Twitter

Follow palashbiswaskl on Twitter

Wednesday, November 20, 2013

केंद्र समान मंहगाई भत्ता नहीं, मकान किराया भत्ते पर बंदिश,अब क्या करेंगे सरकारी कर्मचारी? কেন্দ্র সমান মহার্ঘ ভাতা আর নয়, বাড়ি ভাড়াতেও কোপ এবার কি করবেন?

केंद्र समान मंहगाई भत्ता नहीं, मकान किराया भत्ते पर बंदिश,अब क्या करेंगे सरकारी कर्मचारी?

কেন্দ্র সমান মহার্ঘ ভাতা আর নয়, বাড়ি ভাড়াতেও কোপ

এবার কি করবেন?  


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास


पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार के कर्मचारियों को अब भागते भूत के लंगोच से ही संतो, करना पड़ेगा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य विधानसभा में कर्मचारियों के लिए मंहगाई भत्ते की वृद्धि तो घोषणाकर दी लेकिन कर्मचारी तो केंद्र सरकार के बढ़ाये दस फीसद की ही उम्मीद लगाये बैठे थे।पहले ही अड़तीस फीसद मंहगाई भत्ता बकाया है।अब बकाया चौआलीस प्रतिशत हो जायेगा।लेकिन इससे पहले  ही विधानसभा में वित्तमंत्री अमित मित्र ने ऐलान कर दिया कि राज्य के कर्मचारियों को मंहगाई भत्ता का कोई बकाया बाकी नही है।


बंगाल भर के कर्मचारियों में डीए फ्रीज होने की अफवाह फैलजाने से हड़कंप मच गया। सरकारी दफ्तरों में कामकाज ठप हो गया।विधानसभा और नवन्न भी अप्रभावित न रहा।


रात को उच्चस्तरीय सूत्रों से स्पष्ट किया गया कि डीए फ्रीज नहीं किया जा रहा है। कहा गया कि वित्तमंत्री के बयान को गलत ढंग से पेश किया गया।सत्ता में आने के बाद मां माटी मानुष की सरकार नें सत्रह प्रतिशत डीए का भुगतान दो किश्तों में कर दिया है। इससे राज्य सरकार पर हर महीने 425 करोड़ रुपये यानी सालाना अतिरिक्त पांच हजार करोड़ के खर्च का बोझ बढ़ गया।इतना बड़ा खर्च कर्मचारियों के हक में करने के बावजूद सरकार को बदनाम किया जा रहा है।हालांकि वित्तमंत्री  ने अपने लिखित जवाब में कहा कि 30 सितंबर को राज्य सरकार पर कर्मचारियों का कोई मंहगाई भत्ता बकाया नहीं है।केंद्र सरकार जो मंहगाई भत्ता दे रही है वह राज्य की तुलना में 38 प्रतिशत ज्यादा है।वित्तमंत्री के इस बयान की प्रतिक्रिया में कोआर्डिनेशन कमिटी नवपर्याय ने 27 को विधानसभा अभियान का आह्वान कर डाला।


अब मुख्यमंत्री ने सरकारी कर्मचारियों को महगाई भत्ते में छह फीसद वृद्धि की घोषणा के साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि कर्मचारियों को केंद्रसमान भत्ता नहीं मिलेगा।कर्मचारियों को भत्ता केंद्र के हिसाब से नहीं बल्कि राज्य सरकार के पैमाने से मिलेगा।इसी के साथ राज्य की आर्थिक बदहाली के मद्देमनजर कर्मचारियों के मकान भत्ते के भुगतान में यह बंदिश लगा दी गयी कि पति या पत्नी में से कोई अगर निजी क्षेत्र में कार्यरत हो तो निजी क्षेत्र से मिल रहे मकान किराये को हिसाब में रखकर ही मकान भत्ता दिया जायेगा।मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि केंद्र के फैसले के मुताबिक नहीं, बल्कि कर्मचारियों को दिये जाने वाले भत्ते की दर राज्य सरकार ही तय करेगी।यानी केंद्र समान वेतनमानके हिसाब से देय बकाया 38 फीसद मंहगाई भत्ते की बात कर्मचारी अब भूल ही जाये तो बेहतर।मुख्यमंत्री की घोषणा से वित्तमंत्री के बयावनका तात्पर्य स्पष्ट हो गया है।केंद्र समान भत्ता न देने  से जाहिर है कि कर्मचारियों को कोई मंहगाई भत्ता बकाया नहीं रहता।



गौरतलब है कि भारी सब्सिडी, दर्जनों तरह के भत्ते, जमीन तक मुफ्त बांटने की स्कीमों से लैस बंगालको वित्तीय संकट पर रिजर्व बैंक व केंद्र की चेतावनियां रोज की बात हैं। बंगाल में वेतन आदि बांटने के लिए निजी कंपनियों से कर्ज लेने के प्रसंग पुराने हैं।मुख्यमंत्री ने विधानसभा में यह भी कहा है कि राज्य सरकार के लिए केंद्र समान भत्ता राज्य कीआर्थिक बदहाली की वजह से दे पाना असंभव है।इसके बावजूद सरकार कर्मचारियों के हित में यथासंभव उपाय करेगी।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य के कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (डीए) में 6 प्रतिशत की वृद्धि किए जाने की बुधवार को घोषणा की। विपक्षी दल माकपा ने इसका विरोध किया और कहा कि मुख्यमंत्री ने बयान देते समय विधानसभा नियमों का पालन नहीं किया, कांग्रेस ने भी बहिर्गमन किया।


बनर्जी प्रश्नकाल के दौरान बढ़ती कीमतों की स्थिति पर बयान देने के लिए सदन में आई थीं। उन्होंने कहा कि राज्य के समक्ष मौजूदा सभी वित्तीय बाधाओं के बावजूद कर्मचारियों को जनवरी 2014 से डीए में 6 प्रतिशत बढ़ोतरी मिलेगी।


इसको लेकर मुख्यमंत्री तथा विपक्ष के नेता व माकपा सदस्य सूर्यकांत मिश्र में तीखी नोक- झोंक हुई। मिश्र का कहना था कि बनर्जी यह बयान देकर विधानसभा नियमों का पालन नहीं कर रही हैं, क्योंकि इसके लिए सभी दलों में बहस करानी होगी।


मिश्र ने कहा कि मुख्यमंत्री कीमत वृद्धि पर बयान देने सदन में आई थीं लेकिन उन्होंने राज्य कर्मचारियों के लिए डीए में बढ़ोतरी की घोषणा की। बनर्जी ने इसका प्रतिवाद किया और कहा कि मुद्दे आपस में संबद्ध हैं।


मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्हें क्या करना चाहिए, इस बारे में प्रतिपक्ष नेता से निर्देश की जरूरत नहीं है। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष से कहा कि वे मिश्र को कुछ समय बोलने की अनुमति दें।


विधानसभा अध्यक्ष बिमान बनर्जी ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि विधानसभा नियमों के तहत मुख्यमंत्री किसी भी महत्वपूर्ण मुद्दे पर सदन में बयान दे सकती हैं और बयान देते समय कोई सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए।


बनर्जी ने इसी दौरान जरूरी वस्तुओं के बढते दाम के लिए केंद्र की गलत नीतियों को जिम्मेदार ठहराया। कांग्रेस सदस्यों ने इसका विरोध करते हुए बहिर्गमन किया।


জানুয়ারিতে সরকারী কর্মীদের ৬ শতাংশ মহার্ঘভাতা ঘোষণা মুখ্যমন্ত্রীর, চালু হচ্ছে মহার্ঘভাতার নতুন মডেল

মহার্ঘভাতার নতুন মডেল চালু করতে চলেছে রাজ্য। যে মডেলে কেন্দ্রের হারে নয়, রাজ্যের কর্মীদের মহার্ঘভাতা ঠিক করবে রাজ্য সরকারই। আজ বিধানসভায় একথা ঘোষণা করেছেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়। অর্থাত্‍ রাজ্য সরকারি কর্মীরা বকেয়া ৩৮ শতাংশ মহার্ঘভাতা আর পাবেন না। তার বদলে জানুয়ারি মাসে ৬ শতাংশ মহার্ঘভাতা দেওয়া হবে তাদের।


রাজ্য সরকারি কর্মীরা ঠিক কত মহার্ঘভাতা পাবেন. তা নিয়ে দুদিন ধরেই হই চই চলছে বিধানসভায়। মঙ্গলবার বিধানসভায় এক লিখিত বিবৃতিতে, অর্থমন্ত্রী অমিত মিত্র জানান, সেপ্টেম্বর দুহাজার তেরো পর্যন্ত রাজ্যের রকর্মীদের কোনও মহার্ঘভাতা বাকি নেই।


যদিও কেন্দ্রীয় সরকারি কর্মীদের মহার্ঘভাতা রাজ্যের চেয়ে ৩৮ শতাংশ বেশি। এই বিবৃতির পরই ক্ষোভ শুরু হয় রাজ্য সরকারি কর্মীদের মধ্যে। কারণ অমিত মিত্রের বক্তব্যে পরিষ্কার হয়ে যায় রাজ্য সরকার বকেয়া আটত্রিশ শতাংশ ডিএ দেবে না। বুধবার অমিত মিত্রের বক্তব্যেই সিলমোহর দিলেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়।

বিধানসভায় দাঁড়িয়ে মুখ্যমন্ত্রী বলেন, রাজ্যের যে কর আদায় হয়, তার বেশিরভাগটাই চলে যায় কেন্দ্রীয় কোষাগারে। রাজ্যের কাছে প্রায় কিছুই থাকে না। কেন্দ্র যে হারে মহার্ঘভাতা দেয় সেই হারেই রাজ্যকেও মহার্ঘভাতা দিতে হবে, এমন কোনও আইন নেই। রাজ্যের ঘাড়ে এধরণের দায় চাপাতে পারে না কেন্দ্র। রাজ্য সরকার নিজের ক্ষমতা অনুযায়ী নিজের কর্মীদের মহার্ঘ ভাতা দেবে।


এরপরই মুখ্যমন্ত্রী ঘোষণা করেন জানুয়ারি মাসে রাজ্য তার কর্মীদের ছ শতাংশ ডিএ দেবেন। মুখ্যমন্ত্রীর এই ঘোষণায় ক্ষোভ প্রকাশ করতে থাকেন বিরোধীরা। প্রশ্ন ওঠে, কেন রাজ্য সরকারি কর্মীদের ন্যয্য পাওনা থেকে বঞ্চিত করা হচ্ছে। সরকারি কর্মীদের মহার্ঘভাতা ঠিক হয় বাজার দর বৃদ্ধির সূচকের ওপরে। প্রশ্ন, তাহলে কেন রাজ্য সরকারি কর্মীরা কেন্দ্রীয় সরকারি কর্মীদের থেকে কম মহার্ঘভাতা পাবেন?

http://zeenews.india.com/bengali/kolkata/state-announce-6-percent-da_17976.html


৬% ডিএ রাজ্য কর্মীদের


বিতনু চট্টোপাধ্যায়, এবিপি আনন্দ

Wednesday, 20 November 2013 16:59

কলকাতা: রাজ্য সরকারি কর্মচারীদের জন্য নিউ ইয়ার গিফট৷ জানুয়ারিতে ৬ শতাংশ হারে তাঁরা মহার্ঘ ভাতা বা ডিএ পাবেন৷ বুধবার বিধানসভায় এ কথা ঘোষণা করেন মুখ্যমন্ত্রী মমতা  বন্দ্যোপাধ্যায়৷ পাশাপাশি তিনি বলেন, কেন্দ্র যে হারে ডিএ বা অন্যান্য ভাতা দেয়, তা রাজ্য সরকারের পক্ষে দেওয়া সম্ভব নয়৷ কিন্তু তা সত্ত্বেও কর্মচারীদের পাশে দাঁড়িয়ে রাজ্য সরকার যতদূর সম্ভব চেষ্টা করবে৷

সূত্রের খবর, বামফ্রন্ট ক্ষমতা থেকে চলে যাওয়ার সময়ে  রাজ্য সরকারি কর্মচারীরা কেন্দ্রীয় সরকারি কর্মচারীদের থেকে ১৭ শতাংশ কম ডিএ পেতেন৷ তৃণমূল সরকারের শুরুর কয়েকদিনের মধ্যে সেই ব্যবধান বেড়ে দাঁড়ায় ২৩ শতাংশে৷ এ দিন বিধানসভার বাইরে অর্থমন্ত্রী অমিত মিত্র জানান, ২০১১ সালের শেষে তাঁরা রাজ্য সরকারি কর্মীদের ১০ শতাংশ হারে ডিএ দিয়েছেন৷ ২০১২ সালে দিয়েছেন ৭ শতাংশ হারে৷ আর এবার ৬ শতাংশ হারে ডিএ দেওয়া হবে৷ এভাবেই, কেন্দ্রীয় সরকারি কর্মচারীদের সঙ্গে রাজ্য সরকারির কর্মচারীদের পাওয়া ডিএর যে ২৩ শতাংশ ব্যবধান ছিল তা মুছে গেল৷


মঙ্গলবার অমিত মিত্র বিধানসভায় লিখিত বিবৃতি দিয়ে জানিয়েছিলেন, রাজ্য সরকারি কর্মীদের কোনও মহার্ঘ ভাতা বকেয়া নেই৷ তবে কেন্দ্রীয় সরকার তাদের কর্মচারীদের যে মহার্ঘ ভাতা দিচ্ছে, তা রাজ্যের তুলনায় ৩৮ শতাংশ বেশি৷ এই নিয়ে বিভিন্ন মহলে বিভ্রান্তির সৃষ্টি হয়৷ এর ২৪ ঘণ্টার মধ্যেই ৬ শতাংশ হারে ডিএ দেওয়ার কথা ঘোষণা করলেন মুখ্যমন্ত্রী৷ এর জেরে ডিএ নিয়ে রাজ্য সরকারের অবস্থান স্পষ্ট হল বলেই মনে করছে রাজনৈতিক মহল৷ (ফাইল চিত্র)

http://www.abpananda.newsbullet.in/state/34-more/43776-2013-11-20-11-30-55


বাড়িভাড়া ভাতায় কোপ


দীপক ঘোষ, এবিপি আনন্দ

Wednesday, 20 November 2013 19:41

কলকাতা: রুগ্ন কোষাগার সামাল দিতে নজিরবিহীন পদক্ষেপ রাজ্য সরকারের৷ পরিবর্তন আনা হল সরকারি কর্মচারীদের বাড়িভাড়া ভাতার নিয়মে৷ এখন থেকে সরকারি কর্মীর স্বামী বা স্ত্রী বেসরকারি সংস্থায় কাজ করলেও কোপ পড়বে বাড়িভাড়া ভাতায়৷

সরকারি কর্মচারীদের বাড়িভাড়া ভাতার ক্ষেত্রে এবার যুক্ত করা হচ্ছে বেসরকারি সংস্থার কর্মীকেও৷ এতদিন পর্যন্ত সরকারি কর্মচারীর স্বামী বা স্ত্রী বেসরকারি সংস্থার কর্মী হলে সেক্ষেত্রে বেসরকারি সংস্থা থেকে বাড়িভাড়া বাবদ প্রাপ্য আয়কে বিবেচনা করা হত না৷ এবার থেকে তা বিবেচনা করা হবে৷ স্বামী-স্ত্রী একই বাড়িতে থাকলে এবং সরকারি কর্মীর স্বামী বা স্ত্রী বেসরকারি সংস্থা থেকে বাড়িভাড়া পেলে সেই অঙ্কটাকে মাথায় রেখেই বাড়িভাড়া ভাতার ঊর্ধ্বসীমা নির্ধারণ করা হবে৷  এক্ষেত্রে ঊর্ধ্বসীমা ৬ হাজার টাকা হওয়ায় বেসরকারি সংস্থার কর্মী ৬ হাজার টাকার ঠিক যতটা কম বাড়িভাড়া পাবেন ঠিক সেই বাকি অংশটুকু পাবেন সরকারি কর্মচারী৷

অর্থাত্ বেসরকারি সংস্থার কোনও কর্মী যদিও ৪ হাজার টাকা বাড়িভাড়া ভাতা পান, সেক্ষেত্রে সরকারি সংস্থায় কর্মরত তাঁর স্বামী বা স্ত্রী পাবেন ২ হাজার টাকা৷ কিন্তু বেসরকারি সংস্থার কোনও কর্মী ৬ হাজার টাকা বা তার বেশি বাড়ি ভাড়া ভাতা পেলে সরকারি সংস্থায় কর্মরত তাঁর স্বামী বা স্ত্রী এই খাতে কোনও টাকাই পাবেন না৷   

সরকারের এই নয়া আদেশ সামনে আসার পর যথারীতি প্রতি সোচ্চার হয়েছে সরকারি কর্মচারী সংগঠনগুলি৷

সরকারি এই নতুন আদেশ ক্ষোভ বাড়িয়েছে সরকারি কর্মচারী মহলে৷

বাড়িভাড়া ভাতা নিয়ে সরকারের নতুন সিদ্ধান্ত ইতিমধ্যেই কার্যকরি করা শুরু হয়েছে৷ বিভিন্ন দফতরে, স্কুলে নির্দেশিকা পাঠিয়ে সরকারির কর্মীর স্বামী বা স্ত্রী বেসরকারি সংস্থায় কর্মরত হলে, তাঁর আয়ের হিসেব দাখিল করতে বলা হয়েছে৷

http://www.abpananda.newsbullet.in/state/34-more/43787-2013-11-20-14-13-39


মহার্ঘভাতা নিয়ে বিভ্রান্তি


এই সময়: রাজ্য সরকারি কর্মচারীদের কত শতাংশ মহার্ঘভাতা (ডিএ) বকেয়া রয়েছে? বিধানসভায় লিখিত বিবৃতি দিয়ে অর্থমন্ত্রী অমিত মিত্র জানিয়ে দিলেন সরকারি কর্মীদের কোনও ডিএ বকেয়া নেই৷ আর সেই বিবৃতিকে কেন্দ্র করেই মঙ্গলবার দিনভর তোলপাড় হয়ে গেল সরকারি মহল৷ সরকার ডিএ 'ফ্রিজ' করে দিচ্ছে বলে আতঙ্ক ছড়িয়ে পড়ে সারা রাজ্যেই৷ অর্থমন্ত্রীর লিখিত জবাবের কপি দ্রুত রাজ্যের নানা প্রান্তে ই-মেল, ফ্যাক্স মারফত ছড়িয়ে পড়ে৷ এসএমএসেও বার্তা চালাচালি চলে৷ ডিএ মিলবে না এই আতঙ্কে কাজকর্ম লাটে ওঠে সরকারি অফিসগুলিতে৷ বাদ যায়নি খোদ বিধানসভা ভবন এবং নবান্নে মুখ্যমন্ত্রীর অফিসও৷

রাতে অবশ্য সরকারের উচ্চমহল থেকে জানিয়ে দেওয়া হয় সরকারি কর্মচারীদের ডিএ 'ফ্রিজ' করা হচ্ছে না৷ প্রশাসনের পক্ষ থেকে বলা হয়েছে, অর্থমন্ত্রীর বক্তব্যের অপব্যাখ্যা করা হয়েছে৷ তিনি কখনও বলেননি ডিএ দেওয়া হবে না৷ বর্তমান সরকার ক্ষমতাসীন হওয়ার পর দু'বছরে দু'দফায় মোট ১৭ শতাংশ ডিএ দিয়েছে৷ এর জন্য রাজ্য সরকারকে মাসে ৪২৫ কোটি টাকা অর্থাত্ বছরে অতিরিক্ত ৫ হাজার কোটি টাকার ব্যয়ভার বহন করতে হয়৷ অর্থদন্তরের বক্তব্য, এই বিপুল খরচ সত্ত্বেও ডিএ নিয়ে পরিকল্পিত ভাবে বিভ্রান্তি ছড়ানো হচ্ছে৷

বিভ্রান্তির কেন্দ্রে ছিল বিধানসভায় অর্থমন্ত্রী অমিত মিত্রের একটি প্রশ্নের লিখিত জবাব৷ এ দিন বিধানসভায় সিপিএম বিধায়ক বাসুদেব খাঁর এক প্রশ্নের লিখিত জবাব দেন অমিতবাবু৷ অর্থমন্ত্রী এ দিন সভায় একাধিক প্রশ্নের জবাব দিলেও বাসুদেববাবুর প্রশ্নের লিখিত জবাবের কোনও ব্যাখ্যা দেওয়ার সুযোগ পাননি৷ বাসুদেববাবুর প্রশ্ন ছিল ২০১৩-র ৩০ সেপ্টেম্বরের সাপেক্ষে রাজ্য সরকারি কর্মীদের কত শতাংশ মহার্ঘভাতা বকেয়া রয়েছে? অর্থমন্ত্রীর লিখিত জবাব ছিল ৩০ সেপ্টেম্বর ২০১৩-র সাপেক্ষে রাজ্য সরকারি কর্মীদের কোনও মহার্ঘভাতা বকেয়া নেই৷ তবে কেন্দ্রীয় সরকার তাদের কর্মচারীদের যে মহার্ঘভাতা দিচ্ছেন তা রাজ্যের তুলনায় ৩৮ শতাংশ বেশি৷ এই বক্তব্যই বিভ্রান্তির মূল কারণ৷ অর্থমন্ত্রী বিবৃতির খবর শুনেই সরকারি কর্মচারী সংগঠনগুলি আন্দোলনের কর্মসূচি ঘোষণা করে দেয়৷ ২৭ তারিখ বিধানসভা অভিযানের ডাক দিয়েছে কো-অর্ডিনেশন কমিটি৷ নবপর্যায় এবং স্টেট গভর্নমেন্ট এমপ্লয়িজ ফেডারেশনও আন্দোলনের ডাক দেয়৷

অর্থদন্তর পরে ব্যাখ্যা দিয়ে জানিয়েছে অর্থমন্ত্রীর বিবৃতিতে কোনও অসঙ্গতি নেই৷ কেন্দ্রীয় সরকারের হারে এ রাজ্যে ডিএ দেওয়া হয় ঠিকই৷ কিন্ত্ত তার কোনও আইনি বাধ্যবাধকতা নেই৷ সেটি নিছকই প্রথা৷ তাই অর্থমন্ত্রী বলেছেন কেন্দ্রীয় সরকারের কর্মচারীরা ৩৮ শতাংশ বেশি ডিএ পাচ্ছেন৷ বাম আমলে এই বকেয়ার হার ৫০ শতাংশও ছাপিয়ে গিয়েছিল৷

অর্থদন্তরের এক পদস্থ কর্তা এ দিন বলেন, 'কেন্দ্রীয় হারে ডিএ দিতে রাজ্য সরকারগুলি বাধ্য নয়৷ তা ছাড়া দিল্লির সরকার রাজ্যগুলির উপর আর্থিক শৃঙ্খলা ফেরানোর নামে অর্থব্যয়ে একগুচ্ছ শর্ত চাপিয়ে দিয়েছে৷ কিন্ত্ত কেন্দ্রের টাকার কোনও অভাব নেই৷ তাই কেন্দ্রীয় সরকারের কর্মচারীদের ডিএ বকেয়া প্রায় থাকেই না৷ কিন্ত্ত রাজ্য সরকারগুলির তেমন আর্থিক সঙ্গতি নেই৷' অতীতে দু'দফায় ডিএ দেওয়ার কথা স্মরণ করিয়ে দিয়ে অর্থদন্তরের ওই কর্তা বলেন, মহার্ঘভাতা দেওয়া হবে কিনা তা সরকারের আর্থিক সঙ্গতির উপর নির্ভর করে৷ শুধু রাজনৈতিক সদিচ্ছা থাকলেই তা দেওয়া যায় না৷ তা সত্ত্বেও বিগত সরকারের রেখে যাওয়া ঋণভার বহন করেও প্রথমে সাত শতাংশ তার পর ১০ শতাংশ ডিএ দেওয়া হয়েছে৷

কর্মচারী সংগঠনগুলির অবশ্য বক্তব্য, কনজিউমার প্রাইস ইনডেক্স অনুযায়ী বেতনের সঙ্গে মহার্ঘভাতা দিতে সরকার বাধ্য৷ কারণ বেতন কমিশনের সুপারিশ মেনে কর্মচারীদের বেতন নির্ধারণ করা হয়েছে৷ দ্রব্যমূল্য বৃদ্ধির সঙ্গে সঙ্গে বেতনের মূল্যমান কমে যায় বলেই মহার্ঘভাতা দেওয়া হয়৷

http://eisamay.indiatimes.com/city/kolkata/controversy-with-dividend-allowence/articleshow/26084186.cms



রাজ্যের ডি এ বকেয়া নেই, বিবৃতি অর্থমন্ত্রীর

নিজস্ব সংবাদদাতা • কলকাতা

রাজ্য সরকারি কর্মীদের কোনও মহার্ঘ ভাতা (ডিএ) বকেয়া নেই বলে বিধানসভায় জানিয়ে দিলেন অর্থমন্ত্রী অমিত মিত্র। তবে একই সঙ্গে তিনি জানিয়েছেন, এই মুহূর্তে রাজ্য সরকারি কর্মচারীরা কেন্দ্রীয় সরকারি কর্মচারীদের থেকে ৩৮ শতাংশ কম ডিএ পাচ্ছেন। অমিতবাবুর এই বক্তব্যের পরে কেন্দ্র ও রাজ্যের ডিএ-র ফারাককে 'বকেয়া' বলে গণ্য করা হবে কি না, তা নিয়ে বিতর্ক তৈরি হয়েছে।

সিপিএম বিধায়ক বাসুদেব খাঁ অর্থমন্ত্রীর কাছে প্রশ্ন রেখেছিলেন, চলতি বছরের ৩০ সেপ্টেম্বর পর্যন্ত রাজ্য সরকারি কর্মীদের কত শতাংশ ডিএ বকেয়া রয়েছে? বিধানসভায় দাঁড়িয়ে এর কোনও জবাব দেননি অর্থমন্ত্রী। পরে প্রশ্নকর্তা বিধায়কের কাছে অর্থমন্ত্রীর যে লিখিত উত্তর পৌঁছয়, তাতে বলা হয়েছে: 'রাজ্য সরকারি কর্মীদের কোনও মহার্ঘ ভাতা বকেয়া নেই। তবে কেন্দ্রীয় সরকার তাদের কর্মচারীদের যে মহার্ঘ ভাতা দিচ্ছে, তা রাজ্যের তুলনায় ৩৮% অধিক'। প্রসঙ্গত, কেন্দ্রীয় কর্মীরা এখন ৯০% হারে ডি এ পান। রাজ্যের কর্মীরা পান ৫২%।

অর্থমন্ত্রীর জবাব দুপুরের মধ্যেই বিধানসভা ভবন, নবান্ন, মহাকরণ হয়ে জেলা সদরগুলিতে ছড়িয়ে পড়তেই বিতর্কের ঝড় ওঠে। বিতর্কের কারণ: কেন্দ্র ও রাজ্যের মধ্যে ডিএ-র ব্যবধানকে এত কাল বকেয়া হিসেবেই ধরা হতো। এবং তা ধরে নিয়েই বকেয়া ডিএ-র দাবিতে সরব হতো রাজ্য সরকারি কর্মী সংগঠনগুলি। এত দিন সেই বকেয়া ধারণার বিরোধিতাও করেননি কোনও মন্ত্রী বা আমলা।

কোন যুক্তিতে এই ফারাককে বকেয়া বলে গণ্য করছেন না অর্থমন্ত্রী?

সরকারি কর্তাদের ব্যাখ্যা, কেন্দ্র যে হারে ডিএ দেবে, রাজ্যকে সেই হারই মেনে নিতে হবে এমন কোনও বিধিবদ্ধ ব্যবস্থা নেই। এমনকী, এটা প্রথাও নয়। কেন্দ্র চলে কেন্দ্রের নিয়মে। রাজ্য চলে রাজ্যের নিয়মে। সেই জন্য কেন্দ্র ও রাজ্যের আলাদা বেতন কমিশন তৈরি হয়। রাজ্যের বেতন কমিশনও কখনও কেন্দ্রীয় হারে ডিএ দেওয়ার কথা বলে না। কেন্দ্র বছরে দু'টি নির্দিষ্ট সময়ে, জানুয়ারি এবং জুলাই মাসে, ডিএ দেয়। দু'একটি রাজ্য সেই প্রথা অনুসরণের চেষ্টা করলেও অধিকাংশ রাজ্য কিন্তু যখন যেমন পারে, সেই মতো ভাতার ব্যবস্থা করে। সেই কারণেই এ ক্ষেত্রে বকেয়া বলে কিছু হয় না।

অর্থ দফতরের আধিকারিকদের একটা অংশ অবশ্য বলছেন, দ্বিতীয় বামফ্রন্ট আমলেই কেন্দ্রীয় সরকারের সঙ্গে যথাসম্ভব সঙ্গতি রেখে ডিএ দেওয়ার সরকারি সিদ্ধান্ত হয়েছিল। তার পর থেকে সেই প্রথাই চলে আসছিল। এ দিন অর্থমন্ত্রীর বিবৃতির ফলে গোটা বিষয়টি ঘিরে বিভ্রান্তি তৈরি হয়েছে।

আর কেন্দ্রীয় হারে ডিএ দেওয়া রাজ্যের দায় নয়, এই সরকারি ব্যাখার সঙ্গেও সহমত নন বাম জমানার মন্ত্রীরা। এক বর্ষীয়ান প্রাক্তন মন্ত্রীর কথায়, "এই ব্যাখ্যার একেবারে গোড়ায় গলদ! মূল্যবৃদ্ধির সূচককে ধরে সরকারি কর্মীদের ক্ষতিপূরণের যে ব্যবস্থা হয়, তারই নাম ডিএ। রাজ্য সরকারি কর্মচারীদের কোনও ডিএ বকেয়া নেই মানে প্রকারান্তরে এটাই বলা যে, এই সময়ের মধ্যে রাজ্যে মূল্যবৃ্দ্ধি হয়নি!"

সরকারের একটি মহলেরও মতে, কেন্দ্র ও রাজ্য সরকারি কর্মীদের বেতন কাঠামো ঠিক করতে প্রতি ১০ বছর অন্তর বেতন কমিশন বসে। তারা যে সুপারিশ করে, সাধারণ ভাবে তা মেনে নেয় দুই সরকার। এর ভিত্তিতে রাজ্যগুলিতে তৈরি হয় 'রোপা রুল'। কিন্তু দু'টি বেতন কমিশন গঠনের মধ্যবর্তী সময়ে যে দ্রব্যমূল্য বৃদ্ধি হয়, তাতে অবশ্যম্ভাবী রূপে টাকার দাম কমে। টাকার দাম কত কমল, তা বোঝা যায় 'অল ইন্ডিয়া কনজিউমার প্রাইস ইনডেক্স'-এর মাধ্যমে। এর ভিত্তিতেই বাড়তি খরচ মোকাবিলায় ডিএ দেয় কেন্দ্র ও রাজ্য। এ রাজ্যে গঠিত পঞ্চম বেতন কমিশন ডিএ-র প্রসঙ্গে বলতে গিয়ে লিখেছে, এটা সরকারি কর্মীদের কোনও অতিরিক্ত পাইয়ে দেওয়া নয়। বরং, এটা তাঁদের ক্ষতি সামলাতে সাহায্য করা।

ওই মহলের মতে, প্রশ্ন হল এই 'অল ইন্ডিয়া কনজিউমার প্রাইস ইনডেক্স' অনুযায়ী কেন্দ্র অথবা রাজ্য সরকারি কর্মীরা ডিএ পাচ্ছেন কি না। দেখা যাচ্ছে, যে সূচকের ভিত্তিতে কেন্দ্র ও একাধিক রাজ্য ৯০% বা তার কাছাকাছি ডিএ দিচ্ছে, তার চেয়ে ৩৮% কম দিচ্ছে পশ্চিমবঙ্গ সরকার। অর্থাৎ এই পরিমাণ ডিএ রাজ্য সরকারি কর্মীদের পাওনা। সাধারণ ভাবে যা বকেয়া বলেই পরিচিত।

তত্ত্বগত ভাবে সেই ধারণা খারিজ করার পাশাপাশি কেন্দ্রীয় হারে ডিএ দিতে না-পারার কারণ হিসেবে আর্থিক অসচ্ছলতাকেই তুলে ধরছেন অর্থ দফতরের কর্তারা। তাঁদের বক্তব্য, ক্ষমতা থেকে চলে যাওয়ার সময়ে বামফ্রন্ট ২৩% ডিএ বকেয়া রেখে গিয়েছিল। নতুন সরকার দু'বছরে তার ১৭% মিটিয়েছে। বাকি ৬% দু-এক মাসের মধ্যে দেওয়ার চেষ্টা চলছে। তাঁদের ব্যাখ্যা, এই ১৭% ডিএ দিতেই বছরে ৫১০০ কোটি টাকা অতিরিক্ত খরচ হচ্ছে। এখন কেন্দ্রের সঙ্গে সমতা রাখতে এর পরে যদি ৩৮% ডিএ দিতে হয়, তা হলে বছরে আরও ১১ হাজার ৪০০ কোটি টাকা প্রয়োজন। অর্থ দফতরের এক শীর্ষ কর্তার কথায়, "এই টাকা খরচের মতো অবস্থা রাজ্য সরকারের নেই। তাই ডিএ বাড়লে সেই বাড়তি টাকার দায়িত্ব কেন্দ্রীয় সরকারকে নেওয়ার দাবি জানানো হয়েছে অর্থ কমিশনের কাছে।"


পুরনো খবর: দিল্লি দায় নিলে তবেই রাজ্যে গড়া হবে নয়া বেতন কমিশন

http://www.anandabazar.com/20raj1.html


No comments:

Post a Comment

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Welcome

Website counter

Followers

Blog Archive