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Friday, May 23, 2014

मज़दूर बिगुल

मज़दूरों-मेहनतकशों के नायक को चुराने की बेशर्म कोशिशों में लगे धार्मिक फासिस्ट और चुनावी मदारी
शहीदेआज़म भगतसिंह के शहादत दिवस (23 मार्च) के अवसर पर

सत्यप्रकाश
bhagat_singhपिछली 23 मार्च को भगतसिंह के पैतृक गाँव पंजाब के खटकड़कलाँ में बारी-बारी से तमाम चुनावी पार्टियों – अकाली दल-भाजपा, कांग्रेस से लेकर पीपीपी तक ने भगतसिंह के नाम को भुनाने का जो घिनौना नज़ारा पेश किया वह कोई नयी बात नहीं है। क्रान्तिकारियों के विचारों और जनता के दिलों में बसी उनकी यादों को मिटाने की कोशिशों में नाकाम रहने के बाद पिछले कुछ समय से ये चुनावी मदारी और धार्मिक जुनूनी फासिस्ट उनकी छवि को भुनाने की बेशर्म कोशिशों में लगे हुए हैं। खटकड़कलाँ में 23 मार्च को हुई रैलियाँ इन पार्टियों की चुनावी रैलियाँ थीं, उनमें भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत और उनके सपनों की कोई बात नहीं हुई, बस अपनी-अपनी पार्टियों के लिए वोट माँगने के लिए भगतसिंह के नाम का इस्तेमाल किया गया। भीड़ जुटाने के लिए मंच पर फूहड़ बाज़ारू नाच-गाने चलते रहे आैर शहीदों से कई गुना ज़्यादा चुनावी नेताओं के ज़िन्दाबाद के नारे लगते रहे।
पिछले दिनों भगतसिंह के परिवार के एक सदस्य यादविन्दर संधू ने उनके नाम को कलंकित करते हुए भगतसिंह की जेल नोटबुक के नये संस्करण के विमोचन के लिए नरेन्द्र मोदी को आमन्त्रण भेज दिया। यह अलग बात है कि इस पर हुए चौतरफ़ा विरोध के कारण मोदी को मन मसोसकर अपना आना रद्द करना पड़ गया। यह वही मोदी है जिसे भगतसिंह के बारे में इतनी ही जानकारी है कि उन्हें अण्डमान की जेल में क़ैद करवा दिया था! वैसे इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है। आख़िर इन संघियों को क्रान्तिकारियों के बारे में सही जानकारी हो भी कैसे? जब सारा देश अंग्रेज़ों से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग ब्रिटिश हुक़ूमत के तलवे चाट रहे थे। जिस वक़्त भगतसिंह और उनके साथी हँसते-हँसते मौत को गले लगा रहे थे, ठीक उस समय, 15-24 मार्च 1931 के बीच संघ के संस्थापकों में से एक बी.एस. मुंजे इटली की राजधानी रोम में मुसोलिनी और दूसरे फासिस्ट नेताओं से मिलकर भारत में उग्र हिन्दू फासिस्ट संगठन का ढाँचा खड़ा करने के गुर सीख रहे थे। जब शहीदों की क़ुर्बानी से प्रेरित होकर लाखों-लाख हिन्दू-मुसलमान-सिख नौजवान ब्रिटिश सत्ता से टकराने के लिए सड़कों पर उतर रहे थे तो संघ के स्वयंसेवक मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने और शाखाओं में लाठियाँ भाँजने में लगे हुए थे और जनता की एकता को कमज़ोर बनाकर गोरी सरकार की सेवा कर रहे थे।
भाजपा और संघी गिरोह के संगठनों ने भगतसिंह का नाम लेना तो तभी बन्द कर दिया था जब भगतसिंह के विचार लोगों के बीच प्रचारित होने लगे और यह साफ़ हो गया कि वे मज़दूर क्रान्ति और कम्युनिज़्म के विचारों को मानते थे और साम्प्रदायिकता तथा धर्मान्धता के कट्टर विरोधी थे। लेकिन जनता के बीच भगतसिंह की बढ़ती लोकप्रियता को भुनाने के लिए इन फासिस्टों ने भगतसिंह को भी अपने झूठों और कुत्सा-प्रचार का शिकार बनाने की घटिया चालें चलनी शुरू कर दी हैं। इतिहास के प्रमाणित तथ्यों और दस्तावेज़ों को धता बताते हुए वे प्रचारित करते हैं कि भगतसिंह के नाम से मज़दूर क्रान्ति और समाजवाद के बारे में जो लेख और बयान छपते रहे हैं वे वास्तव में उनके हैं ही नहीं। कुछ वर्ष पहले संघ के भोंपू ‘आर्गनाइज़र’ और ‘पाँचजन्य’ का एक विशेष अंक इसी पर निकाला गया था जिसमें साबित करने की कोशिश की गयी थी कि भगतसिंह केवल एक राष्ट्रवादी थे और क्रान्ति के बारे में उनके जो भी विचार सामने आये हैं वह दरअसल कुछ वामपन्थी संगठनों और बुद्धिजीवियों की साज़िश है। पिछले करीब दो दशक से बड़े पैमाने पर भगतसिंह के साहित्य को प्रकाशित करके जन-जन तक पहुँचाने की कोशिश में लगे ‘राहुल फ़ाउण्डेशन और ‘जनचेतना’ को नाम लेकर इसके कई लेखों में निशाना बनाया गया था। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने मेरठ, मथुरा और दिल्ली सहित कई जगहों पर ‘जनचेतना’ की पुस्तक प्रदर्शनियों पर हमले भी किये और भगतसिंह की पुस्तिका ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ को फाड़ने की भी कोशिश की। यह अलग बात है कि हर जगह तगड़ा प्रतिरोध होते ही वे कायरों की तरह भाग खड़े हुए।
पिछले 67 वर्षों से भगतसिंह के सपनों की हत्या करने में लगे कांग्रेसी भी आज मजबूरी में उनके नाम को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। इनकी सरकारों ने 1947 के बाद से ही भगतसिंह और उनके साथियों के क्रान्तिकारी विचारों को दबाने की साज़िशें कीं और आज़ादी की लड़ाई में उनके महान योगदान को छोटा करके पेश किया। इन विचारों को वे अपने लिए भी उतना ही ख़तरनाक मानते थे जितना अंग्रेज़ सरकार मानती थी। भगतसिंह और उनके साथी इस बात को समझने लगे थे कि कांग्रेस के झण्डे तले गाँधीजी ने व्यापक जनता के एक बड़े हिस्से को भले ही जुटा लिया हो, पर कांग्रेस उनके हितों की नुमाइन्दगी नहीं करती, बल्कि देशी धनिक वर्गों के हितों की नुमाइन्दगी करती है और उन्होंने लोगों को चेतावनी दी थी कि कांग्रेस की लड़ाई का अन्त किसी न किसी समझौते के रूप में ही होगा। भगतसिंह ने साफ़-साफ़ कहा था गोरे अंग्रेज़ों की जगह काले अंग्रेज़ों के गद्दी पर बैठ जाने से इस देश के मेहनतकशों को कुछ नहीं मिलेगा।
इनकी हरचन्द कोशिशों के बावजूद भगतसिंह के विचार देशभर में फैलते ही गये हैं और आधी-अधूरी आज़ादी की सच्चाई लोगों के सामने आने के साथ ही क्रान्तिकारियों की पुकार उनके दिलों में और पुरज़ोर ढंग से गूँजने लगी है। ऐसे में अब तरह-तरह के पाखण्डी, मक्कार और चुनावी मदारी भगतसिंह के नाम और छवि का इस्तेमाल करने की निर्लज्ज हरकतें करते दिखायी दे रहे हैं। पिछले दिनों चुनावी अखाड़े के नये जोकर अरविन्द केजरीवाल को एक टीवी चैनल पर बड़ी बेशर्मी से भगतसिंह की फोटो का इस्तेमाल कर अपनेआप को “क्रान्तिकारी” दिखाने की कवायद करते पकड़ा गया था। अन्ना हज़ारे, रामदेव और जनरल वी.के. सिंह जैसे धुर दक्षिणपंथियों से लेकर सुब्रत राय जैसे अपराधी भी भगतसिंह की फोटो अपने मंच पर टाँगने की हिमाक़त करने लगे हैं।
अब बहुत हो चुका! हमारे नायक को हमसे चुराने की इन गन्दी कोशिशों को नाकाम करने का एक ही तरीक़ा है, कि हम भगतसिंह के इंक़लाबी विचारों को पूरी ताक़त के साथ जनता के बीच लेकर जायें और उनके सपनों का हिन्दुस्तान बनाने की लड़ाई को आगे बढ़ाने में जी-जान से जुट जायें। हमें भगतसिंह के इन शब्दों को हर मज़दूर और हर नौजवान तक पहुँचाना होगाः
“क्रान्ति से हमारा क्या आशय है, यह स्पष्ट है। इस शताब्दी में इसका सिर्फ़ एक ही अर्थ हो सकता है – जनता के लिए जनता का राजनीतिक शक्ति हासिल करना। वास्तव में यही है ‘क्रान्ति’, बाक़ी सभी विद्रोह तो सिर्फ़ मालिकों के परिवर्तन द्वारा पूँजीवादी सड़ान्ध को ही आगे बढ़ाते हैं। …भारत में हम भारतीय श्रमिक के शासन से कम कुछ नहीं चाहते। भारतीय श्रमिकों को – भारत में साम्राज्यवादियों और उनके मददगार हटाकर जो कि उसी आर्थिक व्यवस्था के पैरोकार हैं, जिसकी जडे़ं शोषण पर आधारित हैं – आगे आना है। …साम्राज्यवादियों को गद्दी से उतारने के लिए भारत का एकमात्र हथियार श्रमिक क्रान्ति है। कोई और चीज़ इस उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकती। …क़ौम कांग्रेस के लाउडस्पीकर नहीं है, वरन् वे मज़दूर-किसान हैं, जो भारत की 95 प्रतिशत जनसंख्या है। राष्ट्र स्वयं को राष्ट्रवाद के विश्वास पर ही हरकत में लायेगा, यानी साम्राज्यवाद और पूँजीपति की ग़ुलामी से मुक्ति के विश्वास दिलाने से। …हमें याद रखना चाहिए कि श्रमिक क्रान्ति के अतिरिक्त न किसी और क्रान्ति की इच्छा करनी चाहिए और न ही वह सफल हो सकती है।”
“…हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह युद्ध तब तक चलता रहेगा, जब तक कि शक्तिशाली व्यक्ति भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार जमाये रखेंगे। चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज़ पूँजीपति, अंग्रेज़ शासक या सर्वथा भारतीय ही हों। उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर रखी है। यदि शुद्ध भारतीय पूँजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का ख़ून चूसा जा रहा हो तब भी इस स्थिति में कोई अन्तर नहीं पड़ता।”

मज़दूर बिगुलमार्च-अप्रैल 2014

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