्र हैं। हमारे दिग्गज पत्रकार सहकर्मियों तब हमें बांग्लाभाषी और हिंदी में घुसपैठिया करार देते हुए हमारे विरुद्ध तबतक लगातार हिंदी अस्मिता का अभियान चलाते रहे, जबतक न प्रोमोशन उन्हीं समाजवादी विचारक के इशारे पर हो नहीं गये। हमारे तमाम कारपोरेट मैनेजर तब भी ब्राह्मण थे और वे अचंभे में थे,एक नमोशूद्र कैसे संस्करण निकाल सकता है।


दिलीप मंडल और सुमंत भट्टाचार्य टाइम्स आफ इंडिया से प्रशिक्षण पाकर सबसे जूनियर थे।तब कोई पद न था समाचार संपादक और संपादक के अलावा। वेतनमान में चार लोग सबसे सीनियर थे। मेरे अमर उजाला के मूल वेतन में तीन सौ रुपये की कटौती करके मुझे सीनियर ग्रुप में रखा गया।जो आहिस्ते आहिस्ते जूनियर होता गया और बाकी लोग हमारे ऊपर चढ़ा दिये गये।अमित प्रकाश सिंह हमारे पुराने परिचित थे। अमित जी को ऐसे घेरा गया और ऐसी घेराबंदी की गयी कि हम दोनों में सबसे ज्यादा ठन गयी। हमारा जो हुआ सो हुआ,इस दुश्चक्र में और हमारी उनसे चली दुश्मनी के चलते हमारे जामाने के सबसे होनहार समाचार संपादक जिन्हें यह तमीज थी कि किसकी क्या क्षमता है,उसके मुताबिक काम लिया जाये,सामने से नेतृत्व देने की क्षमता थी,एक राजपूत और एक अस्पृश्य को लड़ाकर भारत को एक बेहतरीन संपादक से वंचित करा दिया गया।त्रिलोचन जी के भी कान भरे गये। जो उनसे मेरे संबंध शुरु में थे,बाबा नागार्जुन,विष्णु चंद्र शर्मा और विष्णु प्रभाकर जी जैसे लोगों की तुलना में बेहद आत्मीय और हमसे उनकी लगातार सात आठ घंटे बात भी हुई और हालत यह हुई कि हमें इसका अंदाजा बहुत बाद में लगा कि हम जो सबसे बेहतरीन मित्र हो सकते थे,एक दूसरे के खून के प्यासे हो गये थे सिर्फ पत्रकारिता में दोनों को हाशिये पर धकेले जाने के सुनियोजित षड्यंत्र के तहत।मुझे अफसोस है कि त्रिलोचन जी अमितजी के यहां निरंतर आते रहे और चूंकि अमित जी से बोलना चालना तक बंद था,इसलिए त्रिलोचन जी से मैं कुछ भी सीख नहीं सका।अमित जी मेरे पारिवारिक पृष्ठभूमि से भी परिचित हैं और मैं उनके पारिवारिक पृष्ठभूमि से।हम लोग मेरे छात्र जीवन से जब वे इंदौर में नयी दुनिया में थे,तब से मित्रवत थे।मंगलेश डबराल और वीरेनदा हमलोगों के साझा मित्र थे,लेकिन घृणा का रसायन ऐसा कि हम दोनों जनसत्ता में एक दूसरे को तहस नहस करने में ही लगे रहे

। हम लोगों का जो हुआ सो हुआ, अखबार के भी बारह बज गये।मुजे अफसोस है कि त्रिलोचन जी पर मैंने एकमात्र आलेख उनके मृत्यु के बाद लिखा। घृणा की यह परिणति।


ओमप्रकाश बाल्मीकि, नामदेव धसाल,दया पवांर, मनोरंजन व्यापारी, बेबी हालदार,कंवल भारती की संघर्ष यात्रा में कहीं न कहीं हिस्सेदार हूं,तो जाहिर है कि हमारी लाश से चील कुत्तों की दावत देने की तैयारी भी होगी।


हमने जनसत्ता में रहते हुए, मजे की बात है, जनसत्ता कोलकाता में जो भी कुछ लिखा, वह अमित प्रकाश सिंह के एसाइनमेंट पर ही।अमितजी में खूबी यही थी कि वे पूरे पेशेवर थे और अच्छी तरह जानते थे कि किससे क्या काम लेना है। हमें हमारे मित्रों ने तब समझाया था कि अमित जी ही सबसे बड़े दुश्मन हैं और अमित जी को बी यही बताया गया होगा। जिन लोगों का पक्ष अमितजी लगातार लेते रहे,एक एक करके उन सबने अमितजी की जमकर फजीहत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सिवाय हमारे दिनमान जमाने के अछूत साथी गंगा प्रसाद के। मजे की बात है कि वे अमितजी के साथ थे और इसी लिये सारस्वत समुदाय ने लगातार मुझसे इम्पैक्ट रपट लिखाकर एकमुश्त अमितजी और गंगा प्रसाद को कोलकाता से रवाना करा दिया।


बाकी दिल्ली में मंगलेश डबराल के रहने के बावजूद,जिन्होंने इलाहाबाद में मेरी कड़की के दिनों में मेरी भरपूर मदद की और अमृत प्रभात में मेरी कहानियां तक छापते रहे,मेरा कुछ भी नहीं छपा।सिर्फ एकबार कोलकाता में विष्णु प्रभाकर जी से मेरी जो अंतरंग वार्ता कोलकाता संस्करण में छपी, जनसत्ता दिल्ली में अंदर के पेज पर पूरा पेज विज्ञापने के मध्य बाकायदा फीलर बतौर छपा। मेरे दो कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। कोलकाता के ही साथियों की किताबों की कई कई दफा समीक्षा जनसत्ता के रविवारी में छपी,मेरी किताबों का कभी उल्लेख तक न हुआ।


सोशल मीडिया न होता तो अबतक बतौर लेखक मेरी तो सद्गति हो चुकी होती।


लेकिन मेरे बहुजन मित्र भी घृणा अभियान में पीछे नहीं हैं। जाति उन्मूलन के एजंडे को बाबासाहेब के तिरोधान के बाद अंबेडकरी आंदोलन ने तिलांजलि दे दी।बहुजन मूलनिवासी आंदोलन भारतीय कृषि समाज के मुक्तिकामी जनसंघर्ष के लिए राष्ट्रीय जनांदोलन बनने के बजाय सत्ता में भागेदारी के लिए जाति अस्मिता का पर्याय बन गया। सांस्कृतिक आंदोलन संतों,महापुरुषों का नाम जापते हुए सिर्फ शासक जाति को गाली गलौज करते हुए आजादी के लिए संसाधन जुटाने खातिर आरक्षित कोटे से नौकरीशुदा लोगों के भयादोहन, बेहिसाब नरंकुश अनिवार्यफंडिग बनकर रह गया। जिन्हें कैडर । बताया जाता रहा वे मसीहा संप्रदाय के झोला ढोने वाले बनकर रह गये। कैडर कैंप एकतरफा मनोरंजक प्रवचन। कैडरों को जन जागरण में लगाने के बजाय,आम जनता की तकलीफों और उनके मुद्दों को लेकर जनसंघर्ष में उतारने के बजाय हर कार्यक्रम के लिए अनिवार्य निश्चित झोली भरवने के काम लगा दिया गया। समर्थन की भी अनिवार्य शर्त फंडिग हो गयी।


जो ईमानदार कार्यकर्ता मिशन को समर्पित थे,सच्चे मायने में बाबासाहेब के अनुयायी थे या फिर मान्यवर कांसीराम जी के,उनको एक एक करके किनारे कर दिया गया।कैडरों के लिए काम यह मुख्य बन गया कि एक दूसरे की खुफिया निगरानी करो।एक दूसरे कि खिलाफ आरोप गढ़ो।जो भी सवाल उठाये वह ब्राह्ममों का दलाल या ब्राह्मण। ब्राह्मण महास्त्र से अटूट आस्था और मसीहा निर्माण संस्कृति।


न बाबा साहेब की विद्वता और न गौतम बुद्ध के शील, न निरंतर संवाद की उनकी परिपाटी और न वह प्रखर विचारधारा और जनमुक्ति की प्रतिबद्धता, सारे के सारे स्वयंभू गौतम बुद्ध और सारे के सारे स्वयंभू अंबेडकर।


अब बताइये कि गौतम बुद्ध ने कहां क्या संसाधन निर्माण के जरिये अपने लिए अकूत संपत्ति अर्जित की।


अब बताइये कि बाबा साहेब अंबेडकर ने कब कितनी फंडिग की और फंडिग बाध्यता करते हुए बहुजन आंदोलन की सीमाएं बांध दी।


लोग अपने अवैध यौनाचार तक को बाबा साहेब की वृद्दावस्था में किये विवाह से जोड़ने लगे हैं।


अब कार्यकर्ताओं की औकात यही है कि बहुजन साहित्य के नाम पर मसीहा विशेष के प्रवचन के कैसेट सुनो,उनके प्रवचन समृद्ध वैकल्पिक सूचना रहित भषणमय अखबार बेचो, उनहींके प्रवचनों से तैयार साहित्य पढ़ो और फंडिंग के मिशन पर निकलो।


रिजर्व बैंक की अनुमति के बिना ईसीएस से  व्यक्ति विशेष के नाम डायवर्ट हो जाने वाले संगठन के व्यक्तिगत खातों में डोनेशन जमा होते रहे।


आयकर रिटर्न दाखिल किये बिना बेहिसाब चल अचल संपत्ति जमा की जाती रही।


हालत यह हुई की जब मुंबई में सालाना प्रति व्यक्ति करोड़ दो करोड़ फंडिंग करने वालों ने हिसाब मांगा,तो जवाब देने के बजाय एक के बाद एक मुंबई यूनिट तीन तीन बार भंग कर दी गयी। बाकी यूनियों में यह दम तो कभी हुआ ही नहीं कि फंडिंग का पैसा कहां गया पूछते।


अब जब हमलोग देशभर के कार्यकर्ता नये और पुराने बिन संसाधन जोड़े,बिना फंडिंग की बाध्यता के सिर्फ गौतम बुद्ध,बाबासाहेब और मान्यवर कांशी राम जी के विचारों के तहत अंबेडकरी मिशन को पुनर्जीवित करने लगे हैं तो सारे सक्रिय कार्यकर्ताओं के खिलाफ संगठित कैडर घ-मा अभियान जारी है कि हम लोग कारपोरेट दम पर खड़े हैं।


हम चल अचल संपत्ति का निर्माण नहीं कर रहे हैं और न मनोरंजन कार्यक्रम चला रहे हैं और न मेला और पिकनिक हमारा मकसद है।जनांदोलन और जनसंघर्ष फंडिग से चलते हैं, अगर दुनिया के लोगों ने यही सोचा होता तो कहीं कोई क्रांति होती ही नहीं। भारत भी बौद्धमय न होता कभी।


लखनऊ में मायावती के वोटबेंक को तहस नहस करने के इरादे से लोकसभा चुनाव से पहले जनांदोलनकारी संगठन का पार्टीबद्ध सम्मलन किसके हित साधन के लिए हैं, साबित करने की जरुरत नहीं है।


ओबीसी गिनती के बहाने संघ परिवार गठबंधन के मुखिया के साथ और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व के लिए राजकीय संसदीय आवास में महायज्ञ करानेवाले कैप्टेन जयनारायण निषाद के साथ राजधानी नयी गदिल्ली और देशभर में रैलियां करनेवाले लोग ब्राह्मण जाति के खिलाप यकीनन होगें,लेकिन ब्राह्मणवादी मनुस्मृति कारपोरेट व्यवस्था को मजबूत करने में निर्णायक भूमिका उन्हींकी है।


इसके उलट वे बार बार अनर्गल तमाम ईमानदार कार्यकर्ताओं को संघी,ब्राह्ममों का दलाल, कारपोरेट बंधु सिद्ध करने में सारे संसाधन लगा रहे हैं,शायद दूसरी आजादी से तात्पर्यइसी घृमा अभियान का ही हो।


हमें पैसे की जरुरत इसलिए नहीं हैं कि हम तृणमूल स्तर तक संगठन को संस्थागत बना रहे हैं। वित्तीय गतिविधियां व्यक्तिकेंद्रिक नहीं होंगी, महकमा,जिला, राज्य,जोनल और राष्ट्रीयसत्र तक महज दो साल के लिए चुनी हुई वित्तीय समितियों के मातहत होंगी।आंदोलन में शामिल होने के लिए फंडिंग की बाध्यता हमने खत्म की है,लेकिन राजनीतिक कारपोरेट फंडिंग के लिए पूना पैक्ट की अब तक घोषित दलालों और भड़वों की जमात में हम शामिल नहीं हो रहे हैं और न हममें से कोई चुनाव लड़ रहा है।संस्थागत संगठन के लिए फंडिंग भी संस्थागत होगी और समर्थ कार्यक्रता अब तक का खर्च जैसा खुद अपनी जेब काटकर चला रहे हैं,वैसे ही चलायेंगे।समर्थ समर्थकों का योगदान जुर लिया जायेगा। लेकिन असमर्थों को आंदोलन से बाहर करने के लिए फंडिंग की अनिवार्यता नहीं होगी और न न्यूनतम खर्च चलाने के लिए हमें कारपोरेट मदद की जरुरत है। बिना शर्त कारपोरेट कंपनियां हमें सचिन तेंदुलकर की तरह प्रायोजित कर सकती हैं,यह हममे से कोई सपने में भी सोच नहीं सकता। हमारे साथ खड़ा होने में कारपोरेट जगत का भला कैसे हो सकता है,जब तक हम लोग संगठन में थे तबतक हमारे मित्र बने रहे लोग हमारे विरुद्ध जारी इस अभियान में इसका खुलासा भी करते रहें तो शायद पैसे की किलिलत से हम बच सकें।


हमारे राष्ट्रीय सम्मेलन यानी पटना में 25 नवंबर से 29 नवंबर तक आयोजित हो रहे कार्यक्रम में किसी ताम झाम का इंतजाम नहीं है और न सपरिवार लाखों का मजमा मनोरंजन कार्यक्रम के मार्फत धन वसूली का कार्यक्रम है यह। कार्यक्रम में भाग लेने वाले लोग अपना अपना खर्च खुद वहन करेंगे। जिनकी संवाद में दिलचस्पी हैं औरर जो संवाद में समर्थ हैं,महज उन्ही लोगों का राष्ट्रीय सम्मेलन है।प्रतिबद्ध ईमानदार कार्यकर्ताओं के संगठन को संस्थागत और लोकतांत्रिक बनाने का कार्यक्रम है यह।बहिस्कृत भारतीयसमाज के नायकों महानायकों और सामान्य कार्यकर्ताओं,ओम प्रकाश बाल्मीकि जैसे संस्कृतिकर्मियों के अवदान का स्मरण करने का अवसर है यह।


फिरभी जैसे कि हमारे विरुद्ध अनवरत प्रचार हैं कि हम कारपोरेट हित साध रहे हैं,उनके इस प्रचार से कारपोरेट लोग अगर हमारी मदद करने को तैयार हैं,तो हम इस दुष्प्राचार और अपने पीछे छूट गये पुरातन मित्रों का आबार ही मानेंगे।


निजी तौर पर देश विदेश में सर्वत्र मेरे असंख्य मित्र हैं। राजनीति में पेशे की वजह से कुछ,छात्र जीवन की मित्रता की वजह से कुछ और, पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से उनसे ज्यादा परिचित राजनीति में भी हैं,लेकिन आजीवन पत्रकार रहने के बावजूद आजतक किसी कारपोरेट कार्यक्रम में गया नहीं हूं।अपने कार्यकारी संपादक से न मिलता हूं और न फोन पर कभी उनसे बात होती है। अपनी कंपनी के कारपोरेट अफसरान मुझसे सौ हाथ दूर ही रहते हैं, वजह खास मित्रों को मालूम भी हैं। मेरा आजतक कोई रकारपोरेट मित्र नहीं हैं। हैं तो बतायें ताकि इसका कोई लाभ तो हमें मिले।दो साल में रिटायर होना है।पेंशन दो हजार से ज्यादा नहीं।पति पत्नी दोनों शुगरिये। सविता तो इनसुलिन पर है। बेटा फ्रीलांसर।उत्तराखंड में घर है।थोडी साझा जमीन है,माता पिता की मृत्यु के बाद अब तक हमने उसका बंटवारा नहीं किया है जो घर में रहेंगे, उनके काम आयेगा,पारिवारिक सहमति है।तकालेज से निकलने के बाद भूखों मरने की नौबत होने की हालत में भी,पत्नी की ओपन हर्ट सर्जरी की दशा में भी हमने न परिजनों को कभी सूचित किया है और न उनसे मदद ली है। सही मायने में हम परिवार के लिए अपने इस अड़ियल रुख के कारण आजतक कुछ भी नहीं कर सकें। मेरे पितातो जमीन जायदाद बेचकर आंदोलन करते रहे। मेरे नाम से चल अचल संपत्ति कुच भी  नहीं है।इसलिए अपने अपढ़ पिता के चरण चिन्ह पर चलने कीयोग्यता भी नहीं है हमारी।


मुझे कोई मुगालता नहीं है। मैं अपने को न पत्रकार मानता हूं पेशेवर पत्रकारिता में जिंदगी खपाने के बावजूद क्योंकि हमने पी साईनाथ जैसे मित्र की तरह कोई बुनियादी काम नहीं किया है पत्रकारिता में।हमारी पत्रकारिता पहले क्लर्की थी अब पेज मेकिंग,एड फिक्सिंग और फीलर जुगाड़ तक सीमाबद्ध है वर्षों से। हम साहित्यकार नहीं है और न हमारी कोई कालजयी रचना है।इस समाज में दरअसल हमारी तुच्छातितुच्छ कोई भूमिका ही नहीं है सिर्फ धरती पर बोझ बनने के सिवाय।जाहिर है कि हम भारत रत्न सचिन तेंदुलकर नहीं है।हमने देश का मनोरंजन भी नहीं किया न हमरने कोई रिकार्ड तोड़ा है कि लोग हमें याद करें।हम अपने परिजनों और रिश्तेदारों के काम नहीं आ सकें।रिश्तेदारों के अमोघ प्रश्नों और उनकी अपेक्षाओं के मद्देनजर मां की मृत्यु के बाद जब घर में मेरे मां बाप,चाचा चाची,ताऊ ताई अब कोई नहीं है,सिर्प हमसे छोटे दे भाई पद्म लोचनऔर फंचानन हैं,जो कमोबेश पत्रकार हैं, अपने बचपन के मित्र और गांव के बुजुर्ग एक एककर लापता हो रहे हैं,मैं बसंतीपुर भी बरसों से नहीं जा रहा।


ओम प्रकाश बाल्मीकि का हिंदू रीति रिवाज से अंतिम संस्कार हुआ और कोई जरूरी नहीं कि मेरा संस्कार भी वैसे ही हों, मेरे परिजन नहीं, मेरे आंदोलन के साथी ही तय करेंगे,जैसे मेरे पिता का अंतिम संस्कार आंदोलन के उनके साथियों ने किया और मौके रपर मैं उनका कुपुत्र हाजिर भी न था।मैं कोलकाता में था और गांव तक जाने के लिए मेरे पंख नहीं थे।


अगर चील कौओं से नोंचवाकर ओम प्रकाश बाल्मीकि की सद्गति करने की अधूरी इच्छा मेरी सद्गति से पूरी होती हो,तो मेरी आत्मा अगर है कोई,उसे खुशी होगी।

विनम्र निवेदन सिर्फ इतना है देशवासियों कि हम जैसे तुच्छातितुच्छ हों या हो कोई समुदाय विशेष, हिचलरी विशुद्ध रक्त सिद्धांत के तहत अराजक हिंसक फासीवादी घृमा अभियान के बजरिये देश तोड़ने के बजाय हम अपनी पूरी ताकत इस खंडित देश को जोड़ने में लगाये,खंड विखंड वजूद के संकट से जूझ रहे जन गण को एक जुट करने में लगाये तो शायद सही मायने में कभी न कभी भारत निर्माम हो ही जाये मुक्तबाजार के इस महातिलिस्म को तोड़कर।

Lenin Raghuvanshi
RIP Shri Om Prakash Valmiki. It is great loss.
His writing Joothan inspired me,changed and made me humane to start reconciliation initiative against caste system.


From his writing Joothan: (from wall of Ashish Singh:https://www.facebook.com/ashish.tiss?fref=ts):

Sukhdev Singh Tyagi's daughter was getting married. My mother used to clean their place.
Starting ten to twelve days before the wedding, my parents had been doing all sorts of work at Sukhdev Singh Tyagi's home . . . The barat [guests who formed the bridegroom's party] was eating. My mother was sitting outside the door with her basket. I and my younger sister Maya sat close to my mother in the hope that we too would get a share of the sweets and the gourmet dishes that we could smell cooking inside.
When all the people had left after the feast, my mother said to Sukhdev Singh Tyagi as he was crossing the courtyard to come to the front door: 'Chowdhriji, all of your guests have eaten and gone . . . Please put something on the pattal [leaf plate] for my children. They too have waited for this day.'

Sukhdev Singh pointed at the basket full of dirty pattals and said, 'You are taking a
basketfull of joothan. And on top of that you want food for your children. Don't forget your place, Chuhri. Pick up your basket and get going.'
Those words of Sukhdev Singh Tyagi penetrated my breast like a knife. They continue to singe me to this day. That night the Mother Goddess Durga entered my mother's eyes. It was the first time I saw my mother get so angry. She emptied the basket right there. She said to Sukhdev Singh, 'Pick it up and put it inside your house. Feed it to the baratis [bridegroom's guests] tomorrow morning.' She gathered me and my sister and left like an arrow. Sukhdev Singh had pounced on her to hit her, but my mother had confronted him like a lioness. Without being afraid.

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Himanshu Kumar
क्रिकेट के बारे में तो मैं इतना ही जानता हूँ कि इसमें होने वाले गोल को रन कहते हैं। बाकी मैं क्रिकेट की चर्चा में इसलिए चुप रहता हूँ कि कहीं मेरी ज़हालत की पोल ना खुल जाय।


हमारे मित्र दिलीप मंडल की इस टिप्पणी पर जरुर गौर कीजिये।

Dilip C Mandal
भारत रत्न ने कहा
इस कंपनी का जूता पहनो,
चैंपियन बन जाओगे
यह एनर्जी ड्रिंक्स पी लो,
तगड़े बन जाओगे,
यह कोल्ड ड्रिंक्स पी लो,
मस्त बन जाओगे...

नॉर्मल साउंड करता है क्या?

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Himanshu Kumar
सोनी सोरी और लिंगा कोड़ोपी को छत्तीसगढ़ पुलिस ने साढ़े नौ बजे निज़ामुद्दीन वेस्ट थाने में लाकर बैठा दिया है। पुलिस वाले उसे अभी कहीं जाने नहीं दे रहे हैं। पुलिस का कहना है कि जब एसएचओ साहब आयेंगे तब ये दोनों यहाँ से जा सकते हैं। और एसएचओ साहब राहुल गांधी की बंदोबस्त ड्यूटी में गए हुए हैं। छत्तीसगढ़ पुलिस का यह भी कहना है कि पुलिस इसके बाद इन दोनों की मेडिकल जांच भी करवाएंगे तब सोनी सोरी और लिंगा कोड़ोपी को हमें सौंपा जाएगा ।

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Sachin Tendulkar rules online marketing ahead of farewell Test

CNN-IBN | Nov 13, 2013 at 11:24am


Sachin's retirement has definitely become a mega marketing event for the online players as they try to woo Sachin fans with an array of products.
http://ibnlive.in.com/videos/cricketnext/433852/sachin-tendulkar-rules-online-marketing-ahead-of-farewell-test.html

Sachin Tendulkar's farewell Test series caricatures the most enduring marketing machine of Indian sports

By Rohit Bansal

Last updated : 2013-11-02 10:33:01


Sachin Tendulkar played his last Ranji Trophy match for Mumbai against Haryana at Lahli © PTI

By Rohit Bansal


The story goes that free passes for Sachin Tendulkar's last Ranji Trophy match, largesse from Haryana Chief Minister Bhupinder Singh Hooda to his political clientele, have been freely traded for cash.


Some went for Rs 10,000 apiece.


Are you surprised therefore that the Lahli Stadium emptied no sooner the master took just seven balls to be bowled by rookie Mohit Sharma on Sunday?


Lahli was all about being seen when Tendulkar was batting and very little to do with the game going on inRanjitsinhji's name. Yet, Tendulkar has had this tryst with marketing moolah.


So here he is, as this column is being written, in the fag end of "autumn," refusing to get bowled in the second innings, unbeaten on 55, hoping to bat through Mumbai's victory on Wednesday (October 30).


Euphoria is already being orchestrated by his social media minders, including whispers that he reconsiders his retirement.


Truth be told, whatever Tendulkar may or may not have done in the Ranji match, there are sharks in his team who are out to squeeze the lemon. They're no different than his political gurus, who after securing him a Rajya Sabha seat and an out-of-turn house in Lutyens' Delhi, have designs (in-my-humble-opinion, suicidal) to parade the man in Rahul Gandhi's rallies!


This politico-marketing mafia doesn't care how much pulp is left in the lemon, at least by Tendulkar's own exalted standards. So they are pitching the forthcoming Test match series against the West Indies as a blockbuster for StarSports.


One can't grudge the bonanza to Star India CEO Uday Shankar: he was prescient to have the rights to India playing at home. So if the Board of Control for Cricket in India (BCCI) and Tendulkar got together and cancelled an overseas tour just to create an unprecedented farewell series, Shankar can only be guilty laughing his way to the bank. (Star holds title sponsorship rights to the series. It is supposed to have acquired the rights at the base price set by the cricket board at Rs 2 crore per match. For the broadcast rights, it pays Rs 38 crore for a single match.)  


If we believe estimates published by Business Standard, Shankar now stands to make for his bosses four to five times the ad revenue compared to a normal Test series. "From the early negotiations, it looks like advertisers won't mind paying up to Rs 3 lakh for a 10-second slot on the match," an unnamed media planner has estimated. Ad rates for the last match, to be held at the Wankhede stadium in Mumbai, are being pegged at Rs 3 lakh to Rs 3.5 lakh for 10 seconds, and those for the penultimate Test at Kolkata's Eden Gardens at Rs 2.5 lakh to Rs 3 lakh.


In contrast, ad rates for a usual Test match at home languish at Rs 40,000 to Rs 60,000; the yield could be lower if the opponent was Zimbabwe or Bangladesh.


But here's my early warning about diminishing returns: peddling Tendulkar against a tired West Indies is an insult and overkill. It caricatures the most enduring marketing machine of Indian sports.


What's left is to tell the West Indians to bowl friendly stuff so that the ageing maestro lasts longer than he did since his last Test century two years ago.


So here's what marketers could do beyond pumping endless ads of Tednulkar selling biscuits or cement: How about factoring upfront that the master may play, at best, one or two substantive innings out of the four on hand?


If that's agreed, let's have something innovative just so that the viewing public isn't laughing at the advert (or cursing it, actually!) when the big man is trudging back to the dressing room?


One given would therefore be to shun mindless pumping of regular creatives. They will look indefensible between the 300-odd 10-second slots that go in a match, including breaks between the overs, drinks break and fall of wickets.


Does salvation then lie in new creatives?


Perhaps no, because Tendulkar surely won't be caught giving shooting schedules in the run-up to his last two Tests.


So, what if the agencies haven't sat and thought through this in advance?


Salvation, perhaps, lies in repurposing the creatives and meshing them with tasteful renditions of the aam admi. Remember Tendulkar masks in one particular commercial, now replicated in NaMo's rallies?

Or how about bringing an entire town to a complete standstill?


I would even love a flash mob.


One final point: It's time to get real; this iconic Indian brand is falling into a badly scripted retirement and he has no partners or talent to repurpose himself with the equivalent of Kaun Banega Crorepati (KBC) orMohabbatein.


So rethink the overkill.


Sachin Tendulkar Retirement


(Rohit Bansal, a Harvard Business School alumni, is CEO of India Strategy Group, Hammurabi & Solomon Consulting and former Resident Editor of Financial Express)

First Published: November 2, 2013, 10:33 am

http://www.cricketcountry.com/cricket-articles/Sachin-Tendulkar-s-farewell-Test-series-caricatures-the-most-enduring-marketing-machine-of-Indian-sports/33003


Sachin Tendulkar - the Midas touch of a marketing wonder

By Tim Holt

Last updated : 2013-08-09 14:34:44


Sachin Tendulkar interacting with the media © Getty Images

By Tim Holt

No one has come close to polarising public opinion over the past two decades like Sachin Tendulkar, who has a legion of devout and passionate followers and some neutral admirers and irrational haters. In financial sense, he is the epitome of perfection for all three categories, a literal embodiment of what we term God-sent.

What it means is that if you want to market or sell something, tag Sachin Tendulkar's name to rake in the big money. It's the first thing I learnt as a blogger - write something about Tendulkar and you will have an assured readership.

If it's testimony to Tendulkar's greatness that you will attract his fanbois lauding you, the neutrals agreeing with you and the haters spitting venom on you. I can vouch for this as I get abusive mails from Tendulkar fans for committing the 'sacrilege' that maybe its time for the maestro to retire. The critiques, too, are passionate in their observations.

Away from the little fishbowl that is my blog, the same logic has been used by the marketers behind Shoaib Ahktar's Autobiography 'Controversially Yours'.

That done, when the launch of the book was pitchforked in the limelight all hell expectedly broke loose when it was known that Shoaib Ahktar claimed that Tendulkar was scared when facing him. Shahid Afridi added fuel to the raging fire when he backed Shoaib's insinuation by saying, "He (Tendulkar) was scared of Shoaib. I have seen it myself. I was fielding at square leg and saw his legs trembling when Shoaib came on to bowl."

The resultant war, especially between Tendulkar fans on one side and Shoaib and Afiridi on the other side, is still raging. In the process it has given hundreds of hours of free television time, reams of print media coverage and extensive debates on social media - all  doing wonders for the marketing of Shoaib's autobiography. Shoaib must be quietly thanking his haters – the Tendulkar fans!

The overwhelming negative response is also because Shoiab and Afridi have all the credibility of politicians at election time going around kissing babies.

To label a batsmen with the respect and standing of Tendulkar of being scared is  laughable – a legend, who as a 16-year old, showed exemplary courage to battle on and score a half century after having his face bloodied by the blinding pace of Waqar Younis.

Maybe when Tendulkar clears the tears from his eyes from laughing hard at the ridiculous claims, he should approach the publishers of Shoaib's book and ask for a percentage of the royalty for his huge contribution in its sales!

(Tim Holt was born in Northern Ireland in 1952. He found his love for cricket when he was sent to South Africa between 1964 and 1966. He is an unashamed cricket purist who feasts on Test cricket. His passion for the game cuts across geographical boundaries and into the domestic competitions. Tim, who has a background in journalism and teaching, has lived and worked in many places across the world)

First Published: October 5, 2011, 11:13 am

http://www.cricketcountry.com/cricket-articles/Sachin-Tendulkar-the-Midas-touch-of-a-marketing-wonder/6271

INDIA'S NEXT BIG BRANDING OPPORTUNITY – MARKETING POTENTIAL IN SACHIN'S 100TH 100

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Delhi recently completed a century as India's national capital. Youtube was flooded with patriotic flash-mob videos (with well advertised backdrops) and sales of anything tri-coloured, well, tripled. The chilling fate of the Costa Concordia, commemorates a century for the Titanic. Another tale of maritime tragedy that'll probably be converted into Hollywood's next 'biggest grossing movie ever, with 11 Oscars'.  Not to mention merchandising and tourism possibilities. And any day now, Sachin Tendulkar will score the world's first hundredth international century! For the cricket-crazy capital of the world, if handled right – the master-blaster's next ton could be our biggest marketing opportunity yet.

Merchandise: An enterprising website – 99tshirts.com has already invited people to design their own Sachin t-shirts and cricket jerseys at affordable prices. A wide variety of t-shirts, hoodies, sippers and cricket paraphernalia is also available.

Tourism: If Sydney's Don Bradman museum is a source of profit and joy for Australia, imagine a special guided-tour of our very own Sachin Tendulkar museum, by Ravi Shastri?

Fashion: He's an international sensation, a record breaking rebel and already the most endorsed athlete in India. At a test match played anywhere in the world, he's his own tiny white visiting card! A fact only re-enforced by the fashion fraternity of Delhi, who have already begun putting together a commemorative line for their next show. The designs are inspired by Sachin's career, his soft demeanour and bold batting style.

F&B: Special cricket-cocktails, IPL style parties. A Sachin Tendulkar themed sports bar? Last year Candies, a bakery in Bombay, was the first to introduce the unique Angry Birds cupcake – "Everyone is looking for something innovative to buy, gift or eat. Kids love themed cakes and pastries." If rumour is to be believed, the innovative store is already working on a '100-centuries themed confectionary line' to commemorate the feat. Perhaps, a chocolate Sachin doll?

Delhi recently completed a century as India's national capital. Youtube was flooded with patriotic flash-mob videos (with well advertised backdrops) and sales of anything tri-coloured, well, tripled. The chilling fate of the Costa Concordia, commemorates a century for the Titanic. Another tale of maritime tragedy that'll probably be converted into Hollywood's next 'biggest grossing movie ever, with 11 Oscars'.  Not to mention merchandising and tourism possibilities. And any day now, Sachin Tendulkar will score the world's first hundredth international century! For the cricket-crazy capital of the world, if handled right – the master-blaster's next ton could be our biggest marketing opportunity yet.

Sachin's Commemorative Coke Cans

Merchandise: An enterprising website – 99tshirts.com has already invited people to design their own Sachin t-shirts and cricket jerseys at affordable prices. A wide variety of t-shirts, hoodies, sippers and cricket paraphernalia is also available.

Tourism: If Sydney's Don Bradman museum is a source of profit and joy for Australia, imagine a special guided-tour of our very own Sachin Tendulkar museum, by Ravi Shastri?

He's just a phone call away!

Fashion: He's an international sensation, a record breaking rebel and already the most endorsed athlete in India. At a test match played anywhere in the world, he's his own tiny white visiting card! A fact only re-enforced by the fashion fraternity of Delhi, who have already begun putting together a commemorative line for their next show. The designs are inspired by Sachin's career, his soft demeanour and bold batting style.

F&B: Special cricket-cocktails, IPL style parties. A Sachin Tendulkar themed sports bar? Last year Candies, a bakery in Bombay, was the first to introduce the unique Angry Birds cupcake – "Everyone is looking for something innovative to buy, gift or eat. Kids love themed cakes and pastries." If rumour is to be believed, the innovative store is already working on a '100-centuries themed confectionary line' to commemorate the feat. Perhaps, a chocolate Sachin doll?

http://imagemanagement.in/?p=451

Online rush to encash on Sachin Tendulkar's farewell

Friday, Nov 8, 2013, 8:33 IST | Place: Mumbai | Agency: DNA

Nupur Anand  

 

Sachin Tendulkar's farewell to Test cricket is turning out to be an extravagant affair with rose petals being showered on the cricketer, lanterns lit in the sky, 199 golden leaves on silver banyan trees and a wax statue lined up among other things to honour the Godof cricket.

With all the hype surrounding Tendulkar's last two Tests, online retailers are cashing in on the euphoria.

E-commerce players have lined up an array of products to woo Tendulkar fans. From high-ticket items to silver coins with Sachin's image on them and from smaller articles such as mobile phone covers, laptop skins, notebooks, pens and wallets to copies of magazines in which Tendulkar was featured in the 1990s are available on e-commerce sites.

Collectabillia, Flipkart, Snapdeal, eBay, Tradus, Craftsvilla are some of the players that have lined up Tendulkar-related merchandise. Anjana Reddy, CEO, Universal Collectabillia, which sells official licensed Tendulkar merchandise, said other e-commerce players have shown a lot of interest. "All e-commerce players have increased the orders and we definitely expect the sales to increase."

Companies have also increased their advertising and marketing spends to push Tendulkar's merchandise. Deepa Thomas, e-commerce evangelist, eBay India, said the plan is to have a special microsite where a consumer can access all Sachin-related items. "Apart from this, we plan to put up billboards and have a special digital marketing campaign to promote the merchandise."

Snapdeal, which also has limited edition collectibles priced at Rs5 lakh, said it has been seeing an increase in visits on the page dedicated to Tendulkar on its site. "The traffic has increased and the merchandise sales has also been picking up. We are getting into high gear now as the last match draws closer and with that, the sales will definitely spike," said Amit Maheshwari, VP-Fashion Merchandising, Snapdeal.

Considering the consumer frenzy, websites such as Flipkart and Playgroundonline expect sales to double in the coming weeks. As Tendulkar plays his 200th and last Test match at Wankhede Stadium in Mumbai from November 14-18, sales of his merchandise are expected to shoot up by over 100 per cent, experts said.

Tendulkar's retirement has definitely become a mega marketing event with even advertisers hiking advertisement rates to cash in on the frenzy. Other brands such as Adidas, Coca-Cola, Toshiba, etc are planning strategic campaigns as Tendulkar gets ready to bid farewell to cricket.

http://www.dnaindia.com/sport/report-online-rush-to-encash-farewell-1915396

  1. Brand Sachin Tendulkar bags Musafir.com - Financial Express

  2. www.financialexpress.com/news/sachin-tendulkar-set-for.../1186309

  3. Nov 6, 2013 - The partnership with Sachin Tendulkar covers a major global marketingcampaign that includes radio, television and outdoor media. AP.

  4. No effect of retirement on brand Sachin Tendulkar: Market Experts ...

  5. www.khelnama.com/131113/cricket/...sachin-tendulkar-market.../14001

  6. 4 days ago - He endorses 15 brands, his endorsement income is close to $22 million and he has 12 million followers on Facebook and if anyone thought ...

  7. Brands keen to continue association with Sachin Tendulkar - Livemint

  8. www.livemint.com/.../Brands-keen-to-continue-association-with...

  9. by Gouri Shah - in 39 Google+ circles

  10. 3 days ago - Sachin Tendulkar, who announced his retirement from international ... into his plans," said Jayant Singh, executive vice-president ofmarketing.

  11. Sachin Tendulkar

  12. Images for sachin tendulkar marketing

  13. - Report images

  14. Sachin Tendulkar's signature turns wood to gold - The Times of India

  15. timesofindia.indiatimes.com/india/Sachin-Tendulkars.../25856827.cms

  16. 1 day ago - Sachin Tendulkar's 200th Test match is raking in profits not only for black-marketers and betting syndicates but lawful vendors of merchandise ...

  17. News for sachin tendulkar marketing


Tanaji Kamble
क्या ये चुनावी मुद्दा नहीं हो सकता
भारत में हर तीसरा बच्चा कुपोषित है, इसका मतलब भारत में सिर्फ दो बच्चे सुरक्षित है, बाकि सब आनेवाले दिन में मरने वाले है, उनको मारने बहुत बड़ा षडयंत्र भारत में शासन करने वाली जमात कर रही है, आनेवाले समय में भारत का सुमालियां देश जैसा हाल होनेवाला है, ये तह है, आप खुद अपने बच्चों को मारने के लिए तैयार हो जावो। वास्तव में आज हमारे सामने बच्चों को जिन्दा रखने की चुनौती है. देश की आधी महिलायें खून की कमी की शिकार हैं और उन्हें गरीबी और भेदभाव के कारण पोषण का हक नहीं मिल रहा है
देश में कुपोषण के मामले में राज्य
१) राजस्थान 43% कुपोषित (भुकमरी)
२) मध्य प्रदेश ३०% कुपोषित (भुकमरी)
३)छत्तीसगढ़ ३९% कुपोषित (भुकमरी)
४) दिल्ली ५०% कुपोषित (भुकमरी)
५) मिजोरम २३% कुपोषित (भुकमरी)

१) 5 साल से कम उम्र के 70 फीसदी बच्चे एनीमिया के शिकार हो चुके हैं।मरने के लिए तैयार हो जाते है.
२) देश में 15-49 साल की उम्र में मरने वाले तकरीबन 50 फीसदी लोगों की मौत कुपोषण से होती है, यही है भारत कि नौजवान फौज (भुकेपेट के नौजवान जो भूक से ही मरने वाले है, दुश्मन से क्या लड़ेंगे)
३) आंकड़े बताते हैं कि 1993-94 में बिहार, असम, ओडीशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी 50 प्रतिशत थी, जो बढ़कर 2011-12 में 65 प्रतिशत हो गई है।
४) हर साल देश में 77 हज़ार महिलाओं की प्रसव या उससे जुड़े कारणों से मृत्यु हो जाती है
५) मातृत्व मृत्यु की स्थिति में 80 फ़ीसदी नवजात बच्चो या शिशुओं की भी मृत्यु हो जाती है. कुपोषण का मतलब है उर्जाविहीन जीवन
दुनियाभर में भुखमरी के शिकार लोगों की 25 प्रतिशत से ज्यादा आबादी का बसेरा भारत बना हुआ है, दुनिया भर में कुपोषण के शिकार हर चार बच्चों में से एक भारत में रहता है,
६) 25 करोड़ महिलायें खून की कमी की शिकार हैं
७) हैदराबाद के एक एनजीओ द्वारा कुपोषण पर तैयार की गई एक रिपोर्ट में देश के सर्वाधिक कुपोषित 112 जिलों में से उत्तर प्रदेश के 41, बिहार के 23, झारखंड के 140, मध्यप्रदेश के 12, राजस्थान के 10, उड़ीसा के 6 और हिमाचल प्रदेश, केरल एवं तमिलनाडु के दो-दो जिलों को शामिल किया गया।
दरअसल इस सूचकांक में भारत को उन देशों के वर्ग में रखा गया है, जहां भुखमरी का स्तर ठखतरनाकठ स्थिति में है
http://www.mediaforrights.org/infopack/hindi-infopack/549-बच्चों-की-खाद्य-अ-सुरक्षा-भूख-और-गरीबी-का-यह-एक-बड़ा-मामला-है
http://www.shukrawar.net/details.php?id=2104
जनज्वार डॉटकॉम
पिछले एक दशक में ऐसी दर्जनों घटनाएं सामने आईं जिनसे पता चला कि अध्यात्म के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले दुष्कर्मी संतों ने किस प्रकार अपनी ही पुत्री-पौत्री समान शिष्याओं के साथ रासलीला रचाई. इनमें ताज़ा प्रकरण आसाराम से जुड़ा है, जो कुकर्मों में अपने साथ बेटे को भी शामिल रखता था...http://www.janjwar.com/society/1-society/4512-kalyugi-adhyatmvaadi-for-janjwar-by-tanveer-jafri — with Anita Bharti and 49 others.

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Lenin Raghuvanshi shared PVCHR's event.
'Mohammed was the Prophet of equality, of the brotherhood of man, the brotherhood of all Mussalmams.'
------------------------------------------SWAMY VIVEKANANDA
Please participate to ensure the dignity of Muslim minority.
https://www.facebook.com/events/255293181290040/

Please read follows write up:
http://gulail.com/religious-discrimination-against-muslim-and-christian-dalits/

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Interface and meeting with Parliamentarian on issue of Muslim minority in Uttar Pradesh

Monday, December 9 at 5:00pm

Constitution Club Of India, Rafi Marg in New Delhi, India

You were invited by Lenin Raghuvanshi

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Virendra Yadav
आज ओमप्रकाश बाल्मीकि जी के न रहने पर उनसे विवाद से लेकर सवाद फिर आत्मीयता तक का सिलसिला याद आ गया .बात एक दशक से भी अधिक पुरानी है .ओम प्रकाश बाल्मीकि ने प्रेमचंद को सवालों के घेरे में खड़ा करते हुए 'समकालीन जनमत' में एक लेख लिखा था .मैंने तुरंत अगले ही अंक में इसका तीखा प्रतिवाद किया था .फिर कई अन्य लोगों के मत भी तीखे वाद विवाद के रूप में इस बहस में शामिल हुए .सुखद आश्चर्य तब हुआ जब इस बहस के कुछ ही समय बाद बाल्मीकि जी का का फोन आया कि '"मैं लखनऊ में हूँ ,कैसे मुलाकात होगी ?" ...इसके बाद वे मेरे कार्यालय आये ,मैंने मुद्राराक्षस जी को सूचना दे दी और हम लोगों की लम्बी बातचीत उस दिन हुयी .बाद में उनकी सहृदयता का परिचय तब और भी मिला जब देहरादून लौटकर उन्होंने आत्मीयता भरा एक पोस्टकार्ड लिखा और इस मुलाकात को यादगार बताते हुए पारस्परिक संवाद को और भी आत्मीय बनाने की उम्मीद व्यक्त की थी . इसके बाद वे जब भी लखनऊ आये हम लोग जरूर मिले . ऐसे संवादधर्मी जनतांत्रिक साथी का असमय जाना कहीं मन को गहरे सालता है . वे बार बार याद आ रहे हैं .....नमन.

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Anita Bharti shared Ashutosh Partheshwar's photo.

2 hours ago

.......उन दिनों मैं नौवीं कक्षा में था । घर की आर्थिक हालत कमजोर थी । एक-एक पैसे के लिए परिवार के प्रत्येक सदस्य को खटना पड़ता था । मेरे पास पाठ्यपुस्तकें हमेशा कम रहती थीं । दोस्तों से माँग कर काम चलाना पड़ता था । कपड़ों की भी वही स्थिति थी । जो मिल गया वही पहन लिया । जो वक्त पर मिला खा लिया, उन दिनों गाँव में मरने वाले पशुओं को उठाने का काम भी चूहड़ों के जिम्मे था । जिसके घर में जो काम करता था, उसके मरे हुए पशु भी उसी को उठाने पड़ते थे । इसके बदले कोई मेहनताना या मजदूरी नहीं मिलती थी । एक गाय, बैल या भैंस को उठाने के लिए चार से छह लोगों की जरूरत होती थी । जिसका मवेशी मर जाता था उसे जल्दी लगी रहती थी । इसीलिए वह बार-बार बस्ती में आकर चिल्लाता था । देर होने पर गालियाँ बकता था । उठाने वालों को इकट्ठा करने में अक्सर देर हो ही जाती थी ।

मरे हुए पशुओं को उठाना बड़ा कठिन काम होता है । उसके अगले-पिछले पैरों को रस्सी से बाँध कर बाँस की मोटी-मोटी बाहियों से उठाना पड़ता था । इतने श्रमसाध्य काम के बदले में मात्र

गालियाँ...।

कितने क्रूर समाज में रहे हैं हम, जहाँ श्रम का कोई मोल ही नहीं बल्कि निर्धनता को बरकरार रखने का एक षड्यंत्र ही था यह सब ।

मरे हुए पशु की खाल मुजफ्फरनगर के चमड़ा बाजार में बिक जाती थी । उन दिनों एक पशु की खाल बीस से पच्चीस रुपए मंे बिकती थी । आने-जाने और मरे हुए पशु को उठाने की मजदूरी देकर मुश्किल से एक खाल के बदले दस-पंद्रह रुपए हाथ में आते थे । तंगी के दिनों में दस-पंद्रह रुपए भी बहुत बड़ी रकम दिखाई पड़ते थे ।

चमड़ा खरीदने वाला दूकानदार खाल में बहुत मीन-मेख निकालता था । कट-फट जाने पर खाल बेकार हो जाती थी । खाल को निकालते ही उस पर नमक लगाना पड़ता था, वर्ना दूसरे दिन ही खाल खराब हो जाती थी, जिसे दूकानदार खरीदने से मना कर देता था ।

एक रोज ब्रह्मदेव तगा का बैल खेत से लौटते समय रास्ते में गिर पड़ा । उठ नहीं पाया, मर गया । कुछ ही देर बाद ब्रह्मदेव ने हमारे घर खबर कर दी थी । पिताजी और मुझसे बड़े भाई जनेसर उस रोज किसी रिश्तेदारी में गए थे । घर पर माँ, मेरी बहन माया, और सब से बड़ी भाभी देवी ही रहती थी । जसवीर उन दिनों देहरादून में था मामा के पास ।

माँ परेशान हो गई थी । बैल की खाल उतारने किसे भेजे ? बस्ती में एक-दो लोग थे लेकिन कोई भी उस समय जाने को तैयार नहीं था । माँ ने चाचा से बात की । वे तैयार हो गए थे । लेकिन उनके साथ किसी को जाना चाहिए । अकेले वे खाल नहीं उतार पाएँगे ।

मैं उस समय स्कूल में था । माँ ने थक-हार कर मुझे ही बुला लिया । माँ नहीं चाहती थी कि वह काम मुझे करना पड़े लेकिन खाल बेचकर जो दस-पंद्रह रुपए मिलने वाले थे, उन्हें छोड़ पाने की स्थिति में माँ नहीं थी । हार कर माँ ने मुझे चाचा के साथ भेज दिया । मेरे चाचा, सोल्हड़ महाकामचोर थे बस, सारा दिन ढोल ताशों मेें लगे रहते थे, मेहनत के काम से कतराते थे ।

माँ को पिफकर लगी थी कि कहीं हमारे पहुँचने से पहले ही बैल पर गिद्ध या जंगली जानवर न टूट पड़ेें ।

चाचा ने खाल उतारनी शुरू की । मैं उनकी मदद कर रहा था । चाचा का हाथ ध्ीरे-ध्ीरे चल रहा था । पिताजी जैसी कुशलता उनमें नहीं थी । थोड़ी देर बाद वे थक कर बीड़ी पीने बैठ गए ।

चाचा ने एक छुरी मेरे हाथ में पकड़ा दी । बोले, ध्ीरे-ध्ीरे खाल उतारो । अकेले से तो शाम तक नहीं उतरेगी ।

छुरी पकड़ते ही मेरे हाथ काँप रहे थे । अजीब से संकट में फँस गया था । चाचा ने छुरी चलाने का ढंग सिखाया । उस रोज मेरे भीतर बहुत कुछ था जो टूट रहा था । चाचा की हिदायत पर मैंने बैल की खाल उतारी थी । मैं जैसे स्वयं ही गहरे दलदल में फँस रहा था । जहाँ से मैं उबरना चाहता था । हालात मुझे उसी दलदल में घसीट रहे थे । चाचा के साथ तपती दुपहरी में जिस यातना को मैंने भोगा था आज भी उसके जख्म मेरे तन पर ताजा हैं ।

जैसे-जैसे खाल उतर रही थी मेरे भीतर का रक्त जम रहा था । खाल उतारने में हमें कई घंटे लग गए थे । चाचा ने खाल को जमीन पर फैला दिया । उस पर लगे खून को सूखी जमीन ने सोख लिया था ।

चाचा ने खाल को चादर में बाँध दिया था । गठरी उठाकर सर पर रख ली थी । लगभग दो मील की दूरी पर हमारा घर था । बोझ के कारण चाचा को तेज चलना पड़ रहा था । मैं हाथ में छुरी पकड़ उनके पीछे-पीछे लगभग दौड़ता जाता था । बसेड़ा जाने वाली पक्की सड़क से हम लोग बस-अड्डे के पास पहुँच गए थे । गठरी सिर से उतार कर चाचा ने जमीन पर रख दी थी । ''यहाँ से आगे तुम ले जाओ, मैं थक गया हूँ ।''

उस रोज मैंने चाचा से बहुत कहा लेकिन वे नहीं माने । ''चाचा बस-अड्डे की भीड़ पार करा दो, मेेरे स्कूल की छुट्टी का समय है । मेरे स्कूल के सभी साथी यह ले जाते हुए देखेंगे तो वे स्कूल में मुझे तंग करेंगे ।'' मैंने गिड़गिड़ा कर रुआँसी आवाज में चाचा से कहा था । किंतु वे नहीं पसीजे । गठरी उठाकर मेरे सिर पर रख दी । गठरी का वजन मेरे वजन से ज्यादा था । मजबूरन उठकर चलना पड़ा । बस-अड्डे की परिचित भीड़ से मैं उस रोज जिस तरह से निकला, मेरा ही मन जानता है । एक भय लगातार मेरा पीछा कर रहा था कोई देख ने ले । कोई सहपाठी न मिल जाए । अगर कोई पूछ बैठेगा तो क्या बताऊंगा?

घर तक पहुँचते-पहुँचते मेरी टाँगें जवाब दे गई थीं । लग रहा था कि अब गिरा । गाँव के किनारे-किनारे चलकर, लंबा चक्कर काटा था, बस्ती तक पहुँचने के लिए ।

मुझे उस हालत में देखकर माँ रो पड़ी थी । मैं सिर से लेकर पाँव तक गंदगी से भरा हुआ था । कपड़ों पर खून के ध्ब्बे सापफ दिखाई दे रहे थे । बड़ी भाभी ने उस रोज माँ से कहा था, ''इनसे ये न कराओ ...भूखे रह लेंगे ....इन्हें इस गंदगी में ना घसीटो !'' भाभी के ये शब्द आज भी मेरे लिए अँध्ेरे में रोशनी बन कर चमकते हैं । मैं उस गंदगी से बाहर निकल आया हूँ लेकिन लाखों लोग आज भी उस घिनौनी जिंदगी को जी रहे हैं । (जूठन से)


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Dalit Mat
आपने तो कहा था कि अभी बहुत कुछ लिखना बाकी है। फिर सब अधूरा क्यों छोड़ गए। ये ठीक नहीं हुआ। अब स्नेह भरा हाथ कंधे पर कौन रखेगा। आपको अनेकों श्रद्धांजलि ओमप्रकाश वाल्मीकि सर।।

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Vijay Gaur
यह कैसा बीतता हुआ २०१३ है जो मेरे सबसे करीबी और बड़ भाई कथाकार और कवि वाल्मिकी जी के न रहने का दुख दे गया़ ओह़ अभी अल्पना जी का फोन और सुभाष पंत जी कांपती आवाज ने ये क्या कहा.

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नहीं रहे दलित चिंतक, नाटककार और गद्य के अप्रतिम रचनाकार ओमप्रकाश वाल्मिकी. आज सुबह देहरादून में उनका इंतकाल हो गया



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Saanjha Sapnaa
a play performed in 2012 in delhi designed and directed by Ishwar Shunya, based on writings by Sh. Omprakash Valmiki.


Joothan is an autobiography written by Omprakash Valmiki. the play is based on how dalits are treated and how they face all the social injustice and differences. — with Uday Prakash and 9 others.

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Ashok Kumar Pandey
हंस के सम्पादक और नई कहानी की त्रयी के सदस्य रहे राजेन्द्र यादव के अवसान के बाद से ही मानो हिंदी का शोककाल चल रहा है. गोरखपुर से ख्यात कवि और आलोचक परमानंद श्रीवास्तव जी के जाने की ख़बर आई फिर लखनऊ से प्रख्यात व्यंग्यकार के पी सक्सेना जी के. अभी हम इस आघात से उबर भी नहीं पाए थे कि हिंदी-राजस्थानी के अत्यंत सम्मानित लेखक विजयदान देथा ने अपने गाँव बोरुन्दा में अपनी आख़िरी साँस ली. जीवन भर बच्चों के लिए उत्कृष्ट साहित्य का सृजन करने वाले हरिकृष्ण देवसरे का बाल दिवस वाले दिन ही चले जाना जैसे एक बड़ी विडंबना रच गया तो उसके तीन दिन बाद ही वरिष्ठ कवि और लेखक ओम प्रकाश वाल्मीकि जी के निधन की खबर देहरादून से आई. महीने भर से कम समय में अपने परिवार के इतने सदस्यों को खोकर हिंदी का साहित्य समाज जिस शोक और संताप में डूबा है उसे शब्दों में तो कोई क्या व्यक्त कर पाएगा. बस जैसे कि एक युग अपने बीतने की घोषणा कर रहा हो, जैसे नाटक के एक दृश्य के दुखांत के बाद यवनिका के पतन के साथ कोई शोकाकुल संगीत बज रहा हो, जैसे नई पीढ़ी के कन्धों पर जिम्मेदारियाँ इस शोक के साथ चुपचाप आकर बैठ गई हों.

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  1. ओमप्रकाश वाल्‍मीकि - विकिपीडिया

  2. hi.wikipedia.org/wiki/ओमप्रकाश_वाल्‍मीकि

  3. ... वाल्‍मीकि. मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से. यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज. ओमप्रकाश वाल्मीकि वर्तमान दलित साहित्य के प्रतिनिधि रचनाकारों में से एक हैं। हिंदी में दलित साहित्य के विकास में ओमप्रकाशवाल्मीकि की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

  4. वार्ता:ओमप्रकाश बाल्मीकि - विकिपीडिया

  5. hi.wikipedia.org/wiki/वार्ता:ओमप्रकाश_बाल्मीकि

  6. यह पृष्ठ ओमप्रकाश बाल्मीकि लेख के सुधार पर चर्चा करने के लिए वार्ता पन्ना है। यदि आप आप अपने संदेश पर जल्दी सबका ध्यान चाहते हैं, तो यहाँ संदेश लिखने के बाद चौपाल पर भी सूचना छोड़ दें। कृपया अपने संदेशों पर हस्ताक्षर करें, चार टिल्ड ...

  7. 'जूठन' लिखने वाले ओमप्रकाश वाल्मीकी बीमार

  8. www.dalitmat.com/index.php?option=com_content...

  9. 01-09-2012 - दलित साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर व वरिष्ठ लेखक ओमप्रकाश बाल्मीकि बीमार हैं. उनको कैंसर की बीमारी है. उनका इलाज दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिलट में हो रहा है. वरिष्ठ साहित्यकार वाल्मीकी अगस्त के पहले सप्ताह में यहां भर्ती ...

  10. ओमप्रकाश बाल्मीकि - हिनदी hindi - FriendFeed

  11. friendfeed.com/hindia/f4a7b1db

  12. 20-12-2009 - नया पृष्ठ '''ओमप्रकाश वाल्मीकि'''(१९५०) का जन्म बरेली, जिला मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनका बचपन सामाजिक एवं आर्थिक कठिनाइयों में बीता। पढ़ाई के दौरान उन्हें अनेक आर्थिक, सामाजिक और मानसिक कष्ट झेलने पडे़। वाल्मीकि ...

  13. दलित साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर ओमप्रकाश ... - Janjwar

  14. www.janjwar.comसाहित्यसाहित्य

  15. 6 घंटे पहले - दलित साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर व वरिष्ठ लेखक ओमप्रकाश बाल्मीकि का कैंसर की बीमारी के बाद आज सुबह निधन हो गया है. वे लम्बे समय से बीमार चल रहे थे. उनका इलाज देहरादून के मैक्स अस्पताल में चल रहा था. इस सुप्रसिद्ध कवि-कथाकार ...

  16. प्रकाश बाल्मीकि जी की कविता ….. तब तुम क्या ...

  17. reenababbar.jagranjunction.com/.../ॐ-प्रकाश-बाल्मीकि-जी-क...

  18. 24-10-2012 - प्रकाश बाल्मीकि जी की कविता ….. तब तुम क्या ... Tags: तब तुम क्या करोगे ॐ प्रकाश बाल्मीकि. Rate this ... रीना जी सादर, अत्यंत मार्मिक और खुद कि भोगी पीड़ा को बहुत ही सुन्दरता से कविता रूप में ओमप्रकाश जी ने ढाला है. चिमनी के ...

  19. Ganga Speaks: ओम प्रकाश जी,बाल्मीकि आश्रम में ...

  20. gangapedia.iitk.ac.in/?q...ओम-प्रकाश-जीबाल्मीकि...

  21. 08-01-2011 - ओम प्रकाश जी - मेरा नाम ओम प्रकाश द्विवेदी है | मैं गंगा तट पर बाल्मीकि आश्रम में स्थित लव कुश जन्म भूमि मंदिर का पुजारी हूँ | यहाँ पर बाल्मीकि जी ने गंगा के किनारे अपना आश्रम बनाया था | इसी आश्रम में बाल्मीकि जी ने ...

  22. ओमप्रकाश बाल्मीकि की कहानियों में ... - Printsasia.com

  23. www.printsasia.com/.../ओमप्रकाश-बाल्मीकि-की-कहानियो...

  24. ओमप्रकाश बाल्मीकि की कहानियों में सामाजिक चेतना, 9788181111043,8181111044 by हरपाल सिंह अरूश. Free Shipping USA.

  25. ओमप्रकाश वाल्मीकि / ओमप्रकाश वाल्मीकि | प्रतिलिपि

  26. pratilipi.in/om-prakash-valmiki/

  27. Om Prakash Valmiki के लिए खोजे गए अंग्रेज़ी दस्तावेज़ का अनुदित परिणाम

  28. ओमप्रकाश वाल्मीकि, मनाया आत्मकथा Joothan (1997) के एक प्रमुख हिंदी दलित लेखक और लेखक कविता के तीन संग्रह प्रकाशित किया है -

  29. समालोचन: परिप्रेक्ष्य : ओमप्रकाश वाल्मीकि

  30. samalochan.blogspot.com/2013/11/blog-post_17.html

  31. arun dev द्वारा - 490 Google+ मंडलियों में

  32. 1 घंटे पहले - दलित साहि्त्य के सशक्त हस्ताक्षर व वरिष्ठ लेखक ओमप्रकाश बाल्मीकि जी का आज सुबह परिनिर्वाण हो गया. वे पिछले एक साल से 'बड़ी आंत की गंभीर बीमारी' से जूझ रहे थे. उनका हिन्दी साहित्य और दलित साहित्य में उनके अवदान और उनकी ...

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  1. Webdunia Hindi

  • विदाई के दिन सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न

  • बीबीसी हिन्दी-20 मिनट पहले

  • बीबीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन ने सचिन को भारत रत्न दिए जाने पर कहा, "सचिन तेंदुलकर एक प्रेरक व्यक्तित्व हैं और सभी खिलाड़ियों के लिए एक रोल मॉडल हैं. वो भारत रत्न के सही हक़दार हैं. मैं उन्हें हार्दिक बधाई देता हूं." ...

  • विदाई पर तेंदुलकर को भारत-रत्न का तोहफा

  • आज तक-1 घंटे पहले

  • संन्यास लेते ही सचिन तेंदुलकर को 'भारत रत्न' देने ...

  • एनडीटीवी खबर-16-11-2013

  • सभी 101 समाचार स्रोत »

  • क्रिकेट से नाता आगे भी जुड़ा रहेगा : सचिन तेंदुलकर

  • एनडीटीवी खबर-2 मिनट पहले

  • मुंबई: सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद पहली बार मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि यह रिटायरमेंट का सही वक्त था और शरीर भी अब उतना साथ नहीं दे रहा था। उन्होंने कहा कि 24 सालों तक वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलते ...

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  • दैनिक जागरण

  • यकीन नहीं होता मेरा सफर खत्म हो गया है : सचिन ...

  • एनडीटीवी खबर-3 घंटे पहले

  • मुंबई: भीगी पलकों के साथ सचिन तेंदुलकर ने जब क्रिकेट को अलविदा कहा, तब दिल को छू लेने वाले अपने संबोधन में परिवार, कोचों, साथियों, दोस्तों और प्रशंसकों को शुक्रिया कहना नहीं भूले और यह भी कहा कि उन्हें यकीन नहीं हो रहा कि ...

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  • Live हिन्दुस्तान

  • सचिन तेंदुलकर मेरे युग का महानतम क्रिकेटर : मुरलीधरन

  • एनडीटीवी खबर-3 घंटे पहले

  • नई दिल्ली: श्रीलंका के दिग्गज स्पिनर मुथैया मुरलीधरन ने भारतीय क्रिकेट स्टारसचिन तेंदुलकर को अपनी पीढ़ी का 'महानतम क्रिकेटर' करार देते हुए कहा कि सचिन का विकेट हमेशा उनके लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहा। मुरलीधरन, जिनके साथ ...

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  • Sahara Samay

  • सचिन तेंदुलकर ने टेस्ट रैंकिंग में 18वें स्थान से ...

  • एनडीटीवी खबर-1 घंटे पहले

  • दुबई: महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने अपने रिकॉर्ड 200 टेस्ट करियर का समापन आईसीसी टेस्ट बल्लेबाज रैंकिंग में 18वें स्थान से किया। उन्होंने रविवार को जारी ताजा रैंकिंग में पांच पायदान की छलांग लगाई। तेंदुलकर वेस्ट इंडीज के ...

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  • दुनिया भर के अखबारों में छाए सचिन तेंदुलकर

  • आईबीएन-7-5 घंटे पहले

  • नई दिल्ली। सचिन की भावुक विदाई की खबर दुनिया के सभी अखबारों में प्रमुखता से छपी है। हर भाषा, हर देश की मीडिया में सचिन छाए हुए हैं। विदेशी अखबारों ने लिखा है कि सचिन जाते-जाते सबकी आंखें नम कर गए। सचिन तेंदुलकर ...

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  • Live हिन्दुस्तान

  • एक युग का समापन है सचिन तेंदुलकर का संन्यास

  • एनडीटीवी खबर-15-11-2013

  • मुंबई: विश्व क्रिकेट को भारत की सबसे महान देन - सचिन तेंदुलकर ने अपने 24 साल और एक दिन के ओजस्वी करियर के बाद शनिवार को संन्यास ले लिया। वेस्ट इंडीज के खिलाफ वानखेड़े स्टेडियम में खेलते हुए भारतीय टीम ने सचिन को उनके करियर ...

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  • आज तक

  • सचिन 'महान' तेंदुलकर की मैदान से विदाई..

  • बीबीसी हिन्दी-16-11-2013

  • सचिन ने शनिवार को जब मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में अपने दो दशक से अधिक लंबे क्रिकेट करियर को अलविदा कहा तो सचिन के साथ ही मैदान में मौजूद सभी ... विदाई के क्षणों में सचिन तेंदुलकर अपनी पत्नी अंजलि तेंदुलकर से कुछ कहते हुए.

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  • प्रधानमंत्री सहित कई हस्तियों ने दी सचिन ...

  • Webdunia Hindi-10 घंटे पहले

  • नई दिल्ली। प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने सचिन तेंदुलकर से बात की और उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न पुरस्कार के लिए चुने जाने पर बधाई दी। पुरस्कार की घोषणा के तुरंत बाद सिंह ने सचिन से टेलीफोन पर बात की और कामना ...

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  • Webdunia Hindi

  • विदाई टेस्ट में सचिन तेंदुलकर ने खेली यादगार पारी

  • एनडीटीवी खबर-15-11-2013

  • मुंबई: सचिन तेंदुलकर अपने करियर के अंतिम टेस्ट मैच की पहली पारी में शतक नहीं लगा सके। सचिन ने हालांकि वानखेड़े स्टेडियम में वेस्ट इंडीज के खिलाफ जारी दूसरे टेस्ट मैच के दूसरे दिन शुक्रवार को आउट होने से पहले 74 रनों की ...

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  • मेजर ध्यानचंद

    भारत डिस्कवरी प्रस्तुतिलेख ♯ (प्रतीक्षित)


    मेजर ध्यानचंद


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    पूरा नाम

    मेजर ध्यानचंद सिंह

    अन्य नाम

    हॉकी का जादूगर

    जन्म

    29 अगस्त, 1905

    जन्म भूमि

    इलाहाबाद

    मृत्यु

    3 दिसंबर, 1979

    मृत्यु स्थान

    नई दिल्ली

    अविभावक

    समेश्वर दत्त सिंह (पिता)

    खेल-क्षेत्र

    हॉकी

    पुरस्कार-उपाधि

    1956 में पद्म भूषण

    विशेष योगदान

    ओलम्पिक खेलों में भारत को लगातार तीन स्वर्ण पदक (1928, 1932 और 1936) दिलाने में मेजर ध्यानचन्द का अहम योगदान है।

    नागरिकता

    भारतीय

    अन्य जानकारी

    ध्यानचन्द के जन्मदिन (29 अगस्त) को भारत का 'राष्ट्रीय खेल दिवस' घोषित किया गया है।

    मेजर ध्यानचंद सिंह (अंग्रेज़ी: Dhyan Chand; जन्म: 29 अगस्त, 1905, इलाहाबाद; मृत्यु: 3 दिसंबर, 1979, नई दिल्ली) एक भारतीय हॉकी खिलाड़ी थे, जिनकी गिनती श्रेष्ठतम कालजयी खिलाड़ियों में होती है। मानना होगा कि हॉकी के खेल में ध्यानचंद ने लोकप्रियता का जो कीर्त्तिमान स्थापित किया है उसके आसपास भी आज तक दुनिया का कोई खिलाड़ी नहीं पहुँच सका।

    हॉकी में ध्यानचंद सा खिलाड़ी न तो हुआ है और न होगा। वह जितने बडे़ खिलाड़ी थे उतने ही नेकदिल इंसान थे। हॉकी के इस जादूगर का असली नाम ध्यानसिंह था, लेकिन जब फ़ौज में उन्होंने बाले तिवारी के मार्गदर्शन में हॉकी संभाली तो सभी स्नेह से उन्हें ध्यानचंद कहने लगे और इस तरह उनका नाम ही ध्यानचंद पड़ गया।[1]

    जीवन परिचय

    जन्म

    ध्यानचंद का जन्म प्रयाग (इलाहाबाद) के एक साधारण राजपूत परिवार में 29 अगस्त, 1905 को हुआ। कालांतर में उनका परिवार इलाहाबाद से झांसी आ गया। उनके बाल्य-जीवन में खिलाड़ीपन के कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं देते थे। इसलिए कहा जा सकता है कि हॉकी के खेल की प्रतिभा जन्मजात नहीं थी, बल्कि उन्होंने सतत साधना, अभ्यास, लगन, संघर्ष और संकल्प के सहारे यह प्रतिष्ठा अर्जित की थी।

    बचपन

    साधारण शिक्षा प्राप्त करने के बाद 16 वर्ष की अवस्था में सेना में एक साधारण सिपाही की हैसियत से भरती हो गए। जब 'फर्स्ट ब्राह्मण रेजीमेंट' में भरती हुए उस समय तक उनके मन में हॉकी के प्रति कोई विशेष दिलचस्पी या रूचि नहीं थी। ध्यानचंद को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित करने का श्रेय रेजीमेंट के एक सूबेदार मेजर तिवारी को है। मेजर तिवारी स्वंय भी हॉकी प्रेमी और खिलाड़ी थे। उनकी देख-रेख में ध्यानचंद हॉकी खेलने लगे और देखते ही देखते वह दुनिया के एक महान खिलाड़ी बन गए।

    खेल परिचय

    ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में ब्रैडमैन के समतुल्य माना जाता है। गेंद इस क़दर उनकी स्टिक से चिपकी रहती कि प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को अक्सर आशंका होती कि वह जादुई स्टिक से खेल रहे हैं। यहाँ तक हॉलैंड में उनकी हॉकी स्टिक में चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़ कर देखी गई। जापान में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक से जिस तरह गेंद चिपकी रहती थी उसे देख कर उनकी हॉकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात कही गई। ध्यानचंद की हॉकी की कलाकारी के जितने किस्से हैं उतने शायद ही दुनिया के किसी अन्य खिलाड़ी के बाबत सुने गए हों। उनकी हॉकी की कलाकारी देखकर हॉकी के मुरीद तो वाह-वाह कह ही उठते थे बल्कि प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाड़ी भी अपनी सुधबुध खोकर उनकी कलाकारी को देखने में मशगूल हो जाते थे। उनकी कलाकारी से मोहित होकर ही जर्मनी के रुडोल्फ हिटलर सरीखे जिद्दी सम्राट ने उन्हें जर्मनी के लिए खेलने की पेशकश कर दी थी। लेकिन ध्यानचंद ने हमेशा भारत के लिए खेलना ही सबसे बड़ा गौरव समझा। वियना में ध्यानचंद की चार हाथ में चार हॉकी स्टिक लिए एक मूर्ति लगाई और दिखाया कि ध्यानचंद कितने जबर्दस्त खिलाड़ी थे। सुनने में ये सभी घटनाएं भले अतिशयोक्तिपूर्ण लगे, लेकिन ये सभी बातें कभी हकीकत रही हैं।[1]

    मेजर ध्यानचंद सिंह

    भारत को दिलाये तीन स्वर्ण पदक

    ध्यानचंद ने तीन ओलिम्पिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया तथा तीनों बार देश को स्वर्ण पदक दिलाया। आँकड़ों से भी पता चलता है कि वह वास्तव में हॉकी के जादूगर थे। भारत ने 1932 में 37 मैच में 338 गोल किए, जिसमें 133 गोल ध्यानचंद ने किए थे। दूसरे विश्व युद्ध से पहले ध्यानचंद ने 1928 (एम्सटर्डम), 1932 (लॉस एंजिल्स) और 1936 (बर्लिन) में लगातार तीन ओलिंपिक में भारत को हॉकी में गोल्ड मेडल दिलाए। दूसरा विश्व युद्ध न हुआ होता तो वह छह ओलिंपिक में शिरकत करने वाले दुनिया के संभवत: पहले खिलाड़ी होते ही और इस बात में शक की क़तई गुंजाइश नहीं इन सभी ओलिंपिक का गोल्ड मेडल भी भारत के ही नाम होता।[1]

    खेल भावना

    1933 में एक बार वह रावलपिण्डी में मैच खेलने गए। इस घटना का उल्लेख यहाँ इसलिए किया जा रहा है कि आज हॉकी के खेल में खिलाड़ियों में अनुशासनहीनता की भावना बढ़ती जा रही है और खेल के मैदान में खिलाड़ियों के बीच काफ़ी तेज़ी आ जाती है। 14 पंजाब रेजिमेंट (जिसमें ध्यानचंद भी सम्मिलित थे) और सैपर्स एण्ड माइनर्स टीम के बीच मैच खेला जा रहा था। ध्यानचंद उस समय ख्याति की चरम सीमा पर पहुँच चुके थे। उन्होंने अपने शानदार खेल से विरोधियों की रक्षापंक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया और दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस पर विरोधी टीम का सेंटर-हाफ अपना संतुलन खो बैठा और असावधानी में उसके हाथों ध्यानचंद की नाक पर चोट लग गई। खेल तुरंत रोक दिया गया। प्राथमिक चिकित्सा के बाद ध्यानचंद अपनी नाक पर पट्टी बंधवाकर मैदान में लौटे। उन्होंने चोट मारने वाले प्रतिद्वंदी की पीठ थपथपाई और मुस्कराकर कहा-"सावधानी से खेलो ताकि मुझे दोबारा चोट न लगे।" उसके बाद ध्यानचंद प्रतिशोध पर उतर आए। उनका प्रतिशोध कितना आर्दश है, इसकी बस कल्पना ही की जा सकती है। उन्होंने एक साथ 6 गोल कर दिए। ये सचमुच एक महान खिलाड़ी का गुण है। इससे खेल-खिलाड़ी का स्तर और प्रतिष्ठा ऊँची होती है।

    ओलम्पिक खेल

    एम्सटर्डम (1928)

    1928 में एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में पहली बार भारतीय टीम ने भाग लिया। एम्स्टर्डम में खेलने से पहले भारतीय टीम ने इंगलैंड में 11 मैच खेले और वहाँ ध्यानचंद को विशेष सफलता प्राप्त हुई। एम्स्टर्डम में भारतीय टीम पहले सभी मुकाबले जीत गई। भारत ने आस्ट्रेलिया को 6-0 से, बेल्जियम को 9-0 से, डेनमार्क को 6-0 से, स्विटज़लैंड को 6-0 से हराया और इस प्रकार भारतीय टीम फाइनल में पहुँच गई। फाइनल में भारत और हालैंड का मुकाबला था। फाइनल मैच में भारत ने हालैंड को 3-0 से हरा दिया। इसमें दो गोल ध्यानचंद ने किए।

    लास एंजिल्स (1932)

    1932 में लास एंजिल्स में हुई ओलम्पिक प्रतियोगिताओं में भी ध्यानचंद को टीम में शामिल कर लिया गया। उस समय सेंटर फॉरवर्ड के रूप में काफ़ी सफलता और शोहरत प्राप्त कर चुके थे। तब सेना में वह 'लैंस-नायक' के बाद नायक हो गये थे। इस दौरे के दौरान भारत ने काफ़ी मैच खेले। इस सारी यात्रा में ध्यानचंद ने 262 में से 101 गोल स्वयं किए। निर्णायक मैच में भारत ने अमेरिका को 24-1 से हराया था। तब एक अमेरिका समाचार पत्र ने लिखा था कि भारतीय हॉकी टीम तो पूर्व से आया तूफ़ान थी। उसने अपने वेग से अमेरिकी टीम के ग्यारह खिलाड़ियों को कुचल दिया।

    बर्लिन (1936)

    1936 के बर्लिन ओलपिक खेलों में ध्यानचंद को भारतीय टीम का कप्तान चुना गया। इस पर उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा- "मुझे ज़रा भी आशा नहीं थी कि मैं कप्तान चुना जाऊँगा" खैर, उन्होंने अपने इस दायित्व को बड़ी ईमानदारी के साथ निभाया। अपने जीवन का अविस्मरणिय संस्मरण सुनाते हुए वह कहते हैं कि 17 जुलाई के दिन जर्मन टीम के साथ हमारे अभ्यास के लिए एक प्रदर्शनी मैच का आयोजन हुआ। यह मैच बर्लिन में खेला गया। हम इसमें चार के बदले एक गोल से हार गए। इस हार से मुझे जो धक्का लगा उसे मैं अपने जीते-जी नहीं भुला सकता। जर्मनी की टीम की प्रगति देखकर हम सब आश्चर्यचकित रह गए और हमारे कुछ साथियों को तो भोजन भी अच्छा नहीं लगा। बहुत-से साथियों को तो रात नींद नहीं आई।

    ध्यानचन्द के सम्मान में जारी डाक टिकट

    5 अगस्त के दिन भारत का हंगरी के साथ ओलम्पिक का पहला मुकाबला हुआ, जिसमें भारतीय टीम ने हंगरी को चार गोलों से हरा दिया। दूसरे मैच में, जो कि 7 अगस्त को खेला गया, भारतीय टीम ने जापान को 9-0 से हराया और उसके बाद 12 अगस्त को फ्रांस को 10 गोलों से हराया। 15 अगस्त के दिन भारत और जर्मन की टीमों के बीच फाइनल मुकाबला था। यद्यपि यह मुकाबला 14 अगस्त को खेला जाने वाला था पर उस दिन इतनी बारिश हुई कि मैदान में पानी भर गया और खेल को एक दिन के लिए स्थगित कर दिया गया। अभ्यास के दौरान जर्मनी की टीम ने भारत को हराया था, यह बात सभी के मन में बुरी तरह घर कर गई थी। फिर गीले मैदान और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण हमारे खिलाड़ी और भी निराश हो गए थे। तभी भारतीय टीम के मैनेजर पंकज गुप्ता को एक युक्ति सूझी। वह खिलाड़ियों को ड्रेसिंग रूम में ले गए और सहसा उन्होंने तिरंगा झण्डा हमारे सामने रखा और कहा कि इसकी लाज अब तुम्हारे हाथ है। सभी खिलाड़ियों ने श्रद्धापूर्वक तिरंगे को सलाम किया और वीर सैनिक की तरह मैदान में उतर पड़े। भारतीय खिलाड़ी जमकर खेले और जर्मन की टीम को 4-1 से हरा दिया। उस दिन सचमुच तिरंगे की लाज रह गई। उस समय कौन जानता था कि 15 अगस्त को ही भारत कास्वतन्त्रता दिवस बनेगा।

    हॉकी का जादूगर

    ध्यान चन्द हॉकी खेलते हुए

    कहा जाता है कि मैच के दौरान गेंद हर समय ध्यानचंद की स्टिक के साथ ही चिपकी रहती। यह देखकर दर्शक आश्चर्यचकित रह गए, लेकिन कुछ अधिकारियों को बीच में संदेह होने लगा कि कहीं ध्यानचंद की स्टिक में कोई ऐसी वस्तु तो नहीं लगी है, जो बराबर गेंद को अपनी ओर खींचे जाती है। बात बढ़ गई और शंका-समाधान आवश्यक समझा गया। सैनिक को दूसरी स्टिक से खेलने को कहा गया, लेकिन जब दूसरी स्टिक से भी ध्यानचंद ने दनादन गोलों का तांता बांधकर समा बांध दिया तो जर्मन अधिकारियों को विश्वास हो गया कि जादू स्टिक का नहीं उनकी लोचदार और सशक्त कलाइयों का है। वहाँ के दर्शकों ने तभी ध्यानचंद को 'हॉकी का जादूगर' कहना शुरू कर दिया। 1936 के ओलम्पिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम ने कुल मिलाकर 38 गोल किए जिनमें से 11 गोल ध्यानचंद ने ही किए।

    1936 के बर्लिन ओलम्पिक खिलों के बाद द्वितीय विश्व-युद्ध के कारण 1946 और 1944 के ओलम्पिक खेलों का आयोजन नहीं हो सका। द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद ध्यानचंद ने हॉकी से सन्यास ले लिया, लेकिन हॉकी तो उनकी जीवनसंगिनी थी। उन्होंने नवयुवकों को गुरु-मंत्र सिखाने शुरू कर दिए। काफ़ी समय तक वह राष्ट्रीय खेलकूद संस्थान (पटियाला) में भारतीय टीमों को प्रशिक्षित करते रहे।

    सेना में पदोन्नति

    केवल हॉकी के खेल के कारण ही सेना में उनकी पदोन्नति होती गई। 1938 में उन्हें 'वायसराय का कमीशन' मिला और वे जमादार बन गए। उसके बाद एक के बाद एक दूसरे सूबेदार, लेफ्टीनेंट और कैप्टन बनते चले गए। बाद में उन्हें मेजर बना दिया गया।

    खेल जीवन

    वह 1922 में भारतीय सेना में शामिल हुए और 1926 में सेना की टीम के साथ न्यूज़ीलैंड के दौरे पर गए। 1928 और 1932 के ओलंपिक खेलों में खेलने के बाद 1936 में बर्लिन ओलम्पिक में ध्यानचंद ने भारतीय टीम का नेतृत्व किया और स्वयं छ्ह गोल दाग़कर फ़ाइनल में जर्मनी को पराजित किया। 1932 में भारत के विश्वविजयी दौरे में उन्होंने कुल 133 गोल किए। ध्यांनचंद ने अपना अंतिम अंतर्राष्ट्रीय मैच 1948 में खेला। अंतर्राष्ट्रीय मैचों में उन्होंने 400 से अधिक गोल किए।

    करिश्माई खिलाड़ी

    मेजर ध्यानचंद सिंह

    1948 और 1952 में भारत के लिए खेलने वाले नंदी सिंह का कहना है कि ध्यानचंद के खेल की ख़ासियत थी कि वो गेंद को अपने पास ज़्यादा देर तक नहीं रखते थे। उनके पास बहुत नपे-तुले होते थे और वो किसी भी कोण से गोल कर सकते थे। 1947 के पूर्वी अफ़्रीका के दौरे के दौरान एक मैच में ध्यानचंद ने केडी सिंह बाबू को एक ज़बरदस्त पास दिया और उनकी तरफ़ पीठ कर अपने ही गोल की तरफ चलने लगे। बाद में बाबू ने उनकी इस अजीब हरकत का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि अगर तुम उस पास पर भी गोल नहीं मार पाते तो तुम्हें भारतीय टीम में बने रहने का कोई हक़ नहीं है। उनके पुत्र ओलंपियन अशोक कुमार भी बताते हैं कि 50 वर्ष की उम्र में भी अभ्यास के दौरान वो डी (D) के अंदर से दस में दस शॉट भारतीय गोलकीपर को छकाते हुए मार सकते थे। ओलंपियन केशवदत्त कहते हैं कि ध्यानचंद हॉकी के मैदान को इस तरह देखते थे जैसे शतरंज का खिलाड़ी चेस बोर्ड को देखता है। उनको हमेशा मालूम रहता था कि उनकी टीम का हर खिलाड़ी कहाँ है और अगर उनकी आँख पर पट्टी भी बाँध दी जाए, तब भी उनका पास बिल्कुल सही जगह पर पहुँचता था। 1968 के मैक्सिको ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम के कप्तान रहे गुरुबक्श सिंह भी याद करते हुए कहते है कि 1959 में जब ध्यानचंद 54 वर्ष के थे, तब भी भारतीय टीम का कोई सदस्य बुली में उनसे गेंद नहीं छीन सकता था।[2]

    हिटलर और ब्रैडमैन भी क़ायल

    ध्यानचंद ने अपनी करिश्माई हॉकी से जर्मन तानाशाह हिटलर ही नहीं बल्कि महान क्रिकेटर डॉन ब्रैडमैन को भी अपना क़ायल बना दिया था। यह भी संयोग है कि खेल जगत की इन दोनों महान हस्तियों का जन्म दो दिन के अंदर पर पड़ता है। दुनिया ने 27 अगस्त को ब्रैडमैन की जन्मशती मनाई तो 29 अगस्त को वह ध्यानचंद को नमन करने के लिए तैयार है, जिसे भारत में खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। ब्रैडमैन हाकी के जादूगर से उम्र में तीन साल छोटे थे। अपने-अपने फन में माहिर ये दोनों खेल हस्तियाँ केवल एक बार एक-दूसरे से मिले थे। वह 1935 की बात है जब भारतीय टीम आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर गई थी। तब भारतीय टीम एक मैच के लिए एडिलेड में था और ब्रैडमैन भी वहाँ मैच खेलने के लिए आए थे। ब्रैडमैन और ध्यानचंद दोनों तब एक-दूसरे से मिले थे। ब्रैडमैन ने तब हॉकी के जादूगर का खेल देखने के बाद कहा था कि वे इस तरह से गोल करते हैं, जैसेक्रिकेट में रन बनते हैं। यही नहीं ब्रैडमैन को बाद में जब पता चला कि ध्यानचंद ने इस दौरे में 48 मैच में कुल 201 गोल दागे तो उनकी टिप्पणी थी, यह किसी हॉकी खिलाड़ी ने बनाए या बल्लेबाज ने। ध्यानचंद ने इसके एक साल बाद बर्लिन ओलिम्पिक में हिटलर को भी अपनी हॉकी का क़ायल बना दिया था। उस समय सिर्फ हिटलर ही नहीं, जर्मनी के हॉकी प्रेमियों के दिलोदिमाग पर भी एक ही नाम छाया था और वह था ध्यानचंद।[3]

    पुरस्कार एवं सम्मान

    मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम, दिल्ली

    1956 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनके जन्मदिन को भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है। इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन औरद्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था।

    निधन

    चौथाई सदी तक विश्व हॉकी जगत के शिखर पर जादूगर की तरह छाए रहने वाले मेजर ध्यानचंद का 3 दिसम्बर, 1979 को सुबह चार बजकर पच्चीस मिनट पर नई दिल्ली में देहांत हो गया।झाँसी में उनका अंतिम संस्कार किसी घाट पर न होकर उस मैदान पर किया गया, जहाँ वो हॉकी खेला करते थे। अपनी आत्मकथा 'गोल' में उन्होंने लिखा था, "आपको मालूम होना चाहिए कि मैं बहुत साधारण आदमी हूँ" वो साधारण आदमी नहीं थे लेकिन वो इस दुनिया से गए बिल्कुल साधारण आदमी की तरह।[2]
























    टीका टिप्पणी और संदर्भ

    विश्व के प्रमुख खेल और खिलाड़ी |लेखक: योगराज थानी |प्रकाशक: राजपाल एण्ड सन्ज़, कश्मीरी गेट, दिल्ली |पृष्ठ संख्या: 157-160 |

    1. 1.0 1.1 1.2 हॉकी से जुड़ी वह जादुई हस्ती-ध्यानचंद (हिन्दी) नवभारत टाइम्स। अभिगमन तिथि: 15 नवंबर, 2011।

    2. 2.0 2.1 हॉकी के जादूगर ध्यानचंद (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) बी.बी.सी हिन्दी। अभिगमन तिथि: 15 नवंबर, 2011।

    3. ध्यानचंद की हॉकी के कायल थे ब्रैडमैन (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) वेबदुनिया हिन्दी। अभिगमन तिथि: 15 नवंबर, 2011।

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    1. ध्यानचंद और केएल सहगल की वो मीठी तकरार - BBC Hindi ...

    2. www.bbc.co.uk/.../130829_dhyanchand_birth_anivarsary_rf_pk.shtml

    3. 29-08-2013 - ध्यानचंद को हॉकी का जादूगर कहा जाता है. उनकी 108वीं वर्षगांठ पर उनके जीवन के कुछ ख़ास पहलुओं के बारे में बता रहे हैं बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल.

    4. क्या सचिन से पेहले मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न ...

    5. qna.navbharattimes.indiatimes.com/.../क्या-सचिन-से-पेहले-मेज...

    6. 23 घंटे पहले - क्या सचिन से पेहले मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न मिलना चाहिये ?, Find answers of क्या सचिन से पेहले मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न मिलना चाहिये ?. Answer this question and earn points Find all the latest information on क्या सचिन से पेहले मेजर ध्यानचंद को ...

    7. हैप्पी बर्थडे: मेजर ध्यानचंद की जिंदगी से जुड़ी 15 ...

    8. khabar.ibnlive.in.com/news/106911/4/

    9. 29-08-2013 - IBN Khabar: हॉकी के \'जादूगर\' मेजर ध्यानचंद का आज जन्मदिन है। क्रिकेट में जो स्थान डॉन ब्रैडमैन, फुटबॉल में पेले और टेनिस में रॉड लेवर का है, हॉकी में वही स्थान ध्यानचंद का है।

    10. भारतीय खेल जगत के पितामह हैं मेजर ध्यानचंद - Anay ...

    11. www.livehindustan.com/.../article1-Major-Dhyan-Chand-Hockey-38-38-...

    12. 29-08-2013 - एक समय था, जब बच्चों से कहा जाता था कि 'खेलोगे-कूदोगे होगे खराब, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब', लेकिन आज वक्त बदल चुका है।

    13. हॉकी के जादूगर मेजर ध्‍यानचंद - P7 News

    14. www.p7news.comखेल

    15. 20-07-2013 - तो मेजर ध्यानचंद के नाम पर लगाई खेल मंत्रालय ने मुहर, लेकिन ऐसा क्या खास किया है दद्दा ने जो ध्यानचंद को मिली मास्टर ब्लास्टर के ऊपर तरजीह। आइए आपको बताते हैं हॉकी के जादूगर ध्‍यानचंद की तमाम उपलब्धियां।

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    17. zeenews.india.com/hindi/news/खेल...के...ध्यानचंद.../178491

    18. 30-08-2013 - हॉकी के जादूगर ध्यानचंद की ग्राफिक जीवनी का गुरुवार को यहां उस स्टेडियम में विमोचन किया गया जिसे उनका नाम मिला हुआ है।

    19. हॉकी के जादूगर- ध्यानचंद | Amazing Yatra

    20. amazingyatra.com/entries/hindustan-ke-saput/hocky-ka-jadugar

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    Dhyan Chand

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    Major Dhyan Chand
    Dhyan Chand closeup.jpg
    Personal information
    Born29 August 1905
    AllahabadUnited ProvincesBritish India
    Died4 December 1979 (aged 74)
    Delhi, India
    Height5 ft 7 in (170 cm)
    Playing positionForward
    Senior career
    YearsTeamApps(Gls)
    1921–Indian Army
    National team
    1926-1948India

    Dhyan Chand (29 August 1905 – 3 December 1979) was an Indian field hockeyplayer widely considered to be one of the greatest players of all time.[1] Chand is most remembered for his goal-scoring feats and for his three Olympic gold medals (19281932, and 1936) in field hockey, during an era where India was dominant in the sport.

    Known as "The Wizard" for his superb ball control, Chand played his final international match in 1948, having scored more than 400 goals during his international career.[2]

    Early life[edit]

    Dhyan Chand was born in Allahabad, family.[3][4] He was the elder brother of another player Roop Singh. His father Sameshwar Dutt Singh was in the British Indian Army, and he played hockey in the army. Dhyan Chand had two brothers - Mool Singh, and Roop Singh. Because of Sameshwar Dutt's numerous army transfers, the family had to move to different cities and as such Chand had to terminate his education after only six years of schooling. The family finally settled in JhansiUttar Pradesh, India. Being in the military, Dhyan's father got a small piece of land for a house.

    Young Chand had no serious inclination towards sports, though he loved wrestling. He stated that he did not remember whether he played any hockey worth mentioning before he joined the Army, though he said that he occasionally indulged in casual games in Jhansi with his friends.

    Chand joined the Indian Army at the age of 16, The Hindi word Chand literally means the moon. Since Dhyan Singh used to practice a lot during night after his duty hours, he invariably used to wait for the moon to come out so that the visibility in the field (during his era there were no flood lights) improved. Hence he was called "Chand", by his fellow players, as his practice sessions at night invariably coincided with the coming out from the moon.

    Between 1922 and 1926, Chand exclusively played army hockey tournaments and regimental games. Chand was ultimately selected for the Indian Army team which was to tour New Zealand. The team won 18 matches, drew 2 and lost only 1, receiving praise from all spectators. Following this, in the two Test matches against the New Zealand squad, the team won the first and narrowly lost the second. Returning to India, Chand was immediately promoted to Lance Naik.

    After successfully lobbying for reintroducing field hockey in the Olympics, the newly formed Indian Hockey Federation (IHF) made preparations to send its best possible team for the 1928 Amsterdam Olympics. In 1925, an Inter-Provincial Tournament was held to select India's national field hockey team. Five teams participated in the inaugural nationals - United Provinces (UP), PunjabBengal,Rajputana and Central Provinces. Chand got permission from the Army to play for the United Provinces team.Amsterdam was bad match. later he won.

    In its first game in the tournament. Dhyan Chand as the centre-forward, and Marthins, their inside-right, were particularly happy in their understanding of each other. Dhyan Chand attracted much attention by his clever stickwork. His penetrating runs and judicious passes seemed to assure for him a position in the team that is to take part in the Olympic Games.

    Quite early in the game, it became evident that Dhyan Chand was again at his best. In combination with Marthins he took the ball away to the right and Marthins did well to give him a good pass. Quick as lightning, Dhyan Chand shot a goal. The ball struck one of the defenders' stick and went into the net, giving goalkeeper Collie no chance. A goal within 3 minutes of the start was more than what the most optimistic of the UP supporters could expect. At the interval, UP led by three goals to nil.

    On their part, Rajputana put every ounce of their efforts to score. The UP goal had more than one narrow escape, but they were deserving winners of a fine exhibition match. UP 3 - Rajputana 1.

    Buoyed by the success of the Tournament, it was decided that it would be held every two years. After two more trial matches between various hopefuls, the Olympic team (including Chands as center-forward) was announced and assembled in Bombay. Center-halfBroome Eric Pinniger was selected as the captain. The IHF was initially low on funds since the provinces of Bombay, Madras and Burma had turned a deaf ear to their financial appeal, but they managed to scrape enough money. The Olympic team then played a match against the Bombay XI, and amazingly lost 3-2, even though Singh scored both his team's goals. With a quiet send-off, the team left for England on 10 March, to play 11 matches against local sides as well in the Folkestone Festival, winning all. It was also said that the Great Britain did not send a team in 1928 Amsterdam olympics after their national team was defeated by the Indian team at Folkestone. This is best cited in Kapur's book "Romance of Hockey" where a despatch of H. Sutherland Stark, London representative of "Sports", a magazine of Lahore, tells the story better than any other comment : "For reasons it is difficult to understand the English Hockey Association have taken up a very stiff attitude towards Indian Hockey in recent years and have repeatedly been twitted about it by even their own supporters. The Editor of a leading sports newspaper described them to me as an intensely conservative body, but there seems to be something more than conservative behind their unwillingness apparently ever to meet India ina full international encounter" [5] Finally, on 24 April, the team arrived in Amsterdam to embark on a tour of the Low Countries. In all the pre-Olympic matches against local Dutch, German and Belgian teams, the Indian team won by large margins.

    In the 1928 Amsterdam Summer Olympics, the Indian team was put in the division A table, with Austria, Belgium, Denmark and Switzerland . On 17 May the Indian national hockey team made its Olympic debut against Austria, winning 6-0, with Chand scoring 3 goals. The next day India defeated Belgium 9-0; however Chand only scored once. On 20 May, Denmark lost to India 5-0, with Chand netting 3. Two days later, he scored 4 goals when India defeated Switzerland 6-0 in the semi-finals.

    The final match took place on 26 May, with India facing the home team of the Netherlands. The Indian team's better players Feroze KhanAli Shaukat and Kher Singh were on the sick list and Chand himself was ill. However, even with a skeletal side, India managed to defeat the hosts 3-0 (with Singh scoring 2), and the Indian team won its country's first Olympic gold medal. Keeper Richard Allencreated a unique record of not conceding a single goal. Chand was the top scorer of the tournament by a large margin, scoring 14 goals in 5 matches. A newspaper report about India's triumph said,[citation needed]

    "This is not a game of hockey, but magic. Dhyan Chand is in fact the magician of hockey. "

    On returning to India, the team was received by thousands of people at the Bombay harbour, compared to the three people who had seen them off.

    Posted in Waziristan in the North-West Frontier Province (now in Pakistan) with his new 2/14 Punjab Regiment, Chand was cut off from the IHF, which was by now controlled by civilians. The Inter-Provincial Tournament was being held to select the new Olympic team; the IHF wrote to the Army Sports Control Board to grant Singh leave to participate in the nationals. His platoon refused. Chand received news that he had been selected by the IHF for the Olympic team without any formalities. The rest of his teammates however, had to prove their skills in the Inter-Provincial Tournament, which was won by Punjab. As such, seven players from Punjab were selected for the Olympic team. Apart from Chand, Broome Eric Pinnigar, Leslie Hammond and Richard Allen were the other 1928 Olympians retained in the team. Chand's brother Roop Singh was also included in the squad as a left-in. Lal Shah Bokhari was selected as captain.

    The Olympic team then played practice matches in India before heading for Colombo. In two matches in Ceylon, the Olympic team beat the All Ceylon XI 20-0 and 10-0. Wrote one newspaper on the first match,[citation needed] "Perfection is perilous, for it tempts the gods. For once, this was proved wrong for even the god of weather paid tribute to the genius of the Indian players. Rain clouds, which had threatened to ruin the game, vanished into the blue, and thousands of spectators spent a happy hour marvelling at the incomparable artistry of the Indian team."

    The India team set sail for San Francisco on 30 May, and arrived on 6 June. They reached Los Angeles three weeks before the opening ceremony of the Olympics, which took place on 30 July. On 4 August 1932, India played its first match against Japan and won 11-1. Chand, Roop Singh, Gurmit Singh each scored thrice, and Dickie Carr once. In the final on 11 August, India played against hosts USA. India won 24-1, a world record at that time, and once again clinched the gold medal. Chand scored 8 times, Roop Singh 10, Gurmit Singh 5 and Pinniger once. In fact, Chand along with his brother Roop, scored 25 out of the 35 goals scored by India. This led to them being dubbed the 'hockey twins'.

    One Los Angeles newspaper wrote,[citation needed] "The All-India field hockey team which G. D. Sondhi brought to Los Angeles to defend their 1928 Olympic title, was like a typhoon out of the east. They trampled under their feet and all but shoved out of the Olympic stadium the eleven players representing the United States."

    The team then embarked on a tour of the United States. They played a match on 20 August against a United States XI, almost the same team that they had faced in Los Angeles. Even after loaning its second keeper Arthur Hind, for a half, the team won 24-1.

    After setting sail from New York, the team arrived at England.The then embarked on a hectic tour, playing nine matches in various countries in a fortnight, commencing on 2 September. They played four internationals-against Holland, Germany, Czechoslovakia and Hungary. The team then reached Ceylon and India, playing a number of matches to pay for their expenses. At the end of the tour, India had played 37 matches, winning 34, drawing 2, with one abandoned. Chand scored 133 of the 338 Indian goals.In Indian language he is known as Hockey ka jaadugar that means magician of the hockey game. It is said he used to practice on railway track and what he do is he keeps the ball on one of the track and keep playing it up to 1 to 2 km without letting it to be fallen.

    Captaincy and 1936 Berlin Summer Olympics[edit]

    Indian hockey captain Dhyan Chand at 1936 Berlin Olympics

    In 1933, Chand's home team, the Jhansi Heroes participated in and won the Beighton Cup, which he considered the most prestigious of Indian hockey tournaments. Later, he would state,[citation needed]

    "If anybody asked me which was the best match that I played in, I will unhesitatingly say that it was the 1933 Beighton Cup final between Calcutta Customs and Jhansi Heroes. Calcutta Customs was a great side those days; they had Shaukat Ali, Asad Ali, Claude Deefholts, Seaman, Mohsin, and many others who were then in the first flight of Indian hockey.

    I had a very young side. Besides my brother Roop Singh, and Ismail, who played for the Great Indian Peninsular Railway in Mumbai, I had no other really great player in the team. But I had a team which was determined to do or die. It was a great match, full of thrills, and it was just opportunism that gave us the victory. Customs were pressing hard and our goal was at their mercy. Suddenly I broke through and from midfield gave a long through pass to Ismail, who ran with Jesse Owens' speed half the length of the ground. A misunderstanding occurred between the Customs left-half and the goalkeeper, and Ismail, taking every advantage of it, cut through and netted the only goal of the match. We felt very proud of our triumph.

    "

    In Kolkata, the Heroes also won the Lakshmibilas Cup tournament, which was open only to Indian teams. In 1935, they successfully defended their Beighton Cup title, though lost the subsequent year.

    In December 1934, the IHF decided to send a team to New Zealand in the new year. Chand and his brother were immediately selected. When the Nawab of Manavadar declined to play, Chand was appointed captain. In the subsequent tour, the team played a total of 48 matches on this tour, with 28 in New Zealand and the remainder in India, Ceylon and Australia. India won every match, scoring 584 goals and conceding only 40. Of these 48 matches, Chand played 43 and scored a total of 201 goals.

    Upon returning to India, Chand resumed his duties in the barracks. In December, 1935 the IHF decided to stage the Inter-Provincial tournament to select the Olympic team. Chand was again denied permission to leave his platoon, though once again he was selected without formalities. The final team assembled in Delhi on 16 June and played against the Delhi Hockey XI. Incredibly, they lost 4-1. After this inauspicious start, the team went on a successful tour of the subcontinent, finally departing for Marseilles on 27 June. They arrived on 10 July, and after an uncomfortable journey in third-class compartments, reached Berlin on 13 July. On 17 July, the Indian team played a practice match against Germany and lost 4-1. As such, manager Pankaj Gupta informed the IHF that Ali Dara had to be sent immediately to replace the out of form Mirza Masood.

    On 5 August, India won its first match against Hungary 4-0. India won the rest of the group matches against USA (7-0, with Chand scoring 2 goals) and Japan (9-0, with Chand scoring 4). On 10 August, Ali Dara arrived. Their fourth match was the semi-final against France, whom they defeated 10-0, with Chand scoring 4 goals. Meanwhile, Germany had beaten Denmark 6-0, beaten Afghanistan 4-1 and in the play-offs, had defeated Holland 3-0. Thus, India and Germany were to clash in the 1936 Berlin Olympics field hockey final on 15 August.

    Dhyan Chand scoring a goal against Germany in the 1936 Olympics hockey final

    On the morning of the final, the entire team was nervous since they had been defeated the last time they had faced Germany. In the locker room, Pankaj Gupta produced a Congresstricolour. Reverently the team saluted it, prayed and marched onto the field. The German team was successful in restricting the India side to a single goal until the first interval. After the interval, the Indian team launched an all-out attack, easily defeating Germany 8-1, incidentally the only goal scored against India in that Olympic tournament. Chand top-scored with 3 goals, Dara scored 2 and Roop Singh, Tapsell and Jaffar one each. Describing the game, the Special Correspondent of The Hindu wrote,[citation needed]

    "Every member of the team was feeling the strain of the defeat to the Germans in the practice match, and no one was in his usual self. I never saw a hockey team from India, where the game is definitely of a superior standard compared to the rest of the world, being so obsessed on the eve of the match. The players were nervous as to what the result of the match would be, which was heightened by the feeling that the burden of the country's honour was on their shoulders.

    The game was played at a fast pace and was packed with thrilling incidents. The Germans undercut and lifted the ball, but the Indian team countered with brilliant half-volleying and amazing long shots. Twice Dara attempted to score but was declared offside. Dhyan Chand discarded his spiked shoes and stockings and played with bare legs and rubber soles and became speedier in the second half.

    The vigorous German attacks were brilliantly saved by Allen and Tapsell. The goal scored by Weiss of Germany was the only goal scored against the Indians throughout the tournament. The whole Indian team put up a splendid display. Dhyan Chand and Dara impressed by their combination, Tapsell by his reliability and Jaffar by his tremendous bursts of speed.

    "

    There have been many erroneous media reports over the years claiming that Dhyan Chand scored 6 goals in India's 8-1 victory over Germany in the 1936 Olympic final. However, Major Dhyan Chand in his autobiography titled "Goal!" published in 1952 by Sport & Pastime, Chennai, writes as follows:

    "When Germany was four goals down, a ball hit Allen's pad and rebounded. The Germans took full advantage of this and made a rush, netting the ball before we could stop it. That was the only goal Germany would score in the match against our eight, and incidentally the only goal scored against India in the entire Olympic tournament. India's goal-getters were Roop Singh, Tapsell and Jaffar with one each, Dara two and myself three."

    The record for most goals by an individual in an Olympic final has belonged to Balbir Singh, Sr. another famous Indian hockey hero since the 1952 Helsinki Olympic games. He set this record by scoring 5 goals in India's 6-1 victory over Holland for the gold medal win. The previous holder of this record was England's Reggie Pridmore with his 4 goals in England's 8-1 victory over Ireland in the 1908 Olympic final.

    International Hockey Federation records also attribute only 3 of the 8 goals to Dhyan Chand in the Berlin Olympic final.

    The final was included in the Leni Riefenstahl film on the 1936 Olympics, Olympia. Overall, in 3 Olympic tournaments, Chand had scored 33 goals in 12 matches.

    East African tour and final tournaments[edit]

    After returning from Berlin, Chand joined his regiment. Between 1936 and the commencement of the War in 1939, he largely confined himself to army hockey, with one visit to Kolkata to take part in the Beighton Cup tournament in 1937. After the Beighton Cup, Chand spent four months in a military camp in Pachmarhi to attend military classes. Later, he was promoted to Lieutenant.

    Towards the closing phases of the war, Chand led an army hockey team which toured around the battlefields in Manipur, Burma, the Far East and Ceylon. When the war ended in 1945, Chand decided that the Indian hockey team needed new young players. In 1947, the IHF was requested by the Asian Sports Association (ASA) of East Africa to send a team to play a series of matches. The ASA made a condition that Chand should be included in the team. Once again, Chand was chosen as captain.

    The team assembled in Bombay on 23 November 1947, and reached Mombasa on 15 December and played 9 matches in British East Africa winning all. Chand, though now in his forties, still managed to score 61 goals in 22 matches.

    After returning from the East African tour in early 1948, Chand decided to gradually phase out his involvement in 'serious hockey'. He played exhibition matches, leading a Rest of India side against state teams and the 1948 Olympic team which defeated Chand's side 2-1, even though an aging Chand scored his side's lone goal. Chand's last match was leading the Rest of India team against the Bengal side. The match ended in a draw after which the Bengal Hockey Association organized a public function to honor Chand's services to Indian hockey.

    Last days[edit]

    In 1951, Captain Dhyan Chand was honored at the National Stadium—with Dhyan Chand tournament. Satinder Mullick remembers that Dhyan Chand took him and children of Capt. Kashmira Lal, Sports secretary of Army Hockey Federation.[citation needed] Dhyan Chand was staying in Jodhpur Mess. He was admired by all at the National Stadium.[citation needed]

    In 1956, at the age of 51, he retired from the army with the rank of Major. The Government of India honored him the same year by conferring him the Padma Bhushan (India's Second highest civilian honour).[6]

    After retirement, he taught at coaching camps at Mount AbuRajasthan. Later, he accepted the position of Chief Hockey Coach at theNational Institute of SportsPatiala, a post he held for several years. Chand spent his last days in his hometown of JhansiUttar Pradesh, India.

    Dhyan Chand died on 3 December 1979 at the All India Institute of Medical SciencesDelhi.[7] He was cremated at the Jhansi Heroesground in his hometown, after some initial problems in getting clearance. His regiment, the Punjab Regiment, accorded him full military honours.

    Legacy[edit]

    This section's tone or style may not reflect the encyclopedic tone used on Wikipedia.See Wikipedia's guide to writing better articles for suggestions. (May 2013)
    Dhyan Chand's statue at Jhansi, distant view

    Even today, Dhyan Chand remains a legendary figure in Indian and world hockey. His astounding skills have been glorified in various apocryphal stories and anecdotes. A number of such these revolve around the fact that Singh had a magical control over dribbling the ball. 29 August, Chand's birthday, is celebrated as National Sports Day in India. The Presidentgives away sport-related awards such as the Rajiv Gandhi Khel RatnaArjuna Award andDronacharya Award on this day at the Rashtrapati Bhavan, India.

    The Union Minister of India gives away 20th National Award 2012, namely Gem of India, to the magician of hockey i.e. Major Dhyan Chand. The award was received by his son Ashok Dhyan Chand (hockey Olympian himself) on behalf of his late Hon'ble father; award was given by Journalist Association of India under the flagship of Journalists Federation of India,Sirifort AuditoriumNew Delhi, India, on 22 September 2012.

    India's highest award for lifetime achievement in sports is the Dhyan Chand Award which has been awarded annually from 2002 to sporting figures who not only contribute through their performance but also contribute to the sport after their retirement. The National Stadium, Delhi was renamed Dhyan Chand National Stadium in 2002 in his honour.[8]

    He scored over 1000 goals in his career, from 1926 to 1948.[9]

    Astro-turf hockey pitch, at the Indian Gymkhana Club in London has been named after Indian hockey legend Dhyan Chand.[10]

    In 1956, at the age of 51, he retired from the army with the rank of Major. After he retired he coached for a while, then settled in his beloved Jhansi.However,The last days of Dhyan Chand were not very happy, as he was short of money and was badly ignored by the nation. Once he went to a tournament in Ahmedabad and they turned him away not knowing who he was. He developed liver cancer, and was sent to a general ward at the AIIMS, New Delhi.

    Anecdotes[edit]

    • Once, while playing a hockey game, Major Dhyan Chand was not able to score a goal against the opposition team. After several misses, he argued with the match referee regarding the measurement of the goal post, and amazingly, it was found to not be in conformation with the official width of a goal post under international rules).[11]
    • After India played its first match in the 1936 Olympics, Dhyan Chand's magical stickwork drew crowds from other venues to the hockey field. A German newspaper carried a banner headline: 'The Olympic complex now has a magic show too.' The next day, there were posters all over Berlin: Visit the hockey stadium to watch the Indian magician Dhyan Chand in action.[11]
    • Legend has it that the Fuhrer was so impressed by Dhyan Chand's wizardry with the stick that he offered the Indian a chance to move to Germany and the post of Colonel in his army, which the Indian is said to have declined with a smile.[citation needed]
    • During a match with Germany in the 1936 Olympics, Dhyan Chand lost a tooth in a collision with the particularly aggressive Germany goalkeeper Tito Warnholtz. Returning to the field after medical attention, Dhyan Chand reportedly told the players to "teach a lesson" to the Germans by not scoring. The Indians repeatedly took the ball to the German circle only to backpedal.[12]
    • Cricket world's legend Don Bradman and Hockey's greatest player Dhyan Chand once came face to face at Adelaide in 1935, when the Indian hockey team was in Australia. After watching Dhyan Chand in action, Don Bradman remarked "He scores goals like runs in cricket"[11]
    • Residents of ViennaAustria, honoured him by setting up a statue of him with four hands and four sticks, depicting his control and mastery over the ball.[13]
    • A tube station has been named after him in London, along with 358 other past and present Olympic heroes, in the run-up to the Games, starting on 27 July 2012. The Transport for London has brought out a special 'Olympic Legends Map', detailing all 361 tube stations. Only six stops have been named after hockey players, with the three Indians - Dhyan Chand, Roop Singh and Leslie Claudius - cornering the majority.[14]

    Autobiography[edit]

    "Goal" is the autobiography of Hockey wizard Dhyan Chand, published by Sport & Pastime, Chennai, 1952.[15] DHYAN CHAND Height: 5'7" (169 cm) -http://www.sports-reference.com/olympics/athletes/ch/dhyan-chand-1.html

    See also[edit]

    References[edit]

    Monumental statue near the city of Jhansi: it is Dhyan Chand standing
    1. Jump up^ "Dhyan Chand (Indian athlete)".Encyclopædia Britannica.
    2. Jump up^ Niket, Bhushan (20 May 2011). "Dhyan Chand - The Legend Lives On".Bharatiyahockey.org.
    3. Jump up^ Indian Champions: Profiles Of Famous Indian Sportspersons
    4. Jump up^ Mohan B. Daryanani
    5. Jump up^ Page 38 of M.L. Kapurs "Romance of Hockey".
    6. Jump up^ Dharmaraja. "HOCKEY WIZARD DHYAN CHAND REMEMBERED". Press Information Bureau, Government of India. Retrieved 4 January 2012.
    7. Jump up^ "Dhyan Chand never expected anything: Ashok Kumar"Times of India (India). 30 August 2011.
    8. Jump up^ "Even Bradman was impressed with Dhyan Chand"The Times of India. 30 Aug 2011,.
    9. Jump up^ "Discover hockey's answer to Pele".BBC news-Sports. 26 February 2004. Retrieved 4 January 2012.
    10. Jump up^ "Hockey pitch in London named after Dhyan Chand"Zee News (India). 23 August 2011.
    11. Jump up to:a b c "Dhyan Chand ( a bio-graphical sketch)". Mudraa.com. 21 March 2010. Retrieved 2012-01-19.
    12. Jump up^ "1936 Olympics: Hat-trick for India under Dhyan Chand"The Hindu(India). 8 July 2012. Retrieved 24 June 2013.
    13. Jump up^ "Why Dhyan Chand doesn't need a Bharat Ratna". India: IBN Live. 29 August 2011.
    14. Jump up^ "Hockey legends make London tube station list"The Times of India (India). 6 April 2012.
    15. Jump up^ "DHYAN CHAND — Player, legend and the man"The Tribune (Chandigarh, India). 29 August 2009.

    External links[edit]

    Wikimedia Commons has media related to Dhyan Chand.
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