दलित विमर्श : निष्क्रियता के दौर में
केदार प्रसाद मीणा
जनसत्ता 15 जून, 2014 : हिंदी के दलित साहित्य में काफी समय से कोई हलचल नहीं हुई है, सिवाय तुलसीराम की आत्मकथा के दूसरे भाग ‘मणिकर्णिका’ के। हालांकि इस आत्मकथा का वैसा स्वागत नहीं हुआ, जैसा इसके पहले भाग ‘मुर्दहिया’ का हुआ था। इसका एक कारण यह हो सकता है, जो दलित लेखकों के खेमों से उठाया जा रहा है, कि तुलसीराम की आत्मकथा का यह भाग एक दलित युवक में प्रखर बौद्धिकता के दर्शन कराता है और सवर्ण समाज को दलितों में यही चीज पसंद नहीं आती, इसलिए वे इसकी चर्चा नहीं कर रहे हैं। उनके मुताबिक, इसमें तुलसीराम रचना की श्रेष्ठता के ‘प्रमाण-पत्र विके्रताओं’ के चंगुल से भी निकलते दिखते हैं, इसलिए इसकी गाज इस रचना पर गिर रही है।
विश्वविद्यालयों के कुछ दलित शोधार्थी दबी जुबान से कह रहे हैं कि आत्मकथा के इस भाग के युवा तुलसीराम अच्छी शिक्षा और तार्किक राजनीति का आग्रह न रख कर सवर्ण प्रोफेसरों-नेताओं की जी-हुजूरी में अंत तक लगे दिखते तो ‘मणिकर्णिका’ भी उतनी ही चर्चित होती, जितनी ‘मुर्दहिया’ हुई है। इन सब का मानना है कि अगर इसमें भी दलित अपने ‘शुद्रत्व’ के साथ नजर आते और अपने घर-परिवार, खासकर महिलाओं की लोकलाज के जाने, पति-पत्नियों के झगड़े आदि का जिक्र होता तो यह भाग भी ‘लाजवाब’ साबित होता! इसके अलावा भी एक पक्ष है, दलित साहित्य का। खुद के दलित न होने का अफसोस न करते हुए और दलित होने का गुमान न पालते हुए काम कर रहे दलित और गैर-दलित बुद्धिजीवियों का मानना है कि ‘मणिकर्णिका’ भी उतनी ही बेहतरीन रचना है, जितनी कि ‘मुर्दहिया’ या ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ हैं, अपने भिन्न प्रखर बौद्धिकता से भरे प्रसंगों के साथ।
इनका यह मानना सही लगता है कि चूंकि ‘मणिकर्णिका’ तुलनात्मक रूप से अधिक गंभीर रचना है, इसलिए दलित साहित्य में ‘बदले की भावना’ जैसे हलके बौद्धिक स्तर से लबालब बड़े वर्ग को इस रचना ने काफी निराश किया है। इसलिए ‘वहां’ इसका वैसा स्वागत नहीं हुआ। इस पक्ष के अनुसार यह रचना बड़े दलित बुद्धिजीवी वर्ग की दो दशक पहले बनी घृणा और गाली-गलौज वाली दलित-दृष्टि के अनुकूल नहीं है।
दूसरे पक्ष के इन बुद्धिजीवियों की इस बात में अगर तनिक भी सच्चाई है तो यह एक गंभीर बात है कि दिन-रात ईमानदार मेरिट का आग्रह रखने वाला दलित बुद्धिजीवी वर्ग ऐसी रचना का खुल कर सम्मान करने से कतरा रहा है, जिसमें मेरिट के दर्शन अधिक होते हैं। या इसकी वजह है कि बड़े दलित साहित्यकार इतने आत्मकेंद्रित हो गए कि किसी दूसरे की अच्छी रचना का स्वागत नहीं कर पा रहे हैं? पिछले दो-तीन साल से दलित साहित्य के खेमों में एक प्रकार की चुप्पी छाई हुई है। स्तरीय नई पत्रिकाएं नहीं आ रही हैं, पुरानी पत्रिकाएं समय से नहीं निकल रही या वे अपने को दोहरा रही हैं। लेखक-संपादक किताबें न बिकने और विज्ञापन न मिलने का रोना रोकर अपना बौद्धिक ही नहीं, व्यक्तिगत स्तर भी गिराते जा रहे हैं।
दलित लेखक संघ पहले कई भागों में बंटते गए और पिछले दो-तीन साल से सब निष्क्रिय हैं। यह रोचक बात है कि कई बड़े लेखक संघों में ‘अछूत’ रहे कुछ लेखकों में से एक अजय नावरिया ने इस दौर में कुछ सक्रियता दिखाई है, पर भयानक निष्क्रियता और संकीर्णता के इस दौर में ये थोड़े से सक्रिय लोग कुछ कर पाएंगे, इसमें संदेह है।
सवाल है कि दलित साहित्य में इन दिनों दिख रही यह चुप्पी क्या संकेत करती है। दलित साहित्य चुक गया है या दलितों की सभी समस्याओं के समाधान निकल आए हैं? या समाज की समस्याओं के निदान के लिए साहित्य इनको अब ‘कारगर’ नहीं लगता या दलित साहित्यकार आपस में लड़-भिड़ कर, कुछ अपनी प्रतिभा के हिसाब से ‘हासिल’ कर, ‘तृप्त’ होकर या साहित्य को भी एक कारोबार समझ कर इसमें आ, कमा या निराश होकर शांत बैठ गए हैं? कभी आए दिन विवाद का मुद्दा बनने वाले डॉ. धर्मवीर अब बहस में नहीं रहते हैं। मराठी-हिंदी के दलित साहित्यकार दो साल पहले तक मंच साझा करते थे, अब एक-दूसरे को आमने-सामने तक नहीं देखना चाहते। दलित साहित्य में ‘अपने’ पुरुषों से इतर क्रांतिकारी ढंग का एक नया स्त्री-स्वर प्रबल होने लगा था, वह वापस उसी ‘शोषक स्वर’ में जगह तलाशने लगा है। क्या आंबेडकरवाद से प्रेरणा लेने वाला यह विमर्श भी अब दलित राजनीति की तरह अवसरवादी विमर्श बन कर रह जाने वाला है? इसकी इस चुप्पी में क्या निहित है?
दलित साहित्यकारों की नजर में इस चुप्पी के चाहे जो अर्थ हों, दलित समाज के हक में ऐसी चुप्पियां खतरनाक हैं। इससे साफ पता चलता है कि दलित साहित्यकारों के भीतर अपने दंशों को लेकर अब दर्द नहीं रहा गया है। बल्कि कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि सदियों से पीड़ित-दमित रहे समाज की यह साहित्यकार पीढ़ी जैसे अपने पूर्वजों के झेले दंशों पर भीतर ही भीतर खुश है और उन्हें ‘कैश’ करने में लगी है। इनसे अच्छी कमाई कर, सदियों बाद जैसे पेट भर कर ऊंघने लगी है। इसे अब यह सोचने की फुर्सत नहीं रह गई है कि इन दिनों उनके समाज के हालात क्या हैं। थोड़ा यश और धन पाकर अब इनमें से बहुत उसी घाघ राजनीति के रंग में रंगते जा रहे हैं, जिसने दलितों में मात्र डॉ. आंबेडकर और कांशीराम को होश और हिम्मत बख्शी है। जैसे बाकी दलित नेता आजकल उनके साथ खड़े हैं, जिनके खिलाफ लड़ने का उनका इतिहास रहा है, लगभग इसी तरह दलित साहित्यकार भी उनके नक्शे-कदम पर चल रहे हैं, जिनके खिलाफ लिखने का इनका इतिहास रहा है।
अपने दलित समाज के दर्द और जमीर को सामने रखने वाले इन साहित्यकारों को अब न अपने समाज के हालात की जानकारी है और न उसके अनुभवों से सीखने की जरूरत। ऐसा एक उदाहरण पिछले दिनों देखने में आया। हरियाणा के भगाणा गांव में दबंग जाति के लड़कों द्वारा सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई कुछ लड़कियां जंतर मंतर पर धरने पर बैठी थीं। कई संगठनों ने वहां जाकर उन्हें समर्थन दिया और प्रदर्शन किया। पर सक्रिय राजनीति करने वाले एकाध निष्प्रभावी लेखकों के अलावा वहां कोई दलित साहित्यकार नजर नहीं आया, जबकि ये सभी दिल्ली में रहते हैं और छोटे-बड़े को मिला कर इनकी संख्या दो सौ से कम नहीं होगी। जबकि प्रदर्शन का एक दिन रविवार भी रहा। अंदाजा लगाया जा सकता है कि दिल्ली के बाहर जाकर ये साहित्यकार दलितों की समसामयिक सामाजिक-आर्थिक स्थिति का जायजा कतई नहीं लेते हैं। इनका दिल्ली से बाहर जाना या तो नौकरी के सिलसिले में होता है या फिर किसी सभा-संगोष्ठी में।
क्या बलात्कार की शिकार दलित लड़कियां अपने साहित्यकारों-बुद्धिजीवियों से कोई उम्मीद नहीं रखतीं? क्या इनके साथ खड़े होना कोई अबौद्धिक कर्म है? तब इन दलित साहित्यकारों को दलित समाज सम्मान क्यों दे और क्यों इनका साहित्य पढ़े? कैसे इनके मिशन से जुड़े? इन प्रदर्शनों में दलितों की तुलना में गैर-दलित बुद्धिजीवी-विद्यार्थी अधिक सक्रिय देखे गए। उनके साथ पीड़िताओं ने अपने दर्द साझा किए। ऐसे में कल को अगर इन्हीं प्रसंगों पर केंद्रित कोई कहानी या उपन्यास लिखा जाएगा, तो क्या दलित साहित्यकार कह सकेंगे कि गैर-दलित के हाथों लिखा गया यह साहित्य प्रामाणिक नहीं है? क्या तब उस दलित साहित्यकार का लिखा हुआ अधिक प्रामाणिक माना जाएगा, जो दलितों के इन संघर्षों में मौजूद ही नहीं रहते हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि सहानुभूति और स्वानुभूति की बहस बेकार की गई?
अगर केवल स्वानुभूति वाला तर्क सही है तो क्या यह मान लिया जाए कि आगे आने वाला दलित साहित्य वही अच्छा होगा, जिसे ऐसे गैर-दलित लिखेंगे, जो ऐसे संघर्षों में दलितों के साथी बने हुए हैं, देश-दुनिया में घूम कर उनके समाज और उनके संघर्षों का जायजा लेते हैं। और क्या तब अपने घरों में आराम से बैठ कर साहित्य लिखने वाले ये दलित साहित्यकार कह पाएंगे कि उन्हीं का लिखा पढ़ा जाए, उन्हीं का कहा अंतिम माना जाए? जरूरी है कि दलित साहित्यकार अपने समाज से जुड़े रहें, इसका वर्तमान जानें, इसके संघर्ष में साथी बनें, उनकी आवाज उठाएं और आगे पहुंचाएं। यह कोई नसीहत नहीं, दलित समाज की कमजोर पड़ती आवाजों की मांग है और आप पर इनका हक बनता है।
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