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Thursday, May 22, 2014

समकालीन आदिवा‍सी कवियों को पढते हुए भी हम एक अलग अनुभव से गुजरते हैं। दलित कविता का अभ्‍यासी हमारा मन वहां प्रतिशोध की भावना न देखकर चकित होता है।

समकालीन आदिवा‍सी कवियों को पढते हुए भी हम एक अलग अनुभव से गुजरते हैं। दलित कविता का अभ्‍यासी हमारा मन वहां प्रतिशोध की भावना न देखकर चकित होता है।
ऐसा क्‍यों है? मैंने इस विषय पर पहले भी कई बार सोचा, लेकिन कोई स्‍पष्‍ट उत्‍तर न पा सका। आखिरकार, इसका उत्‍तर मुझे अश्विनी कुमार पंकज के लेख 'दलित साहित्‍य की वैचारिकी से भिन्‍न है आदिवासी दर्शन' में मिला। दरअसल, आदिवासी साहित्‍य में 'प्रतिरोध' है, 'प्रतिशोध' नहीं है। यह उसकी एक बडी विशेषता है, जिसे हमें न सिर्फ समझना चाहिए बल्कि जिसका सम्‍मान भी करना चाहिए। यह मनुष्‍यता को आगे ले जाने वाला दर्शन है।
बहरहाल, वंचितों के साहित्‍य में गंभीर रूचि रखने वालों के लिए यह एक जरूरी लेख है।

दलित साहित्य की वैचारिकी से भिन्न है आदिवासी दर्शन

- अश्विनी कुमार पंकज
‘जैसे-जैसे लोग बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे जमीन सिकुड़ती जा रही है। आधुनिक ज्ञान से नई सीे नई चीजें विकसित हो रही हैं, जल, जंगल, जमीन तो नहीं।” – डॉ. सिकरा दास तिर्की
भारत विभिन्न समुदायों का संघ है। मानव विज्ञान के अध्येताओं ने पिछली एक सदी के दौरान अपने नृतत्वशास्त्रीय अध्ययनों के जरिए हमें इन समुदायों के बारे में बहुत सारी सूचनाएं दी हैं। छूट गए समुदायों के बारे में भी नए सिरे से हम तक अभी भी जानकारियां पहुंच रही हैं। इसी तरह भाषा वैज्ञानिकों ने भी अपने अन्वेषणों के द्वारा बोलियों और भाषाओं के अनुपम और समृद्धशाली संसार से हमारा परिचय कराया है। परंतु जहां तक विविध भाषाओं के साहित्य का सवाल है, तो यहां पर हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि व्यापक तौर पर बोली जानेवाली और प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य के अतिरिक्त सैंकड़ों अल्पसंख्यक भाषाओं के साहित्य के बारे में भारतीय साहित्य में एक अंधकार काल पसरा हुआ है, क्योंकि अभी तक जिन प्रमुख भाषाओं के साहित्य से भारतीय साहित्य का चेहरा बनाया गया है, वह अपूर्ण है। यह भी एक बात है कि भारतीय साहित्य राजनीतिक लाभ-हानि के कारण मोटे तौर पर दो भागों में विभाजित है। उत्तर भारत का साहित्य, जिसका एक बड़ा भाग हिंदी में है तो दूसरा दक्षिण भारत का साहित्य है द्रविड़ भाषाओं में। उत्तर-दक्षिण के साहित्य का मेल मिलाप आज तक एक असहज प्रक्रिया में फंसी हुआ तो है ही, उसके समन्वय ओर साझेदारी की गति भी अत्यंत धीमी है। जाहिर है उत्तर और दक्षिण के इस राजनीतिक व साहित्यिक वर्चस्व के द्वंद्व में उत्तर-दक्षिण की परिधि में जीवित आदिवासी भाषाएं व दूसरी देशज भाषाओं का साहित्य भारतीय साहित्य से बाहर है बल्कि पूरा उत्तर-पूर्व भी साहित्यिक तौर पर अदृश्य है। इनमें प्रमुख हैं मुण्डा एवं नाग परिवार के आदिवासी भाषाओं का साहित्य।
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भारत में कुल चार भाषा परिवारों की भाषाएं हैं। सारे बहस-विवादों के बाद अंतत: मोटा-मोटी अब यही स्वीकार्य हो चला है। आग्नेय अथवा आस्ट्रिक, तिब्बती-चीनी अथवा नाग, द्रविड़ और भारोपीय भाषा परिवार। देश की अधिकांश आदिवासी भाषाएं आग्नेय और नाग भाषाओं के परिवार से जुड़ी हैं। मध्य भारत और झारखंड की की दो प्रमुख आदिवासी भाषाएं गोंडी और कुड़ुख द्रविड़ भाषा परिवार के अंतर्गत हैं तो चार राज्यों गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में बसे भील समुदाय की भीली-भिलाला का भारोपीय भाषा परिवार से नाता है, जिसकी कुल जनसंख्या इन चारों राज्यों में मिलाकार 1,26,85,753 है। शेष संताल, मुण्डा, बोड़ो, गारो आदि आग्नेय और नाग परिवार की भाषाएं हैं। इनमें भी नाग भाषा का परिवार सबसे बड़ा है। अपनी पुस्तक ‘भारत में नाग-परिवार की भाषाएंं’ में सुप्रसिद्ध भाषाविज्ञानी राजेन्द्र प्रसाद सिंह ग्रियर्सन के हवाले से हमें सूचित करते हैं कि 179 में से 113 भाषाएं नागकुल की हैं। आदिवासी भाषाओं में ‘भीली’ बोलने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है जबकि दूसरे नंबर पर ‘गोंडी’ भाषा और तीसरे नंबर पर ‘संताली’ भाषा है। संवैधानिक स्तर पर देखें तो भारत की 114 मुख्य भाषाओं में से 22 को ही संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। इनमें हाल-फिलहाल शामिल की गई संताली और बोड़ो ही मात्र आदिवासी भाषाएं हैं। अनुसूची में शामिल संताली (0.62), सिंधी, नेपाली, बोड़ो (सभी 0.25), मिताइ (0.15), डोगरी और संस्कृत भाषाएं एक प्रतिशत से भी कम लोगों द्वारा बोली जाती हैं। जबकि भीली (0.67), गोंडी (0.25), टुलु (0.19) और कुड़ुख 0.17 प्रतिशत लोगों द्वारा व्यवहार में लाए जाने के बाद भी आठवीं अनुसूची में दर्ज नहीं हैं।
भाषाविज्ञानी राजेन्द्र प्रसाद सिंह सवाल उठाते हैं,’भारत की पूरी नाग-भाषाओं पर कोई भी स्वतंत्र और व्यवस्थित पुस्तक हिंदी में उपलब्ध नहीं है। कुछ ऐसी ही स्थिति मुण्डाकुल की भाषाओं की है।’ यह सवाल वे इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में कर रहे हैं। यानी 2005 में। जबकि आज से चार दशक पूर्व मुण्डा पुरखौती (लोक) साहित्य के अध्येता जगदीश त्रिगुणायत ने अपनी पुस्तक ‘बांसरी बज रही’ आदिवासी साहित्य की उपेक्षा पर इस तरह से कटाक्ष किया था, ‘नृतत्वशास्त्र के विद्वानों ने जन-जीवन के खंडहर को बहुत खोदा, उसके गड़े मुर्दों को बहुत उखाड़ा … (परंतु) नृतत्वशास्त्र की आत्मा अभी तक पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं, डाकबंगलों और शिविरों के तरु-कोटरों में भूत के कलेजे की तरह बंद रही। उसने लोक-जीवन की सांसों को छूकर और उसके संगीत में अपना स्वर मिलाकर चलने का प्रयास नहीं किया।’ स्पष्ट है कि 47 में भारतीय आजादी के राष्ट्रव्यापी संचरण के बावजूद समाज, राजनीति, भाषाविज्ञान और साहित्य की पहुंच आदिवासी समाजों तक नहीं बन पाई। इसलिए आज अगर हम भारतीय साहित्य जैसी किसी पूर्वस्थापित अवधारणा और अवस्थिति की बात कर रहे हैं तो हमें सजग रहना पड़ेगा, क्योंकि इसमें मुण्डा एवं नागकुल सहित भारोपीय भाषाओं के आदिवासी साहित्य का संग्रहण नहीं के बराबर है।
भाषाओं का उदाहरण इसलिए रखा गया है ताकि हम आदिवासी भाषाओं के साहित्य पर बात करने से पहले इनके उत्स की वास्तविक पृष्ठभूमि से परिचित हो सकें। राजनीति का उदाहरण नहीं दे रहे हैं, जिसमें इन भाषाओं का समाज आर्थिक दोहन व लूट के लिए औपनिवेशिक समय से ही बेदखली, विस्थापन और दमन का शिकार है। लहूलुहान है और आज भी विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं एवं फौजी कार्रवाईयों में मारा जा रहा है। इसीलिए डॉ. वीर भारत तलवार कहते हैं, ‘बहुत दूर खड़े रहकर जो चीज दीख जाती है, वह यह कि उनका बड़ा आर्थिक शोषण होता है। वही ये लोग लिख सकते हैं। लेकिन उसमें आदिवासी समाज की आत्मा नहीं है। उसका अंत:करण नहीं है। एक आदिवासी की मानसिक बनावट आपको कहीं नहीं मिलेगी। इसीलिए हिंदी में आदिवासी विमर्श हिंदी के साहित्यकार लोग नहीं चला सकते, क्योंकि उनको आदिवासी समाज का कोई ज्ञान नहीं है।’
पश्चिमी और पूर्वी दोनों ही जगत में साहित्य को मुख्यत: सत्यं शिवम् सुंदरम् की अभिव्यक्ति स्वीकार किया गया है। भारतीय साहित्य अध्ययन में आचार्यों ने साहित्य को लोकमंगल की कामना घोषित किया है। साथ ही साहित्य को दो वर्गों में विभाजित किया है। लोक साहित्य और शिष्ट अथवा आधुनिक साहित्य. आदिवासी साहित्य का भी आज इसी दर्शन और विभाजनों के साथ अध्ययन-मनन और लेखन हो रहा है। मुख्यतया गैर-आदिवासी साहित्यिक एवं अकादमिक दुनिया में। हालांकि बहुत सारे आदिवासी विद्वान और रचनाकार भी इसी दृष्टि से ग्रसित हैं क्योंकि आधुनिक राजव्यवस्था, उसकी शिक्षा और संस्कृतिकरण ने उन्हें बुरी तरह से ग्रसित कर दिया है। इसलिए आदिवासी साहित्य पर विचार करते हुए हमें पूर्वी और पश्चिमी दुनिया के दर्शन, साहित्यिक मानदंडों और विभाजनों को परे रख देना होगा। अन्यथा हम इसी गैर आदिवासी एवं औपनिवेशिक स्थापनाओं के इर्दे-गिर्द चक्कर काटते रहेंगे कि आदिवासियों का साहित्य विकसित ही नहीं हुआ है और उनके पास लोक साहित्य का विपुल भण्डार है। उनका चलना नाच है और बोलना ही गीत है।
भारतीय साहित्य की इस प्रचलित और स्थापित अवधारणा को समझना अत्यंत जरूरी है। वंदना टेटे लिखती हैं, ‘क्योंकि साहित्य की जो स्वायत्त और नियंत्रणकारी भूमिका गैर-आदिवासी विश्व में है, ठीक वैसी ही निर्णायक और स्वायत्त भूमिका आदिवासी समाज में नहीं है। वेद से लेकर आजतक रचा जा रहा साहित्य गैर-आदिवासी विश्व के जीवनदर्शन, मूल्यों और परंपराओं को संरक्षित, प्रसारित एवं परिवर्दित करने का काम बखूबी और वैधानिक रूप से कर रहा है। परंतु साहित्य की ऐसी स्वायत्त और स्वतंत्र वैधानिक भूमिका आदिवासी विश्व में न वाचिक परंपरा में है और न ही अब की लिखित परंपरा में … हमें यह देख जानकर पक्का कर लेना होगा कि आदिवासी विश्व के लिए साहित्य के क्या मायने हैं और शेष विश्व के लिए क्या है ?’
भारत को छोड़कर, दुनियाभर में आज आदिवासी लोग अपने साहित्य को ‘ऑरेचर’ कह रहे हैं। यानी वे खुद के साहित्य को वाचिक परंपरा में देख रहे हैं। आधुनिक विश्व के लिखित साहित्य और उसके दर्शन में नहीं। इसलिए भारत में भी हम जब आदिवासी साहित्य कह रहे हैं तो दरअसल ‘ऑरेचर’ की बात ही कर रहे हैं। आदिवासी दर्शन का साहित्य। लोकमंगल की कामना वाला साहित्य आदिवासी साहित्य नहीं है। वैसे भी वंदना टेटे ने आदिवासी साहित्य के संदर्भ में ‘लोक साहित्य’ की जगह ‘पुरखौती साहित्य’ को प्रस्तावित किया है जो हमारे विचार से आदिवासी साहित्यकारों और अध्येताओं को ग्राह्य होना चाहिए। मोटे तौर पर इसे यूं समझिए कि लोकमंगल की आकांक्षा व्यक्तिगत संपत्ति और जीवनदर्शन वाले समाज की है। जबकि आदिवासी समाज सामूहिक और सहअस्तित्व जीवन जीेने वाला एक भिन्न और विशिष्ट संस्कृति का समाज है। ‘ऑरेचर’ की अवधारणा को और स्पष्टता के साथ समझने के लिए आप सब केन्याई आदिवासी दार्शनिक न्यूगी वा थ्योंगो की पुस्तक ‘पेन प्वांइट गन प्वाइंट’ अवश्य पढ़ें।
‘आदिवासी क्षेत्रों की भाषाओं (मुंडा परिवार एवं भीली) का साहित्य अस्मिता और आत्माभिव्यक्ति’ विषय पर बहुत बात होती है। आदिवासी साहित्य की वैचारिकी के अनुरूप अस्मिता तो ठीक है परंतु अत्माभिव्यक्ति आदिवासी दर्शन का सहभागी शब्द नहीं है। सारत: आदिवासी साहित्य ऑरेचर और पुरखौती साहित्य ही है जिसका विस्तार आधुनिक या लिखित विश्व में भी हो रहा है पर वह लोक साहित्य की तरह का परिमार्जित शिष्ट विस्तार नहीं है।
आदिवासियों का पुरखा साहित्य बहुत समृद्ध है। इसे सभी स्वीकार करते हैं। पर साथ ही वे इसे साहित्य नहीं, लोक साहित्य मानते हैं। बीसवीं सदी की शुरुआत तक लगभग सभी आदिवासी भाषाओं के पुरखौती साहित्य का संग्रह विदेशी अध्येता एवं प्रशासक कर चुके थे। लेकिन लोक साहित्य मानने के कारण अंग्रेजी और हिंदी दोनों ही साहित्य के विद्वानों ने इस पर ध्यान ही नहीं दिया। अगर कुछ लिखा-पढ़ा भी गया तो साहित्य से इतर विषयों और विभागों में। जबकि आदिवासियों का यह मूल साहित्य है। साहित्यिक प्रभागों में इस पर बात होनी चाहिए थी। लेकिन बात न तब की गई और न आज की जा रही है। आदिवासी साहित्य पर बात करने के लिए व्यक्तिगत तौर पर लिखा गया लिखित साहित्य ढूंढा जा रहा है। दलित साहित्य के उभार और स्थिरीकरण के बाद से अचानक अकादमिक हलकों में अब लिखित आदिवासी साहित्य की मांग उमड़ पड़ी है। जबकि पिछले सौ सालों में इतना सारा पुरखौती साहित्य लिखित रूप में संग्रहित हो चुका है, जिस पर किसी की नजर नहीं जा रही है। क्यों ? मानसिकता के कारण कि वह लोक साहित्य है, शिष्ट यानी व्यक्तिगत साहित्य नहीं है। हिंदी जगत और हमारे अकादमिक क्षेत्र के लोग यदि थोड़ा-सा भी इस बात पर विचार कर लें कि जो समाज ही सामूहिक है, अलिखित है, उसका साहित्य भी अलिखित और सामूहिक होगा तो उनकी आदिवासी साहित्य संबंधी दुविधा सहज ही समाप्त हो जाएगी।
झारखंड से पुरखौती साहित्य के कुछ उदाहरण रखूंगा। झारखंड में 32 आदिवासी समुदायों की आदि बसाहट है। इनमें से अधिकांश मुण्डा कुल की भाषाएं बोलते हैं। हो, मुण्डा, संताल, खड़िया, भूमिज आदि बड़े और असुर, बिरहोड़, सबर जैसे छोटे आदिवासी समुदाय आस्ट्रिक भाषा-परिवार की प्रतिनिधि भाषाएं बोलते हैं। वहीं उरांव, पहाड़िया, किसान आदि समुदाय द्रविड़ भाषा परिवार का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन सभी के पास ऑरेचर यानी पुरखौती साहित्य है। कथाओं के रूप में गीतों के रूप में। असुर, बिरहोड़, पहाड़िया आदि छोटे आदिवासी समुदायों के पुरखौती साहित्य को लिखित रूप नहीं दिया गया है। इस दिशा में, जिस संगठन से मैं जुडा हूं, ‘झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’ प्रयासरत है और अब तक असुरों के गीतों का एक संकलन ‘असुर सिरिंग’ (2010) प्रकाशित हो चुका है। पर जहां तक हो, संताल, मुण्डा, उरांव और खड़िया आदिवासी समुदायों की बात है तो उनके पुरखौती साहित्य का प्रकाशन अंग्रेजी, हिंदी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में और उनके स्वयं की भाषाओं में भी हो चुका है, हो रहा है। इसलिए अगर कोई कह रहा है कि आदिवासी साहित्य लिखित रूप में उपलब्ध नहीं है तो वह भारतीय साहित्य को ही संकुचित और विपन्न कर रहा है।
मुण्डा भाषा में आदिवासियों की एक पुरखौती कथा है ‘जंगल की रानी’ । मुण्डारी से हिंदी अनुवाद और प्रस्तुति जगदीश त्रिगुणायत की है। इसलिए ‘रानी’ जैसे शब्दों पर ध्यान नहीं दीजिएगा। हम भी कथा के उस मूल तत्व को ही सारत: रख रहे हैं जो आदिवासी दर्शन के अनुकूल है। यह त्रिगुणायत के ‘मुण्डा लोक कथाएं’ में संकलित है। कथा है कि जंगल में एक भैंस और भैंसा को एक नवजात बच्ची मिली। दोनों उसे अपने घर ले आए और लड़की को पाल-पोसकर बड़ा किया. अपूर्व सौंदर्य लिए हुए सोने की काया वाली वह बच्ची जवान हुई। उसके सोने-सी देह और अनुपम सौंदर्य की चर्चा कुछ शिकारियों के द्वारा राजा को मिली। राजा ने छुपकर लड़की को देखा और उसके रूप पर मोहित हो गया। उसने उसका अपहरण करने की कोशिश की। तभी भैंस और भैंसा दोनों वहां आ गए। दोनों को आया देख राजा ने लड़की को बंधक बना लिया और घर का दरवाजा भीतर से बंद कर लिया। भैंस ने दरवाजा खोलने के लिए लड़की को बाहर से आवाज लगायी। लड़की बंधक थी। वह कैसे दरवाजा खोल पाती। उसने बिलखते हुए राजा से आग्रह किया कि वह उसे खोल दे। पर राजा ने लड़की को मुक्त नहीं किया. अंतत: भैंस और भैंसा दोनों दरवाजा खोलने की कोशिश करने में सर पटकते-पटकते धक्का देते मर गए। उनके मर जाने के बाद राजा ने बलपूर्वक लड़की को अपनी रानी बना लिया।
अब अगर इस कहानी में जंगल, भैंस और सोने की काया वाली लड़की के रूपक को यदि आप नहीं समझ पाएंगे तो वैदिक कथाओं का इकहरा पाठ ही करते रहेंगे। यह कथा ऋग्वेद में ब्राह्मणों द्वारा हजार शब्दों/पृष्ठों में रचे गए लोकप्रिय मिथिहास का मात्र 300-400 शब्दों में सर्वथा नया आयाम पेश करती है। साथ ही मार्कण्डेय पुराण में वर्णित महिषासुर के मर्दन की झूठी आर्य कथा को एक नए सत्य से उधेड़ती है। हम यहां संतालों में व्याप्त उस पुरखौती कथा को उद्धृत नहीं कर रहे हैं जो सीधे-सीधे ‘दुर्गासप्तशी’ की नीयत का खुलासा करती है और बताती है कि क्यों आदिवासियों के सामूहिक साहित्य को लोग ‘साहित्य’ नहीं मानते हैं।
एक अन्य उदाहरण भील समुदाय के पुरखौती साहित्य से। एक बार एक भील ने खूब मेहनत की। उसके अथक मेहनत से खेत लहलहाने लगे। जब फसल पकने को हुई तो भील उसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गया। उसकी चिंता एक पंछी से नहीं देखी गई। पंछी ने सोचा कि खेत केवल भील के लाभ के लिए ही तो नहीं है। खेत से भील के साथ ही उसका और अन्य पशु-पंछियों का भी भरण पोषण होता है। इसलिए खेत की सुरक्षा भील का ही नहीं उसका और पशु-पंछियों का भी कर्तव्य है। पंछी के इस विचार को जानकर जंगल के दूसरे पशु-पंछी भी भील की चिंता से आ जुड़े। इसके बाद जब चोरों ने भील की फसल लूटने की कोशिश की तो पशु-पंछियों के कारण न सिर्फ फसल की सुरक्षा हो सकी बल्कि चोर अपनी बदनीयती से मृत्यु को भी प्राप्त हुए।
आप कहेंगे इस आदिवासी भील कथा में असाधारण साहित्यिक तत्व क्या हैं ? चोर-लूटेरों से संसाधनों के रक्षा की मामूली कहानी है यह। बेशक इसमें आपको जिन्हें आप साहित्यिक तत्व कहते हैं नहीं मिलेगा। गैर-आदिवासी दृष्टिकोण से यह एक मामूली कहानी ही लगेगी। लेकिन जब आप आदिवासियत की दृष्टि से इस कथा का पाठ करेंगे तो पाएंगे कि यह अपने दर्शन में असाधारण है। यह भील कहानी सिर्फ संसाधनों की रक्षा की बात नहीं करती। सामूहिकता और सहअस्तित्व वाले एक जीवनदर्शन की बात करती है। समष्टि में हर चीज के होने की, उनके अंतर्संंबंधों की और उनकी एकजुटता और सहअस्तित्व की बात करती है। इसी के साथ गौर करें आप कहानी के क्लाइमेक्स पर। कहानी में चोर की हत्या नहीं होती है। गैर-आदिवासी दृष्टि वाली कहानियों का अंत एक निर्णायक प्रतिशोध से होता है। हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की कहानियों में प्रतिरोध और शोषण का एक ही जवाब सुझाया जाता है। वर्ग दुश्मनों की हत्या। गीता का भी सार संदेश यही है और माओ के ‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है’ का भी यही। दोनों ही परस्पर विरोधी जीवनदर्शन न्याय के लिए हिंसा को जरूरी मानते हैं। वह इसलिए कि गैर-आदिवासी समाज के दर्शन में हिंसा शामिल है। यह कोई नहीं सोचता कि न्याय के लिए भी अगर हिंसा अनिवार्य हो तो आप कैसे हिंसामुक्त दुनिया रच पाएंगे। आदिवासी जीवनदर्शन हिंसा के किसी भी रूप का समर्थन नहीं करती। इसलिए न वहां हत्या है न ही विरोधियों और असहमतियों को दबाने के लिए कोई कारागार। यह मामूली लगने वाली भील कथा हमें यही बताती है।
आदिवासियों के पुरखौती गीतों में भी यही संदेश है। मुण्डारी का यह लोकगीत देखिए-
देखो, सिसिपिड़ि धधककर जल रही है।
देखो, तिलई बादी तेजी से बरबाद हो रही है।
हे मैना सिसिपिड़ि तो जल रही है।
हे मैना, तुम कहां चरोगी ?
हे आसाकल, तिलईबादी तो बरबाद हो रही है।
आसाकल, तुम कहां टहलोगे ?
हे मैना, सिसिपिड़ि आधा जल रही है
तो तुम आधे में चरना।
हे आसाकल, तिलई बादी आधा बरबाद हो रही है
तो तुम आधे में टहलना।
इस मुण्डा आदिवासी गीत में सिसिपिड़ी और तिलई बादी नामक दो स्थानों का जिक्र है। संभवत: सदियों पूर्व किसी बाहरी समाज ने प्राकृतिक संसाधनों और उन पर कब्जे के लिए आक्रमण किया था। जिसकी स्मृति इस गीत में है। ध्यान दीजिए कि हमले का तो जिक्र है परंतु प्रतिशोध का कोई उल्लेख नहीं है। आदिवासी दर्शन नहीं समझने वाला हिंदी साहित्य और हमारे दलित मित्र झट से कह उठेंगे, ‘आदिवासी कायर थे। वे आर्यों से लड़ नहीं पाए और जंगलों में भाग गए। हम बहादुर कौम थे इसलिए लड़े और बंदी होकर शुद्र बन कहलाए।’ यह गीत इसी तथ्य का बयान करता है। जबकि ऐसा नहीं है। आदिवासी दृष्टिकोण से गीत का आशय बहुत स्पष्ट है। वे कह रहे हैं कि आदिवासी लोग लड़े। परंतु लड़ाई में जीत-हार से परे वे इस बात पर दृढ़ रहे कि बचे हुए भाग पर भी वे जी सकेंगे। इसे ‘संतोषम् परम्ं सुखम्’ मानने की भूल नहीं कीजिएगा। असली आशय है प्रतिशोध और हिंसा का नकार, क्योंकि आदिवासी विश्वदर्शन किसी भी सूरत में हिंसा को स्वीकार नहीं करता है।
आदिवासी साहित्य के बहुत ब्यौरे में नहीं जा रहा हूं। बस सूत्र रूप में आदिवासी साहित्य और उसके जीवनदर्शन को रखने का यत्न कर रहा हूं। इसे भी याद रखें कि यह हमारा अपना कोई निजी मौलिक विचार नहीं है। हम तो समुदाय का एक माध्यम भर हैं। इसलिए कोई सूचि न रखते हुए कि किसने क्या लिखा, कौन-कौन से आदिवासी लेखक हैं और कौन-कौन-सी किताबें प्रकाशित हैं, अब तक रचे गए पुरखौैती साहित्य और आदिवासी विश्वदर्शन को ही रखने की कोशिश कर रहा हूं। ताकि आदिवासी साहित्य के बारे में एक समग्र और सही अवधारणा विकसित करने में आप सब अपनी साहित्यिक और अकादमिक भूमिका निभा सकें। इसलिए आखिरी में एक और उदाहरण रखूंगा।
यह उदाहरण ले रहा हूं देश के पहले आदिवासी उपन्यासकार मेन्नस ओड़ेअ (1884-1968) के उपन्यास ‘मतुराअ: कानिÓ (मतुरा की कहानी) से। प्राचीन मुंडारी भाषा में 1920 के आस-पास मेन्नस ने लिखा था यह उपन्यास। 1700 पृष्ठों का यह वृहत् मुण्डारी उपन्यास पांच भागों में है। इसका प्रकाशन करीब 60 साल बाद 1984 में हुआ। आश्चर्य है लगभग 30 साल बाद भी इसकी चर्चा भारतीय साहित्य में नहीं है। देश के इस पहले आदिवासी उपन्यास की चर्चा झारखंड के आदिवासी विषयक विशेषज्ञ और चैंपियन हिंदी साहित्यकार क्यों नहीं करते, हमारे ख्याल से यह कोई पहेली नहीं है। मेन्नस ओड़ेअ ‘इनसाइक्लोपीडिया ऑफ मुंडारिका’ के संकलनकर्ता फादर हाफमैन के स्टेनो थे। मुण्डा भाषा-संस्कृति के करीब पांच हजार पेजों के इस इनसाइक्लोपीडिया की सामग्री मेन्नस ने ही टंकित की थी। इतना विशाल संदर्भ कोश संभवत: अन्य किसी भारतीय आदिवासी समुदाय पर अब तक नहीं डॉक्यूमेंट हुआ है। इसे टाइप करते हुए ही उनके मन में यह विचार आया था कि क्यों नहीं एक ऐसी रचना करूं जिससे आम लोग भी मुण्डा समुदाय और उसकी संस्कृति को सरलता से जान सकें। परिणामस्वरूप ‘मतुराअ: कानि’ जैसे बेजोड़ कृति सामने आई।
मूर्खता के पर्याय तक हिंदी व अन्य भारतीय व विदेशी साहित्य में आदिवासियों के भोलेपन का चित्रण होता आ रहा है। हमारे विद्वानों और साहित्यकारों ने यह मान लिया है आदिवासी दिमाग उनके जटिल विश्वव्यवस्था को समझने में अक्षम है। इस अवधारणा के विपरीत ‘मतुराअ: कानि’ का यह एक प्रसंग सुनिए, ‘तुम्हारी डिगरी होगी या उसकी, कोई नहीं कह सकेगा। कचहरी तो अंधेरा घर ही है। हाकिम स्वयं नहीं जानता है-यह किसकी जमीन है, वह किसकी है; गवाह उसे जिधर ले चलें उधर ही चलेगा। अपनी आंखों से देखकर विचार किए पंचों के समान वह नहीं हो सकेगा।’  यह संवाद मेन्नस ओड़ेअ ने बिरसा मुण्डा के नेतृत्व में अंग्रेजी राज के खिलाफ हुए आदिवासी युद्ध ‘उलगुलान’ की पृष्ठभूमि में रचा है। जब आदिवासियों की जमीन बड़े पैमाने पर छिनी जा रही थी और न्याय के लिए लोग अदालत तक भी पहुंच रहे थे।
आगे देखिए। गांव का मुण्डा कहता है, ‘उन जातियों का नहीं बोला जा सकता है, वे अत्यंत ही पंचाल हैं। उनके साथ बहुत दिन रहने से तुम भी बेईमानी सीखोगे। देखो, जिन गांवों में कटुवा और मटुवा अधिक हैं, वहां के मुण्डाओं में भी लंदफंदी पार हो गई; यह तो प्रमाणित बात है, कोई संदेह नहीं है।’ सौ साल पहले लिखे गए मुण्डा आदिवासी उपन्यास का लेखक अपने साहित्य में बहुत ही सरलता से लेकिन पूरी बुद्धिमता से बातें लिख रहा है। गैर-आदिवासी विश्वव्यवस्था और उसका दर्शन आदिवासियों के अनुरूप नहीं है और न ही वह हो सकता है, इसमें लेखक को तनिक भी संदेह नहीं है। वह साफ तौर पर कह रहा है आधुनिक विश्व की न्याय व्यवस्था आदिवासी पंचों के समान नहीं हो सकती और उनका अनुकरण करने से हमारा आदिवासी अस्तित्व संकट में पड़ेगा इसमें कोई संदेह नहीं।
अंतत: यही कहूंगा कि भारत के भाषायी लोकतंत्र और भारतीय साहित्य की समग्रता की दृष्टि से आदिवासी भाषाओं और साहित्य पर सर्वेक्षण-अध्ययन एवं विमर्श का काम सामाजिक न्याय के इस दौर में भी लंबित है। इस तथ्य से शायद ही कोई इनकार करे कि आदिवासी भाषाओं और साहित्य का कोई व्यापक और व्यवस्थित सर्वेक्षण व अध्ययन ग्रियर्सन के बाद ईमानदारी व न्यायपूर्वक हुआ हो। आदिवासी साहित्य से अनभिज्ञता का एक यह भी कारण है, क्योंकि भारतीय अदिवासी अपनी मातृभाषाओं के साथ-साथ हिंदी, अंग्रेजी और अन्य भारत के उन प्रांतीय भाषाओं में भी रच रहे हैं, जहां वे रहते हैं। जैसे ओडिया, बांग्ला, गुजराती-राजस्थानी या फिर असमिया में। हिंदी, बांग्ला और ओडिया में लिखी जा रही आदिवासी रचनाओं और झारखंड के मुण्डा एवं द्रविड़ भाषा परिवारों में लिखे साहित्य के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि आदिवासी लेखन में भिन्न-भिन्न भाषाओं के बावजूद उनकी दार्शनिक पृष्ठभूमि एक-सी है। विषय, कथ्य और प्रस्तुति शैली में जरूर अन्य क्षेत्रीय भाषायी समाजों का प्रभाव पड़ा है लेकिन दृष्टि आदिवासी ही है। हिंदी में लिखित पीटर पॉल एक्का का बहुचर्चित उपन्यास ‘जंगल के गीत’  हो या डॉ. रोज केरकेट्टा के ‘पगहा जोरी-जोरी रे घाटो’ कथा-संग्रह की कहानियां, हिंदी में गैर-आदिवासियों द्वारा किए गए लेखन से बिलकुल अलग हैं। इसी तरह बांग्ला में महाश्वेता देवी के मुकाबले संताली कथा लेखकों की कहानियां और उपन्यास आपको भिन्न धरातल पर ले जाती हैं। ओडिया में रघुनाथ मुर्मू का लेखन सीधे-सीधे आदिवासी जीवन-दर्शन की बात करता है। यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि दलित साहित्य की वैचारिकी की तरह आदिवासी साहित्य में स्वानुभूति अथवा सहानुभूति का प्रश्न प्रमुख नहीं है। आत्मकथाओं पर भी आप आदिवासी साहित्य में जोर नहीं पाएंगे। स्त्रीवादी सवाल की भी अनुपस्थिति यहां है। यहां प्रमुख है विश्व दृष्टिकोण। एक भिन्न और विशिष्ट संस्कृति की दृष्टि और उसका जीवनदर्शन। जिसके केन्द्र में पूरी समष्टि है सिर्फ इंसान नहीं।
कहानीकार व कवि अश्विनी कुमार पंकज पाक्षिक बहुभाषी आदिवासी अखबार ‘जोहार दिसुम खबर’ तथा रंगमंच प्रदर्शन कलाओं की त्रैमासिक पत्रिका ‘रंगवार्ता’ के संपादक हैं
फारवर्ड प्रेस की साहित्‍य वार्षिकी, मई, 2014 में प्रकाशित

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