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Saturday, June 14, 2014

बड़वानी में सैकडो विस्थापितों का प्रदर्शन, सरदार सरोवर की उंचाई बढाने का विरोध

दिनांक - 14 जून, 2014

बड़वानी में सैकडो विस्थापितों का प्रदर्शन, 
सरदार सरोवर की उंचाई बढाने का विरोध 

बडवानी जिले के दो जन प्रतिनिधियेां ने खुला समर्थन व्यक्त किया 

बड़वानी -  सरदार सरोवर बांध की उंचाई 138.68 मीटर तक बढाकर 48,000 जनसंख्या को डुबाने के अमानवीय निर्णय के विरोध मे आज नर्मदा घाटी के बडवानी, अंजड, कुक्षी, मनावर, धरमपुरी महसिलों के गाँव-गाँव से किसानों, आदिवासियों, मजदूरों, मछुआरेों ने जिला मुख्यालय पहँुचकर शहर के मुख्य मार्गो से रेली निकाल कर, प्रदर्शन किया। 

रेली ओर प्रदर्शन मंे बड़वानी विधान सभा के विधायक श्री रमेश पटेल ओर राजपुर विधानसभा के विधायक श्री बाला बच्चन ने सेकडांे किसानों के साथ काली पट्टियँा पहनकर, केन्द्र शासन के इस गैर कानूनी निर्णय का विरोध किया। श्री पटेल ने इस निर्णय का खंडन करते हुये मांग की कि भारत सरकार को उंचाई बढाने के बदले सभी गांवो में सम्पूर्ण पुनर्वास और लोगों के कानूनी अधिकार सुनिश्चित करना चाहिए। 

श्री बाला बच्चन ने दावा किया कि एक तरफ दिल्ली में मोदी जी के नेतृत्व में सरकार ने यह गलत निर्णय लिया और शिवराज सिंह जी ने इस निर्णय का स्वागत किया, मगर उसके पहले क्षेत्र की जनता, उनके तीन दशकों के आंदोलन का इतिहास, सर्वोच्च अदालत के कई फैसले, कानूनी प्रक्रिया, मैदानी हकीकत, आदि को पूरी तरीके से अनदेखा कर दिया। 

दोनों विधायकों ने घाटी की जनता के जायज लडाई का खुला समर्थन व्यक्त किया ओर आश्वासन दिया कि हर मोर्चे पर लोगों के साथ खडा रहेंगें। किसानों ओर आदिवासियों की ओर से देवराम कनेरा, महेश पटेल, महेन्द्र जाट, कमला यादव, करीम चाचा, पेमा भाई आदि ने लडाई के विभिन्न मुददों को प्रस्तुत करते हुए, केन्द्र शासन की इस गलत ओर घातक निर्णय को चुनौती दी गई। 

आंदोलन ने एक खुली अपील जारी करते हुए, संघर्ष के कारण ओर तर्क विधायकों ओर क्षेत्र की जनता को प्रस्तुत किया। नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण द्वारा पुनर्वास बाकी परिवारांे की संख्या शून्य बताने वाले दस्तावेज ओर बांध के प्रतिक को जलाते हुये आंदोलनकारियों ने कार्यक्रम सम्पन्न किया। देश के विभिन्न संगठनों और समूहों द्वारा नर्मदा घाटी की संघर्ष को समर्थन मिल रहा है। कल दिल्ली में समर्थकों ने केन्दी्रय जल संसाधन मंत्रालय के समक्ष धरना दिया। आज पुना में सेनापति बापट शहीद चैक पर कई लोगों ने प्रदर्शन किया और समर्थन जताया।  हम केन्द सरकार को यह गलत निर्णय वापस लेने का आगृह करते है ओर चुनौती देते है कि विकास के झूठे सपने दिखाते हुए, सच्चाई को छिपाते हुये, कानून को तोड़ते हुये, गांवो को मनमानी तरीके से न उजाडे अन्यथा क्षेत्र की जनता अपना आंदोलन तीव्र करेगी। 
 
(राहुल यादव)  (कैलाश यादव)  (मुकेश भगोरिया)   (मोहन पाटीदार)
फोनः 09179148973
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दिनांक - 14 जून, 2014

सरदार सरोवर की उंचाई के साथ उसकी महिमा बढाने की दोशी है सरकार

महाराष्ट्र शासन आदिवासी और राज्यहित की नुमाइंदगी छोड़कर चुप क्यों?


केन्द्र शासन ने सरदार सरोवर की उंचाई 122 मी से आगे 138.68 मीटर (17 मी.) बढाने का अमानवीय और ओर अन्यायपूर्ण र्निाय किस तरह और किस आधार पर लिया, इस सवाल का जवाब है, निर्णय लिया गया, पूरी कानूनी प्रक्रिया और संरचनाओं तोड़मरोड़ कर। साथ ही इस बांध को केवल गुजरात के बड़ें उद्योगपतियों के दबाव में आगे बढाने के लिये अब इसकी महत्ता भी चढा बढाकर दिखाई जा रही है जबकि इससे होने वाली त्रासदी छुपाने के लिये झूठे या गलत आकडे पेश किये जा रहे है। ‘विकास’ का मूलमंत्र और ‘जनतंत्र’ भी कितना विकृत हो सकता है, इसी का यह नमूना है और नये केन्द्र शासन की परीक्षा भी होने जा रही है। 

जो जानकारी सामने आयी है, उससे यह स्पष्ट है कि सरदार सरोवर संबंधी निर्णय में सर्वोच्च अदालत के 2000 अक्टूबर के फैसले में सूचित निर्णय प्रक्रिया व संरचना की अवमानना की गई है। निर्णय लेते वक्त पर्यावरण मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में गठित पर्यावरण उपदल की पूर्व बैठक तथा 17 मीटर उंचाई बढाने की मंजुरी वह भी पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति कार्य की पूर्व शर्त का पालन सुनिश्चित करने के बाद दी जाना जरूरी था। हमारी जानकारी अनुसार यह बैठक और मंजुरी नही ली गयी। सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय के नेतृत्व में चलते आये पुनर्वास उपदल की स्वतंत्र बैठक व पुनर्वास कार्य पूरा होने के बाद दी जाने वाली मंजुरी भी टाल दी गई है। इस दोनो उपदलो की मंजुरी का स्पष्ट आदेश सर्वोच्च न्यायालय से लागू होते हुए इन दोनो आधारो को तथा संबंधित दोनो मंत्रालयो और मंत्रीयो को भी नकारा गया है। क्या भारत नही केन्द्रीय मंत्रिमंडल तथा विकास योजना पर निर्णय ही मोदीमय हो चुका है। 

नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण (एनसीए) की अंतरराज्य संरचना इसीलिये बनी है कि सरदार सरोवर केवल गुजरात का बांध नही है। इस बांध में महाराष्ट्र और सबसे ज्यादा म0प्र0 की उपजाउ भूमि गांव जा रहे है। उनसे नर्मदा और उसका पानी पर हक ही छीना जा रहा है, तथा लाभो की मात्राअनुसार हर राज्य का पूंजी निवेश भी है। जैसे महाराष्ट्र और म0प्र0 को एक बंूद पानी इस योजना से नही मिल रहा है, केवल 27 प्रतिशत व 57 प्रतिशत (अनुक्रम में) बिजली तो बिजली निर्माण के खर्च का 27 और 57 प्रतिशत हिस्सा ये राज्य बराबर चुका रहे है। 

लेकिन नर्मदा कंट्रोल आथरिटी की बैठको में इन राज्यो में बनी विस्थापन पुनर्वास की हकीकत, राज्यों के आर्थिक हिस्से/भागीदारी में वर्षो से चल रहा विवाद तथा गुजरात ने बायपास केनल द्वारा अधिक पानी लेने की चलायी हुई साजिस संबंधी वर्षो तक चर्चा ही नही हुई है। पुनर्वास जैसे अत्यंत गहन मानवीय सवाल संबंधी कोई गहरी चर्चा के बिना केवल गुजरात की सोचकर यह निर्णय लिया गया है इस पर संदेह नही। महाराष्ट्र पुनर्वास मंत्री श्री कदम या नंदुरबार जिलाधिकारी जबकि 450 आदिवासी परिवारो का पुनर्वास बाकी है, यह कहते है तब हकीकत यह है कि उन्होने ही 9 जून की जिलास्तरीय बैठक में 600 परिवार बाकी बताये थे और हमने उन्हें शासन के साथ किये गये हमारे सयुक्त सर्वेक्षण के आधार पर 1000 से अधिक परिवारो का पुनर्वास बाकी है और 300 परिवार अघोषित से घोषित होना बाकी है, यह बात स्पष्ट की थी। 

म0प्र0 में तो जिन हजारो किसान परिवारों को जमीन के बदले पैसा (5 एकड़ के बदले 5.5 लाख केवल) देकर खरीदी के नाम पर जमीन की फर्जी रजिस्ट्रीयां बनाकर फसाया गया है, उनकी जांच हायकोर्ट से नियुक्त न्यायाधीश श्रवणशंकर  झा आयोगब की ओर से जारी है। और फर्जी रजिस्ट्रया कम नही 2000 से 3000 तक निकलेगी यह निश्चित है जिसमें म0प्र0 के कई पुनर्वास अधिकारी राजस्व के कर्मचारी दलालो के साथ दोषी करार होगे, यह भी दिखाई दे रहा है। कुल 45000 परिवार (2.5 लाख लोग) डूब क्षेत्र में होते हुये तथा पात्रताअनुसार ज्यादा प्रभावित किसानों के लिये दोनो राज्यों में हजारो हेक्टेयर्स जमीन ढूढनी और देनी है तथा मछुआरे, कुम्हार, दुकानदारो को वैकल्पिक आजीविका देना बाकी है। सर्वोच्च अदालत के चार फैसलो के अनुसार ट्रिब्यूनल फैसले का पूरा पालन, यही डूब/विस्थापन के पहले पुर्वशर्त होते हुए, इसे भी निर्णय करते वक्त सोच समझकर नजर अंदाज किया गया। 

सवाल यह है कि क्या इन दोनो राज्यों ने बांध की अंतिम उंचाई तक जोन के इस निर्णय को सहमति दी है। गुजरात तो अपने बचे हुए सैकडो आदिवासियों की बात तक नही करता, न ही लाभक्षेत्र में जल जमाव बांध के नीचे के क्षेत्र में पानी, मछली, पर मदुआरो पर असर आदि की परवाह करता...... लेकिन म0्रप0 ने केवल दलीय हित संबंध का सोचकर अपने भरे पूरे गांव, धरमपुरी जैसा शहर, सांस्कृतिक धरोहर और नदी की खेती की, सदियों पुराने मंदिरो घाटों की आहुति देने का कार्य किया है शायद। क्या महाराष्ट्र ने भी उंचाई बढाना मंजूर किया ?

यह चित्र सामने आया है कि न किसी केन्द्रीय मंत्री या मंत्रालय ने कोई अध्ययन किया न कागज पत्रो का न ही न्यायालयीन फैसलो का अध्ययन किया, न ही धरातल की स्थिति देखी। महाराष्ट्र में काग्रेस राष्ट्रवादी की सत्ता होते हुए भी, राज्य का प्रतिनिधित्व क्यों नही किया गया या सोच समझकर कमजोर रखा गया ? निर्णय पर कोई प्रतिक्रिया न देते हुए महाराष्ट्र चूप क्येां? हजारो करोड़ रू का पूंजीनिवेश होते हुए इस योजना को गंुजरात का मानता है या नरेन्द्र मोदी जी का 400 करोड़ रू की मुफ्त बिजली महाराष्ट्र खो रहा है, इस झूठे चुनावी प्रचारी बयान पर विश्वास करता है। यह निश्चित कि महाराष्ट्र ने अपने आदिवासियेां के तथा राज्य के हितों की ही आहुति इस निर्णय के रूप में दी है। क्या अभी भी जवाब देगे। 

लाभों का जाल फैलाने वाले सरदार सरोवर की सच हकीकत छुपाकर इस निर्णय के साथ न केवल उसकी उंचाई किन्तु महत्ता भी बढायी जा रही है। सच तो यह है कि सरदार सरोवर के लाभ हानि का ब्योरा ही पूरा बदल गया है। सिंचाई 18 लाख हे. में नही होने वाली है। अभी तक मोदी सरकार ने तय कर चुकी पानी, कच्छ सौराष्ट्र के लिये भी अब प्राथमिकता नही रही। अधिकतर पानी उद्योगो को दिया जा रहा है और जब नहरो का निर्माण ही 30 सालों में 30 प्रतिशत हुआ तो पानी न खेतो को न गांव फलियो को उद्योगो की ओर मोड़ना तय है। बांध की लागत सच्चाई छुपाकर बांध लाभदायक बताते गये इसीलिये बांर बार बढानी पडी आज 90000 करोड़ रू तक पहुची है तो लाभ हानि के अपूर्णाक का क्या हुआ । योजना आयेाग तक किसी ने भी 1983 के बाद कभी जांच नही की गुजरात की जनता से भी सच्चाई छुपा के रखी । 

सबसे गंभीर यह है कि महाराष्ट्र म0प्र0 और गुजरात के भी आदिवासी गांवो को जमीन पाीढियों पुराने जंगल को डूबोकर जो अर्ध जलाशय निर्मित हुआ, उसमें से 25 प्रतिशत ही पानी आज भी गुजरात उपयेाग में ला रही है। तो फिर आज ही बांध की उंचाई बढाने की जरूरत क्या है। 

साफ है कि महाराष्ट्र म0प्र0 अपने ही विस्थापितों की नुमांइंदगी नही करते और गुजरात के पूंजीनिवेशक मोदी शासन (कल का और आज का) पर दबाव बना के रखते, इसीलिये यह विकृत अन्यायपूर्ण निर्णय लिया गया है। आज भी इस निर्णय को प्रक्रिया कानूनी न होने के कारण चुनौती देना जरूरी है। क्या महाराष्ट्र शासन कुछ बोलेगी। क्या दलीय भेद भूलकर आदिवासी किसान मछुआरो की साथ राजनेता देगे। आंदोलन का तो तय है कि हम इस निर्णय को हर मोर्चे पर चुनौती देेगे। न्याय के बिना विकास नामंजूर करेगे..... न केवल नर्मदा में और लडेगे, कानूनी तथा मैदानी लडाई भी 

(मेधा पाटकर)  (देवराम कनेरा)  (मीरा बहन)  (नूरजी पाडवी)
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भारत सरकार होश मे आओं

सरदार पटेल को याद करो, सरदार सरोवर को रोक दो 

हम सरदार सरोवर की ऊँचाई बढाने का विरोध क्यो कर रहे है?

क्योंकि आज भी बांध के डूब क्षेत्र में करीब 48,000 परिवार निवासरत है, म.प्र. में ही 45,000 परिवारों का भविष्य अंधेरे मे है। 
क्योंकि हजारांे किसानांे, आदिवासियों से कानून वैकल्पिक खेती लायक, सिंचित जमीन का हक, भूमिहीनांे, मछुआरांे, कुम्हारांे से वैकल्पिक आजीविका का हक छीनते हुए, जीवित गाँवों को डुबाया जा रहा है। 
क्योंकि म.प्र, महाराष्ट्र ओर गुजरात के डूब क्षेत्र के 245 गाँवों में हजारों हेक्टेयर अति उपजाऊ जमीन, बहुमूल्य फसलें, लाखों पेड़ मंदिरें, मस्जिदे, घाट, शालाऐं अस्पताल, बाजार, आदिवासी देवे-दानी, चारागाह जमीन, को गैरकानूनी ओर अमानवीय रूप से डूबाने का निर्णय लिया गया है। 
क्योंकि पुनर्वास के नाम पर हजारों किसानो को सिर्फ पथरीली, अतिक्रमित जमीनों का कागजी आवंटन किया गया है। लेण्ड बैंक ओर मुआवजे के नाम पर विस्थापितो के साथ छलावा हो रहा है। वसाहटें रहने योग्य स्थिति में नही है। एसी अवस्था में मुूल गाँवों में बांध का पानी भरने का निर्णय, जल समाधि के लिए मजबुर करने के बराबर है। 
क्योंकि म0प्र0 में करीब 1,000 करोड़ रू भ्रष्टाचार घोटाले की जांच 5 सालों से चालू है। लगभग 3,000 फर्जी रजिस्ट्रियंा, 88 बसाहटों में करोड़ो रूपये का गबन, अनुदान ओर घर प्लाट वितरण में करोडों रूपये का भ्रष्टाचार, दलालों, आधिकारियेां द्वारा गरीबांे की लूट - इनकी जांच रिपोर्ट आने के पहले घाटी को डूबाना राजनीतिक साजिश है। 
क्योंकि माननीय सर्वेाच्च अदालत और उच्च न्यायालय के कई फैसले ओर शिकायत निवारण प्राधिकरण के सेकडों आदेशों का पालन न करते हुये, हजारों आवेदन लंबित होते हुए, हमें डुबाना गैर कानूनी ओर न्यायालय की अवमानना है। 
क्योंकि हजारों गरीब, दलित, आदिवासी, मानकर, नायक, पिछडा वर्ग, अल्पसंख्यक, महिलााएँ, विधवायें, व्यवस्क पुत्र एवं पुत्रियां, आदि को अपना कानूनी हक से वंचित किया जा रहा है, बर्बाद किया जा रहा है। 
क्योंकि लगभग 70 हजार करोड़ रूपये तक खर्चा पहंुचते हुये, बांध का पूरा खर्च 90 हजार करोड़ तक अनुमानित होते हुय,े आज भी सिंचाई, बिजली ओर पीने के पानी के झूटे दावांे से गुजरात की जनता को भी गुमराह किया जा रहा है। म0प्र0 और महाराष्ट्र को भी लूटा जा रहा है। 
क्येांकि बिजली के वादे, म0प्र0 को चमकाने की घोषणाओं के पीछे वास्तविक स्थिति और आंकडों को छुपाकर घाटी को डुबाया जा रहा है। जबकि 138 मीटर पर भी मात्र 10 से 20 प्रतिशत बिजली का अतिरिक्त उत्पादन संभावित है, बिजली का जाल ओर शहरों की चाल से गांवो को उजाडा जा रहा है। 
क्योंकि मोदी जी 13 साल गुजरात के मुख्यमंत्री होते हुये भी, वहां नहर निर्माण पर हमारा विरोध नही होते हुए भी, 30 प्रतिशत से कम नहरें बनाना, 20 प्रतिशत से कम जलाशय का पानी का उपयोग करना, गुजरात की नाकामी, कच्छ ओर सौराष्ट के लोगो के साथ भी धोखाधडी है। घाटी के गाँवों को डुबाकर, 122 मी. पर 2 लाख हेक्टर से भी कम सिंचाई होना, शर्मनाक है। 
क्योंकि सिंचाई ओर ग्रामीण विकास के बहाने गुजरात में नर्मदा का पानी कंपनियांे, उद्योगांे, शहरी क्षेत्रांे को मोड़ना, गुजरात के ओर घाटी के किसानों के साथ धोखाधड़ी है। हजार लीटर पानी मात्र 10 रू में कंपनियों को देना विकास के नाम पर लूट की छूट नही तो ओर क्या ?  
क्योंकि गुजरात मंे 4 लाख हेक्टर जमीन लाभक्षेत्र से बाहर करने का निर्णय, निजी कंपनीयेां के मुनाफे के लिये किसानों ओर गांवो को लूटने की नीति हमें नामंजूर है। 
क्योंकि 55 गवों ओर धरमपुरी शहर को डूब से बाहर करने के खतरनाक खेल को केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने ही नकार दिया है। 2013 की डूब से साबित हो चुका है कि 138 मीटर पर घाटी का कोई भी गांव या आबादी बचने वाला नही है। आकडों के खेल, झूटे सर्वे ओर कागजी पुनर्वास हमें नामंजूर है। 
क्योंकि कई पर्यावरण मंत्रालय के ही रिपोर्ट द्वारा साबित हो चुका है कि शर्तों का उल्लंघन हुआ है - लाभक्षेत्र विकास कार्य, वैकल्पिक वनीकरण, जलग्रहण क्षेत्र उपचार, मछली, स्वास्थ्य पर असर भूकम्प के खतरे, सांस्कृतिक धरोहर आदि महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर करोडो का खर्चा तो जरूर हुआ है मगर एक भी शर्त का पूरा अम्मल नही हुआ है। 
क्योंकि स्वर्गीय किसान नेता सरदार पटेल के पुतले के नाम पर राजनीति, विस्थापन ओर पर्यटन के लिये, तीन राज्यों के पुनर्वास से ज्यादा खर्चा करना (2,500 करोड़ रू) ओर नर्मदा घाटी को डूबाना अमानवीय है ओर सरदार पटेल के साथ भी छलावा है। 

इसलिये, हम नर्मदा घाटी की जनता अपने हक के लिये ही नही, प्रदेश और देश के हित के लिये भी इस गैर कानूनी निर्णय को चुनौती दे रहे है। हम सभी संवैदनशील नागरिकों, संस्थाओं, माध्यमकर्ता, व्यापारी, विभिन्न राजनीति एवं सामाजिक समूह से अपील करते है कि घाटी की लडाई को समझे ओर हर प्रकार से हमें सहयोग करें। 

नर्मदा घाटी की जनता

गैरकानूनी निर्णय वापिस लो, 

पुनर्वास के साथ, पुनर्विचार भी करो

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