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Sunday, June 15, 2014

मतांतर : हिंदी और गलतफहमी

मतांतर : हिंदी और गलतफहमी

विष्णु नागर
जनसत्ता 15 जून, 2014 : प्रभु जोशी ने अपने लेख ‘भाषा के दिन’ (8 जून) में सोशल मीडिया पर उन ‘हिंदीयाए लोगों’ पर उचित ही व्यंग्य किया है, जो इस बात से पीड़ित होने लगे थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति महोदय को अपना पहला पत्र क्यों अंगरेजी में लिखा? वैसे जोशीजी की भी सहानुभूति उन ‘हिंदीयाए लोगों’ के साथ ही है, जिन्हें वे सावधान कर देना चाहते हैं कि यह दिल को ठेस लगने का मात्र श्रीगणेश है, आने वाला समय (हिंदी को लगने वाली) ठेसों की ऐसी असमाप्त शृंखला से भरा होगा, यानी हिंदी के मामले में मोदीजी से बड़ी उम्मीदें मत पालिए। वे शायद ठीक ही कहते हैं और कुछ और ठीक बातें करने के चक्कर में मैं भी कुछ निवेदन करना चाहता हूं। 
मगर मैं अपनी बात शुरू करने से पहले उसी रविवार को हिंदुस्तान टाइम्स के पहले पृष्ठ पर प्रकाशित प्रशांत झा की रिपोर्ट की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा, जिसमें कुछ ताजा घटनाक्रमों के सहारे इसके विपरीत बात बताई गई है। इसमें कहा गया है कि पिछली यूपीए सरकार के मुखिया के विपरीत मोदीजी हिंदी में बोलने में चूंकि सहज महसूस करते हैं, जिसका असर अब दीखने लगा है। सचिवों की चर्चित बैठक को भी उन्होंने हिंदी में ही संबोधित किया था। प्रधानमंत्री कार्यालय में नियुक्तियां करते समय भी उन्होंने इस बात का विशेष रूप से खयाल रखा है कि जो अंगरेजी के साथ हिंदी बोलने में पारंगत हों, उन्हीं को रखा जाए। उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में आए विदेशी अतिथियों से भी हिंदी में ही बात की थी, जिसका अंगरेजी अनुवाद किया गया था। मोदीजी अपने वरिष्ठ मंत्रियों और पार्टी नेताओं से भी हिंदी में ही बात करते हैं, हां कोई गुजरातीभाषी हो तो उससे स्वाभाविक ही अपनी मातृभाषा में बात करते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि मोदीजी के इस रुख से वे वरिष्ठ अधिकारी अब चिंतित होने लगे हैं, जो दक्षिण भारत से आते हैं और जिन्हें धाराप्रवाह हिंदी बोलनी-समझनी नहीं आती। 
अगर ‘हिंदीयाए लोग’ इन तथ्यों के बाद अपनी खोई हुई खुशी लौटाना चाहें तो वे इसके लिए स्वतंत्र हैं और खुद प्रभु जोशी चाहें तो वे अपनी आशंकाओं को वापस ले सकते हैं और माना जा सकता है कि हिंदी के अच्छे दिन आ चुके हैं। राजभाषा विभाग गृहमंत्री राजनाथ सिंह के जिम्मे है, जो सदा-सर्वदा हिंदी में ही बोलते आए हैं, हालांकि इस मंत्रिमंडल में अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद जैसे मंत्री भी हैं, जिनकी लगता है कि मातृभाषा अंगरेजी है, जो मजबूर होने पर हिंदी बोलने की कृपा किया करते हैं। 
मेरे जैसे लोग न तो इस बात से निराश हुए थे कि मोदीजी ने अपना पहला पत्र राष्ट्रपति को अंगरेजी में लिखा था और न इस बात से अतिउत्साहित हो गए हैं कि मोदीजी हिंदी ही बोलते हैं, प्रभुवर्ग की भाषा अंगरेजी नहीं। जैसा कि प्रशांत झा कि रिपोर्ट से भी जाहिर है कि मोदीजी के हिंदीप्रेम का उनकी अपने भाषा ज्ञान से ज्यादा संबंध है, अपनी सरकार में हिंदी का प्रभुत्व बढ़ाने से नहीं। अंगरेजी उन्हें नहीं आती है, ऐसा भी नहीं है, मगर इतनी भी नहीं आती कि मनमोहन सिंह या राजीव गांधी की तरह उसका सहजता से ठीक-ठीक और सावधान उपयोग कर सकें। इसलिए मोदीजी के लिए या उनकी सरकार के लिए यह कोई नीतिगत या विचारधारात्मक मामला नहीं है, यह कोरी प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत सुविधा का सवाल है और इसे इसी रूप में लिया जाना चाहिए। इसे व्यर्थ के अतिउत्साह या अतिनिराशा में नहीं फंसेंगे। वैसे किसी प्रधानमंत्री को बहुत अच्छी अंगरेजी आती है या नहीं, यह अपने आप में उसकी योग्यता या अयोग्यता का सूचक नहीं है और लोकसभा में भाजपा को सीटों का बहुमत इस आधार पर मिला भी नहीं है, 

न कभी किसी पार्टी को मिला है। 
वैसे यह समझ लिया जाना चाहिए कि अपने अखिल भारतीय स्तर पर अधिक विस्तार के लिए आकुल भाजपा हिंदी के प्रति अतिरिक्त प्रेम दिखाने की गलती करने नहीं जा रही है। वह युग गया, जब भाजपा का पूर्व अवतार जनसंघ हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान किया करता था और यह अच्छा ही हुआ कि वह युग चला गया। हिंदी और हिंदू को एकमेक करने की यह जिद दोनों के दीर्घकालिक हित में नहीं थी। वैसे भी केंद्र या किसी राज्य सरकार के मुखिया द्वारा अपने दैनिक व्यवहार में स्थानीय भाषा या हिंदी को प्रमुखता देना उस सरकार के जनोन्मुख होने का स्वत: प्रमाण नहीं है। अपने आसपास की तमाम मौजूदा और विगत सरकारों को देखिए, तो इस बात के ढेरों प्रमाण मिल जाएंगे। 
यही अंगरेजी में मरने-जीने वाले मनमोहन सिंह और हिंदी का अधिकतम व्यवहार करने वाले नरेंद्र मोदी के संदर्भ में भी कहा जा सकता है। इन दोनों की नीतियां लगभग एक हैं, बल्कि सिंह साहब जिन आर्थिक नीतियों के कारण अलोकप्रियता के शिखर पर विराजमान हो गए थे, उन्हीं नीतियों को अधिक उत्साह से मोदीजी लागू करने जा रहे हैं, इसके सभी संकेत बजट से पहले ही मिलने लगे हैं। इसलिए मन को समझाने के लिए कुछ भी सोचते-मानते रहिए, खुश और दुखी होते रहिए, मगर अंगरेजी हटाओ हिंदी लाओ के नारे से चीजें अब बहुत आगे निकल चुकी हैं। इसलिए उस किस्म की सरल दिमागी से अब काम नहीं चलेगा। कहीं ज्यादा बड़े परिप्रेक्ष्य में सोचने की जरूरत है और ऐसा कह कर मैं अंगरेजी की कतई वकालत नहीं कर रहा हूं, सिर्फ इतना कह रहा हूं कि हिंदी के प्रति इस तरह के उत्साह या निराश का कोई मतलब नहीं रह गया है। 
मोदीजी ने सार्क देशों के प्रमुखों से हिंदी में बात की, बहुत अच्छा है, मगर मात्र इससे यह सिद्ध नहीं हो जाता कि इन देशों से हम और वे मुल्क हमसे आगे अच्छे ही रिश्ते बनाएंगे? चीन, जापान या रूस की द्विपक्षीय या बहुपक्षीय नीतियां भी उन देशों द्वारा अपनाई जा रही स्वभाषा से तय नहीं होतीं। इसी तरह इस सरकार का मुखिया चूंकि हिंदी का ज्यादा इस्तेमाल करेगा, इसका स्वत: अर्थ यह नहीं हो जाता कि कोई गरीब हिंदीभाषी, तमिल या असमिया प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखेगा या मिलने आएगा तो न केवल उसकी बात सुनी जाएगी, बल्कि उसका स्वागत किया जाएगा। उसके प्रति व्यवहार में कोई अंतर नहीं आने वाला है। 
और जो अंगरेजी का वर्चस्व आज है, उसके पीछे एक लंबा इतिहास है, जबर्दस्त राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय लॉबियां सक्रिय हैं, इसलिए यह क्या कोई भी सरकार उसे न कम करना चाहेगी, न कर पाएगी। अंगरेजी प्रभुवर्ग की भाषा है और उस वर्ग ने अपनी पूरी ताकत इस सरकार को लाने में लगा दी थी, तो उस वर्ग की भाषा से मोदीजी कैसे मुंह मोड़ेंगे? कैसे उसके चैन में खलल डालेंगे? और इस गलतफहमी को तो मनमोहन सिंह ने ही दूर कर दिया था कि गरीब वर्ग से आने वाला आदमी सबसे पहले उस वर्ग के बारे में सोचता है। इसलिए जोशीजी अपनी मालवी में कहूं नीवरी गलतफहमी पालने से कर्इं फायदो? 

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